भूतही-बलान : फिर बँधे दालान

Submitted by RuralWater on Sun, 08/23/2015 - 11:34
भूतही बलान एक छोटी नदी है। भारत-नेपाल सीमा पर लौकहा से महज 42 किलोमीटर दूर हिमालय की चूरे पर्वत शृंखला में केवल 910 फीट ऊँचाई से निकली है। भारत में प्रवेश के बाद यह नदी एक बड़े विस्तार में अपनी मर्जी से घूमा करती थी। एक बड़ी लहर की तरह इसका पानी इलाके में आता था, ज़मीन पर पतली मिट्टी, बालू पड़ जाता था और कई जगहों पर खेती पर असर पड़ता था मगर ऐसा शायद ही कभी होता हो कि किसान खाली हाथ खेत से वापस चला आए। कोई-न-कोई फसल जरूर हो जाती थी। अजीब नदी है यह जिसका न तो कोई निश्चित प्रवाह रहा है और न ही निश्चित तल। स्थानीय लोग बताते हैं कि यह नदी बरसात में देखते-देखते चढ़ जाती है। इसका पानी घरों में घुस जाता है, रास्ते बन्द हो जाते हैं और इसके पहले कि बचाव के लिये कुछ किया जा सके, यह नदी बालू की मोटी परत छोड़कर गायब हो जाती थी।

अनजान आदमी अगर नदी धारा में फँस गया तो पानी उसे पटक देगा और नदी की रेत उसे दफन कर देगी। उसमें से जिन्दा बच निकलना नामुमकिन है। वहीं आधे घंटे बाद जाइए तो सब शान्त, कहीं कुछ नहीं, पैदल पार कर जाइए नदी को। यही कारण है कि इस नदी में नाव नहीं चलती। कहते हैं कि जैसे भूतों का आना या जाना पता नहीं लगता, उसी तरह इस नदी का भी आना-जाना पता नहीं लग पाता। शायद इसीलिये इसे ‘भुतही’ नाम मिल गया।

भूतही बलान एक छोटी नदी है। भारत-नेपाल सीमा पर लौकहा से महज 42 किलोमीटर दूर हिमालय की चूरे पर्वत शृंखला में केवल 910 फीट ऊँचाई से निकली है। भारत में प्रवेश के बाद यह नदी एक बड़े विस्तार में (लौकहा से निर्मली तक) अपनी मर्जी से घूमा करती थी। एक बड़ी लहर की तरह इसका पानी इलाके में आता था, ज़मीन पर पतली मिट्टी, बालू पड़ जाता था और कई जगहों पर खेती पर असर पड़ता था मगर ऐसा शायद ही कभी होता हो कि किसान खाली हाथ खेत से वापस चला आए।

कोई-न-कोई फसल जरूर हो जाती थी। बालू पड़ने की जगहें भी बदलती रहती थी और आज़ाद रहने की वजह से नदी का पानी बड़े इलाके पर फैलता था जिससे इसकी बाढ़ का स्तर एक सीमा के अन्दर ही रहता था और नदी कभी खतरनाक नहीं हो पाती थी।

लोग नदी की शरारत और आँख मिचौली से वाक़िफ़ थे और इसी लुकाछिपी के बीच जीवन की धारा आराम से चला करती थी। बरसात के मौसम में नदी का बेताबी से इन्तजार होता था, उससे मिठाइयों की सौगात चढ़ाने का वायदा होता था और सही समय पर नदी में उफान आने को एक शुभ संकेत माना जाता था।

भूतही बलान के प्रवाह में बालू और सिल्ट की मात्रा बहुत अधिक है जिसकी वजह से नदी की धारा में परिवर्तन, साँप की तरह चलता प्रवाह मार्ग, किनारे तोड़कर बहना, नदी का छिछला और अस्थिर रहना आदि वह सभी गुण मौजूद हैं जिनसे आम लोगों के लिये परेशानी पैदा होती थी। इसकी नई-नई शाखाएँ फूटती हैं और साल या दो-चार-दस साल में मिट जाती हैं। पड़ोस में बहने वाली बिहुल नदी कई बार मिलती और बिछुड़ती है। वह गहरी धारा वाली नदी है, उछलती नहीं।

