गंगा की फिक्र

Submitted by Hindi on Wed, 12/05/2012 - 10:25
Source
जनसत्ता रविवारी, 02 दिसंबर, 2012
गंगा को गंगाभक्त ने ही गंदा कियागंगा को गंगाभक्त ने ही गंदा कियादेश के बड़े इलाके की जीवनधारा कही जाने वाली गंगा नदी में बढ़ता प्रदूषण, चिंता का विषय है। तमाम कोशिशों के बाद भी गंगा को मैली होने से बचाने में नाकामी ही हाथ लगी है। बल्कि इन उपायों के बीच गंगा का पानी और भी जहरीला हुआ है। अब तो और इसका पानी लोगों को कैंसर का रोगी बना रहा है। नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम (एनसीआरपी) के एक अध्ययन के मुताबिक गंगा में इतनी ज्यादा धातुएं और घातक रसायन घुल गए हैं कि इस पानी के संपर्क में रहने वाले लोग कैंसर से पीड़ित होने लगे हैं। शोध के मुताबिक गंगा किनारे रहने वाले लोगों में पित्ताशय, किडनी, भोजन नली, प्रोस्टेट, लीवर, यूरिनरी ब्लैडर और स्किन कैंसर होने का सबसे ज्यादा खतरा है। गंगा के किनारे रहने वाले हर दस हजार लोगों में साढ़े चार सौ पुरुष और एक हजार महिलाएं, पित्त की थैली के कैंसर से पीड़ित हैं। उत्तर प्रदेश में वाराणसी, बिहार के वैशाली, पटना ग्रामीण और बंगाल के मुर्शिदाबाद और दक्षिणी चौबीस परगना के इलाके में यह अध्ययन किया गया है। अध्ययन के मुताबिक पित्त की थैली के कैंसर के दूसरे सबसे ज्यादा मरीज़ भारत में गंगा किनारे बसते हैं।

यह हालात तब हैं, जब केंद्र और राज्य सरकारें बरसों से गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए मुहिम छेड़े हुए हैं। गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने पर करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं, मगर हालात जस के तस है। गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट कई बार दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। तीन मई, 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार को गंगा में पर्याप्त पानी छोड़ने और गंगा के आसपास पॉलिथीन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था। लेकिन इस आदेश पर अभी तक अमल नहीं हुआ है। गंगा के किनारे अनेक शहर, कस्बे और गांव बसे हैं, जहां से हर रोज करोड़ों लीटर प्रदूषित पानी गंगा में प्रवाहित होता है। फिर गंगा के आस-पास स्थिति सैकड़ों कारखाने भी गंगा को प्रदूषित कर रही हैं।

ऋषिकेश से इलाहाबाद तक गंगा के आस-पास सौ से ज्यादा बड़ी औद्योगिक इकाइयां हैं। इनमें चीनी मिल, कागज़, खाद और तेलशोधक कारखाने और चमड़ा उद्योग प्रमुख हैं। ये कारखाने गंगा में रसायनयुक्त प्रदूषित पानी और औद्योगिक कचरे को प्रवाहित करके गंगा के पूरे तंत्र को नुकसान पहुंचा रही हैं। इन कारखानों से निकलने वाले कचरे में हाइड्रोक्लोरिक एसिड, पारा, भारी धातुएं और कीटनाशक जैसे खतरनाक रसायन होते हैं। गंगा सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में प्रदूषित होती है। उत्तर प्रदेश में पचास फ़ीसदी प्रदूषित पानी गंगा में मिल जाता है। अकेले इलाहाबाद में ही पचास से अधिक ऐसे बड़े नाले हैं जो गंगा और यमुना में गंदगी प्रवाहित करते हैं। एक बात और जितने गंदे पानी को साफ किया जाता है, उससे कहीं ज्यादा गंदा पानी गंगा में प्रवाहित हो रहा है।

कहा जा सकता है कि गंगा की बर्बादी के लिए जितना इसे प्रदूषित करने वाले जिम्मेदार हैं, उससे कहीं ज्यादा वे भी जिम्मेदार हैं, जिन्हें इसे प्रदूषण मुक्त करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी। इन्होंने अपने काम को सही तरीके से अंजाम नहीं दिया। जिसकी वजह से गंगा आज और भी प्रदूषित हो गई है।

