धानी पंजाब में धान पानी

Submitted by UrbanWater on Sat, 03/11/2017 - 13:41
Source
राइजिंग टू द काल, 2014

अनुवाद - संजय तिवारी

जेथुका गाँव के भीम सिंहजेथुका गाँव के भीम सिंहसाल 2006 की बात है। पाँच नदियों के प्रदेश में पानी का संकट पैदा हो गया था। यह संकट जमीन के ऊपर जितना था उससे ज्यादा जमीन के नीचे था। भूजल रसातल की तरफ धँसता जा रहा था। सरकार के सामने इसे रोकने की चुनौती थी। कैप्टन अमरिन्दर सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री थे। लेकिन इस संकट को रोकने के लिये राज्य का किसान कमीशन जो रास्ता सुझा रहा था वह कैप्टन के लिये भूजल से बड़ा संकट नजर आ रहा था।

पंजाब राज्य किसान आयोग का गठन किसानों से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिये ही किया गया है लेकिन यहाँ किसान आयोग जो समाधान बता रहा था वह भूजल को ऊपर उठाता या न उठाता लेकिन सरकार को रसातल में पहुँचाने वाला नजर आ रहा था। किसान आयोग के अध्यक्ष गुरुचरण सिंह कालकट अपना जो प्रस्ताव लेकर सरकार के पास गए थे उसमें कहा था कि सरकार अप्रैल के महीने में धान की रोपाई पर रोक लगा दे। यह कैसे हो सकता था? देश के दूसरे हिस्सों में धान की रोपाई भले ही जून जुलाई के महीने में होती हो लेकिन पंजाब में तो अप्रैल मई का महीना धान की खेती का महीना बन गया था। जब ज्ञान और विज्ञान ने मिलकर तय ही कर लिया था कि धान की खेती के लिये प्रकृति की किसी व्यवस्था को बाधा नहीं बनने दिया जाएगा तो जून जुलाई तक मौसम का इन्तजार कोई क्यों करता? लिहाजा, अप्रैल मई महीने की प्रचंड गर्मी में जब पानी हवा का भी साथ छोड़ देता है तब पंजाब के किसानोंं ने उसे धान का संग साथ करा दिया।

मुख्यमंत्री भी समझते थे कि इस नई तरह की खेती से जमीन का पानी सूख रहा है लेकिन वो क्या कर सकते थे? किसान को कैसे कहा जाये कि आपने खेती के लिये गलत मौसम का चुनाव कर लिया है? जवाब गुरुचरण के पास था लेकिन उस जवाब को मानने के लिये राज्य के कैप्टन तैयार नहीं थे। लेकिन गुरुचरण ने भी बिल्कुल साफ कर दिया कि इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। बिना कानून बनाए हम किसान को अप्रैल मई के महीने में धान की रोपाई से नहीं रोक सकते।

राजनीतिक लोगों के लिये अक्सर अनिर्णय सबसे फायदे का निर्णय होता है। कैप्टन ने भी यही किया। “हम राजनीतिक आत्महत्या नहीं कर सकते।” कैप्टन ने इसी जवाब के साथ समस्या का तात्कालिक समाधान कर दिया। साल भर बाद पंजाब में चुनाव हुए और कैप्टन अमरिन्दर के राजनीतिक आत्महत्या की नौबत नहीं आई। कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और शिरोमणि अकाली दल की भाजपा के साथ सरकार बन गई।

उधर सरकार बदली इधर गुरुचरण सिंह फिर से अपने प्रस्ताव के साथ तैयार। पंजाब के नए मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को फिर से वही पुराना ड्राफ्ट दिया गया लेकिन उन्होंने इसे कोई तवज्जो नहीं दिया। पंजाब में किसान सिर्फ देश के लिये रोटी पैदा नहीं करते बल्कि राज्य में राजनीतिक दलों के लिये रोजी रोटी का जुगाड़ करते हैं। पंजाब में किसान सबसे सशक्त मतदाता समूह हैं और कोई भी राजनीतिक दल इनकी अवहेलना नहीं कर सकता। पंजाब में कोई भी राजनीतिक दल किसान के मुद्दे पर “राजनीतिक आत्महत्या” नहीं करना चाहता।

