दर्द की दो रेखाएं

Submitted by Hindi on Fri, 06/10/2011 - 09:28
Source
द पब्लिक एजेंडा, जून 2011

हाल के दो सर्वेक्षण बताते हैं कि अब गंगा का पानी कई जगहों पर नहाने के लायक़ भी नहीं रह गया है और यमुना में ऑक्सीजन की मात्रा बेहद कम हो गयी है। बाक़ी नदियों का हाल भी बुरा है। काशी से तन-मन की शुद्धि की धारणा पर विश्वास करने वालों को सदमा लग सकता है कि काशी की डुबकी उन्हें बीमार कर सकती है। काशी ही नहीं, अब अधिकतर जगहों पर गंगा का पानी नहाने के लायक भी नहीं रह गया है। यह किसी गंगा-प्रेमी की चिंता नहीं, बल्कि शीर्ष प्रदूषण नियंत्रण संस्था- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की हालिया शोध-रिपोर्ट का सार है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ॠषिकेश, हरिद्वार और नरोरा को छोड़ अन्य जगहों पर गंगा में घातक बैक्टीरिया- फेकल कोलिफार्म (एफसी) की मात्रा सामान्य से काफी ज्यादा है।

हर दिन औसतन 25 हजार 617 लाख लीटर गंदा पानी गंगा में बहाया जा रहा है, जिसके कारण नदी में सड़े-गले कार्बनिक प्रदूषकों (ऑर्गेनिक पाल्यूटेंट) की मात्रा काफी बढ़ गयी है। रिपोर्ट बताती है कि गंगा के किनारे बसे तमाम बड़े और छोटे शहरों से निकलने वाले मल-मूत्र और औद्योगिक अपशिष्ट उसे प्रदूषित कर रहे हैं। नाली के गंदे पानी को शुद्ध करने में एक भी शहर पूरी तरह सक्षम नहीं है, जिसके कारण पानी में डीओ (डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन) और बीओडी (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) का संतुलन बिगड़ता चला जा रहा है। गौरतलब है कि वैज्ञानिक प्रणाली में डीओ, बीओडी और एफसी के आधार पर नदी की स्वच्छता मापी जाती है। गंगा वाटर क्वालिटी ट्रेंड' नामक 68 पेज की इस रिपोर्ट में गंगा की स्वच्छता का काफी विस्तार से अध्ययन किया गया है।

इसके तहत नदी के पूरे बहाव क्षेत्र में 141 आंकड़ा संग्रहण केंद्र बनाये गये और लगातार दस वर्षों (1999-2008) तक आंकड़े एकत्र किये गये। तमाम तरह के आंकड़ों के विश्लेषण के बाद शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अब गंगा अपने उद्गम से लेकर संगम तक (उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल) प्रदूषित हो चुकी है। सबसे चिंताजनक स्थिति उत्तर प्रदेश में है।प्रदूषण ही नहीं, दुनिया की यह चौंतीसवीं सबसे लंबी नदी पानी की कमी भी झेल रही है। सीपीसीबी की रिपोर्ट बताती है कि ऊपरी जल संग्रहण क्षेत्र में बांध आदि निर्माण के परिणामस्वरूप गैर-बरसाती मौसम में गंगा में पानी की मात्रा काफी कम हो जा रही है। यह सरकारी रिपोर्ट है, शायद इसलिए इसमें पानी की कमी को बहुत कम शब्दों में निपटा दिया गया है। लेकिन अब यह बात?छिपी नहीं है कि उत्तराखंड में सहायक नदियों पर बांधों के निर्माण के कारण गंगा काफी कमजोर हो चली है।

