भारत में खाद्य सुरक्षा : दशा, दिशा और भावी परिदृश्य

Submitted by Hindi on Fri, 02/24/2017 - 13:01
Source
कुरुक्षेत्र, फरवरी, 2017

आज हमारे देश के अन्न भण्डारों में लगातार बढ़ती आबादी को पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने की सामर्थ्य है और किसी आकस्मिकता से निपटने के लिये यथेष्ट अनाज सुरक्षित भण्डारों में भी मौजूद है। हरे-भरे खेतों में उपजे अनाज को देश के कोने-कोने तक पहुँचाने और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को कम कीमत पर अनाज उपलब्ध कराने की एक मजबूत प्रणाली भी काम कर रही है। इसलिये तमाम चुनौतियों के बावजूद खाद्य सुरक्षा का भविष्य उज्जवल और सुरक्षित दिखाई देता है।

scan0009अकाल और भुखमरी को करारी शिकस्त देकर भारत ने खाद्य सुरक्षा हासिल की है। आज हमारे देश के अन्न भण्डारों में लगातार बढ़ती आबादी को पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने की सामर्थ्य है और किसी आकस्मिकता से निपटने के लिये यथेष्ट अनाज सुरक्षित भण्डारों में भी मौजूद है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को कम कीमत पर अनाज उपलब्ध कराने के साथ-साथ सामाजिक कल्याण की अनेक योजनाओं के माध्यम से विशेष रूप से बच्चों और महिलाओं के लिये पर्याप्त आहार और पोषण की व्यवस्था की गई है। देश की लगभग 1.30 अरब आबादी के लिये खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में कृषि अनुसंधान एवं विकास ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है, जिससे फसल, बागवानी और पशु-पक्षी उत्पादों के कुल उत्पादन और उत्पादकता में क्रांतिकारी वृद्धि हुई है। यह क्रम और प्रयास पहले से अधिक गहनता और तत्परता के साथ जारी हैं, इसलिये तमाम चुनौतियों के बावजूद खाद्य सुरक्षा का भविष्य उज्जवल और सुरक्षित दिखाई देता है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार खाद्य सुरक्षा का अर्थ है, “सभी व्यक्तियों की सभी समय पर्याप्त, सुरक्षित और पोषक आहार तक भौतिक, सामाजिक और आर्थिक पहुँच हो और जो उनके सक्रिय तथा स्वस्थ जीवन के लिये उनकी आहार आवश्यकताओं तथा भोजन वरीयताओं को भी संतुष्ट करें।” इस परिभाषा के अनुसार खाद्य सुरक्षा में स्वाभाविक रूप से पोषण सुरक्षा का भी समावेश है। भारत ने पोषण सुरक्षा के नजरिए से भी उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं, जिनका प्रभाव सामाजिक स्वास्थ्य के क्रमिक सुधार के रूप में दिखाई देता है।

