भूमि सुधार एजेण्डा से गरीबी उन्मूलन

Submitted by birendrakrgupta on Fri, 01/09/2015 - 13:18
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योजना, नवम्बर 2013
जमीनी स्तर पर स्थिति का आकलन करने पर संविधान में वर्णित जीने के अधिकार की प्रभावहीनता का अन्दाजा लगाया जा सकता है। बड़ी संख्या में लोग अब भी जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें जीने के संसाधनों जैसे— जल, जंगल और जमीन आदि उपलब्ध ही नहीं हैं।भूमि सुधार की अनुशंसाओं की पृष्ठभूमि में जो तथ्य मैं रखने जा रहा हूँ, उस सन्दर्भ में मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि यह लगातार एक साल तक भारत के 24 राज्यों के 350 जिलों की 80 हजार कि.मी. की यात्रा के इर्द-गिर्द रखी गई हैं। इस दौरान हजारों लोगों से मेरी मुलाकात हुई। इनमें से कई यात्राएँ लोक सुनवाइयों के दौरान हुईं, जो समुदायों पर प्रभाव डालती हैं और बौद्धिकों और मध्यवर्गीय लोग भी इसमें शामिल होते हैं।

अपनी यात्राओं के दौरान मैंने देखा कि बड़े पैमाने पर हाशिये के लोगों में भूमिहीनता की स्थिति है। कई समर्पित लोग, स्वयंसेवी संस्थाएँ, समुदाय आधारित सामाजिक आन्दोलन में लगे लोग इस समस्या को सुलझाने में लगे हैं और उन्हें काफी विरोधों का सामना भी करना पड़ता है। मुझे बताया गया कि लगभग 29 हजार दलित गाँव ऐसे हैं, जिन्हें मृत शरीर के अन्तिम संस्कार करने या दफनाने के लिए जमीनें नहीं मिलतीं। कई गाँवों में लोगों के घरों में न शौचालय हैं और न ही खुली जगह, जहाँ वे नित्य क्रिया कर सकें। पाठकों को इन तथ्यों से वंचित लोगों की भूमिहीनता और देश के विभिन्न हिस्सों में अब भी मौजूद उनकी दयनीय स्थिति का अन्दाजा सहज मिल सकता है।

इस प्रकार जमीनी स्तर पर स्थिति का आकलन करने पर संविधान में वर्णित जीने के अधिकार की प्रभावहीनता का अन्दाजा लगाया जा सकता है। बड़ी संख्या में लोग अब भी जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें जीने के संसाधनों जैसे— जल, जंगल और जमीन आदि उपलब्ध ही नहीं हैं।

कई द्रष्टव्य कारकों में से कुछ कारक इस प्रकार हैं, जो भूमि पर दबाव को इंगित करते हैं :

1 दक्ष कारीगरों जैसे बढ़ई, लोहार, बुनकर आदि को वापस कृषि मजदूर के रूप में काम करना पड़ता है, क्योंकि उनके पास काम के अवसर नहीं हैं।
2. जमीन मालिक अपनी जमीन का और विस्तार चाहते हैं, ताकि कृषि योग्य भूमि उनके पास ज्यादा हों।
3. उद्योगों और आधारभूत संरचनाओं के लिए जमीन की माँग लगातार बढ़ रही है।
4. जिनके पास धन है, वे जमीन में निवेश करते हैं, ताकि अपने मनोरंजन के लिए फॉर्म हाउस बनवा सकें और उनकी जमीन की कीमत में इजाफा हो।
5. रियल एस्टेट बाजार का हिस्सा जमीन ही बन गई है, इसलिए कृषि से रियल एस्टेट की तरफ झुकाव बढ़ा है।

अगर हम व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य में जमीन की बात करें, खासकर भूमिहीनों के सन्दर्भ में तो हम दो तरह की भूमि की बात करते हैं :

