डिजिटलीकरण से सुनिश्चित होगी सभी के लिये खाद्य सुरक्षा

Submitted by Hindi on Wed, 03/15/2017 - 09:22
Source
कुरुक्षेत्र, फरवरी 2017

खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में आए नए बदलावों की ओर कम लोगों का ध्यान गया है लेकिन देश में चल रही डिजिटल क्रांति से यह क्षेत्र भी अछूता नहीं है। डिजिटल इंडिया पहल और उसके साथ विभिन्न स्तरों पर घटित हो रहे नवाचारपूर्ण प्रयोगों ने खाद्य सुरक्षा, जन वितरण प्रणाली, कृषि, भंडारण और खाद्यान्न वितरण जैसे क्षेत्रों का कायाकल्प करना शुरू कर दिया है।

कुछ साल पहले लागू हुए महत्त्वाकांक्षी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम की सार्थकता सुनिश्चित करने के लिये जरूरी था कि भारत में खाद्यान्न इकट्ठा करने, उनके भंडारण और वितरण जैसी प्रक्रियाएँ पारदर्शी हो। सही और पर्याप्त आँकड़ों के अभाव, वितरण प्रक्रियाओं में अनियमितताओं, भ्रष्टाचार, एकाधिक राशन कार्ड बनवाने जैसी प्रवृत्तियों की मौजूदगी में यह अधिनियम कामयाब नहीं हो सकता था। याद रहे, इस अधिनियम के तहत हजारों करोड़ रुपये की लागत से कोई 82 करोड़ लोगों को रियायती कीमतों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। सुयोग से, डिजिटल माध्यमों ने सटीक तथ्यों को इकट्ठा करने, उनके आधार पर सटीक निर्णय लेने और अनेक प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 5 जुलाई, 2013 को अमल में आया था। हालाँकि सभी राज्यों ने इसे एक साथ नहीं अपनाया। धीरे-धीरे इसे राज्यों में अपनाया गया और हाल ही में नवम्बर, 2016 में सम्पूर्ण देश में यह लागू हो गया है। इसके तहत केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को बाध्य किया गया है कि वे पात्र लाभार्थियों को बेहद कम कीमत पर खाद्यान्न मुहैया कराएँगी। अधिनियम के तहत राज्य सरकारों के लिये सही लोगों तक रियायती दरों पर खाद्यान्नों की पूरी मात्रा की सप्लाई सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है। यदि नागरिक और सामाजिक संगठन चाहे तो अधिनियम के तहत उपलब्ध मंचों का प्रयोग लक्षित जन-वितरण योजना (टीपीडीएस) पर अमल में दिखने वाली कमियों या सीमाओं की तरफ ध्यान खींचने के लिये भी कर सकते हैं। इन सबका इस्तेमाल सबके लिये खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में बनाई जाने वाली नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों के संदर्भ में किया जाना है।

सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम को लागू कर चुके हैं और उनमें से अधिकांश में राशनकार्डों का लगभग पूर्ण डिजिटलीकरण हो चुका है। ज्यादातर राज्यों ने अपने यहाँ जन वितरण प्रणाली के लाभार्थियों की सूचियों को ऑनलाइन उपलब्ध करा दिया है। सटीक सूचनाओं की उपलब्धता और पारदर्शिता के चलते आज जन-वितरण प्रणाली को अधिक कार्यकुशल बनाया जा सका है। डिजिटलीकरण से पहले भारतीय खाद्य निगम के द्वारा राज्यों को आवंटित किये जाने वाले खाद्यान्न के कोटे और राज्यों की तरफ से उठाए जाने वाले खाद्यान्न के बीच काफी फर्क होता था। दोनों तरफ सूचनाओं की सही उपलब्धता का अभाव इसका अहम कारण था। किस राज्य में कितनी पैदावार हुई है और ठीक-ठीक कितने अतिरिक्त खाद्यान्न की आवश्यकता है, इसकी गणना पारम्परिक तरीकों से होती थी जो काफी हद तक कारगर तो थी लेकिन फिर भी उसकी अपनी सीमाएँ थी। यही वजह है कि या तो राज्य खाद्य निगम की तरफ से जारी किया गया पूरा कोटा उठाते ही नहीं थे या फिर वे कम खाद्यान्न जारी किये जाने की शिकायत करते थे।