खाद्य उत्पादन में क्रांति


सन 1960 के दशक में हरितक्रांति के सूत्रपात ने भारत को पहली बार अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया। इसी के साथ यह भी सुनिश्चित हुआ कि कृषि और सम्बन्धित उद्यमों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के दखल से उत्पादकता को कई गुना तक बढ़ाना संभव है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के नेतृत्व में इस ओर बढ़ाए गए ठोस कदमों और प्रयासों से आज अनाज उत्पादन बढ़कर 25.22 करोड़ टन (2015-16) तक पहुँच गया है। हाल के वर्षों में देश को कई बार सूखे जैसी दशाओं तथा प्राकृतिक आपदाओं की विपदा झेलनी पड़ी, परन्तु पूर्व तैयारी के कारण खाद्य उत्पादन पर इसका कोई विशेष प्रभाव देखने को नहीं मिला। वर्ष 2015-16 के दौरान चावल का 10.33 करोड़ टन, गेहूँ का 9.40 करोड़ टन और मोटे अनाजों का 3.77 करोड़ टन उत्पादन हुआ। दालों का उत्पादन 1.70 करोड़ टन से अधिक आँका गया और तिलहनों ने लगभग 2.60 करोड़ टन का आँकड़ा हासिल कर लिया। कृषि जिंसों के उत्पादन के ये प्रभावशाली आँकड़े कृषि अनुसंधान एवं विकास के साथ कृषि विकास एवं किसान कल्याण की उन योजनाओं की कामयाबी की ओर भी संकेत करते हैं, जिनके माध्यम से किसानों को उत्पादकता बढ़ाने के लिये तकनीकी सहायता, कृषि आदान, कृषि ऋण, बाजार सुविधा आदि उपलब्ध कराई गई। इन योजनाओं में हाल के वर्षों में प्रारम्भ की गई प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, राष्ट्रीय कृषि बाजार और परम्परागत कृषि विकास योजना प्रमुख हैं। उल्लेखनीय है कि इन योजनाओं के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों तक लाभ पहुँचाने का विशेष प्रयास किया गया, क्योंकि किसानों के इस वर्ग को देश की खाद्य और पोषण सुरक्षा का सबसे प्रमुख अंशदाता माना जाता है। इनके दो हेक्टेयर से कम जोत आकार के खेत देश के कुल कृषि क्षेत्र के लगभग 44 प्रतिशत भाग पर फसल उपजाकर खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाते हैं। कृषि उत्पादन में दर्ज की जा रही लगातार बढ़ोत्तरी के कारण दिसम्बर, 2016 में भारतीय खाद्य निगम के भण्डारों में कुल लगभग 276 लाख टन अनाज (चावल और गेहूँ) जमा था। यह मात्रा देश की आवश्यकता और सुरक्षित भण्डार के तय मानदंडों से अधिक है।

खाद्य के साथ पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से फलों और सब्जियों का उत्पादन बढ़ाने के लिये समग्र प्रयास किए गए, जिसके फलस्वरूप इस क्षेत्र में भारत ने विश्व में दूसरा स्थान हासिल कर लिया है। वर्ष 2014-15 में भारत ने 8.66 करोड़ टन फल और 16.94 करोड़ टन सब्जियों के उत्पादन का रिकॉर्ड बनाया। इसी वर्ष में भारत में लगभग 14.6 करोड़ टन दूध का उत्पादन किया गया, जो विश्व में सर्वाधिक है और एक कीर्तिमान भी है। दूध उत्पादन में इस क्रांतिकारी वृद्धि के कारण देश में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता वर्ष 1990-91 के 176 ग्राम से बढ़कर 2014-15 में 322 ग्राम तक पहुँच गई, जो विश्व औसत से अधिक है। इसी क्रम में वर्ष 2014-15 में अंडों का उत्पादन बढ़कर 78.48 अरब हो गया और पोल्ट्री मांस का उत्पादन 30.4 लाख टन पहुँच गया। इसी दौरान मछली उत्पादन बढ़कर 101.6 लाख टन दर्ज किया गया। खाद्य और पोषण को आधार देने वाली इन जिंसों के उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि से खाद्य और पोषण सुरक्षा को एक मजबूत आधार मिला है।

खाद्य सुरक्षा के लिये मिशन


लगातार बढ़ती आबादी के संदर्भ में खाद्य सुरक्षा को सतत बनाने के लिये भारत सरकार ने वर्ष 2007 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के नाम से एक व्यापक और महत्त्वाकांक्षी योजना प्रारम्भ की। इसका लक्ष्य ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-08 से 2011-12) के दौरान चावल के उत्पादन में एक करोड़ टन गेहूँ में 80 लाख टन और दालों में 20 लाख टन की वृद्धि करना था। इस अवधि के दौरान योजना ने अपने लक्ष्य से अधिक सफलता हासिल की, जिससे उत्साहित होकर मिशन को बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) के दौरान भी जारी रखा गया। परन्तु इस बार लक्ष्य को बढ़ाकर कुल खाद्यान्नों के लिये 250 लाख टन कर दिया गया है। साथ ही चावल, गेहूँ और दलहन के साथ मोटे अनाज, गन्ना, जूट और कपास को भी शामिल किया गया है। ग्यारहवीं योजना में मिशन के अंतर्गत केवल 15 राज्य शामिल किए गए थे, लेकिन अब इसे राष्ट्रव्यापी बनाकर 29 राज्यों के 638 जिलों में लागू कर दिया गया है। हाल में मिशन के अंतर्गत 93 ‘सीड हब’ (बीज केंद्र) स्थापित करने का निर्णय लिया गया, ताकि किसानों को सही समय और वाजिब कीमत पर उन्नत किस्मों के प्रमाणित बीज उपलब्ध हो सकें।