भूतही बलान से उत्पन्न परेशानियों का सामना करने की तैयारी लोगों में रहती थी। बाढ़ से बचाव के पारम्परिक तरीके में नदी के पानी के साथ-साथ उसमें आने वाली सिल्ट का भी पूरा-पूरा ख्याल रखा जाता था। तालाब, पोखर, डबरे आदि उसके साधन रहे हैं। नियमित अन्तराल पर उनकी सफाई करने और बालू-सिल्ट को निकालकर घाट पर डालने की व्यवस्था थी।

वैसे बाढ़ का पानी विस्तृत क्षेत्र में फैलने से उसका लेबल कम रहता था, जमीन की उर्वरा शक्ति कायम रहती थी और भूमि निर्माण की प्रक्रिया भी निर्बाध गति से चलती रहती थी। सबसे बड़ी बात की बाढ़ हर वर्ष आती थी और उसकी अपनी व्यवस्था थी।

बरसात के तीन महीनों की परेशानी के बाद खेती बम्पर होती थी। धान की जबरदस्त फसल के बाद दलहन-तिलहन और दूसरे अनाजों की पैदावार होती थी। धान की अच्छी फसल हो जाया करती थी क्योंकि किसानों के पास अलग-अलग बाढ़ की गहराई के लिये पारम्परिक ढंग से प्रचालित बीज हुआ करते थे। बाढ़ उतरने पर मिट्टी की बनावट बदलने या नदी में धारा परिवर्तन और सिंचाई की जरूरत के मुताबिक फसल लगाई जाती थी।

कई तरह के मोटे अनाज उपजाए जाते थे। अगर बाढ़ में धान की फसल नष्ट होती तो खेत की नमी रबी फसल में मदद करती थी। इस तरह, कुछ समय के लिये नदी और बाढ़ से परेशानी जरूर होती थी, मगर नदी की बाढ़ कभी मारक नहीं बन पाती थी। वर्षा न हो, तो बाढ़ से अधिक बड़ी समस्या होती है। पर तालाब और पोखर उससे निपटने में सहायक होते थे।

इसलिये भूतही बलान क्षेत्र के लोग नदी को वापस लाने के लिये मनौतियाँ मानते थे। इसे लेकर किस्से प्रचलित थे। एक था- “आयल बलान बान्धल दलान, गेल बलान भांगल दलान।’’ लोगों की चहेती यह नदी कोसी तटबन्ध की भेंट चढ़ गई।

पश्चिमी कोसी तटबन्ध के निर्माण से भूतही बलान के प्रवाह में बाधा आई। पहले नदी अपने पूरे फैलाव के साथ कोसी में समाहित होती थी। बाढ़ का पानी लम्बे क्षेत्र में फैला होने से बाढ़ का स्तर और प्रकोप अपने आप कम हो जाता था। पर तटबन्ध ने नदी के फैलाव को संकुचित और अत्यन्त सीमित कर दिया।

पश्चिमी तटबन्ध के हिस्सा के तौर पर निर्मली-घोघरडीहा रेल लाइन को ऊँचा किया गया था। उस तटबन्ध पर रेललाइन बिछी थी, इसलिये भुतही-बलान की बाढ़ के पानी को मार्ग देने के लिये अनेक पुल बने। भूतही बलान की मुख्य धारा पर पुल नम्बर 133 बना है।

वहाँ से निर्मली तक पूलों की एक शृंखला है। पर उन पुलों को नदी ने कुछ ही दिनों में भर दिया। अब कोसी तटबन्ध के बाहर भूतही बलान और उसकी तरह उत्तर पश्चिम से आकर कोसी में मिलने वाली दूसरी नदियों के पानी का फैलाव बढ़ता गया और खुद तटबन्ध पर हमले तेज हुए। इधर तटबन्ध के भीतर कोसी उफन रही थी। उसका पानी तटबन्धों तक पहुँचने और अधिक दिन टिकने लगा।