लेकिन गुरुचरण सिंह भी हार मानने वालों में से नहीं थे। वे सिर्फ किसान आयोग के अध्यक्ष ही नहीं थे बल्कि खुद एक कृषि वैज्ञानिक हैं इसलिये उन्हें दिख रहा था कि बहुत जल्द उनकी चिन्ता पूरे प्रदेश की चिन्ता बनने वाली है। पहला प्रस्ताव खारिज हो जाने के बाद 2008 की शुरुआत में एक बार फिर उन्होंने बादल सरकार को सम्पर्क किया। इस बार मुख्यमंत्री का जवाब इतना भी निराश करने वाला नहीं था। उन्होंने कहा, “हम सीधे कानून नहीं बनाएँगे। अभी एक अध्यादेश लेकर आएँगे अगर यह प्रयोग सफल नहीं रहा तो कानून बनाने के बारे में सोचेंगे। लेकिन असफल हुआ (या फिर किसानों की तरफ से विरोध हुआ) तो अध्यादेश को निरस्त कर देंगे।” गुरुचरण सिंह को आखिरकार उम्मीद की वह रोशनी नजर आ गई थी जिसकी दो साल से राजनीतिक गलियारों में तलाश कर रहे थे।

इसके बाद लम्बी चौड़ी चर्चाओं और कानून बनाने की प्रक्रिया चली। अन्तत: अप्रैल 2008 में अध्यादेश जारी हो गया। अध्यादेश के मुताबिक दस मई से पहले धान के बीजों की बुआई पर रोक लगा दी गई और 10 जून से पहले खेतों में धान की रोपाई नहीं की जा सकती थी। इस साल अच्छी वर्षा हुई इसलिये किसानों को पानी की कोई समस्या नहीं हुई। अध्यादेश का भी असर हुआ। दस मई तक धान के बीजों की रोपाई खेतों में नहीं हुई और 10 जून तक सिर्फ 22 फीसदी खेतों में धान लगाए गए जबकि एक साल पहले 2007 में, 10 जून तक 42 फीसदी खेतों में धान की रोपाई हो गई थी।

पंजाब में राजनीतिक आकाओं को अध्यादेश की अहमियत समझ में आ गई। 2009 में पंजाब भूजल संरक्षण अधिनियम कानून पारित हो गया। कानून में कृषि विभाग के अधिकारियों को अधिकार दिया गया कि 10 मई से पहले अगर वे खेतों में धान के पौधे पाते हैं तो उसे नष्ट कर सकते हैं और इसका खर्चा भी किसान से ही वसूल करेंगे। कानून का उल्लंघन करने पर किसान पर प्रति हेक्टेयर 10 हजार रुपए का जुर्माना भी तय किया गया। कृषि विभाग के अधिकारियों को यह अधिकार भी दिया गया कि बार-बार कानून का उल्लंघन करने वाले किसानों की बिजली भी काट सकते हैं। पंजाब में किसानों की तरफ से इस कानून का बहुत विरोध नहीं हुआ उल्टे बगल के हरियाणा में भी सरकार ने 2009 में भूजल संरक्षण के लिये इसी तरह का कानून पारित कर दिया।

संकट की शुरुआत


1970 और 80 का वह हरित क्रान्ति का दौर था। देश की खाद्य सुरक्षा का भार पंजाब के कन्धों पर डाल दिया गया था। इस भार को उठाने के लिये पंजाब ने अपनी परम्परागत फसलों मकाई, दलहन, तिलहन को अलविदा कहकर गेहूँ, चावल का फसल चक्र अपना लिया। 1979 में ही सूखे का पहला संकट खड़ा हो गया था जब मध्य पंजाब के इलाकों में भूजल तेजी से नीचे गिरने लगा लेकिन 1988 की बाढ़ ने इस संकट से पंजाब को उबार लिया।

