एक किसान से दो टूक बात

Submitted by Hindi on Tue, 06/07/2011 - 10:15
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

यदि फसलें बगैर कृषि रसायनों, उर्वरकों या मशीनों के उगाई जाने लगीं तो बड़ी-बड़ी रसायन निर्माता कंपनियां बेकार हो जाएंगी और सरकार की कृषि सहकारी ऐजेंसी भी ध्वस्त हो जाएंगी। इस मामले को सबके सामने उठाते हुए मैंने कहा, कि सहकारी समितियां तथा कृषि-नीतियां तय करने वालों की सत्ता का आधार विराट कृषि मशीनों और उर्वरकों के कारखानों में लगी विराट पूंजी ही है।

इन दिनों जापान में पर्यावरण के बिगड़ने तथा उसके कारण खाद्यों के प्रदूषित होने को लेकर काफी चिंता व्यक्त की जा रही है, जो कि वाजिब है। पर्यावरण के प्रति नेताओं और उद्योगपतियों की उपेक्षा के विरोध में प्रर्दशनों और बहिष्कारों का आयोजन भी किया जा रहा है। लेकिन यह सारी कवायद, यदि इसी भावना के साथ की जाती रही तो उसका नतीजा बेकार में की गई मेहनत ही होगा। कुछ खास तरह के प्रदूषणों को हटा देने की बात वैसी ही है जैसे कि हम बीमारी के लक्षणों का इलाज करते रहे और बीमारी का मूल कारण इस दौरान पनपता रहे। मिसाल के लिए, दो वर्ष पूर्व प्रदूषण की समस्या पर चर्चा करने के लिए, एक सम्मेलन कृषि प्रबंधन अनुसंधान केंद्र ने जैव-कृषि परिषद तथा नादा सहकारी समिति के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया गया। इस सम्मेलन के अध्यक्ष थे श्री तेरूओ इचिराकू, जो कि जापानी जैव-किसान संघ प्रमुख होने के साथ ही सरकारी सहकारी समितिओं की एक बड़ी हस्ती भी हैं। इस एजेंसी द्वारा, कौन सी फसलें तथा बीज किस्में उगाई जाएं, कितने उर्वरकों का उपयोग किया जाए, तथा कौन से रसायनों का इस्तेमाल हो, आदि के बारे में सलाह दी जाती है। इस सलाह का पालन जापान का हर ग्रामीण किसान करता है।

क्योंकि इस सम्मेलन में इतने विविध तथा प्रभावशाली लोग हिस्सा ले रहे थे, मैं भी इस उम्मीद से वहां पहुंचा कि वहां कुछ दूरगामी कार्यवाही तय करके क्रियान्वित की जाएगी। खाद्य-प्रदूषण की समस्या को प्रचारित कराने के लिहाज से इस सम्मेलन को सफल कहा जा सकता हे। लेकिन, अन्य ऐसी ही बैठकों में जैसा कि आमतौर से होता है, यहां भी चर्चाएं, शोध-विशेषज्ञों की बेहद तकनीकी रपटों तथा उनके खाद्य प्रदूषण के बारे में निहायत ही व्यक्तिगत और भयानक विवरणों में उलझकर रह गई। ऐसा लगा कि समस्या के साथ उसके बुनियादी स्तर पर दो-चार होने के लिए कोई भी तैयार नहीं था। मिसाल के लिए ट्यूना मछलियों की मरक्यूरी (पारद) विषाक्तता पर जो चर्चाएं हुयीं उसमें मत्स्य पालन ब्यूरो के प्रतिनिधि ने पहले तो यह बतलाया कि यह समस्या कितनी गंभीर हो गई है। चूंकि उन दिनों मरक्यूरी-प्रदूषण के बारे में दिन-रात रेडियो और टेलिविजन पर चर्चाएं हो रही थीं सभी ने, इस महानुभाव को इस विषय पर जो कुछ भी कहना था, उसे बड़े ध्यान से सुना।

