भविष्यवाणी जो सुनी नहीं गई

Submitted by admin on Thu, 08/12/2010 - 09:02
श्री कपिल भट्टाचार्य एक विलक्षण अभियंता थे। उन्होंने फरक्का बैराज और दामोदर घाटी परियोजना का विरोध उस समय किया, जब ज्यादातर वैज्ञानिक, इंजीनियर और बुद्धिजीवी इसके पक्ष में जुटे थे। इसी विरोध के कारण उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। नवंबर 1989 में उपेक्षा और एकांत की पीड़ा झेलते हुए उनका निधन हुआ। यह लेख उन्होंने आज से कोई 40 बरस पहले लिखा था।
दामोदर घाटी परियोजना को बने हुए अनेक वर्ष बीत चुके हैं। जिस समय यह परियोजना बन रही थी, उसी समय मैंने इसके दोषों और इससे होने वाले भयंकर परिणाम की जानकारी सबके सामने रखी थीः इसके कारण पश्चिम बंगाल के पानी को निकालने वाली मुख्य नदी हुगली भी जाएगी और फिर देश में भयानक बाढ़ आएगी। हुगली नदी भरने से कलकत्ता बंदरगाह में आने वाले बड़े समुद्री जहाजों का आना भी संभव नहीं हो सकेगा। मेरे दृढ़ प्रतिवाद और चेतावनी के बावजूद केन्द्र की तत्कालीन कांग्रेसी और राज्य सरकारों ने मिलजुल कर दामोदर घाटी परियोजना को लागू किया।

दामोदर नदी में साल भर छोटी-छोटी बाढ़ों के कारण जो उपजाऊ मिट्टी जमा होती है, उसे आषाढ़ में आने वाली बड़ी बाढ़ बहाकर समुद्र में पहुंचा देती है। सावन, भादों और अश्विन महीने में हुगली के निचले हिस्से में भाटा की गति जितनी तेज होती है, उतनी तेज ज्वार की गति नहीं होती। इस कारण समुद्र से आने वाली रेत नदी के मुहाने पर जमा होती है और इस रेत को भी दामोदर और रूपनारायण नदी में आने वाली बाढ़ बहा देती है। मैंने उस समय चेतावनी दी थी कि अगर इस स्वाभाविक प्रक्रिया में बाधा पहुंचाने की कोशिश की गई तो दामोदर और रूपनारायण नदी की बाढ़ गति धीमी पड़ जाएगी, जिससे नदी के मुहाने पर जमने वाली मिट्टी साफ नहीं हो पाएगी और जगह-जगह नदी में टापू निकल आएंगे। 1948 से 1952 तक लगातार मैं इस सच्चाई से सरकार और देशवासियों को अवगत कराता रहा, लेकिन सरकार और परियोजना के प्रबंधको ने मेरे तर्कों को न काटा और न इनका कोई संतोषप्रद उत्तर ही दिया। अपनी झूठी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए उन लोगों ने इस परियोजना को लागू किया।

मैंने सुझाया था कि दामोदर घाटी परियोजना में ही कुछ सुधार कर उसकी सिंचाई परियोजना को छोड़कर उसी पानी को नियमित रूप से रूपनारायण नदी के माध्यम से निम्न हुगली में प्रवेश कराया जाए। मगर झूठी मर्यादा की रक्षा के लिए इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया। परिणामस्वरूप दामोदर घाटी परियोजना एक धोखा साबित हुई। बाद में मेरे द्वारा सुझाई गई वैकल्पिक सिंचाई पद्धति लिफ्ट इरीगेशन को ही अपनाना पड़ा।

