जल की शुद्धिकरण में आधुनिक प्रौद्योगिकी की प्रांसगिकता

Submitted by Hindi on Wed, 12/28/2011 - 17:32
Source
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

यह सर्वविदित और अकाट्य सत्य है कि हवा के बाद पानी ही मनुष्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। हमारे देश में पानी की समस्या बाकी विकासशील देशों की तुलना में ज्यादा नाजुक है। जल प्रदूषण के पीछे औद्योगिकीकरण का हाथ तो है ही, साथ ही बढ़ती जनसंख्या भी जिम्मेदार है।

पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या और औद्योगिक गतिविधियों का तेजी से विकास अधिक से अधिक Contamiaut की पहचान और दूषित जल संसाधनों की उपलब्धता के कारण पांरपरिक जल और अपशिष्ट जल उपचार प्रक्रियाओं का उपयोग काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है।

कुछ उभरते उपचार प्रौद्योगिकियाँ जैसेः झिल्ली निस्पंदन, नैनोटेक्नोलॉजी नैनो, बुलबुल, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के बेहतर संरक्षण के लिए महान विकल्प प्रदान करने का वादा देते हैं। इस लेख में पानी और अपशिष्ट जल उपचार के क्षेत्र में उभरती प्रौद्योगिकियों पर मुख्य ध्यान केंद्रित किया गया है। इस पत्र से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि बढ़ती ज्ञान और विनिर्माण उपयोग के क्षेत्र में प्रगति के साथ इन प्रौद्योगिकियों का आवेदन एक अभूतपूर्व पैमाने पर बढ़ जाएगा।

जल के शुद्धीकरण में आधुनिक प्रौद्योगिकियों की प्रासंगिकता (Role of modern technologies in purification of water)


जल विज्ञान विभाग, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की (उत्तराखण्ड)

सारांश


यह सर्वविदित और अकाट्य सत्य है कि हवा के बाद जल ही मनुष्य की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। हमारे देश में जल की उपलब्धता व शुद्धता की समस्या बाकी विकासशील देशों की तुलना में अधिक विचारणीय है। पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या और औद्योगिक गतिविधियों का तेजी से विकास, तकनीकी कुशलता से अधिक से अधिक अशुद्धियों की पहचान और जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव के कारण उपयुक्त और अपशिष्ट जल (effluent) उपचार प्रक्रियाओं का उपयोग काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है। कुछ आधुनिक उपचार प्रौद्योगिकियाँ जैसे : झिल्ली निस्पंदन, नैनोटेक्नोलॉजी, माइक्रो व नैनो बुलबुले सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के बेहतर संरक्षण के लिये उचित विकल्प प्रदान करने का आश्वासन देते हैं। इस शोधपत्र में जल और अपशिष्ट जल उपचार के क्षेत्र में इन्हीं प्रौद्योगिकियों पर मुख्य रूप से ध्यान केन्द्रित किया गया है। इस आलेख से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आने वाले समय में बढ़ते ज्ञान के साथ इन प्रौद्योकियों का अनुप्रयोग एक अभूतपूर्व पैमाने पर बढ़ जाएगा।

It is universal fact that after air, water is the most important requirement of the human beings. The availability and purity of water happens to be a major cause of concern in India amongst all the developing countries. In few last decades, factors like rapid urbanization and industrialization better and more precise identifications of contaminants due to improved technical capabilities and finally, increasing stress on the water resource systems have presented numerous challenges before the conventional water treatment technologies. In view of the above, few modern technologies like Membrane filtration, Nanotechnology and Micro/Nano bubbles present a better alternative for water treatment. This research paper presents a brief review of the aforementioned technologies. It is expected that the advantages offered by these technologies would allow them to be used over a much larger scale in the near future.

