देसी आरओ : 100 रुपए में साफ पानी

Submitted by admin on Tue, 09/23/2008 - 18:21

देसी आरओदेसी आरओरिवर्स ओस्मोसिस ( आरओ ) एक पृथक्करण की प्रक्रिया है, जिसमें किसी भी घोल को छलनी में से दबाव के साथ डाला जाता है, जिसमें घुलनशील विलायन छलनी में रुक जाता है और शुद्ध द्रव हमें प्राप्त होता है। औपचारिक रूप से रिवर्स ओस्मोसिस ( आरओ ) एक झिल्ली अथवा छलनी के माध्यम से घोल को उच्च पदार्थ एकत्रीकरण वाले क्षेत्र से न्यून पदार्थ एकत्रीकरण वाले क्षेत्र में अधिक ओस्मोटिक दबाव में दबाव के साथ ले जाने की प्रक्रिया है, यह सामान्य ओस्मोसिस प्रक्रिया का उल्टा है। सामान्य ओस्मोसिस प्रक्रिया में एक झिल्ली अथवा छलनी के माध्यम से घोल को न्यून पदार्थ एकत्रीकरण वाले क्षेत्र से उच्च पदार्थ एकत्रीकरण वाले क्षेत्र में बिना किसी बाहरी दबाव के बहता है।

समाचार -

सुशील भार्गव/ भास्कर/ करनाल.स्वच्छ पानी को लेकर प्रति वर्ष देश में खरबों रुपए की योजनाएं बनती हैं। बाजार में एक के बाद एक पानी साफ करने के सिस्टम ईजाद किए जा रहे हैं, ताकि साफ पानी पीकर पेट व शरीर की सभी बीमारियों से बचा जा सके। लेकिन एक उद्योगपति ने वैज्ञानिकों से सलाह लेकर ऐसा देसी आरओ (रिवर्स ओसमोसिस) सिस्टम ईजाद किया है।

जिस पर महज 100 रुपए खर्च आता है। सिस्टम पानी से 86 फीसदी तक बैक्टीरिया खत्म कर देता है, पानी में किसी तरह की बदबू नहीं रहती, यही नहीं पानी को पालिश की जाती है। मैलापन दूर कर मैला रंग पानी से बाहर निकाल देता है, जबकि नई विधि रेत के फिल्टर से दस गुणा अधिक काम करती है। तीनों घड़ों में डाली गई राखी पांच से छह माह बाद बदल दी जाती है और चावल के छिलके की राखी निशुल्क मिलती है।

क्या है देसी सिस्टम :

तीन घड़े लेकर तीनों की तली में सुराग किया जाता है। सुराग के ऊपर नारियल की भूसी लगा दी जाती है और घड़ों में चावल की राखी भर दी जाती है। फिर ऊपर वाले घड़े में पानी की टोंटी से पानी डाला जाता है, सबसे निचले घड़े से जो पानी आता है वह एकदम साफ होता है, इसमें बैक्टीरिया बहुत कम होता है।

बिना बिजली साफ पानी :

उद्योगपति विजय सेतिया के अनुसार ग्रामीण एरिया में साफ पानी की सबसे अधिक दिक्कत है। उनकी ग्रीन वल्र्ड फाउंडेशन नामक संस्था शीघ्र ही हरियाणा के 20 गांवों में नए आरओ सिस्टम को लगाकर दिखाएगी, ताकि लोगों का रूझान इस ओर हो सके। केवल 100 रुपए खर्च कर आम आदमी साफ पानी ले सकेगा। उन्हें यह प्रेरणा अमेरिकन वैज्ञानिक डा. फ्रैंकले से मिली है, जिन्होंने चावल की राखी से बहुत से आविष्कार किए।

साभार - दैनिक भास्कर

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