हमारी स्कूली शिक्षा का हिस्सा बने आपदा प्रबंधन

Submitted by Hindi on Wed, 09/05/2012 - 15:59
Source
अमर उजाला, 04 सितंबर 2012
आपदा ज्यादातर मानवीय ही होती है। भूकंप, बाढ़ और अतिवृष्टि जैसी परिस्थितियों में प्राथमिक विद्यालय ही आश्रय बनते हैं। दूसरा बड़ा आश्रय पंचायत भवन होता है। ये दोनों ही आशिंक रूप से आश्रय के केंद्र होते हैं। ऐसी परिस्थिति में इनसे जुड़े कर्मचारी स्वतः ही स्वयंसेवक हो जाते हैं। जरूरी है कि हम अपने प्राथमिक स्कूलों के अध्यापक और पंचायत कर्मियों को आपदा प्रबंधन के गुर सिखाएं। साथ ही आपदा प्रबंधन हमारी स्कूली शिक्षा का भी हिस्सा बने, बता रहे हैं अनिल जोशी।

अनुभव यही बताते हैं कि जितनी भी आपदाएं अब तक हुईं, उनमें से कुछ बातें समान थीं। गांवों में, खासतौर से अन्य सुविधाओं के अभाव में भूकंप, बाढ़ और अतिवृष्टि में प्राथमिक विद्यालय ही सबसे बड़ा आश्रय बनता है। पंचायत भवन आपदा में दूसरे बड़े आश्रय बनते हैं। ये दोनों ही आंशिक रूप से आश्रय और राहत केंद्र के लिए विधिवत रूप से जोड़े जा सकते हैं। आपदा की सरल-सी परिभाषा है कि यह प्रकृति से छेड़छाड़ और उसके असाधारण विषम व अपवाद व्यवहार तथा कुप्रबंध का परिणाम है। प्रकृति का हमने गत सैकड़ों वर्षों से जैसा शोषण किया है, यह इसी का प्रसाद है। हमारे वर्तमान विकास की ऐसी कोई भी हलचल नहीं है, जिसमें प्रकृति का शोषण न हुआ हो। लंबे समय से मूक प्रकृति ने इस दुर्व्यवहार का बदला लेना शुरू किया है, और प्राकृतिक आपदा अब बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने है। आपदाओं की चिंता के तहत सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर एक आपदा प्रबंधन इकाई का गठन किया। इसका मूल उद्देश्य आपदाओं के प्रति सचेत व नियंत्रण रखने की रणनीति पर अमल करना है।

लगभग 10 वर्ष पुरानी इस इकाई की भूमिका आपदा नियंत्रण कार्यक्रमों में स्पष्ट रूप से नहीं दिखाई देती। राष्ट्रीय स्तर पर आपदा नीति भी है और साथ में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अथॉरिटी भी। इनकी सहायता के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान भी गठित किया गया। प्रधानमंत्री स्वयं अथॉरिटी के अध्यक्ष हैं। वर्ष 2005 के आसपास आई आपदा नीति बहुत तरह की बातें अवश्य करती है, पर व्यवहार में इसमें खोखलापन दिखता है। आपदा प्रबंधन पर राज्यों की तरफ एक नजर डालें, तो बहुत से राज्यों में कोई आपदा नीति नहीं है और वहां आपदा आने पर ही चर्चा या कार्रवाई होती है। औपचारिक तौर पर आपदा कार्यालय हर राज्य में आवश्यक है, लेकिन केंद्र और राज्यों में कोई समन्वय नहीं दिखता है।

अगर हम एक दृष्टि आपदाओं और उनके प्रबंधन पर नजर डालें, तो निराशा हाथ लगेगी। हमारे देश में आपदा के बाद रेड अलर्ट शुरू होता है। आपदा आने पर ही हलचल होगी और सच तो यह है कि विभाग अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए आपदा का इंतजार करता है। अगर ऐसा न होता, तो वर्ष भर मुस्तैदी से लगकर यह विभाग आपदा के समय बेहतर परिणाम देता, पर ऐसा नहीं है। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड में मानसून में अब तक 45 लोगों की मौत हो गई है। पिछले 12 वर्षों में 756 लोग आपदा के शिकार हुए और करीब हर वर्ष 63 लोग आपदा की बलि चढ़ते हैं। यह संख्या तब है, जब कोई बड़ी आपदा नहीं आई है। ऐसा ही देश के दूसरे कोनों में भी होता आया है।

किसी भी आपदा प्रबंधन को तीन चरणों में देखा जाता है। आपदा में तत्काल, अल्प अवधि व दीर्घकालीन प्रबंधन की बात होती है। खासतौर से दीर्घकालीन प्रबंधन में सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है। परंतु तत्काल व अल्प अवधि प्रबंधन स्थानीय संसाधनों पर ही निर्भर रहता है।

अनुभव यही बताते हैं कि जितनी भी आपदाएं अब तक हुईं, उनमें से कुछ बातें समान थीं। गांवों में, खासतौर से अन्य सुविधाओं के अभाव में भूकंप, बाढ़ और अतिवृष्टि में प्राथमिक विद्यालय ही सबसे बड़ा आश्रय बनता है। पंचायत भवन आपदा में दूसरे बड़े आश्रय बनते हैं। ये दोनों ही आंशिक रूप से आश्रय और राहत केंद्र के लिए विधिवत रूप से जोड़े जा सकते हैं। इनसे जुड़े कर्मी स्वतः ही इसमें भागीदार भी होंगे। हमारे प्राथमिक स्कूलों के अध्यापक और पंचायतकर्मी हमारी व्यवस्था के सबसे विकेंद्रित प्रबंधक हैं और आपदा के समय उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। स्थानीय होने के कारण उनकी प्रायः हर घर में पैठ होती है। बदलती परिस्थिति में आपदा प्रबंधन हमारी शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए।

आपदा के एक और महत्वपूर्ण पहलू की तरफ भी ध्यान दिया जाना चाहिए। जनजीवन को सामान्य बनाने व पटरी पर लाने वाले आर्थिक कार्यक्रमों के भी सतत् प्रयत्न होने चाहिए। वर्ष 1991 और 1999 में उत्तराखंड में दो बड़े भूकंपों में सामाजिक संगठनों की पहल सराहनीय रही। इन संगठनों ने तत्काल सहायता के बाद स्थानीय संसाधनों पर रोजगार खड़े किए, जिससे आर्थिक सहायता के साथ स्वावलंबन भी पैदा हुआ। इस तरह की जानकारियां विद्यालयों के माध्यम से बांटना और भी जरूरी है। हमारी आपदा नीति वर्तमान तंत्र के लिए बोझ नहीं होनी चाहिए। इसका स्वरूप ही ऐसा हो, जो कि हमारे रोजमर्रा के कार्य का हिस्सा हो। आपदाएं हमारी प्राथमिक शिक्षा का हिस्सा जब तक नहीं बनेंगी, तब तक हम मूल व मानसिक रूप से आपदाओं की आपदा से मुक्त नहीं हो पाएंगे।

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