पश्चिमी कोसी तटबन्ध का निर्माण 1955-56 में आरम्भ हुआ था। उसके कुप्रभाव अगले ही साल दिखने लगे। 1960 आते-आते तटबन्ध के भीतर और बाहर पूरे इलाके तबाह हो गए। कभी भूतही बलान का पानी रेललाइन के ऊपर से बह जाता, कभी रेल लाइन टूट जाती। ट्रेन सेवाएँ कई-कई दौर में स्थगित होने लगी। तब सरकार ने भूतही बलान के झोंके से रेललाइन को बचाने के लिये एक मार्जिनल बाँध बनाया।

मर्जिनल बाँध में भूतही बलान की धारा के लिये केवल एक मार्ग दिया गया-पुल नम्बर 133 के सामने। मार्जिनल बाँध पर कुछ दूरी तक पक्की सड़क भी बनी है। पुल नहीं बन पाने से सड़क पूरी नहीं बनी। इससे पूरब के गाँवों और रेलवे स्टेशनों को भूतही बलान की बाढ़ के पानी से निजात जरूर मिली। पर रेलवे लाइन अर्थात पश्चिमी कोसी तटबन्ध और मार्जिनल बाँध के सामुहिक प्रभाव से पश्चिम अर्थात तटबन्ध के बाहर के गाँवों की तबाही बहुत बढ़ गई। उधर भूतही बलान पर तटबन्ध बनाने की माँग उठी। इधर कोसी तटबन्ध के भीतर कोसी की बाढ़ ने गाँवों, घरों, खेतों और पोखरों-तालाबों को बालू मिट्टी से भर दिया।

उन दिनों हुई तबाही के किस्से बहत्तर वर्षीय गंगा प्रसाद मुखिया की स्मृति में सुरक्षित है। गंगा प्रसाद का घर पश्चिमी कोसी तटबन्ध के भीतर मैनही पंचायत के पलसाहा गाँव में है। उनके गाँव में अधिक आबादी मल्लाह और केवट जाति के लोगों की है। बताते हैं कि ‘‘जब कोसी आई तब हालत बिगड़ गई। कुआँ, तालाब सब भर गया। लोग कोसी का पानी पीते भी थे। घोघरडीहा बाजार जाने के लिये नाव की व्यवस्था हुई। पर गाँव काफी गरीब हो गए थे। घोघरडीहा बाँध (पश्चिमी कोसी तटबन्ध का हिस्सा) बनने के बाद बाढ़ अधिक विकराल हो गई थी। पहले जब बलान आती थी, तब बहुत अच्छी जमीन थी। अच्छी खेती होती थी। लेकिन भूतही बलान का पानी आना बन्द हो जाने केे बाद उनका चक्र एकदम बिगड़ गया। कोसी ने मिट्टी-बालू भर देने के बाद आना छोड़ दिया। अब खेती के लिये मिट्टी और पानी की घोर कमी हो गई। चारों ओर कास-पटेर उग गए थे।”

1962 में 22 अगस्त से 1 सितम्बर के बीच भुतही-बलान में जबरदस्त बाढ़ आई। बाढ़ का पानी लम्बे समय तक टिके रहने के कारण ग्रामीणों की भोजन की व्यवस्था चरमरा गई और अगली फसल से उत्पादन की सम्भावना जाती रही। बड़ी संख्या में घर गिर गए। गाँवों और रास्तों पर 2-2 मीटर से अधिक गहराई तक पानी था। लोगों को पेड़ों पर, छप्परों पर या फिर चौकी पर चौकी सजाकर रहने की व्यवस्था करनी पड़ी। नावों का एकदम अभाव था। इसलिये पूरा इलाका बाकी दुनिया से कटा हुआ था।कोसी तटबन्ध के भीतर का बाकी किस्सा बसुआरी के राजकुमार यादव बताते हैं। उनके अनुसार कोसी तटबन्ध बनने के बाद भूतही बलान का पानी बेलही के पास रेललाइन पार करता था व एक धारा बसुआरी होकर निकलती थी। उस धारा पर चचरी पुल बना था। ‘82 में काठ का पूल बना। पर नदी की मिट्टी-बालू से वह पुल भी भर गया। बाद में 2011-12 में सड़क बनी तो पुल की कोई जरूरत नहीं थी, उसे हटा दिया गया। इस गाँव में 2004 से बाढ़ का पानी आना बन्द हो गया। पर वर्षा के पानी की निकासी की समस्या जरूर उत्पन्न हो गई थी।