मिशन के अंतर्गत फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिये कुछ चुनिंदा सुविधाएँ तथा वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। चुने गए जिलों में वैज्ञानिक खेती के प्रदर्शन आयोजित किए जाते हैं, जिनमें बीज तथा अन्य महत्त्वपूर्ण कृषि आदानों को मुफ्त उपलब्ध कराया जाता है। उन्नत किस्मों के बीज की खरीद के लिये सब्सिडी की व्यवस्था है और नवीनतम किस्मों के बीज ‘सीड मिनीकिट’ के रूप में किसानों के बीच निःशुल्क बाँटे जाते हैं। फसल के लिये उपयोगी यंत्रों, कृषि रसायनों तथा उपचारों के लिये भी वित्तीय सहायता का प्रबंध किया गया है। अधिक से अधिक किसानों को नवीनतम तकनीकों तथा लाभकारी जानकारी से सशक्तीकरण करने के लिये ‘किसान फील्ड स्कूल’ के आयोजन में भी आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाती है। गेहूँ की खेती के लिये पम्पसेट की खरीद पर भी वित्तीय सहायता दी जाती है। दालों की खेती को बढ़ावा देने के लिये उपर्युक्त सुविधाओं के अलावा फव्वारा सिंचाई प्रणाली (स्प्रिंकलर सेट) की स्थापना पर सहायता का प्रावधान है। दलहनी फसलों के खेत की नीलगाय से सुरक्षा के लिये भी विशेष बजट का प्रावधान किया गया है। मिशन के अन्तर्गत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले राज्यों/जिलों को राष्ट्रीय/राज्य-स्तर पर पुरस्कृत एवं सम्मानित करने की व्यवस्था भी है।

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ताकि सबको मिले अन्न


भारत जैसे विशाल और आर्थिक विषमताओं वाले देश में दूर-दराज के दुर्गम इलाकों तक और समाज के सबसे कमजोर वर्ग तक अनाज की भौतिक और आर्थिक पहुँच सुनिश्चित करना एक कठिन चुनौती है। परन्तु अनुकूल, नीतियों, कारगर योजनाओं और प्रभावी क्रियान्वयन ने इस कार्य को बखूबी अंजाम दिया है। सन 1960 के दशक में देश भर में स्थापित की गई सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का उद्देश्य समाज के सभी वर्गों तक वाजिब कीमत पर अनाज को सुलभ कराना था, जिससे देश में अनाज की कमी होने पर भी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित रहे। इसके लिये अनाज की खरीद, भण्डारण, परिवहन और आम जनता तक वितरण की एक मजबूत प्रणाली विकसित की गई, जिसमें उपभोक्ता को उचित कीमत की राशन की दुकानों के जरिए एक निश्चित मात्रा में अनाज उपलब्ध कराया जाता है। परन्तु समय के साथ अनाज उत्पादन और सामाजिक-आर्थिक स्तर में हुए बदलाव के कारण इस प्रणाली की नीति में भी लगातार बदलाव हुआ और आज इसे लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) के रूप में लागू किया जा रहा है।