गोमुख में लगातार कम होते ग्लेशियर, उत्तराखंड में नदी के तल में फैलते स्टोन खनन का गोरखधंधा, कटते जंगल, क्रशर संयंत्रों की स्थापना और अतिक्रमण आदि के कारण बरसात के बाद कई जगहों पर पानी की मात्रा इतनी कम हो जाती है कि उसका बहाव लगभग बंद हो जाता है। विशेषज्ञ इस पर गंभीर चिंता प्रकट करते हैं, जबकि नदी-प्रेमी इसे गंगा की मौत का संकेत मानते हैं। वैसे वैज्ञानिक सिद्धांत भी कहता है कि अगर नदी में पानी की मात्रा न्यूनतम स्तर से कम हो जाये तो वह खुद-ब-खुद प्रदूषित हो जाती है। जब आस्था, सभ्यता और संस्कृति की प्रतीक गंगा का यह हाल है, तो अन्य नदियों की कौन सुनेगा? वैसे गंगा की कराह से कहीं ज्यादा दर्दनाक है यमुना की व्यथा। यमुना की दुर्दशा पर प्रसिद्ध पर्यावरण अनुसंधान संस्था सेंटर फार साइंस ऐंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने चार साल में दो बार शोध किया है।

सन् 2007 में सीएसई ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि यमुना दिल्ली परिक्षेत्र में मृतप्राय हो चुकी है और अन्य स्थानों पर भी यह गंभीर प्रदूषण की मार झेल रही है। दो साल बाद सीएसई ने फिर यमुना पर शोध किया और पाया है कि अब हालात पहले से भी ज्यादा खराब हो गये हैं। “स्टेट ऑफ पॉल्यूशन इन द यमुना” नामक शोध-रिपोर्ट में सीएसई ने कहा है कि प्राकृतिक तौर पर दिल्ली परिक्षेत्र में यमुना का अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया है, क्योंकि गैर-बरसाती मौसम में वजीरावाद बैराज के बाद नदी में प्राकृतिक पानी का आगमन लगभग शून्य हो जाता है और उस दौरान दिल्ली शहर के नाले का गंदा पानी ही नदी में मौजूद रहता है। सीएसई के आंकड़ों के मुताबिक, हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि निजामुद्दीन के बाद यमुना में डीओ की मात्रा नगण्य हो जाती है, जो नदी की मृत्यु का संकेत है। यही हाल बीओडी और एफसी का भी है। ऐसी स्थिति में नदी में नहाना भी बीमारी को आमंत्रण देने जैसा है।

उधर दिल्ली समेत तमाम जगहों पर यमुना के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण जारी है, जिसके कारण इसकी क्षमता और स्वच्छता संकट में है। देश की अन्य प्रमुख नदियों के प्रदूषण-अतिक्रमण में भी कोई कमी नहीं दिख रही है। यह बात दीगर है कि हर राज्य में संकटग्रस्त नदियों के संरक्षण और शुद्धिकरण के लिए योजनाएं वर्षों से चलायी जा रही हैं। हिमालय से निकलकर गंगा और ब्रह्मपुत्र में मिलने वाली कोसी, महानंदा, मेची, गंडक, बागमती, घाघरा, गोमती, सरयू समेत करीब चार दर्जन छोटी-बड़ी नदियां अपना मूल स्वरूप गंवा चुकी हैं। मध्य भारत की नदियां औद्योगिक कचरे के कारण दम तोड़ रही हैं। झारखंड की दामोदर और सुवर्णरेखा देश की सबसे ज्यादा प्रदूषित नदियों में से हैं।

दक्षिण भारत की नदियां भी प्रदूषण और अतिक्रमण की मार से महफूज नहीं हैं। दक्षिण की गंगा के नाम से मशहूर गोदावरी अत्यधिक प्रदूषण का शिकार है जबकि कृष्णा नदी का हाल भी बुरा है। पश्चिम भारत की नदियों को तो अब औद्योगिक कचरों का संगम कहा जाने लगा है। गुजरात में स्थिति यह है कि अब सरकार हर तीसरे महीने नदियों के प्रदूषण की जानकारी ले रही है। कुछ समय पहले सीपीसीबी ने देश की नदियों की स्वच्छता का अध्ययन किया था। इसके मुताबिक, पश्चिम और दक्षिण भारत की 80 प्रतिशत नदियों में अधिकतर स्थानों पर एफसी, डीओ और बीओडी का स्तर मानक से कम है। औद्योगिक शहरों से दूर बहने वाली जो नदियां कुछ साल पहले तक प्रदूषण से बची हुई थीं, वे भी अब खेतों में कीटनाशक दवाओं और रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध इस्तेमाल के कारण जहरीली हो रही हैं। कहा जा सकता है कि अब भारत की गोदी में नदियां खेल नहीं, बल्कि कराह रही हैं।
 

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