जल : प्रथम और अन्तिम सार्वजनिक सम्पदा

Submitted by birendrakrgupta on Thu, 06/11/2015 - 21:28
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योजना, जून 2005
जल संकट व्यापारिक कारणों से उत्पन्न एक पारिस्थितिकीय संकट है जिसका कोई बाजारनिष्ठ समाधान नहीं है। बाजारनिष्ठ समाधान धरती को बर्बाद करते हैं और असमानता को बढ़ावा देते हैं। जल संकट को खत्म करने के लिए पारिस्थितिकीय लोकतन्त्र को नई जिन्दगी का आवश्यकता है।

जल के दो आयाम बेहद विवादित हैं- जल की सार्वजनिकता का आयाम और जल के वस्तु होने का आयाम।

जल एक सार्वजनिक सम्पदा


जल एक सार्वजनिक सम्पदा है क्योंकि यह जीवन का पारिस्थितिकीय आधार है और इसकी उपलब्धता और सामयिक आवण्टन सामुदायिक सहयोग पर आधारित है। हालांकि समस्त मानव इतिहास की विभिन्न संस्कृतियों में जल-प्रबन्धन सार्वजिनक है और हालांकि ज्यादातर समुदायों ने जल संसाधनों का प्रबन्धन संयुक्त सम्पदा की तरह किया या आज भी, पानी तक पहुँच, सार्वजिनक सम्पदा की तरह है लेकिन जल संसाधनों के निजीकरण की माँग जोर पकड़ रही है।

अंग्रेंजों के आने से पहले, दक्षिण भारत के समुदाय जल-व्यवस्था का संयुक्त प्रबन्धन, कुडीमरामथ (स्वयं-मरम्मत) नामक प्रणाली के माध्यम से करते थे। अठारहवीं शताब्दी में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के निगमित शासन के प्रादुर्भाव से पहले, एक किसान कमाए गए अन्न की अपनी 1,000 इकाइयों में से 300 का भुगतान सार्वजनिक निधि को करता था और इन में से 250 का सार्वजनिक सम्पदा और लोक निर्माण के रखरखाव के लिए गाँव में इस्तेमाल होता था। 1830 तक, किसानों का भुगतान बढ़कर 650 इकाइयाँ हो गईं जिनमें से 590 इकाइयाँ सीधे ईस्ट इण्डिया कम्पनी को चली जाती थीं। बढ़े भुगतानों और रखरखाव-राजस्व के नुकसान से किसान और सार्वजनिक सम्पदा बर्बाद हो गईं। परिणामस्वरूप, भारत में सदियों पुराने 3,00,000 तालाब और जलस्रोत नष्ट हो गए जिससे कृषि उत्पादन और आय प्रभावित हुई।

1857 के प्रथम स्वतन्त्रता आन्दोलन के माध्यम से ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बाहर खदेड़ दिया गया। 1858 में अंग्रेजों द्वारा मद्रास आवश्यक श्रम अधिनियम पारित किया गया जिसे आमजन ने 'कुडीमरामथ' अधिनियम के रूप में जाना। इससे जल और सिंचाई की व्यवस्था के रखरखाव के लिए किसानों हेतु श्रमदान करना जरूरी कर दिया गया। क्योंकि कुडीमरामथ बाध्यता नहीं बल्कि स्वप्रबन्धन पर आधारित था। अतः यह अधिनियम सामुदायिक हिस्सेदारी जुटाने और सार्वजनिक सम्पदा के पुनर्निर्माण में विफल रहा।