तटबन्ध के भीतर और बाहर की तबाही और इसे लेकर उभरते हुए स्थानीय विवादों को विधायक रसिक लाल यादव ने 1957 में विधानसभा में प्रश्न उठाया था। उस समय तो यह बात आई गई हो गई, मगर बाढ़ की निकासी की समस्या बढ़ती जा रही थी। तत्कालीन सिंचाई मंत्री दीप नारायण सिंह ने 1962 में विधानसभा में कहा कि ‘‘यह बात सही है कि फुलपरास और लौकही थाना को भुतही-बलान नदी सात वर्षों से बर्बाद कर रही है।’’ इस बयान से यह भी पक्का हो गया कि सात साल पहले तक भुतही-बलान की बाढ़ कोई बड़ी समस्या नहीं पैदा करती थी।

1962 में 22 अगस्त से 1 सितम्बर के बीच भुतही-बलान में जबरदस्त बाढ़ आई। बाढ़ का पानी लम्बे समय तक टिके रहने के कारण ग्रामीणों की भोजन की व्यवस्था चरमरा गई और अगली फसल से उत्पादन की सम्भावना जाती रही। बड़ी संख्या में घर गिर गए। गाँवों और रास्तों पर 2-2 मीटर से अधिक गहराई तक पानी था। लोगों को पेड़ों पर, छप्परों पर या फिर चौकी पर चौकी सजाकर रहने की व्यवस्था करनी पड़ी। नावों का एकदम अभाव था। इसलिये पूरा इलाका बाकी दुनिया से कटा हुआ था।

भुतही-बलान से तबाही का बयान करते हुए 1968 में विधायक तेज नारायण झा ने सरकार को सचेत किया कि सड़कें और रेल लाइनें नदी की बाढ़ में कट जा रही है और समूचे इलाके को भारी तबाही का सामना करना पड़ रहा है। 1971 में भुतही-बलान ने मई महीने में ही बाढ़ से बर्बादी के किस्से गढ़ने शुरू कर दिये। 12 जून को आई बाढ़ ने पुराने सारे रिकार्ड तोड़ दिये। तब जाकर 18 मई 1972 को बिहार विधानसभा में ‘भुतही-बलान के दाहिने किनारे पर लौकहा से लेकर कोसी के पश्चिमी तक तटबन्ध बनाने की घोषणा राधानन्दन झा ने की।

फिर सरकार ने भूतही बलान के पश्चिम तटबन्ध बना दिया जिससे घोघरडीहा रेल स्टेशन और फूलपरास जैसे प्रमुख बाजार को भूतही बलान के विकराल बाढ़ से बचाया जा सका। भूतही बलान के पश्चिमी तटबन्ध के निर्माण से पूर्वी किनारे के लोग स्वाभाविक रूप से परेशान थे क्योंकि नदी की बाढ़ का सारा पानी उधर की ओर मुँह करने वाला था। इस विवाद की वजह से तटबन्ध निर्माण का फैसला होने में देर हुई। जब फैसला हुआ, तब विरोधी जबान पर ताले लग गए थे।

देश में इमरजेंसी लग गई थी। यह तटबन्ध 1974-78 में निर्मली -घोघरडीहा रेललाइन में किशनीपट्टी के पास से लौकहा तक करीब 30 किलामीटर की लम्बाई में बनकर तैयार हुआ। नतीजा हुआ कि धीरे-धीरे पूर्वी तट अर्थात धारा के बाएँ किनारे के 54 गाँव स्थाई बाढ़ की चपेट में चले गए। अब नदी के पूर्वी किनारे पर तटबन्ध बनाने की माँग उठी।

दोनों के अलग-अलग हितों की रक्षा करने के लिये राजनीतिज्ञों और उनकी पार्टियों को मसाला मिल गया। राज्य के कई महत्त्वपूर्ण राजनेता इस क्षेत्र से हुए हैं। पूर्वी तटबन्ध का निर्माण आरम्भ भी हुआ। पर बन्द हो गया। तटबन्ध विवाद लम्बा चला। भूतही बलान का पूर्वी तटबन्ध अधूरा है और प्रचंड बाढ़ से घिरे सात-आठ गाँव अधूरे तटबन्ध के पूरा होने की आस है। पर रेलवे और दूसरे कई गाँव इसे कतई बनने देना नहीं चाहते।

