इस नदी में जंग लगेगी

Submitted by Hindi on Mon, 05/09/2011 - 13:56
Source
गांधी-मार्ग मई-जून 2011

लेकिन यह नदी या कहें विशाल नद बहुत ही विचित्र है। इसके किनारे पर आप बैठकर इसे निहार नहीं सकते। इसका कलकल बहता पानी न आप देख सकते हैं और न उसकी ध्वनि ही सुन सकते हैं।

लीबिया की गिनती दुनिया के कुछ सबसे सूखे माने गए देशों में की जाती है। देश का क्षेत्रफल भी कोई कम नहीं। बगल में समुद्र, नीचे भूजल खूब खारा और ऊपर आकाश में बादल लगभग नहीं के बराबर। ऐसे देश में भी एक नई नदी अचानक बह गई। लीबिया में पहले कभी कोई नदी नहीं थी। लेकिन यह नई नदी दो हजार किलोमीटर लंबी है, और हमारे अपने समय में ही इसका अवतरण हुआ है! लेकिन यह नदी या कहें विशाल नद बहुत ही विचित्र है। इसके किनारे पर आप बैठकर इसे निहार नहीं सकते। इसका कलकल बहता पानी न आप देख सकते हैं और न उसकी ध्वनि सुन सकते हैं। इसका नामकरण लीबिया की भाषा में एक बहुत ही बड़े उत्सव के दौरान किया गया था। नाम का हिंदी अनुवाद करें तो वह कुछ ऐसा होगा- महा जन नद।

हमारी नदियां पुराण में मिलने वाले किस्सों से अवतरित हुई हैं। इस देश की धरती पर न जाने कितने त्याग, तपस्या, भगीरथ प्रयत्नों के बाद वे उतरी हैं। लेकिन लीबिया का यह महा जन नद सन् 1960 से पहले बहा ही नहीं था।

लीबिया के नेता कर्नल मूंमारअल गद्दाफी ने सन् 1969 में सत्ता प्राप्त की थी। तभी उनको पता चला कि उनके विशाल रेगिस्तानी देश के एक सुदूर कोने में धरती के बहुत भीतर एक विशाल मीठे पानी की झील है। इसके ऊपर इतना तपता रेगिस्तान है कि कभी किसी ने यहां बसने की कोई कोशिश ही नहीं की थी। रहने-बसने की तो बात ही छोड़िए, इस क्षेत्र का उपयोग तो लोग आने-जाने के लिए भी नहीं करते थे। बिल्कुल निर्जन था यह सारा क्षेत्र।

नए क्रांतिकारी नेता को लगा कि जब यहां पानी मिल ही गया है तो जनता उनकी बात मानेगी और यदि इतना कीमती पानी यहां निकालकर उसे दे दिया जाए तो वह हजारों की संख्या में अपने-अपने गांव छोड़कर इस उजड़े रेगिस्तान में बसने आ जाएगी। जनता की मेहनत इस पीले रेगिस्तान को हरे उपजाऊ रंग में बदल देगी।

अपने लोकप्रिय नेता की बात लोक ने मानी नहीं। पर नेता को तो अपने लोगों का उद्धार करना ही था। कर्नल गद्दाफी ने फैसला लिया कि यदि लोग अपने गांव छोड़कर रेगिस्तान में नहीं आएंगे तो रेगिस्तान के भीतर छिपा यह पानी उन लोगों तक पहुंचा दिया जाए।

इस तरह शुरू हुई दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे महंगी सिंचाई योजना। इस मीठे पानी की छिपी झील तक पहुंचने के लिए लगभग आधे मील की गहराई तक बड़े-बड़े पाईप जमीन से नीचे उतारे गए। भूजल ऊपर खींचने के लिए दुनिया के कुछ सबसे विशालकाय पंप बिठाए गए और इन्हें चलाने के लिए आधुनिकतम बिजलीघर से लगातार बिजली देने का प्रबंध किया गया।

तपते रेगिस्तान में हजारों लोगों की कड़ी मेहनत, सचमुच भगीरथ-प्रयत्नों के बाद आखिर वह दिन भी आ ही गया, जिसका सबको इंतजार था। भूगर्भ में छिपा कोई दस लाख वर्ष पुराना यह जल आधुनिक यंत्रों, पंपों की मदद से ऊपर उठा, ऊपर आकर नौ दिन लंबी यात्रा को पूरा कर कर्नल की प्रिय जनता के खेतों में उतरा। इस पानी ने लगभग दस लाख साल बाद सूरज देखा था।

कहा जाता है कि इस नदी पर लीबिया ने अब तक 27 अरब रुपए खर्च किए हैं। अपने पैट्रोल से हो रही आमदनी में से यह खर्च जुटाया गया है। एक तरह से देखें तो पैट्रोल बेच कर पानी लाया गया है। यों भी इस पानी की खोज पैट्रोल की खोज से ही जुड़ी थी। यहां गए थे तेल खोजने और हाथ लग गया इतना बड़ा, दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञात भूजल भंडार।