प्रस्तावना


परम्परागत जल और अपशिष्ट जल उपचार प्रक्रियाओं का प्रयोग लम्बे समय से पर्यावरण में विद्यमान कई अशुद्धियों चिंताजनक रासायनिक पदार्थों और सूक्ष्म जीवाणुओं को हटाने में किया जाता रहा है। हालाँकि विभिन्न प्रकार की चुनौतियों के कारण पिछले दो दशकों से इन प्रक्रियाओं का प्रभाव काफी सीमित हो गया है। इन चुनौतियों में सबसे महत्त्वपूर्ण हैं : भूजनित व अन्य अकार्बनिक तत्व (आर्सेनिक, नाईट्रेट, फ्लोराइड इत्यादि) सिंथेटिक कार्बनिक यौगिक (पीएएच, पीसीबी, डीएनएपीएल इत्यादि) विषाक्त पदार्थ (भारती धातुएँ, रेडियोधर्मी पदार्थ जैसे यूरेनियम इत्यादि) व रोगजनित जीवाणुओं को हटाना क्योंकि इनका सार्वजनिक स्वास्थ्य और जलस्रोतों की गुणवत्ता पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। इस परिप्रेक्ष्य में उक्त तीन आधुनिक प्रौद्योगिकियां समसामयिक प्रतीत होती हैं। इनका वर्णन निम्न पंक्तियों में किया गया है।

झिल्ली निस्पंदन (Membrane Filtration)


यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दूषित जल को अर्धपारगम्य (semipermeable) झिल्ली से पार कराया जाता है। इस प्रक्रिया में जल में उपस्थित अधिक सान्द्रता वाले विलेय तो झिल्ली के एक तरफ रह जाते हैं तथा शुद्ध जल झिल्ली को पार कर जाता है।

झिल्ली एक पतली सतह की तरह होती है जिस पर जब बल लगाया जाता है तो वह पदार्थ को जल से अलग करने में सक्षम होती है। झिल्ली सिस्टम विशेष अनुप्रयोगों में जैसे जीवाणु, धूल कण इत्यादि को जल से अलग करना, समुद्री और खारे पानी के अलवणीकरण इत्यादि में 30 से अधिक वर्षों से बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है। लगातार हो रही तकनीकी प्रगति और लागत में कटौती निकट भविष्य में झिल्ली सिस्टम के लिये विशिष्ट संभावनाएं प्रस्तुत करती हैं। झिल्ली का प्रयोग दूषित जल और अपशिष्ट जल को साफ करने तथा पुनः उपयोग के लिये कई औद्योगिक इकाइयों में भी किया जा रहा है।

फिल्ट्रेशन की प्रक्रिया को भली-भाँति समझने के लिये पदार्थों व अशुद्धियों का माप व आकार का ज्ञान महत्व रखता है जिसको चित्र 1 में दर्शाया गया है। विशेष रूप से, झिल्ली निस्पंदन प्रक्रिया का वर्गीकरण Permeating प्रजातियों के आकार की सीमा, कार्यरत बलों, रासायनिक संरचना तथा झिल्ली की रचना और निर्माण के आधार पर किया जा सकता है । महत्त्वपूर्ण निम्न प्रकार हैं:

.माइक्रो फिल्ट्रेशन (MF) : माइक्रो फिल्ट्रेशन के द्वारा 0.04 से 1.0 माइक्रो मीटर आकार के कणों तथा जीवाणुओं को जल से अलग किया जाता है तथा यह फिल्टर कार्टरिज के रूप में उपलब्ध है। कार्टरिज की आकृति ट्यूब्युलर, डिस्क प्लेट, स्पायरल अथवा खोखले फाइबर के रूप में होती है।

अल्ट्रा फिल्ट्रेशन (UF): अल्ट्रा फिल्ट्रेशन के द्वारा 0.05 से 0.10 माइक्रो मीटर आकार के उच्च परमाणु भार वाले यौगिकों, कोलाइड्स, पायरॉक्सिन, जीवाणुओं तथा सस्पेंडेड सॉलिड्स को दूर किया जाता है। अल्ट्राफिल्टर मेम्ब्रेन के रूप में होते हैं इन फिल्टरों को भी ट्यूब्यूलर, डिस्क प्लेट, स्पाइरल तथा खोखले फाइबर के रूप में स्थापित किया जाता है।

नैनो फिल्ट्रेशन (NF): नैनो फिल्टर के छिद्र का माप 0.6-5 नैनो मीटर होता है। इससे मल्टीवैलेंट आयन (multivalent ions), सूक्ष्मजीवाणु, सस्पेंडेड सॉलिड्स आदि को जल से अलग किया जाता है। नैनो फिल्ट्रेशन में monovalent ions को जल से अलग नहीं किया जा सकता।

रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) : यह काफी लोकप्रिय प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में जल को अपारगम्य झिल्ली द्वारा पार करवाया जाता है। इसके द्वारा जल में उपस्थित लगभग सभी अकार्बनिक आयनों, गंदलापन, जीवाणु, सॉलिड्स व कार्बनिक पदार्थों को जल से अलग किया जा सकता है।