ऐसा नहीं है कि प्रदूषण रोकने के लिए सरकारी पहल नहीं हुई। कोशिशें खूब हुई, लेकिन सब बेकार। गंगा के प्रदूषण पर सरकार ने पहली बार 1979 में पहल की। तब केंद्रीय जल प्रदूषण निवारक और नियंत्रण बोर्ड ने गंगा में प्रदूषण पर अपनी दो व्यापक रिपोर्ट पेश की थी। इनके आधार पर अप्रैल, 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा एक्शन प्लान को मंजूरी दी। यह पूरी तरह से केंद्र सरकार की योजना थी। राजीव गांधी ने गंगा को पांच साल के भीतर प्रदूषण मुक्त करे के वादे के साथ गंगा एक्शन प्लान शुरू की। इस पर अब तक दो हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च हो गए, लेकिन इतना पैसा खर्च होने और सत्ताईस सालों की कोशिश के बाद भी गंगा पहले से ज्यादा गंदी और प्रदूषित है। इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बाद भी गंगा एक्शन प्लान बुरी तरह नाकाम रहा।

इस योजना के तहत फंड की बर्बादी बड़े पैमाने पर हुई आबंटित फंड का ज्यादातर हिस्सा सीवर लाइनें बिछाने और इनके लिए ज़मीन खरीदने पर खर्च कर दिया गया। लापरवाही का आलम यह रहा कि गंगा एक्शन प्लान पर खर्च पैसे का कोई व्यवस्थित हिसाब-किताब तक नहीं रखा गया। केंद्र ने गंदे पानी के ट्रीटमेंट के लिए प्लांट तो लगवा दिए, लेकिन शहरों का गंदा पानी प्लांटों तक नहीं पहुंच सका। कहीं सीवर लाइनें नहीं बिछीं, तो कहीं प्लांट नहीं लगे। मसलन बनारस में एक हजार करोड़ रुपए खर्च करके सीवर लाइन डाल दी गई। सीवर लाइन डालने का मकसद शहर के गंदे पानी को उत्तरी छोर तक ले जाना और फिर वहां ट्रीटमेंट प्लांट लगाना था। जब भारी लागत लगाकर सीवर लाइनें बिछ गईं, तब स्थानीय लोगों ने सीवर प्लांट का विरोध करना शुरू कर दिया। जिसकी वजह से पूरी परियोजना ही ठप हो गई।

गंगा एक्शन प्लान के तहत लगाए गए कई बड़े सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट आज बेकार पड़े हैं। केंद्र सरकार ने प्लांट तो स्थापित कर दिए, लेकिन भारी रख-रखाव और संचालन खर्च के कारण शहरी प्राधिकरण उन्हें चला नहीं पाए। राज्य सरकारों और शहरी प्राधिकरणों की उदासीनता की वजह से पैसा बर्बाद हो गया। 2000 में पेश अपनी रिपोर्ट में सीएजी ने कहा कि गंगा एक्शन प्लान के तहत शुरू किए गए पैंतालीस सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों में से उन्नीस ने कोई काम नहीं किया। सीएजी ने इसका कारण संयंत्रों को बिजली न मिल पानी, तकनीकी खामियों को दूर न किया जाना और राज्य सरकारों द्वारा फंड न देना बताया था। जाहिर है जब तक राज्य सरकारें खुद उत्साह नहीं दिखाएंगी, तब तक गंगा एक्शन प्लान के नतीजे सकारात्मक नहीं आ सकते।

कहा जा सकता है कि गंगा की बर्बादी के लिए जितना इसे प्रदूषित करने वाले जिम्मेदार हैं, उससे कहीं ज्यादा वे भी जिम्मेदार हैं, जिन्हें इसे प्रदूषण मुक्त करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी। इन्होंने अपने काम को सही तरीके से अंजाम नहीं दिया। जिसकी वजह से गंगा आज और भी प्रदूषित हो गई है। जरूरत इस बात की है कि ज़मीनी स्तर पर कुछ ठोस कदम उठाए जाएं। गंगा किनारे बसे शहरों और उद्योगों से निकल रहे प्रदूषित जल और रासायनिक कचरे को जब तक गंगा में बहाने पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जाएगी, तब तक गंगा को प्रदूषण मुक्त करना महज कागज़ों पर ही रहेगा।

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