छोटे जलवायु परिवर्तन, खतरे बड़े

Submitted by Hindi on Fri, 08/01/2014 - 10:16
अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान द्वारा लगाए गए जलवायु में व्यापक बदलाव के असर के अनुमान के मुताबिक एशिया में जल्द ही एक करोड़,10 लाख, अफ्रीका में एक करोड़ और बाकी दुनिया में 40 लाख बच्चों को भूखा रहना पड़ेगा। विश्व प्रसिद्ध भारतीय कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन मानते हैं कि यदि धरती का तापमान महज एक डिग्री सेल्सियस बढ़ा तो गेहूं का वार्षिक उत्पादन 70 लाख टन घट जाएगा। इस त्रासदी को सबसे ज्यादा औरतों को झेलना होगा और 60 फीसदी महिलाएं इसकी चपेट में होंगी क्योंकि उन्हें स्वयं की क्षुधापूर्ति से ज्यादा बच्चों की भूख मिटाने की चिंता रहती है। जलवायु परिवर्तन, मसलन वैश्विक तापमान के बढ़ते खतरे ने आम आदमी के दरवाजे पर दस्तक दे दी है। दुनिया में कहीं भी यकायक बारिश, बाढ़, बर्फबारी, सूखे का कहर, यही संकेत दे रहे हैं। आंधी, तूफान और अचानक ज्वालामुखियों के फटने की हैरतअंगेज घटनाएं इशारा कर रही हैं कि अदृश्य खतरे आपके इर्दगिर्द ही मंडरा रहे हैं। मौसम बिगड़ने की ये चेतावनियां संयुक्त राष्ट्र की पहल पर बनी उस अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन समिति ने दी हैं, जिसमें दुनिया के 309 वैज्ञानिकों की भागीदारी रही है।

धरती का बढ़ता तापमान और पिघलते हिमखंड लोगों की खाद्य सुरक्षा, पेयजल स्वास्थ्य और आवास जैसे जीवन के लिए जरूरी सुविधाओं को संकट में डालने जा रहे हैं। जाहिर है कि भूख, महामरी और विस्थापन का संकट आपकी दहलीज पर आ खड़ा हुआ है। बावजूद कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में कोई कार्यवाही आगे बढ़ती नहीं दिखती? दरअसल वायुमंडल में कार्बन की बढ़ती मात्रा ही त्रासदियों की जनक है। दुनिया के पर्यावरणविद् और मौसम विज्ञानी कॉर्बन उत्सर्जन के प्रति अरसे से अगाह कर रहे हैं परंतु, औद्योगिक-प्रौद्योगिक उपक्रमों के जरिए आर्थिक वृद्धि को ही सर्वोच्च लक्ष्य के पैरोकारों की दलील रही है कि इस तरह की चिंताएं अतिरंजित हैं।

किंतु, अब इस ताजा रिपोर्ट को शंका की दृष्टि से देखना एक बड़ी भूल होगी क्योंकि इसे बड़े पैमाने पर तैयार किया गया है। क्लाइमेट चेंज 2014: इंपेक्ट, अडाप्टेशन और वलनरेबिलिटी शीर्षक से जारी ढाई हजार पृष्ठीय इस रिपोर्ट को दुनिया भर के 309 लेखकों, 70 देशों के पर्यावरण विशेषज्ञों और 1729 जलवायु विशेषज्ञों व मौसम विज्ञानियों ने गंभीर और व्यापक क्षेत्र में अध्ययन के बाद तैयार किया है। रिपोर्ट के सह प्रमुख क्रिस फील्ड ने कहा है, ‘जलवायु परिवर्तन व्यापक रूप ले चुका है।

अब यह भविष्य का संकट नहीं रह गया है,बल्कि इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं।’ भारत के ओडिशा में आए फेलिन तूफान और उत्तराखंड की बाढ़ और भूस्खलन प्रलय जैसे ही संकेत हैं। अमेरिका में बर्फबारी और दावानलों ने कहर बरपाया। आस्ट्रेलिया इसी कालखंड में भीषण सूखे की चपेट में रहा है। अनियंत्रित औद्योगीकरण और उपभोग आधारित इसी जीवनशैली के लिए कार्बन उत्सर्जन का यही क्रम जारी रहा तो रिपोर्ट के मुताबिक अगली एक शताब्दी में दुनिया का तापमान 0.3 से 4.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। यह बदलाव खाद्य संकट तो बढ़ाएगा ही, पर्यावरण शरणार्थी जैसी नई समस्या भी पैदा करेगा।

वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों, मसलन ओजोन और कार्बन-डाइ-ऑक्साइड की मात्रा लगातार बढ़ती रही तो इसका सबसे ज्यादा असर गेहूं, चावल,मक्का और सोयाबीन की फसलों पर पड़ेगा। इसके अलावा गंगा और यमुना के कछारों व समुद्र तटीय क्षेत्रों में मछली पालन व्यवसाय भी प्रभावित होगा। रिपोर्ट के अनुसार गेहूं और चावल की फसल 10 फीसदी और मक्का व सोयाबीन की फसलें 3 से 5 प्रतिशत प्रभावित होगी।

पिछले कुछ सालों में प्राकृतिक आपदाओं के साथ ही धरती का तापमान जिस तेजी से बढ़ा है, उससे प्रभावित देशों व क्षेत्रों में 25 फीसदी तक नुकसान हो चुका है।

