जल संकट से बढ़ेगा कृषि संकट

Submitted by HindiWater on Mon, 04/27/2020 - 14:34

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प्रांरभ से ही भारत में खेती की जा रही है। भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है। देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि ही है, जहां 51 प्रतिशत भाग पर कृषि,  4 फीसद पर चारागाह, 21 फीसदी पर वन और 24 बंजर भूमि है। देश के 52 प्रतिशत भाग की आजीविका कृषि और इससे संबंधित उद्योगों व कार्यों पर निर्भर है। चीन के बाद भारत गेंहू और चावल का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक है। देश में कृषि भूमि के 15 प्रतिशत भाग पर गेहूं उगाया जाता है। गेहूं उत्पादन में उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है, जबकि प्रति हेक्टेयर भूमि पर सबसे ज्यादा गेहूं पंजाब में होता है। आम, केला, चीकू, खट्टे नींबू, काजू, नारियल, काली मिर्च, हल्दी के उत्पादन में भारत का पहला स्थान है, जबकि फल और सब्जियों के उत्पादन में भारत का दूसरा स्थान है। फसलों का उत्पादन भी राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप किया जाता है, लेकिन पानी के बिना खेती संभव नहीं है। 

हर प्रकार के कृषि कार्य के लिए पानी की जरूरत होती हैं। बिना सिंचाई के फसलें नहीं होती। देश भर में किसानों की सिंचाई की जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न नहरों का निर्माण करवाया गया। पानी के लिए किसानों ने बड़े पैमाने पर बोरिंग कराई। खेतों में बोरिंग कराने के लिए सरकार द्वारा किसानों को अनुदान दिए जाने का प्रावधान भी किया गया, लेकिन जैसे जैसे भूजल स्तर गिरा, किसानों के सामने पानी की समस्या गहराने लगी। देश के कई हिस्सों में सूखना पड़ने लगा। बुंदेलखंड में पानी की समस्या किसी से छिपी नहीं है। पानी की समस्या देश में इतनी विकट है कि कई इलाकों में किसानों ने खेती ही छोड़ दी है। खेती छोड़ने के कारणों में कम बाजार मूल्य और बढ़ता कर्ज मुख्य है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012-13 में ग्रामीण भारत में 57.8 प्रतिशत कृषि परिवार थे, लेकिन 2018 में आई नाबार्ड की अखिल भारतीय ग्रामीण वित्तीय समावेशन सर्वेक्षण (एनएएफआइएस) के मुताबिक देश के आधे से ज्यादा किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं। ग्रामीण भारत में 48 प्रतिशत ही कृषि परिवार है। गांव के अन्य परिवार आजीविका के लिए गैर-कृषि कार्यों पर निर्भर हैं। स्पष्ट तौर पर कहें तो खेती में 17 प्रतिशत की कमी आई है, लेकिन जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन और जल संकट बढ़ेगा खेती के लिए समस्या बढ़ती जाएंगी।

हाल ही में हिंदू कुश हिमालय पर हुए एक शोध में बताया गया कि हिमालय तेजी से पिघल रहा है। जिससे भारत सहित आठ देशों पर संकट गहरा सकता है। इससे न केवल लोगों के सामने पीने के पानी की समस्या होगी, बल्कि प्राकृतिक स्रोतों के सूखने से नदियों के प्रवाह में भी कमी आएगी। वहीं दूसरी तरफ भूमिगत जल भी लगातार कम होता जा रहा है। ऐसे में खेती के लिए चुनौतियों खड़ी हो सकती हैं। शोध में शामिल सेडार (CEDAR) के एक्जीक्यूटिक डायरेक्टर विशाल सिहं ने बताया कि ‘‘खेती जलवायु पर निर्भर करती है, इसलिए जलवायु परिवर्तन के कारण पूरे देश में खेती पर प्रभाव पड़ रहा है। हिमालय का क्षेत्र ‘रेन-फेड’ क्षेत्र है, यहां पहले से ही जमीन खेती के लिए अच्छी नहीं रही है। ऐसे में समस्या पहले से ही थी, जो अब और गहराएगी, क्योंकि बारिश का पैटर्न बदल रहा है। कभी अतिवृष्टि हो रही है, तो कभी लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है। यहां हमें खेती को जलवायु के अनुरूप ही बदलना होगा। इसके लिए कृषि विशेषज्ञों को लाना पड़ेगा।’’

गहराते जल संकट के बीच खेती का संकट केवल किसी एक राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए है। इसका सीधा प्रभाव लोगों की आजीविका और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। ऐसे में जलवायु परिवर्तन को रोकने के उपाये सख्ती से करने होंगे। पानी के संरक्षण के लिए खेतों में ही वर्षा जल संग्रहण करना होगा। फसलों को बदलती जलवायु के अनुरूप ही लगाएं। यदि ऐसा समय रहते नहीं किया गया तो अभी देश केवल जल संकट से जूझ रहा है। निकट भविष्य में भोजन का संकट भी गहरा सकता है।


हिमांशु भट्ट (8057170025)

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