दिल्ली की हवा में घुलता जहर

Submitted by RuralWater on Sun, 10/16/2016 - 16:03

केन्द्र व राज्य सरकारें भी पराली नष्ट करने की सस्ती व सुरक्षित तकनीक ईजाद करने में नाकाम रही हैं। ऐसी कोई तकनीक नहीं होने के कारण किसान को खेत में ही डंठल जलाने पड़ते हैं। जलाने की उसे जल्दी इसलिये भी रहती है, क्योंकि खाली हुए खेत में गेहूँ और आलू की फसल बोनी होती है। इस लिहाज से जरूरी है कि राज्य सरकारें पराली से जैविक खाद बनाने के संयंत्र जगह-जगह लगाएँ और रासायनिक खाद के उपयोग को प्रतिबन्धित करे। हालांकि कृषि वैज्ञानिक पराली को कुतरकर किसानों को जैविक खाद बनाने की सलाह देते हैं, किन्तु यह विधि बहुत महंगी है। मौसम के करवट लेते ही देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण से लोगों की सेहत बिगड़ने लगती है। इस प्रदूषण के कारण तो कई हैं, लेकिन प्रमुख कारण यही बताया जा रहा है कि फसलों के अवशेष जलाए जाने से यह समस्या उत्पन्न होती है। यह समस्या कोई नई नहीं है, बावजूद सर्वोच्च न्यायालय को इस समस्या पर निगरानी व नियंत्रण के लिये सम्बन्धित राज्य सरकारों को निर्देश देना पड़ता हैै। जबकि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिये विभिन्न एजेंसियाँ व बोर्ड हैं, लेकिन वे जब तक ऊपर से सख्ती नहीं होती है, तब तक कानों में उँगली ठूँसे बैठी रहती हैं। इस बार भी यही हुआ है।

फसलों के अवशेष के रूप में निकलने वाली पराली को हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी मात्रा में जलाया जाता है। हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जब पराली जलाई जाती है, तो दिल्ली की आवोहवा में धुंध छा जाती है। हर साल अक्टूबर-नवम्बर माह में फसल कटने के बाद शेष बचे डंठलों को खेतों में ही जलाया जाता है। इनसे निकलने वाला धुआँ वायु को प्रदूषित करता है। वायु गुणवत्ता सूचकांक के आँकड़े बताते हैं कि मानसून खत्म होते ही दिल्ली में वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ने लगा है।

अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा ने भी सेटेलाइट तस्वीरें जारी करके इस समस्या की पुष्टि की है। सरकारी आँकड़ों से पता चलता है कि देश में हर साल 70 करोड़ टन पराली निकलती है। इसमें से 9 करोड़ टन खेतों में ही छोड़नी पड़ती है। हालांकि 31 प्रतिशत पराली का उपयोग चारे के रूप में 19 प्रतिशत जैविक ऊर्जा के रूप में और 15 प्रतिशत पराली खाद बनाने के रूप में इस्तेमाल कर ली जाती है। बावजूद 31 प्रतिशत बची पराली को खेत में ही जलाना पड़ता है, जो वायू प्रदूषण का कारण बनती है।

अकेले पंजाब में इस बार 15 लाख मीट्रिक टन पराली खेतों में जलाने की आशंका है। एक हेक्टेयर धान के खेत में औसतन 3 से 5 मीट्रिक टन पराली निकलती है। पंजाब में इस बार 30 लाख 10 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि में धान रोपी गई है। फसल आने के बाद इसमें से पाँच लाख मीट्रिक टन पराली का इस्तेमाल चारा, खाद एवं उद्योगों में ईंधन के रूप में हो जाएगा। उपयोग की जाने वाली पराली की यह मात्रा महज 20 प्रतिशत है, जबकि 80 प्रतिशत पराली का कोई उपयोग नहीं है। इसलिये किसानों के पास इसे सरलता से नष्ट करने के लिये जलाने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं है।

केन्द्र व राज्य सरकारें भी पराली नष्ट करने की सस्ती व सुरक्षित तकनीक ईजाद करने में नाकाम रही हैं। ऐसी कोई तकनीक नहीं होने के कारण किसान को खेत में ही डंठल जलाने पड़ते हैं। जलाने की उसे जल्दी इसलिये भी रहती है, क्योंकि खाली हुए खेत में गेहूँ और आलू की फसल बोनी होती है।

इस लिहाज से जरूरी है कि राज्य सरकारें पराली से जैविक खाद बनाने के संयंत्र जगह-जगह लगाएँ और रासायनिक खाद के उपयोग को प्रतिबन्धित करे। हालांकि कृषि वैज्ञानिक पराली को कुतरकर किसानों को जैविक खाद बनाने की सलाह देते हैं, किन्तु यह विधि बहुत महंगी है।

कर्ज में डूबे देश के किसान से यह उम्मीद करना नाइंसाफी है। हालांकि कुछ छोटे किसान वैकल्पिक तरीका अपनाते हुए धान को काटने से पहले ही आलू जैसी फसलें बो देते हैं। इसका फायदा यह होता है कि पराली का स्वाभाविक रूप में जैविक खाद में बदल जाती है।

यह सही है कि पराली जलाने के कई नुकसान हैं। वायु प्रदूषण तो इतना होता है कि दिल्ली भी उसकी चपेट में आ जाती है। अलबत्ता एक एकड़ धान की पराली से जो आठ किलो नाइट्रोजन, पोटाश, सल्फर और करीब 3 किलो फास्फोरस मिलती है, वह पोषक तत्व जलने से नष्ट हो जाते हैं। आग की वजह से धरती का तापमान बढ़ता है।