1. सिर पर छत के लिए जमीन- 4.4 करोड़ लोगों के सिर पर छत नहीं है।
2. कृषि भूमि- 30 करोड़ लोगों को कृषि के लिए जमीन चाहिए।

जब हम भूमिहीन गरीबों की बात करते हैं, तो लगभग 38.2 फीसदी आबादी को निम्न समुदायों में वर्गीकृत किया जा सकता है :

दलित- 18 प्रतिशत
आदिवासी- 8 प्रतिशत
घुमक्कड़- 11 प्रतिशत (बी.आर. रेंके की रिपोर्ट)
मछुआरे- 1.2 प्रतिशत
कुल- 38.2 प्रतिशत इनमें भूमिहीन गरीबों के अन्य जाति समूह शामिल नहीं हैं।

4.4 करोड़ लोगों के सिर पर छत नहीं है। 30 करोड़ लोगों को कृषि के लिए जमीन चाहिए।आखिर किस किस्म के नीति विचलन की अनुशंसा हम कर रहे हैं? पहला, जिनके सिर पर छत नहीं है, वह सबसे गम्भीर समस्या है, क्योंकि वे अपनी पहचान और सम्मान के बिना जीने को विवश हैं। सिर्फ आवास योजना से यह समस्या हल नहीं होगी, बल्कि उनकी भूमिहीनता और आवासहीनता को एक समयबद्ध अभियान चला कर हल करना होगा। दूसरा, लोगों को आवास के लिए दी जाने वाली जमीन को आवास योजना के साथ सम्बद्ध नहीं करना होगा (घर बनाने के लिए पैसा देना), क्योंकि गरीब लोगों के पास यदि जमीन होगी, तो वे सुरक्षित तरीके से अपना आवास तैयार कर ही लेते हैं। तीसरा, जमीन का एक टुकड़ा (ग्रामीण इलाकों में 10 छटांक) और शहरी इलाकों में ढंग के आवास के लिए समुचित स्थान मुहैया करा देने से भारत के लाखों लोगों को हम पहचान और आत्मसम्मान दे पाएँगे। चैथा, ऐसी छत जो ढह न जाए, जल्दी टूटे नहीं, आगजनी का शिकार न हो और लम्बे समय के लिए वे उसमें रह पाएँ, ऐसा करने से सड़क के किनारे या रेल की पटरियों के किनारे रहने वाले लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव आ सकता है। इससे लोगों के जीवन में स्थायित्व आएगा और वे अपने बच्चों का भविष्य और स्वास्थ्य सुनिश्चित कर पाएँगे।

इस समस्या के अन्दर झांकते हुए अगर उन लोगों के जीवन को देखकर समझा जाए, तो फिलहाल एक जमीन के टुकड़े पर घर बना कर रहते हैं और उनके बीच मतभेद नहीं हुआ करते। अगर ये जमीनें उनके नाम कर दी जाएँ, तो वे खुद को सुरक्षित महसूस करेंगे और बेहतरी के लिए बैंक और दूसरी वित्त संस्थाओं से मदद के लिए उनका रुख करेंगे। जिन जगहों पर जमीन को लेकर मतभेद हैं, वहाँ की स्थानीय सरकारों को हाशिये पर रहने वालों के हित में कदम उठा कर मामले को सुलझाने की कोशिश करनी होगी। उद्योग, खनन, डैम आदि के विस्थापित समुदायों के मामले में नये एलएआरआर अधिनियम के तहत समयबद्ध तरीके से मामले को सुलझाया जा सकता है। सामान्य या सामुदायिक जमीनें, जिन पर शक्तिशाली लोगों ने कब्जा कर रखा है, उन्हें छुड़ा कर गरीबों को छत दी जा़ सकती है। जिन जगहों पर उपरोक्त तरीके से समस्या नहीं सुलझायी जा सकती, वहाँ सरकारें जमीन खरीद कर ग्रामीण और भूमिहीन लोगों को स्थापित कर सकती है।