सात राज्यों के सूखे उष्णकटिबन्धीय जिलों के राष्ट्रीय स्तर के सर्वेक्षण में एन.एस. जोधा ने पाया कि भारत में गरीबों की सबसे मूलभूत ईन्धन और चारे की जरूरतें सार्वजनिक सम्पदा संसाधनों से ही पूरी होती हैं।स्वप्रबन्धित, स्वनियमित समुदाय मात्र ऐतिहासिक वास्तविकता नहीं है बल्कि समकालीन तथ्य भी है। राजकीय हस्तक्षेप और निजीकरण इन्हें पूरी तरह से समाप्त नहीं कर सका। सात राज्यों के सूखे उष्णकटिबन्धीय जिलों के राष्ट्रीय स्तर के सर्वेक्षण में एन.एस. जोधा ने पाया कि भारत में गरीबों की सबसे मूलभूत ईन्धन और चारे की जरूरतें सार्वजनिक सम्पदा संसाधनों से ही पूरी होती हैं। संवेदनशील थार रेगिस्तान में जोधा ने सार्वजनिक सम्पदा के अध्ययन में पाया कि ग्राम-समुदाय परिषद आज भी चराई अधिकारों का निर्णय होता है, चराई अवधि का निर्धारण, चराई की बारी तय करना, चरने वाले जानवरों की संख्या और प्रकार, गोबर और ईन्धन की लकड़ी जुटाने सम्बन्धी अधिकार और हरे चारे के लिए पेड़ काटने के नियम भी ग्राम परिषद बनाती है। ग्राम परिषद अपना चौकीदार भी नियुक्त करती है, यह सुनिश्चित करने के लिए कि समुदाय का कोई सदस्य या कोई बाहरी व्यक्ति नियम न तोड़े। कुएँ व तालाब के रखरखाव के लिए भी नियम बने हुए हैं।

जल की सार्वजनिकता का विचार, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली जिससे कमी की दिशा में, जल-प्रबन्धन की दीर्घकालीन व्यवस्था विकसित हुई। संरक्षण और सामुदायिक निर्माण के लिए जल संसाधन में प्राथमिक निवेश, श्रमदान था। गाँधी शान्ति फाउन्डेशन के अनुपम मिश्र के अनुसार :

'पलार' यानि बारिश की बूँद इकट्ठा करने के तरीके बादल और बूँदों जितने ही असीमित हैं। समुद्र की तरह ही कोई बर्तन बूँद-बूँद करके भरता है। यह सुन्दर पाठ किसी पाठ्य-पुस्तक में नहीं मिलेगा, बल्कि यह हमारे समाज की यादाश्त में मौजूद है। इसी यादाश्त से हमारी मौखिक परम्परागत श्रुति आरम्भ हुई।

इस विशाल कार्य के लिए राजस्थान के लोग, केन्द्र सरकार या निजी क्षेत्र के भरोसे नहीं रहे। लोगों ने स्वयं ही प्रत्येक गाँव के प्रत्येक घर में इस ढाँचे को तैयार किया, देखरेख की और उन्हें आगे विकसित भी किया।

स्थानीय प्रबन्धन पर आधारित यही परम्परागत जल व्यवस्था गुजरात के सूखा-प्रवण क्षेत्रों में भी पानी की कमी के विरुद्ध बीमा है। स्थानीय संस्थाएँ और मुख्य रूप से ग्रामीण समुदाय इस व्यवस्था का प्रबन्धन करते हैं। बाढ़, सूखा और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से राजा भी मदद करता था। अतः केन्द्रीय सत्ता की भूमिका मुख्यतः आपदा-नियन्त्रण में रही है। किसान संगठन, स्थानीय सिंचाई पदाधिकारी, ग्रामीण जल संगठन और प्रत्येक परिवार के अंशदान, से चलने वाली श्रम-व्यवस्था जल-प्रबन्धन में शामिल स्थानीय संस्थाएँ थीं।

एक जमाने में, भारत में जलाशय के निर्माण और देखरेख के लिए कृषक संगठनों की व्यवस्था बेहद विशाल थी। कर्नाटक और महाराष्ट्र में इन संगठनों को 'पंचायत' के नाम से जाना जाता था। तमिलनाडु में इन्हें नट्टामाई, कवई मनियम, नीर मनियम, ओपीडि संगम या ऐरि वरियम (तालाब समिति) कहते थे। पोखर और तालाब अक्सर एक से ज्यादा गाँव की सहायता करते थे और ऐसी स्थिति में प्रत्येक गाँव के प्रतिनिधि या कृषक संगठन लोकतान्त्रिक नियन्त्रण रखते थे।

यह समितियाँ और संगठन उपभोक्ता से शुल्क और कर एकत्रित कर सकते थे। जलकार्य पर ज्यादा पूँजी खर्च होने पर, भूदान भी किया जाता था।