आजकल घरेलू स्तर पर भी वाटर प्यूरिफायर (जल शोधन संयंत्रों) का प्रयोग काफी किया जा रहा है जिसमें RO का इस्तेमाल होता है। विशेषकर जहाँ भूजल में घुलनशील सालिड्स (TDS) 500 मि.ग्रा. प्रति ली. से अधिक हों, और बाकी अशुद्धियाँ जल की गुणवत्ता मानक से अधिक हों, वहाँ घरेलू RO संयंत्र काफी प्रभावी पायी गई हैं। विभिन्न प्रकार के उद्योगों जैसे कपड़ा, डेयरी, दवा इत्यादि में भी बेकार पानी को कारगर बनाने के लिये अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र लगाये जाते हैं जिनमें झिल्ली तकनीक का प्रयोग अशुद्धियों को प्रभावी ढंग से हटाने हेतु अंतिम चरण पर किया जा रहा है। झिल्ली द्वारा निष्पादित पानी का प्रयोग उद्योगों में फिर से किया जा सकता है। इससे पानी की खपत भी कम हो जाती है। तथा भूजल रिक्तीकरण की समस्या भी दूर की जा सकती है। वाणिज्यिक झिल्ली छिद्र के माप व आकार के एक विस्तृत विस्तार या रेंज के रूप में उपलब्ध है। झिल्ली निस्पंदन के निम्न प्रभावी उपयोगों का वर्णन तकनीकी साहित्य में उपलब्ध है।

प्रयोगशाला और बड़े पैमाने दोनों स्तरों पर झिल्ली प्रक्रियाओं द्वारा ठोस तरल अलगीकरण का लगातार सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया गया है। इसमें MF तथा UF विशेष महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि ये बहुत कम दबाव भिन्नता के सिद्धांत पर कार्य करते हैं जल उपचार में इनका प्रयोग सस्पेंडेड सॉलिड्स व टरबिडिटी को हटाने तथा क्लोरिन प्रतिरोधी रोगजनकों (chlorine resitant pathogens) को समाप्त करने में सहायक है। दूषित जल से जीवाणुओं (Giardia Spp. और cruptosporodium Spp.) की 6 लॉग इकाई से भी ज्यादा हटाने की क्षमता प्रदर्शित की गई है, बशर्ते झिल्ली की अखण्डता को बनाए रखा जाए।

किलेगा आदि (1991) ने दर्शाया है कि प्राथमिक मल जल प्रवाह के MF प्रक्रिया द्वारा उपचार से सस्पेंडेड सॉलिड्स तथा टरबिडिटी को कम से कम 1 मि.ग्रा. प्रति.ली. और 1 एन टी यू. क्रमशः तक कम किया जा सकता है। इसके अलावा बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमान्ड (BOD), तेल इत्यादि को भी काफी मात्रा में हटाना सम्भव है।

सामान्यतः MF और UF सतही जल (Surface Water) के उपचार में घुले हुए कार्बनिक यौगिकों को हटाने में केवल
कपड़ा उद्योग अपशिष्ट से कार्बनिक रंजक अथवा डाइ (dye) का अलग करना, तेल क्षेत्र से brines और पेट्रोलियम शोधन संयंत्र में तेल की एकाग्रता बढ़ाना, भूजल से कीटनाशकों को दूर करने में, और landfill leachate उपचार में भी यह प्रौद्योगिकी सफल रही है।

पानी के उपचार में NF और RO झिल्लियाँ अकार्बनिक प्रदूषकों को हटाने में सबसे ज्यादा उपयोगी पाई गई हैं। एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि 1889 में दुनिया भर में लगभग 3.8x106 क्यू.मी. प्रतिदिन क्षमता के 4000 से भी अधिक संयुक्त अलवणीकरण (Desalination) RO संयत्र थे (AWWA मैम्ब्रेन टेक्नोलॉजी रिसर्च कमेटी, 1992) जिसमें केवल 95 m3/d से अधिक क्षमता वाले संयंत्र शामिल हैं। इसके अलावा, हाल ही में एक जाँच के अनुसार NF और RO पानी से कठोरता, नाइट्रेट और भारी धातुएँ हटाने में सक्षम है।