पंचैत और मैथन के बांध बनने के तुरंत बाद ही मेरी बात सच निकली और 1956 में ही कलकत्ता बंदरगाह की गहराई भयंकर रूप से घट गई। पश्चिम बंगाल के भागीरथी और हुगली के मैदान और दामोदर नदी के निचले हिस्सों में भयानक बाढ़ आई। दामोदर घाटी परियोजना बनने से पहले द्वितीय महायुद्ध के समय दामोदर की बाढ़ से मात्र 50 वर्ग मील जलप्लावित होता था। 1956 के इस जल प्रलय में पश्चिम बंगाल का एक तिहाई हिस्सा यानी 10930 वर्ग मील क्षेत्र बाढ़ के विनाश से प्रभावित हुआ। 1956 की बाढ़ के समय यह देखा गया था कि भागीरथी और हुगली नदी की सर्वोच्च जल-निकासी क्षमता काफी घट चुकी थी। ऐसा दामोदर घाटी परियोजना की वजह से हुआ था। इसके अलावा जलोशी, चुरनी, मयुराक्षी, अजय, दामोदर नदी की जल निकासी क्षमता 50 हजार क्यूसेक थी। 1959 में देखा गया कि यह क्षमता घटकर 20 हजार क्यूसेक रह गई है। इस तरह पहले जो बाढ़ दो-तीन दिन या सप्ताह तक चलती थी, वह अब महीने से भी अधिक समय तक रहने लगी थी। फिर 1970-71 में देखा गया कि बाढ़ और अधिक दिनों तक रुकी रही, इस कारण बहुत बड़ा क्षेत्र जल भराव का शिकार बना रहा।

दामोदर घाटी परियोजना के खिलाफ जो बातें सामने रखी गई थीं, बाढ़ के दिनों में इसे नकारा नहीं जा सका। 1960 में बड़े-बड़े समुद्री जहाजों के यातायात के लिए कलकत्ता से 60 मील दक्षिण हल्दिया में एक नए बंदरगाह की नींव रखी गई और यह तय किया गया कि फरक्का के निकट गंगा में एक बैराज बांध बनाकर एक नहर की सहायता से भागीरथी में कुछ जल प्रवेश कराया जाएगा। तब मैंने सुझाया था कि दामोदर घाटी परियोजना में ही कुछ सुधार कर उसकी सिंचाई परियोजना को छोड़कर उसी पानी को नियमित रूप से रूपनारायण नदी के माध्यम से निम्न हुगली में प्रवेश कराया जाए। मगर झूठी मर्यादा की रक्षा के लिए इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया। परिणामस्वरूप दामोदर घाटी परियोजना एक धोखा साबित हुई। बाद में मेरे द्वारा सुझाई गई वैकल्पिक सिंचाई पद्धति लिफ्ट इरीगेशन को ही अपनाना पड़ा।

1948 से 1952 तक लगातार मैं इस सच्चाई से सरकार और देशवासियों को अवगत कराता रहा, लेकिन सरकार और परियोजना के प्रबंधकों ने मेरे तर्को को न काटा और न इनका कोई संतोषप्रद उत्तर ही दिया। अपनी झूठी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए उन लोगों ने इस परियोजना को लागू किया।

हम लोगों ने तब यह भी कहा था कि फरक्का बांध बनने के बाद परिस्थिति और भी जटिल होगी। पहली बात तो यह है कि सूखे महीनों में फरक्का से भागीरथी को 40 हजार क्यूसेक पानी की जो आवश्यकता है, वह कभी पूरी नहीं हो पाएगी। 50 के दशक में मैं हावड़ा में पीपुल्स इंजीनियरिंग नामक एक कारखाने में इंजीनियर था। उसमें जहाज का निर्माण और मरम्मत का काम होता था। रेलवे के फेरी जहाजों के मरम्मत का काम मेरे जिम्मे था। इन जहाजों के नाविकों की सहायता से ही गंगा के जल प्रवाह को गर्मी के दिन में साहेबगंज और मनिहारी के पास नापा गया था। यहां गंगा में जल प्रवाह की जानकारी अधिकारियों को थी। बावजूद इसके वे लोग फरक्का बैराज परियोजना के माध्यम से भागीरथी में 60 हजार क्यूसेक जल प्रवेश कराने की बात प्रचारित करने लगे। ये अधिकारीगण बड़ी चतुराई से बाद में यह कहने लगे कि चूंकि गंगा की सहायक नदियों का पानी उत्तर प्रदेश और बिहार की सिंचाई में खर्च किया जा रहा है, इस कारण भागीरथी को 40 क्यूसेक का जल प्रवाह मिलना संभव नहीं होगा। फरक्का बैराज परियोजना में सौ करोड़ से अधिक रुपए खर्च करने के बाद इसके अवकाश प्राप्त अभियंता कहने लगे हैं कि फरक्का परियोजना असफल होगी। मैंने तो फरक्का परियोजना के प्रस्ताव के समय ही इसकी असफलता की घोषणा की थी। उस समय पश्चिम बंगाल के कांग्रेसी नेताओं ने जनमत को भ्रमित कर फरक्का परियोजना के लिए केंद्र सरकार पर दबाव डाला था। विरोधी दलों के कुछ लोगों ने मेरी बातों का सम्मान जरूर किया था, लेकिन परियोजना के समर्थन में वे सरकार के ही साथ रहे। उस समय के एक समाचार पत्र के संपादकीय में मुझे पाकिस्तानी गुप्तचर घोषित किया गया था। इसके लिए निम्नलिखित कारण गिनाए गए थेः