पंजाब के गाँव का किसान लेजर-स्तरीय तकनीक का उपयोग करके अपने खेत को तैयार करता हुआलेकिन असली संकट पैदा हुआ 1993-94 के दौरान जब पंजाब के किसानों ने चावल की किस्म गोविन्दा को उगाना शुरू किया। क्योंकि यह धान साठ दिनों में पककर तैयार हो जाता था इसलिये आम बोलचाल की भाषा साठी चावल कहा गया। इसका किसानों ने यह फायदा उठाया कि एक फसल चक्र (अप्रैल से अक्टूबर) में साठी चावल की दो फसल उगाना शुरू कर दिया। इससे किसानों की आय में बढ़ोत्तरी हुई लेकिन राज्य में पानी का संकट खड़ा होना शुरू हो गया। पंजाब भूजल बोर्ड और पंजाब विश्वविद्यालय ने जब इस ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया तो इस संकट से निपटने के लिये 2005 में पंजाब राज्य किसान आयोग का गठन किया गया। 1980 के दशक में जहाँ भूजल का स्तर 18 सेंटीमीटर सालाना की दर से नीचे गिर रहा था वहीं 2000 से 2005 के बीच भूजल स्तर 88 सेंटीमीटर सालाना की दर से नीचे गिरने लगा। इस संकट से निपटने के लिये गठन के तत्काल बाद पंजाब राज्य किसान आयोग ने किसानों को जागरुक करने के लिये आयोग ने पानी बचाओ, पंजाब बचाओ अभियान शुरू किया। ऐसा इसलिये भी जरूरी था क्योंकि हरित क्रान्ति के अलावा जलवायु परिवर्तन का भी असर पंजाब पर होने वाला था।

जलवायु परिवर्तन का असर


1970 से 2001 के दौरान गंगा की तराई में हुए बारिश के पैटर्न को देखें तो पता चलता है कि बारिश में बढ़ोत्तरी नजर आती है, (0.3-5.8 मिलीमीटर सालाना)। इस भूभाग में तापमान में सालाना 0.02 से 0.07 डिग्री सेंटीग्रेड की दर से तापमान में वृद्धि दर्ज की गई है। अनुमान है कि 2030 तक इस भूभाग में 1 से 2 डिग्री तक तापमान में बढ़ोत्तरी हो सकती है। अगर सर्दी के तापमान में आधा डिग्री की बढ़त हुई तो पंजाब और हरियाणा जैसे अधिक पैदावार वाले इलाकों में पैदावार में 10 फीसदी की गिरावट आ सकती है। अगर तापमान में यह बढ़त 1, 2 या फिर 3 डिग्री की हुई तो गेहूं के पैदावार में 8.1, 18.7 या फिर 25.7 फीसदी और चावल के पैदावार में क्रमश: 5.4, 7.4 और 25.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा सकती है। पंजााब में बठिंडा जलवायु परिवर्तन की सबसे ज्यादा जद में है। इसके बाद कपूर्थला और रूपनगर आते हैं। जाहिर है जब जलवायु परिवर्तन का यह असर खेती किसानी पर पड़ेगा तो इसका सीधा असर इंसानों के स्वास्थ और जानवरों के पालन पर भी पड़ेगा।