2050 तक इस हानि के बेतहाशा बढ़ने की आशंका है।

विषेशज्ञों का यह भी अनुमान है कि दुनिया भर में 2050 तक 25 करोड़ लोगों को अपने मूल निवास स्थलों से पलायन को मजबूर होना पड़ेगा। जलवायु बदलाव के चलते मालद्वीप और प्रशांत महासागर क्षेत्र के कई द्वीपों को समुद्र लील लेगा। इसी आसन्न खतरे से अवगत कराने के लिए ही मालद्वीप ने कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण के लिए समुद्र की तलहटी में एक परिचर्चा आयोजित की थी , यह बताने के लिए कि दुनिया नहीं चेती तो छोटे द्वीपों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

इस व्यापक बदलाव के असर का अनुमान अंतराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान ने भी लगाया है।

इसके मुताबिक एशिया में एक करोड़,10 लाख,अफ्रीका में एक करोड़ और बाकी दुनिया में 40 लाख बच्चों को भूखा रहना पड़ेगा। विश्व प्रसिद्ध भारतीय कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन का मानना है कि यदि धरती के तापमान में महज एक डिग्री सेल्सियस की ही वृद्धि हो जाती है तो गेहूं का वार्षिक उत्पादन 70 लाख टन घट सकता है।

इस कमी की सबसे ज्यादा त्रासदी दुनिया की आधी आबादी, मसलन औरतों को झेलनी होगी। भूख का संकट गहराता है तो इसकी चपेट में 60 फीसदी महिलाएं ही होंगी क्योंकि उन्हें स्वयं की क्षुधापूर्ति से कहीं ज्यादा बच्चों की भूख मिटाने की चिंता रहती है।

बढ़ते तापमान से हिमखंडों के पिघलने की जो शुरुआत होगी, उसका खतरनाक मंजर बांग्लादेश में देखने को मिलेगा। यहां तबाही का तांडव इसलिए जबरदस्त होगा क्योंकि बांग्लादेश तीन नदियों के डेल्टा पर आबाद है। यहां के ज्यादातर भूखंड समुद्र तल से महज 20 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक बांग्लादेश में धान की पैदावार 10 प्रतिशत और गेहूं की 30 प्रतिशत तक घट जाएगी।

वैश्विक तापमान के चलते 36 विकासशील और 21 अफ्रीकी देशों पर भूख की काली छाया मंडरा रही है।

जलवायु पर्वितन के संकट के दायरे में पेयजल भी आएगा। वर्षाचक्र में बदलाव, बाढ़, तूफान और भूस्खलन के चलते ज्यादातर शुद्ध जल के स्नेत दूषित हो जाएंगे। नतीजतन इस दूषित पानी के उपयोग से डायरिया व आंखों के संक्रमण के खतरे बढ़ेंगे। वैसे भी दुनिया में पानी की कमी से हर दस में चार लोग पहले से ही जूझ रहे हैं। डायरिया से हरेक साल 18 लाख मौतें होती हैं।

मौसम में आए वर्तमान बदलावों ने पानी व मच्छर जैसे संवाहकों के मार्फत डेंगू और मलेरिया जैसी संक्रामक बीमारियों के खतरे उत्पन्न कर दिए हैं। 2006 में भारत में डेंगू के 10 हजार मामले सामने आए थे, जिनमें से दो सौ लोगों की मौत भी हो गई थी।

समस्या को लेकर 1997 में जापान के क्योतो शहर में पहली बैठक हुई थी, लेकिन अमेरिका इसमें शामिल नहीं हुआ, जिसका कार्बन उत्सर्जन में प्रतिव्यक्ति सबसे ज्यादा योगदान है। कोपेनहेगन में भी पृथ्वी को बचाने के लिए 12 दिनी बड़ा सम्मेलन दिसंबर 2009 में हुआ था परंतु, कार्बन उत्सर्जन की कटौती को लेकर विकसित और विकासशील देश अंत तक अपने-अपने पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं हो पाए। जापान, कनाडा, न्यूजीलैंड और नीदरलैंड जैसे औद्योगिक देशों का प्रबल आग्रह था कि कार्बन कटौती की दृष्टि से सभी देशों के लिए एक ही बाध्यकारी आचार संहिता लागू हो। साथ ही विकसित देश विकासशील देशों को हरित प्रौद्योगिकी की स्थापना संबंधी तकनीक और आर्थिक मदद भी दें लेकिन, विकासशील देशों ने इन शर्तो को सिरे से खारिज कर दिया था क्योंकि विकसित देश ही कार्बन उत्सर्जन की भूमिका में अग्रणी हैं। अमेरिका में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा 19.1, आस्ट्रेलिया में 18.8 और कनाडा में 17.4 मीट्रिक टन प्रतिव्यक्ति हैं, जबकि, विकासशील देशों में चीन 4.6, भारत 1.2 और नेपाल की भूमिका 0.1 मीट्रिक टन प्रतिव्यक्ति है। बहरहाल यहां सवाल यह है कि जब संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित वैश्विक पंचायत में हुई अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि के कोई बाध्यकारी हल पेश नहीं आए तो आईपीसीसी की जलवायु परिवर्तन संबंधी चेतावनियों की परवाह कौन करने वाला है?

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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