ग्लेशियरों तक पहुंच रहा ब्लैक कार्बन

Submitted by HindiWater on Fri, 02/07/2020 - 15:36

फोटो - Hindustan Times

ग्लेशियर प्रकृति का संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका अदा करते हैं। नदियों को जल ग्लेशियरों से ही मिलता है और फिर ये नदियां समूचे भारत की भूमि को सींचती हैं तथा लोगों की प्यास भी बुझाती है। जिन शहरों से नदियां होकर गुजरती हैं, उनके के लिए ये जीवन रेखा के समान है। गोमुख से निकलने वाली गंगा जैसी पवित्र नदियों से प्रत्यक्ष तौर पर करोड़ों लोगों का व्यापार जुड़ा है, लेकिन जंगलों में लगने वाली आग से ब्लैक कार्बन ग्लेशियरों तक पहुंच रहा है। इसकी रिपोर्ट वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने केंद्र सरकार को भेजी है। ऐसे में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की संभावना के चलते वैज्ञानिकों की चिंता काफी बढ़ गई है।

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान की रिपोर्ट में बताया गया कि 3600 से 3800 मीटर या इससे अधिक ऊंचाई पर ब्लैक कार्बन पाया गया है। ब्लैक कार्बन को एयरोसोल भी कहते हैं, जो जंगल में लगने वाली आग तथा पराली जलाने के दौरान अधिक मात्रा में उत्पन्न होती है। संस्थान की रिपोर्ट में भी जंगलों में लगने वाली आग के दौरान ब्लैक कार्बन की मात्रा गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र में 4.62 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक पाई गई है, जबकि पराली जलाने के दौरान ये मात्रा 2 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक रही। हालांकि वर्ष के अन्य दिनों में ब्लैक कार्बन की मात्रा 0.01 से 0.09 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर के बीच पाई जा रही है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डाॅ. डीपी डोभाल व पीएस नेगी के अनुसार ये रिपोर्ट केंद्रीय एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर को सौंपी गई है। 

विदित हो कि लंदन में ब्लैक कार्बन 1.30 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर में पाया जाता है, जबकि स्विटजरलैंड के आठ स्थानों पर 0.24 से 1.54 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर, फिनलैंड में 1.52 से 1.69 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर और स्पेन में 3.5 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर में पाया जाता है, लेकिन विश्वभर में ग्लेशियर जैसे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा के लिए सांस लेने के लिहाज से अधिकतम सीमा तय नहीं की गई है। किंतु भारत इस दिशा में मानक निर्धारित करने की पहल करने के लिए तैयारी कर रहा है। जिसके लिए पर्यावरण मंत्री को यूरेपीय देशों की ब्लैक कार्बन की रिपोर्ट भी भेजी जा रही है। ऐसे में उम्मीद है कि जल्द ग्लेशियर वाले इलाकों में ब्लैक कार्बन की उच्चतम सीमा तय की जा सकेगी। 

 

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