इस वक्ता ने बतलाया कि ट्यूना मछलियों के शरीर में मरक्यूरी की मात्रा अंटार्कटिक महासागर तथा उत्तरी क्षेत्रा में भी बहुत ज्यादा पाई गई, लेकिन जब कई सौ वर्ष पूर्व गए प्रयोगशाला नमूने को विच्छेदित कर उसका विश्लेषण किया गया तो आशा के विपरीत, इस मछली के शरीर में भी मरक्यूरी पाई गयी। वक्ता ने इससे जो अस्थाई निष्कर्ष निकाला उसका संकेत था, कि इस मछली के जिंदा रहने के लिए उसके द्वारा मरक्यूरी खाया जाना जरूरी था! दर्शक व श्रोता अविश्वास से एक-दूसरे के चेहरे देखने लगे। इस बैठक का उद्देश्य संभवतः यह तय करना था, कि उस प्रदूषण से कैसे निपटा जाए, जिसने पहले ही पर्यावरण को दूषित कर दिया है तथा इसे दुरुस्त करने के उपाय क्या किए जाएं? लेकिन मत्स्य-पालन-ब्यूरो का अधिकारी वैसा कुछ न करते हुए कह रहा था कि मरक्यूरी ट्यूना मछली के जिंदा रहने के लिए जरूरी है। जब मैं कहता हूं कि लोग प्रदूषण की समस्या की जड़ को न पकड़ते हुए उसे एक संकुचित और सतही नजरिए से देखते हैं, तो मेरा मतलब इसी तरह की चीजों से होता है।

मैंने खड़े होकर सुझाव दिया, हम सब मिलकर, तत्काल इसी जगह प्रदूषण से निपटने के लिए एक संयुक्त कार्य योजना बना लें। क्या यह बेहतर नहीं होगा, कि हम प्रदूषण फैला रहे रसायनों के उपयोग को बंद करने के बारे में साफ-साफ बात करें? मसलन, चावल बगैर रसायनों के मजे से उगाया जा सकता है, और नारंगियां तथा सब्जियां भी। मैंने कहा कि ऐसा किया जा सकता है, और अपने फार्म पर मैं बरसों से ऐसा कर भी रहा हूं। लेकिन जब तक सरकार रसायनों के उपयोग की इजाजत देती रहेगी, मेरे अलावा कोई भी स्वच्छ-खेती को आजमाने के लिए तैयार नहीं होगा। इस बैठक में मत्स्यपालन विभाग के सदस्य भी मौजूद थे। और उनके साथ ही कृषि, वानिकी तथा कृषि-सहकारी-समिति के लोग भी वहां थे। यदि इन लोगों तथा सम्मेलन के अध्यक्ष श्री ईचीराकू ने वाकई चाहा होता, कि इस देश में कुछ शुरुआत हो तथा यह सुझाव दिया होता, कि सारे देश में किसानों को बगैर रसायनों के चावल उगाने के प्रयोग करना चाहिए, तो क्रांतिकारी परिवर्तन हो सकता था।

बेशक, एक पेंच इसमें था। यदि फसलें बगैर कृषि रसायनों, उर्वरकों या मशीनों के उगाई जाने लगीं तो बड़ी-बड़ी रसायन निर्माता कंपनियां बेकार हो जाएंगी और सरकार की कृषि सहकारी ऐजेंसी भी ध्वस्त हो जाएंगी। इस मामले को सबके सामने उठाते हुए मैंने कहा, कि सहकारी समितियां तथा कृषि-नीतियां तय करने वालों की सत्ता का आधार विराट कृषि मशीनों और उर्वरकों के कारखानों में लगी विराट पूंजी ही है। रसायनों और मशीनों का उपयोग बंद करने से आर्थिक और सामाजिक ढांचा पूरी तरह बदल जाएगा। इसीलिए, मैं समझ गया कि श्री ईचीराकू, सहकारी समितियां या सरकारी अधिकारी, प्रदूषण हटाने के उपायों के पक्ष में बोल ही कैसे सकते हैं? जब मैंने इस तरह खुली बात की तो अध्यक्ष महोदय ने यह कह कर कि, ‘श्री फुकूओका, आप अपनी टिप्पणियों से इस सम्मेलन में अव्यवस्था पैदा कर रहे हैं,’ मेरा मुंह बंद कर दिया। तो यह सम्मेलन बिना कुछ करे-धरे इस तरह समाप्त हो गया।

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