फरक्का बैराज परियोजना में सौ करोड़ से अधिक रुपए खर्च करने के बाद इसके अवकाश प्राप्त अभियंता कहने लगे हैं कि फरक्का परियोजना असफल होगी। मैंने तो फरक्का परियोजना के प्रस्ताव के समय ही इसकी असफलता की घोषणा की थी। उस समय पश्चिम बंगाल के कांग्रेसी नेताओं ने जनमत को भ्रमित कर फरक्का परियोजना के लिए केंद्र सरकार पर दबाव डाला था। विरोधी दलों के कुछ लोगों ने मेरी बातों का सम्मान जरूर किया था, लेकिन परियोजना के समर्थन में वे सरकार के ही साथ रहे।

फील्ड मार्शल अयूब खां ने मेरी किताब (जिसमें फरक्का बांध के प्रस्ताव का विरोध बिलकुल वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर किया गया था।) खरीदकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पास भेजी थी। पश्चिम बंगाल सरकार ने मेरे पीछे सी.आई.डी. लगा दी थी और अंततः 1962 में मुझे पीपुल्स इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ देनी पड़ी थी।

मेरा तर्क था कि पद्मा नदी में ज्वार-भाटा होता है। अतः फरक्का नदी बैराज द्वारा सूखे के दिनों में गंगा का प्रवाह अवरूद्ध होने पर ज्वार द्वारा लाई गई मिट्टी से पद्मा नदी का प्रवाह इसलिए बदल जाएगा, क्योंकि ज्वार की मिट्टी उस नदी को भर देगी। बाद में ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़ भी पद्मा की उजान में बहकर भैरवमाथा, भंगा, जलंगी, चुरनी, इच्छामति आदि नदियों के माध्यम से पश्चिम बंगाल में बाढ़ लाएगी। 1971-72 में सचमुच में फरक्का बांध का निर्माण होते ही पूर्व आशंका के अनुरूप बाढ़ आई। फरक्का बांध के कारण राजशाही और हार्डिंग पुल के मध्यवर्ती इलाके में आने वाले 5-7 वर्षों में भयानक स्थिति होगी तथा भविष्य में कलकत्ता तक जलमग्न हो सकता है। मेरी यह शंका तर्कसंगत थी और शंका की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया गया, लेकिन सरकारी अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।

मेरी सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि बैराज का तलहट कंकरीट का होगा। इसलिए सूखे दिनों में गंगा की धारा तलहट से नीचे बहेगी। इस कारण बाढ़ के समय गंगा का जल प्रवाह जो गंगा के तल को 50 फीट से 150 फीट तक गहरा कर देता था, अब संभव नहीं होगा। इस कारण गंगा के जल प्रवाह की क्षमता में अत्यधिक कमी आएगी। मोकामा के राजेन्द्र पुल के पास गंगा का सर्वोच्च जल प्रवाह तीस लाख क्यूसेक मापा गया था। किंतु फरक्का परियोजना में उसे घटाकर सत्ताइस लाख क्यूसेक किया गया। मेरे साधारण हिसाब के मुताबिक जब कोसी जैसी बहुत बड़ी सहायक नदी फरक्का में मिलती है तब इसमें कम से कम 40 लाख क्यूसेक जल प्रवाह की व्यवस्था होनी चाहिए थी। मगर वास्तविकता तो यह है कि अब इसके अनुरूप व्यवस्था संभव नहीं है।