इस कारण खेती के लिये लाभदायी सूक्ष्म जीव भी मर जाते हैं। इस लिहाज से पराली जलाने का सबसे ज्यादा नुकसान किसान को उठाना पड़ता है। इसलिये यह जरूरी है कि पराली के उपयोग के भरपूर उपाय किये जाएँ। बावजूद ऐसे कई कारण हैं, जो वायू को प्रदूषित करते हैं।

भारत में औद्योगीकरण की रफ्तार भूमण्डलीकरण के बाद तेज हुई है। एक तरफ प्राकृतिक सम्पदा का दोहन बढ़ा तो दूसरी तरफ औद्योगिक कचरे में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई। लिहाजा दिल्ली में जब शीत ऋतु दस्तक देती है तो वायुमण्डल में आर्द्रता छा जाती है। यह नमी धूल और धुएँ के बारीक कणों को वायुमण्डल में विलय होने से रोक देती है।

नतीजतन दिल्ली के ऊपर एकाएक कोहरा आच्छादित हो जाता है। वातावरण का यह निर्माण क्यों होता है, मौसम विज्ञानियों के पास इसका कोई स्पष्ट तार्किक उत्तर नहीं है। वे इसकी तात्कालिक वजह पंजाब एवं हरियाणा के खेतों में जलाए जा रही पराली बता देते हैं। यदि वास्तव में इसी आग से निकला धुआँ दिल्ली में छाए कोहरे का कारण होता तो यह स्थिति चंडीगढ़, अमृतसर, लुधियाना और जालंधर जैसे बड़े शहरों में भी दिखनी चाहिए थी? लेकिन नहीं दिखी। अलबत्ता इसकी मुख्य वजह हवा में लगातार प्रदूषक तत्वों का बढ़ना है।

दरअसल मौसम गरम होने पर जो धूल और धुएँ के कण आसमान में कुछ ऊपर उठ जाते हैं, वे सर्दी बढ़ने के साथ-साथ नीचे खिसक आते हैं। दिल्ली में बढ़ते वाहन और उनके सह उत्पाद प्रदूषित धुआँ और सड़क से उड़ती धुल अंधियारे की इस परत को और गहरा बना देते हैं। दिल्ली में इस वक्त वायुमण्डल में मानक पैमाने से ढाई गुना ज्यादा प्रदूषक तत्वों की संख्या बढ़ गई है। इस वजह से लोगों में गला, फेफड़े और आँखों की तकलीफ बढ़ जाती है। कई लोग मानसिक अवसाद की गिरफ्त में भी आ जाते हैं।

हालांकि हवा में घुलता जहर महानगरों में ही नहीं छोटे नगरों में भी प्रदूषण का सबब बन रहा है। कार-बाजार ने इसे भयावह बनाया है। यही कारण है कि लखनऊ, कानपुर, अमृतसर, इन्दौर और अहमदाबाद जैसे शहरों में प्रदूषण खतरनाक स्तर की सीमा लाँघने को तत्पर है। उद्योगों से धुआँ उगलने और खेतों में बड़े पैमाने पर औद्योगिक व इलेक्ट्रॉनिक कचरा जलाने से भी दिल्ली की हवा में जहरीले तत्वों की सघनता बढ़ी है। इस कारण दिल्ली दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शामिल हो गया है।

जिस गुजरात को हम आधुनिक विकास का मॉडल मानकर चल रहे हैं, वहाँ भी प्रदूषण के हालात भयावह हैं। कुछ समय पहले टाइम पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के चार प्रमुख प्रदूषित शहरों में गुजरात का वापी शहर शामिल है। इस नगर में 400 किलोमीटर लम्बी औद्योगिक पट्टी है।

इन उद्योगों में कामगार और वापी के रहवासी कथित औद्योगिक विकास की बड़ी कीमत चुका रहे हैं। वापी के भूजल में पारे की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों से 96 प्रतिशत ज्यादा है। यहाँ की वायु में धातुओं का संक्रमण जारी है, जो फसलों को नुकसान पहुँचा रहा है। कमोबेश ऐसे ही हालात अंकलेश्वर बन्दरगाह के हैं। यहाँ दुनिया के अनुपयोगी जहाजों को तोड़कर नष्ट किया जाता है। इन जहाजों में विषाक्त कचरा भी भरा होता है, जो मुफ्त में भारत को निर्यात किया जाता है। इनमें ज्यादातर सोडा की राख, एसिड युक्त बैटरियाँ और तमाम किस्म के घातक रसायन होते हैं।

इन घातक तत्वों ने गुजरात के बन्दरगाहों को बाजार में तब्दील कर दिया है। लिहाजा प्रदूषित कारोबार पर शीर्ष न्यायालय के निर्देश भी अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश में विश्व व्यापार संगठन के दबाव में प्रदूषित कचरा भी आयात हो रहा है। इसके लिये बाकायदा विश्व व्यापार संगठन के मंत्रियों की बैठक में भारत पर दबाव बनाने के लिये एक परिपत्र जारी किया है कि भारत विकसित देशों द्वारा पुनर्निमित वस्तुओं और उनके अपशिष्टों के निर्यात की कानूनी सुविधा दे।

पूँजीवादी अवधारणा का जहरीले कचरे को भारत में प्रवेश की छूट देने का यह कौन-सा मानवतावादी तर्क है? अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी इस प्रदूषण को निर्यात करते रहने का बेजा दबाव बनाए हुए हैं। बहरहाल हमारे नीति-नियन्ताओं को कई स्तर पर प्रदूषण मुक्ति की पहल करनी होगी, तब कहीं जाकर दिल्ली समेत देश के अन्य छोटे-बड़े नगर प्रदूषण से मुक्त हो पाएँगे।

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