मिसाल के तौर पर सन 2013-14 में राज्यों ने चावल, गेहूँ और मोटे अनाजों का 87 प्रतिशत हिस्सा ही उठाया था। इसी तरह 2014-15 में यह आँकड़ा 83 प्रतिशत ही रह गया था। लेकिन डिजिटलीकरण के बाद वित्तवर्ष 2015-16 के पहले छह महीनों में राज्यों ने आवंटित खाद्यान्नों का 93 फीसदी हिस्सा अपने यहाँ लक्षित जन वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) के माध्यम से वितरित करने के लिये उठा लिया। जाहिर है, डिजिटलीकरण के बाद अब बेहतर सूचनाएँ उपलब्ध हो रही हैं और दोहरे राशनकार्डों के साथ-साथ भ्रष्टाचार, कालाबाजारी जैसी समस्याओं पर भी अंकुश लगाना सम्भव हुआ है। राज्य सरकारें अब ऑनलाइन उपलब्ध डाटा की मदद से हर महीने अपने यहाँ खाद्यान्न की माँग का बेहतर ढंग से अनुमान लगा पा रही हैं। बहुत से राज्यों ने तो अपने यहाँ जन वितरण प्रणाली पारदर्शिता पोर्टल विकसित किये हैं जिन पर राज्य में खाद्यान्न से सम्बन्धित ताजा आँकड़ों और सूचनाओं को कोई भी व्यक्ति देख सकता है।

इस संदर्भ में, हिमाचल प्रदेश के ई-पीडीएस पारदर्शिता पोर्टल की मिसाल लें। इस पोर्टल पर खाद्यान्नों की कीमतों पर निगरानी, राशनकार्डों से सम्बन्धित सूचनाएँ, जन वितरण प्रणाली के तहत उपलब्ध स्टॉक का ब्यौरा, तमाम तरह की रिपोर्टें (भंडारण क्षमता से लेकर एनएफएसए रिपोर्ट तक और सप्लाई चेन आँकड़ों से लेकर अंतिम बैलेंस तक), खाद्यान्न आवंटन के आदेश, अपनी राशन दुकान का पता लगाने की सुविधा, माल-भाड़े की दरें, नक्शें, कारोबारियों का ब्यौरा, मीडिया में आई सूचनाएँ, सतर्कता विभाग की गतिविधियों का विवरण, तमाम तरह के कानून और नियमों का विवरण, शिकायतें दर्ज कराने तथा उन पर हुई प्रगति को जाँचने की सुविधा और यहाँ तक कि विभिन्न मामलों में लोगों की तरफ से आने वाली टेलीफोन कॉलों का ब्यौरा तक उपलब्ध है। इस तरह की पारदर्शिता न सिर्फ प्रक्रियाओं को आसान और प्रभावी बनाती है बल्कि भ्रष्टाचार और बेजा लाभ उठाने की प्रवृत्तियों पर भी अंकुश लगाती है।

 

लक्षित जन-वितरण प्रणाली का कम्प्यूटरीकरण


सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को पूरी तरह से पारदर्शी बनाने के लिये सरकार टीपीडीएस यानी लक्षित जन-वितरण प्रणाली से जुड़े परिचालनों का शुरू से अंत तक कम्प्यूटरीकरण कर रही है। इसके परिणामस्वरूप पिछले दो वर्षों के दौरान राज्यों द्वारा बड़ी संख्या में बोगस कार्डों को खारिज किया गया है जिससे तकरीबन 10,000 करोड़ रुपये मूल्यों के अनाज को अब बेहतर ढंग से लक्षित किया जा रहा है।


केंद्र पीडीएस को आधुनिक एवं उपभोक्ता अनुकूल बनाने के लिये राज्य सरकारों से लगातार इस ओर ध्यान देने को कह रहा है। इसके तहत कम्प्यूटरीकरण के लिये 884 करोड़ रुपये की लागत वाली एक परियोजना पर काम शुरू किया गया है। अब तक उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की गई हैं। सभी राज्यों में राशनकार्डों का पूरी तरह से डिजिटलीकरण कर दिया गया है और कार्ड का ब्यौरा सभी राज्यों के पारदर्शी पोर्टल पर उपलब्ध है। 29 राज्यों में राशन डीलरों को अनाज का ऑनलाइन आवंटन किया जा रहा है। 19 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में सप्लाई-चेन को कम्प्यूटरीकृत कर दिया गया है और सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में ऑनलाइन शिकायत निवारण सुविधा अथवा टोल-फ्री हेल्पलाइन शुरू की गई है। राज्यों से राशनकार्डों के डाटाबेस में आधार नम्बरों को समाहित करने का आग्रह किया गया है। लीकेज एवं अन्यत्र उपयोग रोकने के लिये केंद्र बायोमीट्रिक उपकरण लगाकर उचित मूल्य की दुकानों (एफपीएस) का स्वचालन करने के लिये भी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों से लगातार कह रहा है। देशभर में मई 2016 तक 1.11 लाख उचित मूल्य की दुकानों का स्वचालन किया गया और मार्च, 2017 तक यह संख्या 3 लाख से अधिक होने की उम्मीद है।