1970 को आधार मानकर देखें तो पंजाब के तापमान में 2010 तक 05-1.0 डिग्री की बढ़ोत्तरी हो चुकी है। आने वाले दिनों में भी गर्मी बढ़ेगी और सर्दी में कमी आएगी। 2050 तक अगर गर्मी में इसी गति से बढ़ोत्तरी होती रही तो न्यूनतम तापमान में 1.9 से 2.1 डिग्री की बढ़ोत्तरी हो जाएगी। पंजाब किसान आयोग का ड्रॉफ्ट बताता है कि 2009 में पंजाब में 20.35 अरब घनमीटर भूजल बचा है जबकि 34.66 अरब घनमीटर होना चाहिए। इस लिहाज से 2009 में पहले ही भूजल में 14.31 अरब घनमीटर भूजल की कमी है। इसका नतीजा है कि पंजाब भूजल संकट की लिस्ट में सबसे आगे खड़ा है। लेकिन एक तरफ जहाँ भूजल का संकट बढ़ रहा है वहीं दूसरी तरफ चावल की खेती का रकबा भी बढ़ता जा रहा है। 2000-01 में पंजाब में खेती का रकबा 2612 मिलियन हेक्टेयर था जो कि 2009-10 में 2802 मिलियन हेक्टेयर हो गया। 1970 में पंजाब में 1 लाख 90 हजार ट्यूबवेल थे जो कि 2010 में 23 लाख हो गए। इन्हीं खतरों को देखते हुए पंजाब सरकार ने 2009 में भूजल दोहन के खिलाफ कानून को पास किया।

काम कर गया कानून


सही कानून और उसका पालन सख्ती से हो तो परिणाम सामने आने में समय नहीं लगता। ऐसा ही पंजाब में हुआ। 2009 में कानून बनने के बाद उसका सख्ती से पालन किया गया जिसका परिणाम चार साल के भीतर ही दिखने लगा। 2009 में जहाँ भूजल स्तर सालाना 91 सेंटीमीटर की दर से नीचे गिर रहा था वह सम्भल गया और गिरता स्तर घटकर 55 सेंटीमीटर सालाना रह गया। पंजाब के कृषि कमिश्नर बलविन्दर सिंह संधू बताते हैं कि उस साल मानसून औसत से 30 फीसदी कम था लेकिन देर से की गई धान की रोपाई कानून के पक्ष में गया। लेकिन क्या पाँच साल की यह सफल यात्रा इतनी आसान थी? जवाब हरियाणा के एग्रीकल्चर डिप्टी डायरेक्टर एस एस यादव कहते हैं कि कई बार स्थानीय नेताओं और बड़े किसानों की तरफ से फोन आता था कि हमें पहले बीजों की रोपाई करनी दी जाये। हम उन्हें कहते थे कि अगर एक भी किसान ने ऐसा किया तो बाकी किसान विद्रोह कर देंगे। कानून ने इस काम में हमारी बड़ी मदद की जिसके नतीजे चमत्कारिक हुए। सन्धू बताते हैं कि कुछ इलाकों में जरूर इसका विरोध हुआ लेकिन एक तरह से किसान भी इस बात को समझ रहे थे कि हालात खराब हो रहे हैं और हम लोग जो कर रहे हैं वह सिर्फ उन्हीं की मदद करने के लिये कर रहे हैं। हमने किसानों को बताया कि एक किलो साठी चावल उगाने के लिये अगर समय से पहले खेती की जाये तो 4500 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है लेकिन अगर समय पर खेती की जाये तो महज 1500 से 2000 लीटर पानी खर्च होता है। अप्रैल मई के महीने में पानी की जरूरत इसलिये ज्यादा होती है क्योंकि गर्मी ज्यादा होती है और पानी जल्दी उड़ जाता है लेकिन जून-जुलाई के महीने में मौसम मदद करता है और पानी की बचत होती है। किसान इस तर्क से सहमत हो जाते थे।

लेकिन इस आंशिक सफलता के कई पहलू ऐसे हैं जिन्हें अभी भी समझने की जरूरत है। अगर उन पहलुओं को दुरुस्त कर दिया जाये तो पंजाब हरियाणा में और तेजी से भूजल में सुधार होगा। ऐसा ही एक पहलू है मुफ्त बिजली और डीजल पर सब्सिडी। इसके कारण किसान बड़ी लापरवाही से पम्पसेट का इस्तेमाल करते हैं जिसके कारण भूजल दोहन होता है। 2013 में पंजाब किसान आयोग की रिपोर्ट में भी इस बात का जिक्र किया गया था कि कैसे मुफ्त बिजली के कारण किसान भूजल का दोहन करते हैं।