झिल्ली निस्पंदन सिस्टम का चयन


झिल्ली प्रतिक्रियाओं का सफल उपयोग झिल्ली सामग्री के उचित चयन पर निर्भर करता है। आदर्श रूप में एक झिल्ली में निम्न गुण: उच्च प्रवाह, अशुद्धियों का बहिष्करण (contaminant rejection), अच्छा रासायनिक प्रतिरोध और कम लागत होने चाहिए। अच्छी झिल्लियों को विकसित करने के लिये नये पदार्थों पर व्यापक अनुसंधान किये गये हैं एवं झिल्ली के चयन में छिद्र का आकार (pore size) आण्विक भार कट ऑफ (molecular weight cutoff) महत्व रखते हैं जिससे अधिकतम आण्विक भार के विलेय (solute) को बहिष्कृत कर दिया जाता है। सारणी 1 में झिल्ली निस्पंदन प्रतिक्रियाओं की मुख्य विशेषताओं को दर्शाया गया है।

 

सारणी-1 झिल्ली निस्पंदन के विभिन्न प्रकारों का वर्गीकरण व विशेषताएं

Method

Pore size (nm)

Molecular weight cutoff

Pressure (bar)

MF

50-5000

>500KDa

0.5-2

UF

5-50

2.500 KDa

0.5-10

NF

0.6-5

500-2000Da

10-30

RO

<0.6

<500Da

30-70

(स्रोतः ई.पी.आर.आई., 1997)

 

नैनोटैक्नोलॉजी (Nanotechnology)


‘‘नैनो’’ शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्दावली से हुई है जिसका अर्थ है ‘‘बौना’’ (dwarf)। एक नैनोमीटर एक मीटर का अरबवां (billionth, 10-9) हिस्सा होता है व लम्बाई में दस हाइड्रोजन अणुओं की एक सीधी पंक्ति जितना समझा जा सकता है। इस तकनीकी का सबसे पहला प्रयोग जेम्स मैक्सेल ने 1867 में किया था। नैनो विज्ञान एक अत्यंत ही विस्तृत व रोचक शोध के विषय में उभरा है जिसमें पदार्थों के ऊपर आण्विक स्तर पर प्रयोग करने नित नये आकार, परिमाण व गुण विकसित किये जा सकते हैं। ऐसा इन पदार्थों के घटते आकार अथवा माप (size) के साथ-साथ इन पदार्थों के सतही क्षेत्रफल (surface area) के बढ़ते चले जाने के कारण संभव हो पाता है। नैनो विज्ञान का गठबंधन कई तकनीकी विधाओं के साथ किया जा सकता है जिसके कारण इसको प्लेटफार्म टैक्नोलॉजी भी कहा जाता है। आज कई क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है यथा पर्यावरण संरक्षण, जलशोधन, रोगोपचार व उद्योग जगत इत्यादि। कई अन्य नये क्षेत्रों में भी भविष्य में इस प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल की प्रबल सम्भावना है।

.पेयजल शोधन के क्षेत्र में सर्वाधिक सफल प्रयोग क्लोरीन युक्त कार्बनिक यौगिकों जिनमें कीटनाशक भी शामिल हैं (halogenated organics including pesticides), भारी धातुओं व सूक्ष्म जीवाणुओं को जल से हटाने पर किये गये हैं। नैनो प्रौद्योगिकी पर आधारित छोटे घरेलू शोधन संयंत्रों (coated candle based purifiers) से लेकर बड़ी क्षमता के संयंत्रों पर अभिनव प्रयोग चल रहे हैं। नैनो जीरोवैलेन्ट लौहकण (NZVI) तथा bimetallic नैनोकण मिट्टी और जल दोनों के उपचार में सहायक हैं। NZVI पानी के वर्तमान कार्बनिक व अकार्बनिक दोषों का ऑक्सीकरण द्वारा उपचार करता है। चित्र. 2 में NZVI द्वारा शुद्धीकरण को दर्शाया गया है। NZVI जल में विद्यमान कैडमियम (Cd), निकिल (Ni), जिंक (Zn) आदि भारी धातुओं को कम हानिकारक स्वरूप में बदलने की क्षमता रखता है। शोधकर्ताओं के अनुसार चाँदी और सोने के नैनोकणों द्वारा हैलोकार्बन, जो दूषित जल में विद्यमान होते हैं, का विघटन सफलतापूर्वक किया जा सकता है। सोने, चाँदी के नैनो कणों का प्रयोग सेन्सर (sensor) के रूप में जल में विद्यमान भिन्न प्रकार के कीटनाशकों का पता लगाने में भी किया जा रहा है। कई शोधकर्ताओं ने क्लोरीनयुक्त यौगिकों के इलाज के लिये नये नैनोकण भी संश्लेषित किये हैं। पैलेडियम (Pd) नैनो कणों को Choloroethene का विघटन (degrade) करने में लोहे (Fe) के कणों से अधिक सक्षम पाया गया है।