 

किसानों को ही लीजिए। भारत में ज्यादातर किसानों का माल उनके गाँव में मौजूद दलाल ही खरीद लेते हैं। ये लोग किसानों को जो दाम देते हैं, वे शहरों में उपभोक्ताओं द्वारा अदा किए जाने वाले दामों का 25-30 फीसदी ही होता है। इसकी वजह यह कि किसान एक तो ताजातरीन सूचनाओं, भावों आदि की जानकारी से वंचित होते हैं और दूसरे उनके पास अपने माल को सही जगह पर पहुँचाने के लिये पर्याप्त साधन नहीं होते। पारदर्शिता के अभाव में फसल उगाने वाला सिर्फ 25 फीसदी दाम प्राप्त कर पाता है जबकि फसल न उगाने वाले लोग, जो बिचौलिये या व्यापारी हैं, 70-75 फीसदी रकम पर हाथ साफ कर लेते हैं। डिजिटल इंडिया के तहत अब किसानों को न सिर्फ ताजा और सटीक जानकारियाँ उपलब्ध होने लगी हैं बल्कि वे सीधे डिजिटल माध्यमों से अपना माल बेचने की स्थिति में भी आ गये हैं। इस तरह की व्यवस्था पूरी तरह अमल में आ जाने पर वे अपने माल को 25-30 नहीं बल्कि 45 से 50 फीसदी तक की दर पर बेच सकेंगे। पारदर्शिता का अर्थ अंतिम छोर पर मौजूद व्यक्ति के लिये 20 प्रतिशत तक का लाभ हो सकता है, इसका अनुमान शायद बहुत कम लोगों ने लगाया होगा।

आज भारत सरकार के राष्ट्रीय सार्वजनिक वितरण प्रणाली पोर्टल पर लक्षित जन वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) योजना के तहत जारी तथा उठाई गई सामग्री का ताजा ब्यौरा किसी भी समय लेना सम्भव है। इस पोर्टल का नाम है- pdsportal.nic.in और यहाँ पर उपलब्ध आँकड़े बता रहे हैं कि भारत में दिसम्बर 2016 में टीपीडीएस के तहत 2.191 करोड़ टन चावल आवंटित किया गया, जिसमें से राज्यों द्वारा 1.774 करोड़ टन चावल उठा लिया गया और 1.866 करोड़ टन गेहूँ जारी किया गया जिसमें से 1.586 करोड़ टन गेहूँ उठा लिया गया। यहाँ पर अधिकांश राज्यों के पीडीएस पोर्टलों के लिंक मौजूद हैं जहाँ जाकर आप हर राज्य की स्थिति का सिलसिलेवार ब्यौरा हासिल कर सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले खाद्यान्न के वितरण के तमाम आँकड़े इस पोर्टल पर सहजता से उपलब्ध हैं। खाद्यान्नों से सम्बन्धित योजनाओं का ब्यौरा, आवंटन नीतियों का विवरण, आवंटन और सप्लाई चेन प्रबंधन की जानकारी, परियोजनाओं से सम्बन्धित दस्तावेज, आधार के साथ जोड़े गए बैंक खातों की जानकारी, तमाम तरह के तकनीकी दस्तावेज और बार-बार पूछे जाने वाले सवालों के जवाब भी यहाँ मिलेंगे।

भारतीय खाद्य निगम के पास आज किस अनाज का कितना स्टॉक मौजूद है, इसे यहाँ देखा जा सकता है। राशन की दुकानों पर कितनी बिक्री हुई, खाद्यान्न से सम्बन्धित नए सरकारी आदेश कौन से हैं, हमारे गोदामों में भंडारण क्षमता की क्या स्थिति है, ऐसे सवाल शायद आपके मन में न आए हो लेकिन इन सबके जवाब भी यहाँ मिलेंगे। ग्रामीण और शहरी गरीब लोग चाहें तो जन वितरण योजना के तहत अपना पंजीकरण भी यहीं पर कर सकते हैं। स्पष्ट है कि डिजिटलीकरण से आम आदमी और वह भी हाशिए पर खड़े आम आदमी को सही तथ्यों तक पहुँचने और अपनी बात कहने की ताकत मिली है जो पहले उपलब्ध नहीं थी।

(लेखक सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ हैं।), ई-मेल : balendudadhich@gmail.com

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