इसकी शुरुआत सन 1997 में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे परिवारों (बीपीएल) को प्रत्येक महीने 10 किलोग्राम अनाज कम कीमत पर उपलब्ध कराने के साथ की गई। इस तरह सार्वजनिक वितरण प्रणाली में पहली बार केवल गरीब वर्ग को लक्ष्य बनाया गया, परन्तु गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों को इस सुविधा से वंचित नहीं किया गया। लेकिन इनके लिये अनाज की कीमत अपेक्षाकृत अधिक रखी गई। अनाज की उपलब्धता बढ़ने के साथ अनाज की मात्रा भी बढ़ती गई और आज प्रत्येक गरीब परिवार को 35 किलोग्राम अनाज प्रत्येक महीने उपलब्ध कराया जाता है। टीपीडीएस को केंद्र और राज्य सरकारों की साझेदारी से लागू किया जा रहा है। केंद्र द्वारा अनाज की खरीद और सुरक्षित भण्डारण की व्यवस्था की जाती है तथा प्रत्येक राज्य को माँग के अनुसार अनाज आवंटित किया जाता है। जबकि राज्यों पर निर्धारित केंद्रों से अनाज को उठाने और राशन की दुकानों के माध्यम से वितरण की जिम्मेदारी होती है।

गरीब परिवारों की पहचान करके उन्हें कार्ड जारी करने और अनाज की वाजिब कीमत तय करने का अधिकार भी राज्य सरकार के पास होता है। टीपीडीएस को अधिक कुशल, पारदर्शी और असरदार बनाने के लिये राज्य सरकारों ने अपने-अपने स्तर पर अनेक उपाय किये हैं, जिनमें आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है। ‘डिजिटल इंडिया’ के अंतर्गत कई राज्यों ने इस प्रणाली को ‘ऑनलाइन’ कर दिया है, जिसके द्वारा अनाज की प्राप्ति, परिवहन की स्थिति, जारी अनाज की मात्रा और बीपीएल कार्डधारकों के विवरण तथा अन्य जानकारी पारदर्शी रूप से सबके सामने हैं। केंद्र सरकार विशेष प्रयास करके देश के दुर्गम इलाकों जैसे उत्तर-पूर्व के पहाड़ी क्षेत्र, हिमालयी क्षेत्र आदि में अनाज पहुँचा रही है और प्राकृतिक आपदा से ग्रस्त राज्यों को निर्धारित कोटा से अधिक अनाज भेजकर तुरन्त राहत पहुँचाई जाती है।

खाद्य सुरक्षा के दायरे को व्यापक बनाने और समाज के गरीब से गरीब तबके तक अनाज पहुँचाने के उद्देश्य से सन 2000 में अन्त्योदय अन्न योजना प्रारम्भ की गई। दरअसल समाज के कुछ गरीब परिवार ऐसे भी हैं, जो राशन की दुकानों से कम कीमत पर अनाज खरीदने में भी सक्षम नहीं हैं और अनुमान के अनुसार इनकी संख्या भी करोड़ों में है। इनकी पारिवारिक आमदनी 250 रुपये प्रतिमाह से भी कम है। इन परिवारों को पहचान कर इनके लिये विशेष अन्त्योदय कार्ड बनाए गए, जिनके आधार पर इन परिवारों को प्रतिमाह 35 किलोग्राम अनाज उपलब्ध कराया जाता है, जिसकी कीमत गेहूँ के लिये मात्र दो रुपये प्रति किलो और चावल के लिये तीन रुपये प्रति किलो तय की गई है। इस योजना ने देश के निर्धनतम परिवारों को भी खाद्य सुरक्षा दी है।

देश के प्रत्येक नागरिक के लिये खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के क्रम में सबसे बड़ा और व्यापक कदम सन 2013 में उठाया गया, जब भारत सरकार ने खाद्य सुरक्षा को नागरिकों का अधिकार मानते हुए एक कानून बनाया। इसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के रूप में संसद द्वारा पारित किया गया और राज्य सरकारों से इसके प्रावधान लागू करने की अपील की गई। इसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों की 75 प्रतिशत आबादी और शहरों की 50 प्रतिशत आबादी को बेहद कम कीमत पर टीपीडीएस के अंतर्गत अनाज उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है। इस तरह देश की लगभग 67 प्रतिशत आबादी खाद्य सुरक्षा के दायरे में आ गई है। इसके अंतर्गत चुने हुए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिमाह पाँच किलोग्राम अनाज उपलब्ध कराया जाता है, जिसकी कीमत चावल के लिये तीन रुपये, गेहूँ के लिये दो रुपये और मोटे अनाजों के लिये एक रुपये प्रति किलो रखी गई है। इसके अंतर्गत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा शिशु को दूध पिलाने वाली महिलाओं (शिशु के जन्म के छह महीने बाद तक) को पोषक आहार दिए जाने की व्यवस्था भी की गई है। इस विशेष अधिनियम को 32 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में लागू कर दिया गया है, जिससे करोड़ों बच्चों और महिलाओं की खाद्य तथा पोषण सुरक्षा सुनिश्चित हुई है।

