जी.एम. फसलें: एक कसौटी दो पैमाने

Submitted by HindiWater on Mon, 08/04/2014 - 16:28
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सर्वोदय प्रेस सर्विस, अगस्त 2014
“भारत सरकार यदि निजी पहल को और अधिक बढ़ावा दे, यदि यह पूंजी प्रवाह हेतु अधिक खुलापन अपनाए, यदि यह अपनी सब्सिडी नियंत्रित करे और शक्तिशाली बौद्धिक संपदा अधिकार उपलब्ध कराए, तो मेरा विश्वास कीजिए और अधिक अमेरिकी कंपनियां भारत में आएंगी”

जान कैरी (अमेरिकी विदेश मंत्री)

गौरतलब है कि मोन्सेंटो द्वारा चीन और भारत में बेचे जा रहे कई बीजों की दर में 30 से 40 गुना तक का अंतर है और उसको भारत एक ऐसे बाजार के रूप में दिखाई दे रहा है जहां पर किसी प्रकार से उसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता। जान कैरी की भारत को दी जा रही सलाह को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। जीएम फसलों के विवाद ने अंततः हम सबको इस सच्चाई से रूबरू करा दिया है भारत की विदेश, कृषि, व्यापार, वाणिज्य और गृह नीति कमोवेश अंतरराष्ट्रीय दबाव से संचालित है। उपरोक्त कथन को आधुनिक जगत में किसी देश की आंतरिक राजनीति में संभवतः तभी तक हस्तक्षेप नहीं माना जाएगा जब तक कि यह प्रवचन अमेरिका द्वारा दिया गया हो। इसके ठीक विपरीत भारत सहित अधिकांश देशों की अमेरिका को यह सलाह देने की हिम्मत नहीं हुई कि इजराइल द्वारा फिलिस्तीन की गाजापट्टी के नागरिक क्षेत्र पर किए जा रहे हमलों में 1300 से अधिक निरपराध लोग जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे और महिलाएं शामिल हैं, के मारे जाने के बाद अमेरिका अपने द्वारा इस देश को दी जा रही सैन्य सहायता के दुरुपयोग के चलते इस पर प्रतिबंध लगा दे।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव की राजनीति के परिणाम हम सबके सामने हैं। साथ ही राष्ट्रों की सरकारों द्वारा अपनी सोच को व्यापकता प्रदान करने के बजाए अपने संकुचित दायरे में व्यवहार करने से राष्ट्रों के अंदर भी स्थितियां दिनोंदिन पेचीदा होती जा रही हैं। अपने देश के संदर्भ में बात करें तो यह तथ्य और तीव्रता से उभरता है।

पिछले आमचुनाव के बाद एनडीए सरकार को प्रेषित केंद्रीय जांच ब्यूरो (आईबी) की रिपोर्ट में गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा अपने आंदोलनों आदि के माध्यम से भारत के विकास में रुकावट डालने को सत्यापित किया गया था। इस रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखा था, “बड़ी संख्या में कार्यरत गैर सरकारी संगठन जिन्हें अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी एवं नीदरलैंड स्थित कुछ दानदाताओं से धन मिलता है, के बारे में देखा गया है कि वे कुछ जनकेंद्रित विषयों का इस्तेमाल कर ऐसा वातावरण तैयार कर देते हैं जो स्वमेव विकास परियोजनाओं को ठप कर देता है।

इनमें शामिल हैं परमाणु ऊर्जा संयंत्र, जीन संवर्धित (जी.एम.) फसलें, विशाल औद्योगिक परियोजनाएं जैसे पॉस्को एवं वेदांता, जलविद्युत परियोजनाएं नर्मदा सागर व अरुणांचल एवं तेल एवं चूना पत्थर खनन परियोजनाएं आदि। इससे जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) पर 2 से 3 प्रतिशत तक का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।”