लोग और उनकी स्थिति


निम्न सूचीबद्ध लोगों में से कई की स्थिति काफी दयनीय है और वे भूमिहीनता की स्थिति में हैं। ये लोग हैं :

1. उद्योगों, खनन, डैम और अन्य लोक आधारभूत विकास परियोजनाओं द्वारा विस्थापित आदिवासी।
2. घुमन्तू जातियाँ जैसे—सँपेरे, जिप्सी, राणा प्रताप राजघराने के छोटे सर्कस के कलाकार, जो हमेशा से कहीं बसना चाहते हैं, क्योंकि वे अपना पारम्परिक पेशा जारी नहीं रख पाते।
3. देश के विभिन्न भागों के वे लोग जो बाढ़ जैसी आपदा में अपना सब कुछ खो चुके हों।
4. वैसे लोग जो आन्तरिक हिंसा के शिकार हैं, उनका कोई स्थायी बसेरा नहीं रह जाता।
5. वे लोग काम की तलाश में प्रवास करते हैं और अस्थायी निवास में रहते हैं।
6. घरेलू नौकर और अनौपचारिक क्षेत्र के कामगार, जो इतना कमा नहीं पाते कि भाड़े पर मकान भी ले सकें।
7. मछुआरे, जो सूनामी या पर्यटन परियोजनाओं के कारण समुद्र छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं।
8. चाय बागानों के आदिवासी, एचआईवी संक्रमित लोग, मुक्त कराए गए बँधुआ मजदूर, कुष्ठ रोगी, ट्राँसजेण्डर लोग, बीड़ी मजदूर, अकेली औरत और अन्य कई समूह, जो बिना आवास के रहते हैं।

उनकी आधारभूत जरूरतें क्या हैं?


विभिन्न समुदायों की कुछ आधारभूत जरूरतें इस प्रकार हैं :

1. कई लोग सालों से जमीन के एक टुकड़े पर खेती करते हैं। अगर कोई झंझट न हो, तो वह जमीन उनके नाम कर दिया जाना चाहिए।

2. कई के पास उनकी जमीनों के पर्याप्त कागजात हैं, लेकिन जमीन पर उनका कब्जा नहीं है। स्थानीय प्रशासन को इन समस्याओं को लेकर जिम्मेवारी उठानी चाहिए।

3. कई लोगों की जमीनें अपने ही समुदाय के ताकतवर लोगों द्वारा बलपूर्वक छीन ली़ गई हैं। यह कानून-व्यवस्था की समस्या है और स्थानीय प्रशासन को समयबद्ध तरीके से उन्हें उनकी जमीनों पर कब्जा दिलाना चाहिए।

4. कई लोगों की जमीनें बेनामी खरीद-फरोख्त के चलते ले ली गई हैं या बैंक द्वारा नीलाम कर दी गई हैं। प्रशासन को ऐसी जमीनों को चिह्नित करके उनके असल मालिक को कब्जा दिलवाना चाहिए।

5. कई प्रगतिशील कानून जैसे सीलिंग, टेनेंसी, पेसा, एफआरए आदि सही तरीके से क्रियान्वित नहीं की गई हैं। इनका कानूनी क्रियान्वयन कई लोगों की जिन्दगियाँ बदल सकता है।

6. गरीबों और हाशिये के लोगों के लिए आरक्षित भूमि जैसे तमिलनाडु में पंचनामी भूमि, महाराष्ट्र में गैरान भूमि और आन्ध्र प्रदेश में डीसी भूमि की पहचान कर योग्य भूमिहीन परिवारों के बीच बाँटी जा सकती है।

7. जिन भूमिहीनों को जमीनें दी जा चुकी हैं, उन्हें बिना भूमि के बदले भूमि की क्षतिपूर्ति के सेज या आधारभूत संरचनाओं के विकास के नाम पर वापस नहीं ली जानी चाहिए, क्योंकि ऐसा करना उनके साथ क्रूर मजाक ही होगा, क्योंकि वे अपनी जमीनों के बूते ही मुख्यधारा में शामिल हो रहे होते हैं।