बच्चों में स्कूल जाने की आदत को बढ़ावा देने और उनका पोषण-स्तर सुधारने के उद्देश्य से सन 1995 में देश के लगभग 2,400 ब्लॉकों में मध्यान्ह आहार योजना (मिड डे मील स्कीम) लागू की गई। इसके अंतर्गत सरकारी तथा सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल के प्राइमरी दर्जे के छात्रों को पोषक आहार दिया जाता है, जिससे बच्चों के स्तर पर पोषण सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। इसकी कामयाबी से उत्साहित होकर इसे पूरे देश के सभी ब्लॉकों में लागू किया गया और पोषक आहार के मानदंड भी बदले गए। साथ ही इसका दायरा भी व्यापक बनाया गया। अब इसमें प्राइमरी तथा अपर-प्राइमरी, दोनों ही दर्जों के छात्रों को शामिल कर लिया गया है तथा आहार में अनाज के साथ दालों और सब्जियों को भी उचित अनुपात में शामिल किया गया है, लेकिन पोषक गुणवत्ता बनाए रखने के लिये तेल और वसा के उपयोग को सीमित किया गया है। इस तरह देश के लगभग 11-12 करोड़ स्कूली छात्रों की पोषण सुरक्षा सुनिश्चित हो रही है। शिशुओं और माताओं की पोषण सुरक्षा और विकास को बढ़ावा देने के लिये भारत सरकार द्वारा सन 1975 से एक व्यापक ‘समेकित बाल विकास योजना’ (आईसीडीएस) लागू की जा रही है। इसके अंतर्गत छह वर्ष तक की आयु के बच्चों और उनकी माताओं को पोषक आहार उपलब्ध कराया जाता है। साथ ही पूरक आहार और प्रारम्भिक स्तर की शिक्षा की व्यवस्था भी रहती है। इस योजना से छह वर्ष की आयु तक के लगभग तीन करोड़ 40 लाख बच्चों और लगभग 70 लाख महिलाओं को लाभ मिल रहा है।

चुनौतियाँ भी कम नहीं

देश की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को लम्बे समय तक सतत बनाए रखना एक कठिन चुनौती है, क्योंकि आबादी में लगातार विस्तार हो रहा है, शहरीकरण बढ़ता जा रहा है और नागरिकों की आमदनी बढ़ने से भोजन की माँग और विविधता में भी वृद्धि दर्ज की जा रही है। यदि इस भावी परिदृश्य को वर्ष 2050 के नजरिए से देखा जाए तो भारत की आबादी लगभग 1.65 अरब तक और प्रति व्यक्ति आमदनी 4,01,839 रुपये तक पहुँचने की सम्भावना है। उस समय देश में 50 प्रतिशत से अधिक आबादी शहरी क्षेत्रों में बसी होगी, जिससे कृषि के आधार को चोट पहुँचने की आशंका जताई जा रही है। अध्ययनों से पता चला है कि यदि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सात प्रतिशत की वृद्धि दर मानी जाए तो वर्ष 2050 में अनाज की माँग 50 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, जबकि फलों, सब्जियों और पशु उत्पादों में 100 से 300 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है। इसका एक अर्थ यह भी है कि प्रति व्यक्ति कैलोरी माँग 3,000 किलो कैलोरी से अधिक हो सकती है। इसके लिये खाद्यान्नों की उत्पादकता वर्तमान 25,000 किलो कैलोरी प्रति हेक्टेयर प्रतिदिन से बढ़ाकर 46,000 किलो कैलोरी प्रति हेक्टेयर प्रतिदिन के स्तर पर ले जानी होगी। इस हिसाब से अनुमान लगाया गया है कि देश में खाद्यान्नों की माँग 45 करोड़ टन तक पहुँच सकती है। इसी तरह दालों, खाद्य तेलों, दूध, माँस, अंडा, फलों, सब्जियों, चीनी तथा अन्य कृषि जिंसों की माँग भी इसी अनुपात में या इससे अधिक बढ़ सकती है। उत्पादकता के इस स्तर तक पहुँचने की सम्भावनाओं से पहले कुछ कठिन बाधाओं पर ध्यान देना और उनका आकलन करना आवश्यक है।