ग्राम जल व्यवस्था में सिंचाई व्यवस्था की रोजाना देखरेख के लिए सिंचाई अधिकारियों की आवश्यकता पड़ती थी। हिमालय में, जहाँ 'कुहल' सामुदायिक सिंचाई जरूरतों की देखभाल करते थे, सिंचाई प्रबन्धक 'कोहली' कहलाए।

महाराष्ट्र में वे पटकारी, हवलदार और जोगालय नामों से जाने गए। कर्नाटक और तमिलनाडु में उन्हें र्निगन्ति, र्निपयची, निशनिक्कन्स और कामकुकाट्टी, नामों से जाना गया।

तटस्थता सुनिश्चित करने के लिए र्निकट्टी भूमिहीन जाति से हरिजन चुने गए जिन्हें जातिसमूह और जमीन्दारों से स्वायत्तता प्रदान की गई। केवल हरिजन ही तालाब के द्वार खोल व बन्द कर सकते थे। एक बार किसानों के द्वारा जल वितरण के नियम बना दिए जाने पर कोई किसान इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता था और जो करता था, उस पर जुर्माना लगता था। आर्थिक रूप से शक्तिशाली लोगों से संगठन का यह बचाव ही जल-लोकतन्त्र सुनिश्चित करता था।

दक्षिण भारत में, 'कुडीमरामथ' नाम से मशहूर ग्राम जल व्यवस्था के निर्माण और देखरेख में सामूहिक श्रमनिवेश मुख्य निवेश था। नहरों की सफाई और रखरखाव में प्रत्येक सक्षम व्यक्ति का मदद करना जरूरी था।मुआवजा व्यक्ति द्वारा किए गए स्व-श्रम निवेश पर आधारित होता था और पूँजी या दूसरों का श्रम इसका विकल्प नहीं हो सकता था। दक्षिण भारत में, 'कुडीमरामथ' नाम से मशहूर ग्राम जल व्यवस्था के निर्माण और देखरेख में सामूहिक श्रमनिवेश मुख्य निवेश था। नहरों की सफाई और रखरखाव में प्रत्येक सक्षम व्यक्ति का मदद करना जरूरी था। र्निकट्टी द्वारा भी किसानों को नहरों की आपूर्ति व्यवस्था साफ करने के लिए बुलाया जाता था। प्राचीन आर्थिक शोध प्रबन्ध पुस्तक अर्थशास्त्र में किसी भी तरह के सहकारी निर्माण से दोषियों के लिए विशेष सजा का प्रावधान था। दोषी लोगों से उम्मीद की जाती थी कि वे बिना किसी फायदे की उम्मीद के, अपने नौकरों व बैलों को काम निपटाने भेजें और खर्चे में हिस्सा दें।ब्रिटिश राज के दौरान सरकार के जल-संसाधनों का नियन्त्रण ले लेने से स्व-प्रबन्धन व्यवस्था को आघात पहुँचा।

बोरवेल और ट्यूबवेल ने किसानों को व्यक्तिगत पूँजी पर आश्रित कर दिया जिससे सामुदायिक स्वामित्व को और अधिक धक्का पहुँचा। राज्य के हस्तक्षेप से सामुहिक जलाधिकार महत्वहीन हो गए और संसाधन-नियन्त्रण बाहरी संस्थाओं को हस्तान्तरित हो गया। राजस्व अब स्थानीय मूल ढाँचे में पुनर्निवेशित होने के बजाय सरकारी विभाग को जाने लगा।

सामुदायिक अधिकार पारिस्थितिकी और लोकतन्त्र, दोनों के लिए जरूरी है। दूरस्थ और बाहरी एजेंसियों के द्वारा दफ्तरशाही नियन्त्रण और व्यावसायिक हितों व कॉरपोरेशन द्वारा बाजारगत नियन्त्रण से संरक्षण हतोत्साहित होता है। यदि केवल नौकरशाही या व्यावसायिक बाहरी एजेंसियाँ उनके प्रयासों और संसाधनों से फायदा उठाएँ तो स्थानीय समुदाय जल-संरक्षण या जल व्यवस्था की देखरेख नहीं करते।

मुक्त बाजार स्थितियों के तहत बढ़े दामों से संरक्षण नहीं होता। बेहद आर्थिक असमानताओं को देखते हुए ज्यादा सम्भावना है कि आर्थिक रूप से शक्तिशाली लोग पानी बर्बाद करेंगे जबकि गरीबों को उसका दाम चुकाना पड़ेगा।