इस रिपोर्ट को लेकर काफी विवाद और बहस हो चुकी है और कमोबेश अभी भी जारी है। सरकार ने इस रिपोर्ट को आधार ग्रंथ माना और गृह मंत्रालय ने ताबड़तोड़ ऐसे अनेक संगठनों पर कार्यवाही शुरू कर दी जो प्राप्त धन का दुरुपयोग मानव अधिकार हनन, पर्यावरण सुरक्षा, देश में बढ़ती सांप्रदायिकता जबरिया विस्थापन के खिलाफ संघर्ष, खेती में बढ़ते रासायनिक खाद व कीटनाशकों के उपयोग के विरुद्ध जागरुकता व जीएम खाद्य फसलों से होने वाली हानियों को जनता के बीच ले जाने के लिए करते हैं।

इस रिपोर्ट का खोखलापन और सरकार का पक्षपातपूर्ण रवैया तब उजागर हो गया जब केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने जीएम फसलों के फील्ड ट्रायल (खेतों में परीक्षण) पर रोक लगाते हुए जेनेरिक इंजीनियरिंग एप्रेजल कमेटी के 18 जुलाई 2014 के फैसले को ठंडे बस्ते में डालने का निश्चय किया।

इस फैसले में समिति ने जी.एम. चावल, गन्ना, बैंगन व सरसों सहित 15 फसलों को खेतों में परीक्षण की अनुमति दे दी थी।

परंतु यहां विषय जीएम फसलों के गुण दोष का नहीं है। इसके पक्ष और विपक्ष में अनगिनत दलीलें दी जा रही हैं। इसी के साथ यह सच्चाई भी है कि यदि किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में जीएम फसलों का अस्तित्व हो गया तो फिर उसे नष्ट नहीं किया जा सकता और समय के साथ वे फैलेंगी और धीरे-धीरे अपने आसपास के क्षेत्र को गिरफ्त में लेती जाएंगी।

परंतु भारत के संदर्भ में वर्तमान महत्वपूर्ण मसला यह है कि एक विशिष्ट मसले पर एक सी राय रखने वाले दो समूहों में से एक को किस आधार पर विकास विरोधी और कहीं-कहीं राष्ट्र विरोधी तक कहा जाता है और इसी मसले पर ठीक वैसी ही राय रखने वाले दूसरे समूह को राष्ट्रभक्त या देश का भविष्य बचाने का प्रयास की संज्ञा दी जाती है। आई बी रिपोर्ट जीएम बीज विरोधियों को विकास विरोधी बताते हुए कहती हैं, कि सन् 2001-02 में जीएम कपास के अस्तित्व में आने के बाद भारत दुनिया में कपास का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश बन गया। लेकिन रिपोर्ट यह नहीं बतलाती कि इस दौरान कपास के बुआई क्षेत्र में कितनी वृद्धि हुई और दूसरी ओर सन् 2001 के मुकाबले आज इसी बीटी कपास के प्रति हेक्टेयर उत्पादन में कितने प्रतिशत की कमी आई है?

यह विषय ही कुछ ऐसा है जिसमें मूल विषय से भटकाव स्वभाविक तौर पर हो जाता है। हम पुनः आईबी रिपोर्ट पर लौटते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार इस जीएम विरोधी आंदोलन में 5 भारतीय कार्यकर्ता एवं 6 गैर सरकारी संगठन शामिल हैं। रिपोर्ट में जिन प्रमुख कार्यकर्ताओं के नाम दिए हैं वे हैं, सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद् वंदना शिवा (नवधान्य) सुमन सहाय (जीन केम्पेन) अरुणा रॉड्रिग्स, कविता कुरुघंटी (आशा) व इनके अलावा ग्रीनपीस की करुणा रैना।

गौरतलब है ये भी महिलाएं हैं। आईबी की इस रिपोर्ट में यदि सिर्फ धन के व्यवस्थित उपयोग की बात होती तो माना जा सकता था कि यह एक तटस्थ रिपोर्ट है, लेकिन ऐसा नहीं है। यह एक निर्णयात्मक रिपोर्ट है। साथ ही आईबी की विशेषज्ञता न तो विकास कार्यों में है और न ही कृषि में। इसलिए यह प्रश्न भी उठना स्वाभाविक है कि पर्यावरण एवं वन मंत्री द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध दो संगठनों स्वदेशी जागरण मंच व भारतीय किसान मंच के विरोध के बाद जीएम फसलों के खेत परीक्षण को किस आधार पर स्थागित किया?