पहले जब नदी बँधी नहीं थी तब वह अपनी मर्जी के मुताबिक घूमती थी। बाढ़ का लेबेल अधिक बढ़ नहीं पाता था। परेशानी जरूर होती थी मगर नदी घातक नहीं बन पाती थी। पैदावार एकदम न हो, ऐसा कभी नहीं होता था। सूखाड़ के समय सिंचाई के लिये तालाब, पोखर डबरा होते थे। मगर तटबन्ध बनने के बाद इस इलाके की जो हालत हुई उसमें बरसात शुरू होते ही माल-मवेशी, औरतों और बच्चों को लोग अपने रिश्तेदारों के यहाँ भेज देते।

नदियों को तटबन्धों से घेरकर बाढ़ नियंत्रण करने की जान-बूझकर या अनजाने में की गई तकनीकी भूल ने पूरे इलाके की तकदीर बिगाड़ दी थी। बिगड़ी तकदीर को फिर से बनाने के लिये नए सिरे से प्रयासों की जरूरत थी। पर सरकारी अमला, प्रभावशाली लोगों का बड़ा तबका तटबन्ध की वजह से हुए विनाश का निदान भी तटबन्धों में ही खोजने के रोग से ग्रस्त है।

जबकि इनकी वजह से एक तरफ पानी की घोर कमी होने लगी थी, तो दूसरी तरफ वर्षाजल की निकासी की समस्या थी। जल का प्रबन्धन सबसे बड़ी समस्या थी। पीने के पानी से लेकर सिंचाई और वर्षाजल की निकासी सबकी व्यवस्था नए सिरे से करनी थी।

ऐसे मौके पर इस इलाके में जीवीएसवीएस जगतपुर, घोघरडीहा का प्रवेश हुआ और उसने समेकित जल प्रबन्धन कार्यक्रम में प्राचीन और नई तकनीकों का समन्वय करके विकास की नई रोशनी दिखाई। इस कार्यक्रम को जर्मनी की संस्था वेल्टहंगरहिल्फे का सहयोग हासिल है। कोसी तटबन्ध के भीतर के 18 गाँवों में यह कार्यक्रम आरम्भ हुआ। उसका प्रभाव जल्दी ही दिखने लगा।

सबसे पहले ग्राम विकास समितियों का गठन हुआ। फिर गाँव के संसाधनों का आकलन किया गया और उसके मुताबिक जल प्रबन्धन के मास्टर प्लान बनाए गए। कार्यक्रम के साथ सरकार की विभिन्न विकास योजनाओं को भी जोड़ा गया। तालाब, डबरा, सड़क आदि के निर्माण के साथ-साथ खेती की नई तकनीक, उपयुक्त फसल का चयन और जैविक खाद का प्रयोग आरम्भ हुआ। इसके साथ पेयजल की गुणवत्ता सुधारने और स्वच्छता के लिये सूखे शौचालयों का प्रचार आरम्भ हुआ जिससे बेहतरीन खाद व कीटरोधक भी प्राप्त होते हैं।

वर्तमान में एक अविश्वसनीय सच्चाई है कि लगभग पचास वर्ष पहले बने कोसी तटबन्धों के बीच फँसे गाँवों के पुनर्वास की घोषणा तो सरकार ने कई बार किया, पर अनेक गाँव ऐसे हैं जिनके पुनर्वास के लिये आज तक ज़मीन का अधिग्रहण तक नहीं हुआ है।

कोसी तटबन्धों के विस्थापितों के हितों की रक्षा के लिये तटबन्ध निर्माण के तीस साल बाद 1987 में स्थापित कोसी पीड़ित विकास प्राधिकार का दफ्तर कहाँ है, यह अधिकांश कोसी पीड़ित नहीं जानते। बहुत सी सरकारी संस्थाएँ भी नहीं जानती कि यह कार्यालय किस जगह है। ऐसे में इन गाँवों में नई तकनीक से कम पानी में होने वाली धान-गेहूँ के अलावा साग-सब्जी की खेती से विकास की नई बयार बह रही है। अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। पर जितना हो गया है, वह भी बहुत कम नहीं।

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