सामुदायिक अधिकार लोकतन्त्र का हिस्सा हैं जो राज्य और व्यापारिक हितों को जवाबदेह बनाते हैं और विकेन्द्रित लोकतन्त्र के रूप में लोगों के जल अधिकारों की रक्षा करते हैं।

जल वस्तु है


सभी मानते हैं कि विश्व के समक्ष गम्भीर जल संकट है। जल-बहुल क्षेत्र जल-विरल हो गए हैं और जल-विरल क्षेत्रों के सामने सूखे की स्थिति है। लेकिन जल संकट के कारण स्पष्टीकरण के रूप में दो विरोधाभासी आयाम हैं। एक बाजार का आयाम है तो दूसरा पारिस्थितिकीय आयाम है। बाजार का आयाम जलविरलता को जल व्यापार की अनुपस्थिति से उत्पन्न संकट मानता है। यदि मुक्त बाजार के माध्यम से जल का संचार और मुक्त वितरण हो सके तो उसे विरलता के क्षेत्रों में स्थानान्तरित किया जा सकता है और ऊँचे दाम होंगे तो उसका संरक्षण होगा। जैसा कि एडीसन और स्नाइडर का कहना है, 'दाम ऊँचे होने पर लोग बर्बादी कम करते हैं और अपनी इच्छा पूरी करने के लिए वैकल्पिक उपाय ढूँढ़ते हैं। पानी इसका अपवाद नहीं है।'

जलचक्र की पारिस्थितिकीय सीमाओं और गरीबी द्वारा तय की गई आर्थिक सीमाओं को बाजारनिष्ठ अवधारणाएँ नहीं मानतीं। जल के अत्यधिक दोहन और जलचक्र के विदारण से अत्यधिक जलविरलता पैदा होती है। इसकी कोई भरपाई नहीं है। वास्तव में, वस्तुकरण की अवधारणा वैकल्पिकता के तर्क पर आधारित है। ऐसे अवास्तविक तर्क सबसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु को ही छोड़ देते हैं कि जब जल ही गायब हो जाएगा तब क्या विकल्प होगा? उदाहरण के लिए हर्ष लीफी और उनके सहयोगी कहते है :

इस बात से इंकार नहीं है कि एक वस्तु की तरह पानी के अपने विशिष्ट गुण हैं, उदाहरण के लिए प्रकृति उसकी आपूर्ति आंशिक रूप से भण्डार और प्रवाह के रूप में करती है और कुछ जगह बिना किसी कीमत के यह उपलब्ध है। लेकिन कहीं और ले जाने के लिए यह महंगा ही है। हम कोई भी वजह दें लेकिन विश्लेषण करने पर पानी का तथाकथित विलक्षण महत्त्व गायब हो जाता है।

ऐसे अवास्तविक तर्क सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा ही छोड़ देते हैं कि जब जल ही गायब हो जाएगा, तब कोई विकल्प नहीं होगा। अविकसित देशों में रहने वाली तीसरी दुनिया की औरतों के लिए जल विरलता का मतलब जल की खोज में ज्यादातर दूर तक जाना है। किसानों के लिए इसका मतलब भुखमरी और असहाय होना है क्योंकि सूखा उनकी फसल नष्ट कर देता है। बच्चों के लिए इसका मतलब निर्जलीकरण और मौत है। दरअसल, जानवरों और पौधों के जैविक अस्तित्व के लिए जरूरी इस अनमोल द्रव्य का कोई विकल्प है ही नहीं।

जल संकट, व्यापारिक कारणों से उत्पन्न एक पारिस्थितिकीय संकट है जिसका कोई बाजारनिष्ठ उपाय नहीं है। बाजारनिष्ठ उपाय धरती को बर्बाद करते हैं और असमानता को बढ़ाते हैं।

पारिस्थितिकीय संकट का उपाय भी पारिस्थितिकीय है और अन्याय का उपाय लोकतन्त्र है। जल-संकट के अन्त के लिए पारिस्थितिकीय लोकतन्त्र की आवश्यकता है।

(लेखिका रिसर्च फाउन्डेशन फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एवं इकोलॉजी, नई दिल्ली की निदेशक हैं)

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