बड़ा भारी उत्सव था। 1991 के उस भाग्यशाली दिन पूरे देश से, पड़ौसी देशों से, अफ्रीका में दूर-दूर से, अरब राज्यों से राज्याध्यक्ष, नेता, पत्रकार जनता- सबके सब जमा थे। बटन दबाकर उद्घाटन करते हुए कर्नल गद्दाफी ने इस आधुनिक नदी की तुलना रेगिस्तान में बने महान पिरामिडों से की थी। वे उस दिन अपने दो शत्रु देशों- अमेरिका और इंग्लैंड के खिलाफ भी जहर उगलने से नहीं चूके थे। उन्होंने इस नदी को एक क्रांतिकारी नदी की संज्ञा दी थी और एक ही सांस में कह डाला था कि क्रांतिकारी जनता ऐसे शत्रुओं को ठिकाने लगा देगी।

वे भला यह बात कैसे बता पाते कि इस क्रांतिकारी योजना का सारा काम उनके शत्रु देशों की कंपनियों ने ही किया है। दक्षिणी-पश्चिमी लंदन के एक कीमती मोहल्ले में बनी एक बहुमंजिली इमारत की चैथी मंजिल पर था, इस नई नदी को रेगिस्तान में उतारने वाली कंपनी का मुख्यालय। ‘अमेरिकी इंजीनियरिंग कार्पोरेशन हैलीबर्टन’ की यूरोपी शाखा ‘ब्राउन एंड रूट्स’ नामक कंपनी इसी जगह से काम करती थी। ब्राउन एंड रूट्स ने ही इस महा जन नद की पूरी रूपरेखा तैयार की थी।

कहा जाता है कि नदी पर लीबिया ने अब तक 27 अरब रुपए खर्च किए हैं। अपने पैट्रोल से हो रही आमदनी में से यह खर्च जुटाया गया है। एक तरह से देखें तो पैट्रोल बेच कर पानी लाया गया है। यों भी इस पानी की खोज पैट्रोल की खोज से ही जुड़ी थी। यहां गए थे तेल खोजने और हाथ लग गया इतना बड़ा, दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञात भूजल भंडार।

लोग बताते हैं कि इन नद से पैदा हो रहा गेहूं आज शायद दुनिया का सबसे कीमती गेहूं है। लाखों साल पुराना कीमती पानी हजारों-हजार रुपया बहाकर खेतों तक लाया गया है-तब कहीं उससे दो मुट्ठी अनाज पैदा हो रहा है। यह भी कब तक?

आज तो लीबिया पर कई तरह के संकटों के बादल हैं। पर तब भी जब यह नदी बन रही थी, अमेरिका और इंग्लैंड से उसके तनावपूर्ण ही नहीं, बहुत ही बुरे संबंध थे। इस नदी के बनने से कोई पांच बरस पहले ही उसकी राजधानी त्रिपोली पर इन देशों ने बमबारी की थी। लेकिन इतने बड़े काम को ‘रचनात्मक’ काम मानकर दुश्मन माने गए देश की बड़ी कंपनियां भी इसमें मदद देने सामने आने को तैयार थीं। सीधी बातचीत या कहें सीधे व्यापार का वातावरण नहीं था, इसलिए मध्यस्थता तब संयुक्त राष्ट्र संघ ने की थी और यूनेस्को जैसी सांस्कृतिक संस्था ने लीबिया के इंजीनियरों को इस महत्वाकांक्षी योजना के योग्य बनाने में ऊंचे दर्जे का तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया था।

लेकिन आज यही सारा संसार लीबिया के इस लोकप्रिय बताए गए नेता के खिलाफ वहां की जनता का साथ देने में जुट गया है। तब भी पर्यावरण का हित देखते तो यह पूरी योजना, महा जन नद लोक विरोधी ही दिखती। पर तब वह बाजार के हित में थी- यह मानकर परस्पर एक दूसरे को अपना दुश्मन बताने वाले गुप-चुप तरीके से मित्र ही बन गए थे।

लोग बताते हैं कि इन नद से पैदा हो रहा गेहूं आज शायद दुनिया का सबसे कीमती गेहूं है। लाखों साल पुराना कीमती पानी हजारों-हजार रुपया बहाकर खेतों तक लाया गया है-तब कहीं उससे दो मुट्ठी अनाज पैदा हो रहा है। यह भी कब तक? लोगों को डर तो यह है कि यह महा जन नद जल्दी ही अनेक समस्याओं से घिर जाएगा और रेगिस्तान में सैकड़ों मीलों में फैले इसके पाईप जंग खाकर एक भिन्न किस्म का खंडहर, स्मारक अपने पीछे छोड़ जाएंगे।

लीबिया में इस बीच राज बदल भी गया तो नया लोकतंत्र इस नई नदी को बहुत लंबे समय तक बचा नहीं सकेगा। और देशों में तो बांधों के कारण, गलत योजनाओं के कारण, लालच के कारण नदियां प्रदूषित हो जाती हैं, सूख भी जाती हैं। पर यहां लीबिया में पाईपों में बह रही इस विशाल नदी में तो जंग लगेगी।

इस नदी का अवतरण, जन्म तो अनोखा था ही, इसकी मृत्यु भी बड़ी ही विचित्र होगी।

फ्रेड पीयर्स के लेख ‘हैलीबर्टन्स जॉब फार गद्दाफी’ और मानस अमोध रॉय की सामग्री के आधार पर अनुपम मिश्र द्वारा प्रस्तुत।

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