गर्माती धरती या ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की वैश्विक विपदा को खाद्य सुरक्षा के लिये सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है। वैज्ञानिक अनुमान बताते हैं कि यदि हम औसत तापमान की बढ़ोत्तरी पर कोई सार्थक रोक लगा नहीं पाते तो सन 2050 तक औसत तापमान में 2.2 से 2.9 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हो सकती है। इससे रबी और खरीफ फसलों के साथ फलों, सब्जियों, दूध उत्पादन तथा मछली उत्पादन पर भी चोट पड़ने की सम्भावना जताई जा रही है। अनुमान है कि तापमान बढ़ोत्तरी के वर्तमान रुख के अनुसार वर्ष 2050 तक गेहूँ के कुल उत्पादन में 01 करोड़ 17 लाख टन तक की कमी आ सकती है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक में बारानी चावल का उत्पादन 10-15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, परन्तु पंजाब और हरियाणा में इसमें 15-17 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। देश के अन्य क्षेत्रों में भी चावल का उत्पादन 6-18 प्रतिशत तक गिर सकता है। सन 2050 तक दूध के उत्पादन में लगभग डेढ़ करोड़ की गिरावट की आशंका जताई गई है। तापमान बढ़ने से हमारे देश के शीतोष्ण क्षेत्रों में उगने वाले फलों के क्षेत्र और उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसी तरह सागरों और नदियों का औसत तापमान बढ़ने से मछली उत्पादन पर भी बुरा असर पड़ेगा।

खाद्य सुरक्षा को सतत बनाए रखने के लिये आवश्यक भूमि की उपलब्धता भी लगातार कम होती जा रही है। वर्ष 2050 में प्रति व्यक्ति भूमि उपलब्धता 2010-11 के 0.13 हेक्टेयर से घटकर मात्र 0.09 हेक्टेयर रह जाएगी, जो एक चिंता का विषय है। इसके साथ कृषि भूमि का लगातार अन्य विकास कार्यों तथा आवास के लिये उपयोग होना भी खाद्य सुरक्षा के लिये एक संकट है। इसी तरह सिंचाई के पानी की लगातार कमी होना भी एक गम्भीर संकट की ओर इशारा करता है। अनुमान है कि तमाम प्रयासों के बावजूद देश की 50 प्रतिशत से अधिक कृषि फसलें बारानी दशाओं में उगाई जाएँगी, यानी वर्षा पर निर्भर रहेंगी। इस दशा में प्रति हेक्टेयर उत्पादकता को बढ़ाना अधिक कठिन हो जाएगा। कृषि के लिये ऊर्जा की कमी, भूमि का क्षरण और जैव विविधता का ह्रास भी खाद्य सुरक्षा को चोट पहुँचाने वाले अन्य महत्त्वपूर्ण कारक हैं। पशुओं में महामारी प्रकोप की सम्भावना को भी खाद्य सुरक्षा के लिये एक प्रमुख खतरा माना जा रहा है, जिसमें पोल्ट्री और मछली पालन भी शामिल हैं।