.क्लोरिन युक्त कार्बन यौगिकों जैसे CCl4 का उपयोग व्यापक रूप से extracting agent के रूप में, सिंथेटिक प्लास्टिक के लिये मध्यवर्ती के रूप में और herbicides में होता है। ये यौगिक अनुचित भण्डारण तथा रिसाव (spill) के माध्यम से मिट्टी की अंदरूनी सतहों से होते हुए भूजल को प्रदूषित करने में सक्षम होते हैं। NZVI का प्रयोग इन पदार्थों के reductive उन्मूलन के लिये काफी सफल सिद्ध हुआ है। (चित्र 3)।

..औद्योगिक अपशिष्ट जल उपचार प्रक्रिया में सुधार लाने के उद्देश्य से भी नैनो पदाथों की उच्च गुणवत्ता पर काफी शोध किया जा रहा है। अपशिष्ट जल के नैनोकणों द्वारा जैविक शोधन (bioremediation) प्रक्रिया द्वारा जल को कीटाणुरहित बनाने में सफलता प्राप्त हुई है। रोगाणुरोधी सामर्थ्य के लिये TiO2 पर नैनोकैटेलिस्ट्स का भी काफी परीक्षण किया गया है।

चुंबकीय नैनोकणों को भी अपशिष्ट जल से धातुओं और कार्बनिक यौगिकों को अवशोषित करने के लिये विकसित किया जा रहा है। ऑक्सीजन याचक अशुद्धियों के प्रदूषण को कम करने के लिये नैनोकैटेलिस्ट्स के प्रयोग का पता भी लगाया जा रहा है। Magnetite नैनोकणों द्वारा अपशिष्ट जल से क्रोमियम धातु को हटाने की क्षमता पर काफी शोध किया गया है।

भूजल व सतही जल का शोधन


नैनो प्रौद्योगिकी भूजल व सतही जल के शोधन के लिये भी अत्यंत उपयोगी है। जलस्रोतों का प्रदूषण न केवल भारत जैसे विकासशील देशों अपितु विश्व के अन्य विकसित देशों के लिये भी एक बड़ी समस्या है। भूजल स्रोतों में कार्बनिक और अकार्बनिक अशुद्धियों के शोधन के लिये NZVI का प्रयोग दो प्रमुख रूपों में किया गया है।

लोहे के नैनो कणों को पाउडर अथवा स्लरी (slurry) के रूप में एक्वीफर (aquifer) के भीतर एक क्षेत्र के रूप में अंत:क्षिप्त किया जाता है (चित्र 4) NZVI के 1.7 किग्रा. नैनो कणों के इंजेक्शन से TCE (trichloroehyles) की मात्रा में 96 प्रतिशत की कटौती देखी गई है।

दूसरे रूप में NZVI से लेपित पारगम्य रिएक्टिव बैरियर (perbeable reactive barrier) की स्थापना जल के बहाव की दिशा में की जाती है जिससे बहते हुए दूषित भूजल की अशुद्धियाँ इस बाधा (barrier) से होकर गुजरने के पश्चात हट जाती हैं। इस बैरियर को थोड़े समय के पश्चात हटा कर बदला जा सकता है (चित्र 5)।

