दिल्ली का लगातार गिर रहा है भूजल स्तर

Submitted by admin on Mon, 08/02/2010 - 09:25
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जनसत्ता, 2 अगस्त 2010
एक और समस्या यह है कि लोग पुरानी कोठी-बंगलों को तोड़कर फ्लैट या होटल बना रहे हैं। इससे पानी की खपत अचानक कई गुणा बढ़ जाएगी और इलाके में पानी का संकट बढ़ जाएगा। पुरानी मांग के हिसाब से उस कालोनी के लिए पानी का आबंटन है। उसी हिसाब से पाइप लाइन डली है। इससे पाइप लाइन पर भी ज्यादा दबाव पड़ेगा और पाइप फटेगी। इसे रोकने के लिए बोर्ड के पास ठोस कानून नहीं है। भूजल के दोहन को रोकने का भी अधिकार बोर्ड के पास नहीं है। दिल्ली के भूजल का मालिक केंद्रीय भूजल प्राधिकरण है। दिल्ली का जल प्रबंधन लगातार चुनौती बनता जा रहा है। राजधानी में पानी की मांग लगातार बढ़ती जा रही है, जबकि जल स्तर हर साल एक मीटर नीचे गिर रहा है। जल बोर्ड की पानी की लाइन दिल्ली की 30 फीसद इलाके में नहीं है। इसके बावजूद जल बोर्ड का घाटा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। बोर्ड दिल्ली सरकार से 22 हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले चुका है जिसके लौटने के आसान नहीं है। दिल्ली जल बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) रमेश नेगी का दावा है कि बोर्ड की वसूली बढ़ाने से लेकर पानी का समान बंटवारा करने का प्रयास हो रहा है। इसके बेहतर नतीजे निकल रहे हैं। पानी की चोरी, लीकेज घटाने और मीटर की तादाद बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

दिल्ली में पानी की उपलब्धता साढ़े आठ सौ एमजीडी (मिलीयन गैलन डेली) है। यह मांग के मुकाबले डेढ़ सौ एमजीडी कम है। यह तब है जब 30 फीसद इलाकों में पानी का कनेक्शन नहीं है। विधानसभा में बोर्ड की अध्यक्ष शीला दीक्षित कबूल चुकी हैं कि 42 फीसद पानी लीकेज में जाता है। नेगी का कहना है कि इस लीकेज में राजस्व नुकसान भी शामिल है। अनधिकृत बस्तियों, जहां पानी की लाइन नहीं है, वहां ग्यारह सौ टैंकरों से पानी दिया जाता है। उस पानी का किसी से पैसा नहीं लिया जाता है। लोगों ने मेन लाइन से अवैध कनेक्शन ले रखे हैं। उससे भी राजस्व नुकसान हो रहा है। इसके अलावा असली लीकेज से अलग नुकसान है। अंतरराष्ट्रीय मानदंड 15 फीसद है। वैसे जापान में केवल पांच फीसद चोरी है।

बिजली के मुकाबले पानी के मीटर आधे हैं। नेगी बताते हैं कि मीटर की अनुपलब्धता से लेकर प्लंबर तक की कमी मुद्दा था। मीटर के लिए विदेशी कंपनी से बात की गई वहीं प्लंबर के लिए आईटीआई से प्रयास किए गए। विदेशी कंपनी अपने मीटर का दस साल तक रखरखाव करेगी। इन प्रयासों के बाद एक लाख मीटर बोर्ड ने लगाए और 80 हजार मीटर लोगों ने खुद लगाए। पुनर्वास बस्तियों में मीटर लगाने की छूट तीन महीने और बढ़ा दी गई है। इसके बाद करीब 10 लाख मीटर लग गए हैं। गांवों में भी पानी के बिल लिए जाते हैं।

नई पाइप लाइन डालने के साथ-साथ पूरी दिल्ली को पानी यूजीआर (अंडर ग्राउंड रिजर्व वाटर) के जरिए देना तय किया गया है। यानी पहले जल शोधन संयंत्र से पानी यूजीआर में आ रहा है फिर उसे कालोनियों में दिया जा रहा है। अब तक 61 यूजीआर बन चुके हैं, 28 और बन रहे हैं। कुल 114 बनने हैं। इससे पानी का समान वितरण होगा। देश का औसत 135 गैलन प्रति व्यक्ति है लेकिन दिल्ली का औसत 190 गैलन प्रति व्यक्ति है। जिन इलाकों में टैंकर से पानी दिया जाता है उसमें 20 लीटर प्रति व्यक्ति पानी नहीं मिलता है। जिन इलाकों में बोर्ड की लाइन है उसमें भी बड़ा इलाका ऐसा है, जहां नियमित पानी आता ही नहीं है।

