जैविक खेती से मुनाफा ही मुनाफा

Submitted by Hindi on Sat, 06/08/2013 - 15:43
Source
पंचायतनामा डॉट कॉम
जैविक खेती सस्ती तो है ही, जीवन और जमीन को बचाने के लिए भी जरूरी है। 1960 से 1990 तक कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए जिस तेजी से और जिस तरह से रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल किया गया, उसने हमारे खेतों और जीवन दोनों को संकट में डाल दिया। तब पर्यावरण की अनदेखी की गयी थी, जिसकी कीमत हम आज चुका रहे हैं। 1990 के बाद से जैविक खाद की ओर खेती को लौटाने का अभियान शुरू हुआ, जो अब भी जारी है। द्वितीय हरित क्रांति में जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है और किसानों को इसके लिए तैयार किया जा रहा है। किसान भी जैविक खाद और कीटनाशक बनाने में अपने अनुभव से कृषि वैज्ञानिक तक को मात दे रहे हैं। ऐसे ही किसान हैं महाराष्ट्र के नारायणराव पांडेरी पांडे उर्फ नाडेप काकाद्ध, जिनकी खाद बनाने की देशज विधि आज न केवल लोकप्रिय है, बल्कि इस विधि को उनके ही नाम नापेड से जाना भी जाता है। हमारे किसान इस तरह की खोज और प्रयोग करने में हमेशा आगे रहे हैं। जैविक खेती हर दृष्टि से सुरक्षित और ज्यादा मुनाफा देने वाली है।

सस्ती खाद करें इस्तेमाल


जैविक खेती में जैविक खाद और जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है। भारतीय किसानों के लिए यह कोई नया विषय नहीं है। यह जरूर है कि रसायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग को लेकर चले अभियान ने जैविक हमारे किसानों को कुछ समय के लिए अपने उपर निर्भर बना लिया। अब, जबकि एक बार हम सस्ती और कम नुकसानदेह वाली खेती की ओर बढ। रहे हैं, तब एक बार हम पुरानी कृषि विधि और कीट प्रबंधन की ओर हम लौटना चाहते हैं। इस अंतराल में जैविक खेती को लेकर कई नये प्रयोग हुए हैं, जो खेती के लाभ के दायरे को बढ़ाते हैं। रासायनिक और महंगी खाद की जगह हम इन खादों का इस्तेमाल कर सस्ती, टिकाऊ और स्वस्थ्य खेती का लाभ ले सकते हैं।

नाडेप, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, जैव उर्वरक (कल्चर), गोबर की खाद, पिट कंपोस्ट मुर्गी की खाद

जैविक खाद का इस्तेमाल सस्ता


रासायनिक कीटनाशक की जगह आप जैविक कीटनाशक का इस्तेमाल करें। यह सस्ता भी है और स्वस्थकर भी। यह पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाता है और जीवों को भी क्षति नहीं पहुंचाता है। इसमें आप गौमूत्र, नीम पत्ती की घोल, निबोली, खली, मट्ठा, मिर्च, लहसुन, लकड़ी की राख, नीम व करंज खली आदि का इस्तेमाल किसान करते हैं।

नाडेप कंपोस्ट ज्यादा सस्ता


नाडेप विधि से कंपोस्ट बनाने की विधि अब लोकप्रिय हो चुकी है। इस विधि की खोज महाराष्ट्र के एक किसान नारायणराव पांडरी पांडे उर्फ नाडेप काकाद्ध ने की है। इसलिए इस विधि को नाडेप विधि और इससे तैयार खाद को नाडेप कंपोस्ट कहते हैं।

विधि : एक


इस विधि से खाद बनाने के लिए पहले गड्ढा बनायें। उसकी दीवार इंट से तैयार करें। पहली दो पंक्ति की जुड़ाई के बाद हर इंट के बीच करीब सात इंच का छेद रखें। गड्ढे की दीवार और फर्श को गोबर और मिट्टी के घोल से लीपें। अब इसमें 60 प्रतिशत वानस्पतिक पदार्थ और 40 प्रतिशत हरा चारा 40 डालें। इससे कार्बन एवं नत्रजन का अनुपात बना रहता है। दीपक से बचाव के लिए नीम की पत्तियां डालें। खाद की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए इसमें गोमूत्र से भींगे पुआल और खरपतवार का इस्तेमाल करें। जल्दी खाद तैयार हो, इसके लिए आप गोबर की जगह गोबर गैस की स्लरी घोल का इस्तेमाल करें।

विधि : दो


कच्चे या बांस के कंपोस्ट ड्रम भी आप बना सकते हैं। गड्ढा की तरह इसका भी आकार-प्रकार निश्चितत अनुपात में रखें। जैसे 12 फीट लंबा, पांच फीट और तीन फीट ऊंचा या 10 फीट लंबा, छह फीट चौड़ा व तीन फीट ऊंचा पिट (गड्ढा) या ड्रम आप तैयार कर सकते हैं। इसमें 2.5 टन से ज्यादा खाद आपको प्राप्त हो सकती है। ड्रम की दीवार और फर्श को गोबर और मिट्टी से लीपें। ड्रम या पिट, जो भी आपने चुना है, उसमें नमी रहनी चाहिए। इसके लिए आप उसमें बाहर से पानी भी डाल सकते हैं। ड्रम या पिट को भरने के लिए आप 1400-1500 किलोग्राम वानस्पतिक पदार्थ, जैसे सूखे पत्ते, छिलके, डंठल, भूसा आदि लें। उस पर 8-10 टोकरी गोबर डालें। अगर बॉयोगैस प्लांट का स्लरी मिले, तो ज्यादा अच्छा। उसमें सड़ी हुई मिट्टी मिलायें। साथ ही 1750 किलो गोमूत्र तथा 1500 से 2000 लीटर पानी डालें। ड्रम या पिट को भरने के पहले उसकी दीवार और फर्श पर गोबर पानी का घोल छिड़क करें या उससे लीप दें। 3-4 प्रतिशत नीम या पलाश की हरी पत्ती भी मिलायें। दो- तीन दिन बाद टीन के डब्बे या किसी अन्य वस्तु की मदद से ड्रम की दीवार पर 9-9 इंच की दूरी पर 7-8 इंच गहरे छेद बनायें, ताकि ड्रम में हवा के लिए रास्ता बन सके। 90 से 120 दिन में यह खाद तैयार हो जाती है। खाद में 15 से 20 प्रतिशत नमी रखें।

नाडेप कंपोस्ट की खासियत :


नाफेड खाद परंपरागत तरीके से तैयार की गयी खाद से 3 से 4 गुना अधिक प्रभावशाली है।

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