किसानों की नाराजगी


कानून कितने भी फायदे का क्यों न हो लेकिन सब समर्थन करें यह जरूरी नहीं होता। जैसे-तैसे पंजाब के किसानोंं कानून को स्वीकार तो कर लिया लेकिन क्या यह सब बहुत खुश होकर स्वीकार किया गया था? पंजाब के संगरूर जिले के लोंगोवाल गाँव के किसान जसविन्दर सिंह कहते हैं ‘कानून हमारे ऊपर लादा गया है।’ जिस साल 2009 में यह कानून लागू किया गया था उस साल कई सारे किसान संगठनों ने संगरूर के डिप्टी कमिश्नर के सामने अपना विरोध प्रदर्शन किया था।

लोंगोवाल गाँव का किसान जसविंदर सिंहकिसानों की इस नाराजगी का एक बड़ा कारण उनकी खेती में आया बदलाव था। साठी धान की खेती ने उनके खेती के पैटर्न को ऐसा बदल दिया था कि अप्रैल मई के महीने में खेतों में हरियाली रहती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। ज्यादा हुआ तो कुछ खेतों में मूँग बो दी जाती है या फिर सोयाबीन की खेती कर दी जाती है नहीं तो इस महीने में जमीनें खाली पड़ी रहती हैं। जसविन्दर सिंह कहते हैं कि आपको हमारी खेती किसानी के बारे में पता होना चाहिए। हम महज तीस फीसदी जमीन पर ही साठी चावल की खेती करते थे। बाकी बीस फीसदी जमीन पर बासमती और पचास फीसदी जमीन पर परमल उगाते थे। अप्रैल से जून महीने के बीच में ये सब अलग-अलग समय पर पैदा किये जाते हैं। ऐसा इसलिये किया जाता था क्योंंकि अगर कोई एक फसल खराब हो गई तो बाकी दूसरी फसलों से उसकी भरपाई हो जाती थी। लेकिन कानून ने सब बदल दिया। अब तो जानवरों के चारे की भी किल्लत शुरू हो गई है। दरबारा सिंह भी जसविन्दर की तरह कानून का विरोध करते हुए कहते हैं कि देर से होने वाली धान की खेती में बीमारी लगने का खतरा रहता है, फिर जानवरों से भी नुकसान पहुँचता है। फसलों को नुकसान से बचाने के लिये किसानों को अब दो तीन पर पेस्टीसाइड का छिड़काव करना पड़ता है।

इसके अलावा एक और नुकसान है जिसके बारे में किसान बताते हैं। दरबारा सिंह कहते हैं कि धान की खेती 120 दिन की होती है। इस वजह से हमें रोपाई के लिये बहुत कम वक्त मिलता है। फिर धान में नमी की वजह से हमें धान की कम कीमत मिलती है। धान की सरकारी कीमत 1400 रुपए है लेकिन हर क्विंटल पर 200 से 300 रुपए नमी के कारण कट जाते हैं। ऐसे में किसानों के सामने दो ही विकल्प होते हैं या तो वे सूखे मौसम में धान की खेती करें या फिर हर क्विंटल पर दो सौ तीन सौ रुपए का घाटा सहें। जेठुका, बठिंडा के किसान भीमा सिंह कहते हैं कि इस कानून से पहले धान और गेहूँ की खेती के बीच में हमारे पास इतना समय होता था कि हम आलू की फसल ले लेते थे। लेकिन इस कानून के कारण आलू की पैदावार और गेहूँ की पैदावार पर भी फर्क पड़ा है। किसान कहते हैं कि दो फसलों के बीच उनके पास पर्याप्त समय नहीं होता इसलिये वो धान के पैरे को जलाना पड़ता है। धान के पैरे को इकट्ठा करने, बाँधने रखने के लिये जो अतिरिक्त खर्च आता है वह किसानोंं पर अतिरिक्त बोझ है।