अवसर और सम्भावनाएँ


खाद्य सुरक्षा पर मंडराते खतरों को भाँपते हुए राष्ट्रीय-स्तर पर विशेष कार्य योजनाएँ बनाई गई हैं, जो खाद्य सुरक्षा को सतत बनाने में सहायक होंगी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के नेतृत्व में देश में ‘क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर’ विकसित करने की ठोस पहल की गई है। इसके लिये राष्ट्रीय-स्तर की परियोजना लागू की गई है, जिसके अंतर्गत किसानों को जलवायु अनुकूल कृषि तकनीकें अपनाने के लिये जागरूक एवं सक्षम बनाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि कृषि अनुसंधान एवं विकास के माध्यम से प्रमुख फसलों की जलवायु अनुकूल किस्में विकसित की जा रही हैं, जिनमें प्राकृतिक आपदाओं जैसे सूखा, बाढ़, अत्यधिक गर्मी या सर्दी को सहने की क्षमता मौजूद होती है। इसी प्रकार जलवायु अनुकूल कृषि विधियों का विकास किया गया है। सिंचाई के पानी की कुशलता बढ़ाने के लिये टपक सिंचाई, फव्वारा सिंचाई जैसी सूक्ष्म और कुशल तकनीकें विकसित की गई हैं, जिनका किसानों के खेतों तक प्रसार किया जा रहा है। इस कार्य में तेजी लाने के लिये ‘पर ड्रॉप, मोर क्रॉप’ जैसा राष्ट्रीय कार्यक्रम लागू किया जा रहा है। भूमि की उर्वरता को सतत बनाए रखने के लिये ‘स्वस्थ धरा, खेत हरा’ जैसे कार्यक्रम शुरू किये गये हैं, जिसके अंतर्गत किसानों को बड़े पैमाने पर ‘सॉयल हेल्थ कार्ड’ जारी किये जा रहे हैं। फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिये जीन परिवर्तन या जेनेटिक इंजीनियरी की बेहद क्षमतावान विद्या तकनीकी रूप से हमारे पास उपलब्ध है, जिसका उपयोग करके कृषि क्षेत्र में चमत्कारी बदलाव लाए जा सकते हैं। परन्तु इसके उपयोग के लिये सरकारी नीति और संस्तुति की आवश्यकता है, जो अभी न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण लम्बित है। परन्तु यह बात तय है कि भविष्य में यह तकनीक खाद्य सुरक्षा को सतत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाने वाली है।

हाल के वर्षों में सतत कृषि की अवधारणा भी विकसित हुई है, जिसके अंतर्गत प्राकृतिक संसाधनों के कुशल और सतत उपयोग द्वारा कृषि प्रक्रियाएँ सम्पन्न की जाती हैं। उर्वरकों और कीटनाशकों के संदर्भ में नैनो-टेक्नोलॉजी का उपयोग नई सम्भावनाएँ उत्पन्न कर रहा है। इसी प्रकार यंत्रीकरण और कृषि में ऊर्जा के उपयोग के क्षेत्र में भी नवोन्मेषों द्वारा कृषि उत्पादन को अधिक कुशल और सक्षम बनाने की अनेक सम्भावनाएँ मौजूद हैं। साथ ही बदलते परिवेश के अनुसार नई नीतियों और योजनाओं की आवश्यकता भी होगी। उदाहरण के तौर पर फसल कटाई, प्रसंस्करण, भंडारण और वितरण के दौरान होने वाले नुकसान को कम करने के लिये हमें एक स्पष्ट और कारगर नीति बनानी होगी। इसी तरह भोजन की बर्बादी पर भी प्रभावी अंकुश लगाना जरूरी हो गया है। सरकार द्वारा लागू की जा रही समाज कल्याण योजनाओं को अधिक मजबूत और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है, ताकि समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को लगातार खाद्य सुरक्षा का लाभ मिलता रहे। खाद्य सुरक्षा के भविष्य को लेकर सरकार, योजनाकार और अन्य सम्बन्धित लगातार गहन विचार-विमर्श करते हुए नई पहल कर रहे हैं। इसलिये आशा के साथ विश्वास भी है कि भारत में खाद्य सुरक्षा निरंतर और सतत बनी रहेगी।

लेखक परिचय


(पूर्व प्रधान सम्पादक (हिंदी प्रकाशन), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा रोड, नई दिल्ली)ई-मेल : jgdsaxena@gmail.com

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