यह सब तथ्य जानते हुए भी अधिकारी वही करेंगे जो प्रस्ताव में आया है। वजह यह कि नेता लोग अपने धन की ताकत बढ़ाने के लिए जल्द से जल्द कुछ कर देना चाहते हैं, या कुछ कर दिखाना चाहते हैं। भविष्य में जो नुकसान होता है, उस पर कोई ध्यान नहीं देना चाहता। इसके अलावा ठेकेदारों और इंजीनियरों को बेहिसाब पैसा कमाने का रास्ता मिल जाता है।

तब फिर गंगा का यह अतिरिक्त जल कहां जाएगा? मुझे समझने में देर नहीं लगी। इस पानी से मालदह और मुर्शिदाबाद जिले में हर साल बाढ़ की तबाही होगी। पटना, बरौनी, उत्तर मुंगेर, भागलपुर और पूर्णियां जिले भी हर साल डूबेंगे। गंगा की खाई क्रमशः भरती जाएगी, बैराज के पानी के प्रवाह की गति धीमी होगी और साद बैराज के गर्भ में जमा होती जाएगी। मैंने सन् 50 से 60 के दस वर्षों में ही दृढ़तापूर्वक इन भयावह परिणामों की ओर सबका ध्यान खींचा था।

1971 में जब बाढ़ आई तो देखा गया कि फरक्का बैराज अपनी घोषित क्षमता 26 लाख क्यूसेक जल प्रवाह का निकास भी नहीं कर पाता है। उस वर्ष उसकी निकासी क्षमता मात्र 23 लाख क्यूसेक थी। इसे सौभाग्य ही कहा जाए कि 1971 के वर्षाकाल में उत्तरी बंगाल के क्षेत्र में औसत से 5 प्रतिशत कम वर्षा हुई, नहीं तो बाढ़ से और भी भयानक तबाही मचती। पद्मा नदी की बाढ़ महानंदा से प्रवाहित होकर मालदह शहर को पूरी तरह डुबा देती।

मेरा तर्क था कि पद्मा नदी में ज्वार-भाटा होता है। अतः फरक्का नदी बैराज द्वारा सूखे के दिनों में गंगा का प्रवाह अवरुद्ध होने पर ज्वार द्वारा लाई गई मिट्टी से पद्मा नदी का प्रवाह इसलिए बदल जाएगा, क्योंकि ज्वार की मिट्टी उस नदी को भर देगी। बाद में ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़ भी पद्मा की उजान में बहकर भैरवमाथा, भंगा, जलंगी, चुरनी, इच्छामति आदि नदियों के मार्फत पश्चिम बंगाल में बाढ़ लाएगी। 1971-72 में सचमुच में फरक्का बांध का निर्माण होते ही पूर्व आशंका के अनुरूप बाढ़ आई।