संकट समाप्त नहीं हुआ है


भूजल संरक्षण कानून बन जाने और सफलतापूर्वक लागू हो जाने के बाद भी संकट अभी समाप्त नहीं हुआ है। लोंगोवाल गाँव के छिहत्तर वर्षीय किसान जरनैल सिंह अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि कैसे अपने हाथों से जमीन खोदकर वो पानी निकाल लेते थे। यह चालीस साल पहले की बात है। लेकिन अब हालात दूसरे हैं। किसान कहते हैं कि हमें मालूम है कि बारिश के दिनोंं में जल संरक्षण अच्छी बात है लेकिन यह हम अपनी जमीन पर नहीं कर सकते। अगर सरकार जल संरक्षण करना चाहती है तो वह खाली जमीनों पर यह काम कर सकती है। लेकिन सरकार यह नहीं करेगी क्योंकि सरकार जमीनों को बेचकर पैसा बना रही है। किसान कहते हैं कि वो समस्या को समझते हैं लेकिन सरकार को भी किसानों की समस्या को समझना चाहिए। जरनैल सिंह बताते हैं कि सारी समस्या की जड़ धान को मिलने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य है। 1966-67 में पहली बार फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया गया। वो बताते हैं कि हमारे गाँव में हमेशा जल भराव रहता था। हमारे यहाँ कुछ नहीं हो पाता था लेकिन फसलों को मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य ने हमें धान की खेती की तरफ धकेला। हम चावल नहीं खाते लेकिन नकद आय के कारण हमने धान की खेती शुरू की। अगर सरकार धान की बजाय दूसरी फसलों पर अच्छी नकद कीमत देती है तो हम उसकी खेती करेंगे।

धान ने पंजाब के किसान की खेती का पैटर्न किस तरह से बदला है उसे एक आँकड़े से समझ सकते हैं कि 1970 में 6.9 प्रतिशत जमीन पर धान की खेती होती थी लेकिन 2005 में यह आँकड़ा 33.8 फीसदी पहुँच गया। परम्परागत फसलों के लिये खेती का रकबा घट गया। बलविन्दर सिंह सिन्धू बताते हैं कि खेती के लिये यह ऐसा वक्त है जब लागत लगातार बढ़ रही है। धान और गेहूँ की खेती किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देते हैं जिससे उनके लागत की भरपाई हो जाती है। ऐसे वक्त में अगर इस न्यूनतम समर्थन मूल्य से छेड़छाड़ करना मुश्किल है और किसानों को ऐसी फसलों की तरफ मोड़ना जिस पर कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं है किसानों को समझ नहीं आता है। यही कारण है कि पंजाब में खेती में विविधता लाने का प्रयास सफल नहीं हुआ।

फिर भी, पंजाब और हरियाणा में भूजल दोहन रोकने के लिये जो कानून बना है उसका जबर्दस्त फायदा हुआ है। कानून भूजल का अनावश्यक दोहन रोकने में बहुत हद तक सफल रहा है। देश के कई दूसरे हिस्सों में भी ऐसे कानून हैं जो भूजल दोहन रोकने के लिये बनाए गए हैं लेकिन वे कानून वैसे सफल नहीं है जैसा कि पंजाब और हरियाणा के कानून हुए हैं। अगर केन्द्र सरकार हरियाणा और पंजाब को लेकर अपना नजरिया थोड़ा बदले तो परिस्थितियों में और सकारात्मक बदलाव आ सकता है। जब भी केन्द्र सरकार खाद्यान्न उत्पादन के बारे में सोचती है तो वह पंजाब और हरियाणा की तरफ ही देखती है। धान और गेहूँ की खेती के लिये उसका सारा जोर पंजाब और हरियाणा की तरफ रहता है। इसमें भी बदलाव की जरूरत है और इसे जल्द करना पड़ेगा नहीं तो जलवायु परिवर्तन का आसन्न खतरा इन राज्यों को इतना नुकसान पहुँचा सकता है जिसकी भरपाई मुश्किल हो जाएगी।

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