बुलबुलों (माइक्रो व नैनो) (Micro and Nano Bubbles) का प्रयोग


.माइक्रो बुलबुले माइक्रो प्रजातियों का एक नया वर्ग है जिस पर हाल ही में शोध किया गया है। माइक्रो बुलबुलों (MB) की पानी की सतह के नीचे फट जाने की क्षमता इन्हें मैक्रो बुलबुलों (बड़े या सामान्य) से अलग कराती है। इन छोटे बुलबुलों की यह विशेषता विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जलशोधन के लिये नये द्वार खोल रही है। माइक्रो और नैनो बुलबुलों (NB) का आकार (व्यास) क्रमशः 10-15 माइक्रोमीटर तथा 200 नैनोमीटर होता है। माइक्रो बुलबुलों का आकार धीरे-धीरे लंबे ठहराव और आंतरिक गैसों के विघटन के कारण कम होता जाता है तथा इस प्रकार उनका पतन हो जाता है। जबकि नैनो बुलबुले जैसे होते हैं, बहुत समय तक उसी आकार में रहते हैं और एक बार में नहीं फटते। नैनो बुलबुलों के इन्टरफेस (interface) पर हार्ड हाइड्रोजन बॉन्ड शामिल होता है। जो बर्फ तथा गैस हाइड्रेट्स में होता है। चित्र 6 में मैक्रो, माइक्रो तथा नैनो बुलबुलों को दर्शाया गया है। काफी लम्बे समय से thermodynamic considerations की वजह से नैनो बुलबुलों के स्थिर इकाई के रूप में इनके अस्तित्व पर काफी बहस की गई है। उदाहरण के लिये : NBs के गठन के साथ सिस्टम की कुल मुक्त ऊर्जा में वृद्धि होनी चाहिए। तथापि छठे के अंदर उच्च laplace दबाव ही उनके घोल (solution) में जल्दी घुलने का कारण है। इन माइक्रो व नैनो बुलबुलों के गुणों को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले कारक उनकी सतह के प्रभार व बुलबुलों की बढ़ती गति है। पिछले कुछ वर्षाे में इन बुलबुलों की उच्च प्रतिक्रियशील कण उत्पन्न करने की क्षमता के कारण पानी के उपचार के लिये इनके सम्भावित अनुप्रयोग पर अधिक से अधिक ध्यान दिया गया है। कुछ प्रमुख क्षेत्रों का वर्णन निम्न पंक्तियों में किया गया है।

कार्बनिक अशुद्धियों का शोधन


MBs का गठन, विकास और पतन अक्सर कैविटेशन के संदर्भ में देखा जाता है। hydrodynamic cavitation के माध्यम से उत्पन्न माइक्रो बुलबुलों को विभिन्न कार्बनिक यौगिकों (यथा alachlor) की मात्रा में गिरावट एवं कम करने के लिये नियोजित किया गया है।

गतिशील प्रोत्साहन के अभाव में तथा तीक्ष्ण अम्लीय स्थिति में ओजोन (O3) के बुलबुले पोलीविनाइल एल्कोहल को हटाने में सक्षम हैं। एक जाँच के अनुसार UV irradiation में नैनो बुलबुले surfactants और non surfactants के विघटन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। MBs रासायनिक प्रतिक्रिया को उत्प्रेरित करते हैं तथा डीटॉक्सीफीकेशन की दक्षता को बढ़ाते हैं जिससे पानी की रासायनिक उपचार की दक्षता में सुधार आता है। इनका न केवल पानी तथा अपशिष्ट जल के उपचार के लिये बल्कि फरमेन्टेशन (fermentation) तथा मानव अपशिष्ट उपचार के लिये भी प्रयोग किया जा सकता है। हवा तथा नाइट्रोजन गैस के बुलबुले एरोबिक तथा एनोरोबिक सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को बढ़ाते हैं।

कीटाणु शोधन (Water disinfection)


.जल के कीटाणु शोधन में माइक्रो तथा नैनो बुलबुले काफी प्रभावी साबित हुए हैं। MBs द्वारा उच्च प्रतिक्रियाशील कण उत्पन्न करने की क्षमता जल के कीटाणु शोधन में काफी मददगार हैं। कॉलीफार्म बैक्टीरिया को नष्ट करने में ओजोन MBs का अत्यधिक प्रभाव देखा गया है। इस तकनीक के कारण रिएक्टर के आकार व ओजोन की मात्रा पारंपरिक ओजोन कीटाणुशोधन की तुलना में बहुत कम पाई गई है। चित्र 7 इस प्रक्रिया को दर्शाता है मेम्ब्रेन निस्पंदन प्रक्रिया में झिल्ली के अशुद्धीकरण को दूर करने में भी MBs काफी सहायक है। ये प्रोटीन को मेम्ब्रेन की स्तर पर सोखने से रोकते हैं।

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सम्पर्क


हिमांशु जोशी, Himanshu Joshi
जल विज्ञान विभाग, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की (उत्तराखण्ड), Department of Hydrology, Indian Institute of Technology, Roorkee (UK)


भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

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