आज पश्चिम बंगाल में बाढ़ नियंत्रण के लिए जो नीम-हकीम सुझाव दिए जा रहे हैं, उनसे समस्याओं का समाधान न होकर परिस्थिति और भी जटिल हो जाएगी। मालदह जिले को बचाने के लिए फरक्का के पास गंगा के किनारे बांध की लंबाई बढ़ाई गई, इससे पूर्णिया जिले में कोसी नदी के मुहाने से गंगा की बाढ़ प्रवेश करेगी और पूर्णिया और मालदह जिले पर बाढ़ का कहर बरपेगा। भविष्य में धीरे-धीरे इसी रास्ते में गंगा की नई जल धारा तैयार होगी जो फरक्का बैराज को पार कर बांग्लादेश में प्रवेश करेगी। बरसात में दामोदर घाटी परियोजना से पानी छोड़ने के बाद दामोदर के निचले हिस्से में जो बाढ़ आएगी, उसे बांध को ऊंचा बनाकर नहीं रोका जा सकेगा। बांध की ऊंचाई की भी एक निश्चित सीमा होती है और वह पूरी तरह भौगोलिक, आर्थिक और राजनैतिक परिस्थिति पर निर्भर करती है। लोगों को विस्थापित कर जो बांध बनाए जा रहे हैं, उससे पुनर्वास की समस्याएं और भी जटिल होती जाएंगी। निश्चित सीमा रेखा तक बांध को ऊंचा करने पर भी जो अतिरिक्त जल अतिवृष्टि के समय बाढ़ नियंत्रण के लिए रोक कर रखना चाहिए, उसे उसी समय ही छोड़ा जाएगा, जिसके भयंकर परिणाम होंगे और फिर उसकी जलधारा भी मिट्टी से जल्दी भर जाएगी। अब यह भी कहा जा रहा है कि मुंडेश्वरी नदी के किनारे तट-बंध बनाए जाएंगे। मगर ऐसे बांध के निर्माण से यहां की नदी की तलहट भर जाएगी। नदी में यह सब हो ही चुका है। फिर अतिवृष्टि के समय बांध के टूटने से प्रबल बाढ़ आने की आशंका बनी रहेगी। वह तो प्रलय ही होगी न?

यह सब तथ्य जानते हुए भी अधिकारी वही करेंगे जो प्रस्ताव में आया है। वजह यह कि नेता लोग अपने धन की ताकत बढ़ाने के लिए जल्द से जल्द कुछ कर देना चाहते हैं, कुछ नया कर दिखाना चाहते हैं। भविष्य में जो नुकसान होता है, उस पर कोई ध्यान नहीं देना चाहता। इसके अलावा ठेकेदारों और इंजीनियरों को बेहिसाब पैसा कमाने का रास्ता मिल जाता है। इसलिए ऐसी योजना पास होने में देर नहीं लगती। सच्चाई यह है कि हुगली नदी की जल निकासी क्षमता को बढ़ाना ही बाढ़ रोकने का एकमात्र रास्ता है। इसके लिए जरूरी है कि हुगली नदी के मुहाने पर ज्वार का नियंत्रण हो जिससे ज्वार से आई हुई मिट्टी नदी के तल को भर न सके।

इसके बाद रूपनारायण और दामोदर को साद के ड्रेजर द्वारा अधिक गहरा किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि दामोदर घाटी परियोजना की संपूर्ण सिंचाई परियोजना रद्द हो। यहां केवल जल विद्युत का उत्पादन होगा, सिंचाई की नहरों को भर दिया जाएगा। नलकूप और पंप के सहारे वैकल्पिक सिंचाई व्यवस्था का इंतजाम करना होगा। उम्मीद है कि भविष्य में बांग्लादेश का सहयोग मिलेगा। जलंगी, चुरनी आदि पथ को नियंत्रित कर ब्रह्मपुत्र और पद्मा नदी के पानी का सहयोग नहीं भी मिला, तब भी सूखे के महीने में फरक्का बैराज परियोजना से भागीरथी नदी गंगा का जल प्रवेश नहीं होने पर भी कोई हानि नहीं होगी। इसके अतिरिक्त गाथाभाग, भैरव और इच्छामति की धारा के सहारे बांग्लादेश और भारत मिल-जुल कर समृद्धि और विकास का रास्ता तय कर सकते हैं। पद्मा और मेघना नदी की जल निकासी क्षमता बढ़ने से उत्तर बंगाल और बांग्लादेश के पूर्वी भाग की बाढ़ का नियंत्रण कुछ आसान हो जाएगा।

इस संदर्भ में एसोसिएशन लाईब्रेरी में मैंने 2 फरवरी, 1965 को एक लेख का पाठ किया था। जिज्ञासु पाठक एसोसिएशन की लाईब्रेरी में इस लेख को पढ़ सकते हैं।

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