8. कई सालों से जमीन जोत रहे किसानों के हक में वन और राजस्व विभाग के बीच मतभेदों का निपटारा शीघ्र किया जाना चाहिए। (जैसा कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच सन्तरा उत्पादकों के मामले सुलझाने से 37 लाख एकड़ भूमि के बँटवारे का मार्ग प्रशस्त हुआ)

9. भूदान की जमीनों की पहचान, आवंटन स्थापना भी निपटाए जाने चाहिए।

10. हर गाँव के भूमि रिकॉर्ड पारदर्शी होने चाहिए। आन्ध्र प्रदेश के वारंगल जिले के जिला कलेक्टर के प्रयासों की बानगी दी जा सकती है, जिसके कारण हाशिये के लोगों को फायदा हुआ।

11. सीलिंग के क्रियान्वयन में होने वाली गड़बड़ियों के लिए मनरेगा जैसी सोशल ऑडिट जरूरी है। ऐसे स्थान जहाँ सिंचित जमीन ज्यादा हैं और वे सीलिंग के तहत हैं, फिर से आवंटित किया जाना चाहिए।

12. पौधरोपण कम्पनियों की अधिकाई भूमि पुनर्वितरण के लिए वापस ले लेनी चाहिए।

13. कम्पनियों और धार्मिक संस्थाओं की अनुपयोगी जमीनें भूमिहीनों को दे देनी चाहिए, ताकि वे अनाज पैदा कर सकें।

14. भूमि को अनुपयोगी बनाए रखने का चलन खत्म होना चाहिए और उन्हें भूमिहीनों के हक में बाँट देना चाहिए।

15. एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड धारण प्रणाली का विकास किया जाना चाहिए, ताकि कोई व्यक्ति या परिवार देश के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न नाम से सीलिंग का उल्लंघन करते हुए जमीनें न बटोरता जाए।

16. किसी भी तरीके की बेनामी जमीन-होल्डिंग का चलन खत्म होना चाहिए।

17. फॉर्म हाउसों के चलन को हतोत्साहित करना चाहिए और उपलब्ध जमीनें अनाज पैदा करने के लिए भूमिहीनों के बीच बाँट देनी चाहिए।

18. भूमिहीनों को पर्याप्त जमीन उपलब्ध कराने के लिए सीलिंग की वर्तमान सीमा का पुनरीक्षण होना चाहिए। तकनीक के विकास से भूमि की उत्पादकता अब काफी बढ़ चुकी है, अतः सीलिंग की सीमा को नीचे लाकर अतिरिक्त जमीन का पुनर्वितरण कर देना चाहिए।

जमीन के मुद्दे से सम्बन्धित अनुशंसाएँ


भारत सरकार का दस सूत्री एजेण्डा ऐसी कुछ समस्याओं के निराकरण की दिशा में ठोस शुरुआत है। ये हैं :

1. राष्ट्रीय भूमि सुधार नीतियों पर राज्य सरकारों से समझौते।
2. लाखों लोगों, खासकर ग्रामीण इलाकों के लोगों के आवास की गारण्टी करने वाला राष्ट्रीय विधेयक।
4. वन भूमि से सम्बन्धित केन्द्रीय कानूनों का ठोस क्रियान्वयन।
5. औरतों को समानता के अधिकार को मजबूती देते हुए उन्हें भूमि स्वामित्व देना।
6. भूमि प्राधिकरणों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना।
7. सरकार और नागरिक समाज द्वारा संयुक्त रूप से मामलों पर नजर।

(लेखक गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता और नयी दिल्ली स्थित गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान के उपाध्यक्ष हैं। साथ ही वह एकता परिषद के अध्यक्ष भी हैं जिसने 2007 में अहिंसक भूमिहीन जनसन्देश यात्रा तथा 2012 में जनसत्याग्रह का आयोजन किया था।)
ई-मेल: ekta.rajagopal@gmail.com

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