विदेशों से प्राप्त धन का तथाकथित दुरुपयोग करने वाले व्यक्ति और संगठन तथा देशी धन से संचालित संगठन दोनोें के जीएम फसलों के विरोध का आधार एक सा ही था। इतना ही नहीं इस संबंध में संसद की स्थायी समिति और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त तकनीकी समितियों ने भी अपनी अनुशंसाएं दी थीं।

बीटी बैंगन को अनुमति के प्रस्ताव को लेकर इन संगठनों ने एक देश व्यापी आंदोलन खड़ा कर जीएम फसलों के खतरों को किसानों और आम जनता के बीच रखा। पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने पूरे देश में इस पर राय जानने के लिए जनसुनवाई करवाई। इसमें भी इन संगठनों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी की थी।

इसी के साथ देश में जीएम फसलों को लेकर एक सार्थक बहस भी प्रारंभ हो गई थी। इस दौरान स्वदेशी मंच एवं भारतीय किसान संघ भी सक्रिय रहे थे। इससे मोंसेंटो जैसी अमेरिकी कंपनियों की नींद उड़ गई थी, क्योंकि वे भारत में अपने बीजों के अनाप-शनाप भाव वसूल रही हैं।

गौरतलब है कि मोन्सेंटो द्वारा चीन और भारत में बेचे जा रहे कई बीजों की दर में 30 से 40 गुना तक का अंतर है और उसको भारत एक ऐसे बाजार के रूप में दिखाई दे रहा है जहां पर किसी प्रकार से उसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता। जान कैरी की भारत को दी जा रही सलाह को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

जीएम फसलों के विवाद ने अंततः हम सबको इस सच्चाई से रूबरू करा दिया है भारत की विदेश, कृषि, व्यापार, वाणिज्य और गृह नीति कमोवेश अंतरराष्ट्रीय दबाव से संचालित है। पिछली यूपीए सरकार में यह साफ दिखाई पड़ता भी था। एनडीए सरकार से यह उम्मीद की जा रही थी कि वह इस ढर्रे में कुछ परिवर्तन लाएगी।

लेकिन उसका यह पहला नीतिगत निर्णय जिसमें वैसे तो जीएम फसलों के खेत में परीक्षण की अनुमति तो जीईएसी ने दी थी लेकिन सरकार द्वारा इसके खिलाफ कोई प्रतिक्रिया न देकर अपने चुनावी घोषणापत्र से मुंह मोड़ना, साफ दर्शाता है कि इस नई सरकार की कृषि को लेकर कोई नई या स्वतंत्र नीति बनाने की कोई इच्छाशक्ति नहीं है। वरना एक अदना सी समिति पूरे सरकार की मंशा को शंका के घेरे में लाने की स्वमेव हिम्मत नहीं कर सकती थी।

अपने विचार से न डिगने पर स्वदेशी जागरण मंच व भारतीय किसान संघ बधाई के पात्र हैं। वहीं दूसरी तरफ हमें यह भी समझना होगा कि अन्य संगठनों की न्यायोचित मांगों को बेवजह दबाने के पीछे क्या निहितार्थ हैं। पर्यावरण मंत्रालय का यह कदम कहीं सामाजिक क्षेत्र में किसी विशिष्ट विचारधारा को स्थापित करने का कोई प्रयास तो नहीं है? वहीं दूसरी तरफ यह कदम कमोवेश भारतीय संविधान में निहित समानता के सिद्धांत पर भी खरा नहीं उतरता। इस सबके बावजूद यह सच है कि भारतीय कृषि कभी उतने संकट में नहीं थी जितनी इस वक्त है।

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