दिल्ली में 700 किलोमीटर पाइप लाइन है। उसमें से पुराने पाइप लाइन को बदलने का काम चल रहा है। अब तक पांच साल में डेढ़ सौ किलोमीटर लाइन बदली गई है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो लीकेज जमीन के अंदर होता है, वह काफी समय बाद पता चलता है। तब तक काफी पानी बेकार हो चुका होता है। बोर्ड की लीक डिटेक्शन यूनिट की मदद करने के लिए निजी कंपनियों को लगाया जा रहा है। पाइप से पानी की चोरी रोकने के लिए दिल्ली में पहली बार पानी अदालत लगाई गई। दिल्ली के चार इलाकों में पानी अदालत लगाई गई। दिल्ली के चार इलाकों में लगने वाली इस अदालत के माध्यम से पांच महीने में 28 लाख रुपए जुर्माना वसूला गया। सीधे मुख्य लाइन से पानी चोरी रोक कर ही अभी तुरंत इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (नए टर्मिनल को) एक एमजीडी पानी दिया जाने लगा है।

सीइओ ने कहा कि पानी की दरें बढ़ने और बोर्ड के प्रयास से बोर्ड का घाटा 300 करोड़ सलाना से इस बार 50 करोड़ सालाना रहेगा। दिल्ली सरकार से मिले 22 हजार करोड़ का कर्ज लौटाने की स्थिति में बोर्ड फिलहाल नहीं है। बोर्ड ने मीटरों की संख्या बढ़ाकर वसूली बढ़ाई है। इतना ही नहीं 20 हजार रुपए से ज्यादा के बिलों के लिए लोक अदालत लगानी शुरू की है। जुलाई में लगी एक दिन की लोक अदालत में 14 लाख रुपए की वसूली हुई है। सामान्य वसूली तो बढ़ी ही है। पानी की चोरी पर मुकदमें आरड्बलूए की शिकायतों पर होने से कार्रवाई होने में कठिनाई नहीं आती है।

राजधानी की सबसे बड़ी चुनौती पानी की उपलब्धता बढ़ाना और सावधानी से इस्तेमाल करना है। हाईकोर्ट के आदेश से मुख्य सचिव की अध्यक्षता में नगर निगम, डीडीए और लोक निर्माण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की एक कमेटी बनी है। उसे दिल्ली के पुराने साढ़े छह सौ तालाबों को पुनर्जीवित करने का लक्ष्य दिया गया है। पानी की बचत के लिए 300 मीटर से बड़े घर में वर्षा जल संचयन प्रणाली लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। 12 हजार लीटर से ज्यादा हर रोज इस्तेमाल करने वाले होटल संस्थानों में रीसाइकिलिंग प्लांट लगाना अनिवार्य किया गया है। पुराने संस्थानों में प्लांट लगवाने का काम पर्यावरण विभाग के पास है। कुछ पुराने संस्थानों में यह लगने भी शुरू हो गए हैं।

एक और समस्या यह है कि लोग पुरानी कोठी-बंगलों को तोड़कर फ्लैट या होटल बना रहे हैं। इससे पानी की खपत अचानक कई गुणा बढ़ जाएगी और इलाके में पानी का संकट बढ़ जाएगा। पुरानी मांग के हिसाब से उस कालोनी के लिए पानी का आबंटन है। उसी हिसाब से पाइप लाइन डली है। इससे पाइप लाइन पर भी ज्यादा दबाव पड़ेगा और पाइप फटेगी। इसे रोकने के लिए बोर्ड के पास ठोस कानून नहीं है। भूजल के दोहन को रोकने का भी अधिकार बोर्ड के पास नहीं है। दिल्ली के भूजल का मालिक केंद्रीय भूजल प्राधिकरण है। ट्यूबवेल लगाने की अनुमति देने के लिए एक कमेटी तो है लेकिन चोरी से लगने पर रोकने का कानून नहीं है। इसके लिए विधानसभा में कानून बनने के लिए सितंबर 2005 में भूजल संशोधन विधेयक आया था। उसका सत्तापक्ष के ही विधायकों ने विरोध किया। इसके बाद उसे प्रवर समिति को सौंप दिया गया। अभी तक वह विधेयक लंबित है।

पानी के लिए नया मास्टर प्लान 2021 बनाया जा रहा है। यह साल के आखिर तक तैयार हो जाएगा। उसमें नए जलाशय बनाने से लेकर भूजल स्तर को नीचे जाने से रोकने के उपाय सुझाए जाने हैं। लेकिन फिलहाल दिल्ली की सबसे बड़ी चुनौती पानी है। पूरी दिल्ली में पाइप लाइन डल जाए (जो संभव नहीं है) और सभी को राष्ट्रीय मापदंड के हिसाब से 130 गैलन पानी हर रोज दिया जाए तो पानी की मांग ग्यारह सौ एमजीडी से ज्यादा हो जाएगी। फिलहाल राष्ट्रमंडल तक तो जैसे तैसे पानी मिल ही जाएगा, आगे समस्या विकट होती जाएगी।

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