जल संरक्षण एवं संवर्धन

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Source
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जनवरी 2012

जल ही जीवन है : पानी की हर एक बूँद अमूल्य है!


.सम्पूर्ण जगत में जल का अद्वितीय महत्त्व है। जल का स्थान सजीवों के जीवन में वायु के समान है। हिन्दू धर्म शास्त्रों (Hindu Mythology) में पानी, मनुष्य की काया के आधार पंच तत्वों (आकाश, वायु, अग्नि, पृथ्वी, पानी) में सम्मिलित है। दुनिया की सभी प्राचीन सभ्यताएँ नदियों के किनारे ही विकसित हुई हैं, जैसे कि- मिस्र की सभ्यता (Egypt Civilizations) जोकि संसार की सबसे पुरानी मानव सभ्यता मानी जाती है। वह संसार की सबसे बड़ी नदी ‘नील नदी’ के किनारे विकसित हुई थी। अन्य सभ्यताएँ हड़प्पा सभ्यता, सिंधु नदी के तट पर व चीनी सभ्यता हृांगहो नदी के तट पर विकसित हुई थी।

जल सभी जीव-जन्तुओं की जीवन रेखा है। इस कथन का ऐतिहासिक सत्यापन प्राचीन मानव सभ्यताएँ करती हैं। परन्तु यह निराशाजनक सत्य है कि पृथ्वी का तीन- चौथाई भाग जल मनुष्य की पेयजल व घरेलू उपयोग सम्बन्धी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा है। जिन ऐतिहासिक व महत्त्वपूर्ण नदियों के किनारे प्राचीन सभ्यताएँ विकसित हुई थी सभी प्रदूषण की मार झेल रही हैं। नदियों का 70 प्रतिशत जल प्रदूषित हो चुका है। सागरों का खारा पानी पीने योग्य नहीं हैं। नदियों की भाँति प्राकृतिक झीलों में भी शहरों व औद्योगिक क्षेत्रों का कचरा बहाया जा रहा है। भूगर्भ जल जो कि सर्वाधिक सुरक्षित माना जाता है रसायनों व उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग के कारण प्रदूषित हो रहा है। दिल्ली व कानपुर जैसे ज्यादा आबादी और बड़े औद्योगिक शहरों में भूगर्भ जल से दुर्गंध आती है जोकि पेयजल (Potable Water) के त्रिगुण (स्वादहीन, रंगहीन, गंधहीन) का पालन नहीं कर रहा है।

बुन्देलखण्ड जैसा क्षेत्र वर्षों से पानी की कमीं की मार झेल रहा है। महिलाओं को पीने का पानी लाने के लिये कोसों दूर पैदल जाना पड़ता है। वहाँ पर यह कहावत प्रचलित है: ‘भड़िया न फूटे, चाहे खसम मरि जाए।’

सूखी व बंजर जमीन होने के कारण उपज बहुत कम होती है और परिवार का ठीक से खर्च न चला पाने व महाजनों-सूदखोरों का कर्ज न अदा कर पाने के कारण सैकड़ों किसान आत्मदाह कर चुके हैं। इसी क्षेत्र में भूगर्भ जल स्तर बहुत नीचे खिसक गया है व जलभरों के खाली हो जाने के कारण वहाँ की जमीन धँस रही है। यह आपदा का संकेत है।

शहरों व ग्रामीण दोनो क्षेत्रों में झोपड़पट्टी वाले इलाकों में सरकारी नलों से पानी भरने के लिये लम्बी कतारें लगानी पड़ती हैं और पानी भरने के लिये काफी लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं।

प्रशांत महासागर के कई द्वीपों के लोगों को पीने व घरेलू उपयोग के लिये पानी डीजल-पेट्रोल की भाँति खरीदना पड़ता है। इससे हम समझ सकते हैं कि भविष्य में कैसी-कैसी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

गंगा नदी का भारतीय उपमहाद्वीप में ऐतिहासिक, भौगोलिक, धार्मिक व औद्योगिक रूप से बहुत महत्त्व है। लेकिन शहरों में पानी की अत्यधिक आपूर्ति व औद्योगिक, सीवर व घरेलू कचरे को नदी में प्रवाहित करने से नदी तेजी से प्रदूषित हो रही है। इससे नदी के तट पर बसी बस्तियों में महामारियाँ फैलती रहती है। कानपुर का जाजमऊ क्षेत्र जोकि गंगा नदी के तट पर स्थित है, उसके लोग, बच्चे जलजनित बीमारियों के शिकार होते रहते हैं।

वर्तमान समय में कई अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ जैसे-संयुक्त राष्ट्र (United Nations), विश्व बैंक (World Bank) और भारत सरकार (Government of India) कई बड़े कार्यक्रमों को आयोजित करके कार्यनीतियाँ व कानून बनाकर जल संरक्षण के लिये कदम उठा रही हैं। विश्व जल दिवस, जल सप्ताह, जल वर्ष व जल दशक आदि समय-समय पर घोषित किये जाते हैं जिससे लोग जल संरक्षण के प्रति प्रेरित हो सकें। जल संरक्षण के लिये कई योजनाएँ भी चलाई जाती हैं।

जल बर्बादी

विश्व जल दिवस (World Water Day)


ब्राजील के शहर रियो डि जेनेरो में संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में वर्ष 1992 में आयोजित ‘संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण व विकास सम्मेलन (United Nations Conference of Environment and Development) में ‘22 मार्च’ को विश्व जल दिवस घोषित किया गया।

विश्व जल सप्ताह (World Water Week)


प्रतिवर्ष 5 सितम्बर से 11 सितम्बर तक विश्व जल सप्ताह मनाया जाता है। इसका आयोजन ‘स्टाॅकहोम अन्तरराष्ट्रीय जल संस्थान (SIWI)’ के तत्त्वावधान में होता है।

विश्व जल वर्ष (World Water Year)


संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2003 को ‘अन्तरराष्ट्रीय मृदु जल वर्ष (International Soft Water Year)’ घोषित किया गया था।

विश्व जल दशक (World Water Decade)


वर्ष 1981-90 की अवधि: वैश्विक जल संकट से निजात पाने के लिये संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1981-90 की अवधि को ‘अन्तरराष्ट्रीय पेयजल आपूर्ति एवं स्वच्छता दशक (International Water Supply & Sanitation Decade)’ मनाने की घोषणा की थी। इसका लक्ष्य था कि दशक समाप्त होने तक सम्पूर्ण विश्व के नागरिकों को पेयजल उपलब्ध कराया जा सके।

वर्ष 2005-15 की अवधि:
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसम्बर 2003 के अपने 58वें अधिवेशन में वर्ष 2005-15 की अवधि को ‘‘अन्तरराष्ट्रीय कार्य दशक: जीवन के लिये जल (International Decade for Action : Water for life)’’ घोषित किया।

राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (National River Conservation Plan):


गंगा कार्य योजना के क्रियाकलापों का पहला चरण वर्ष 1985 में आरम्भ किया गया एवं इसे 31 मार्च 2000 को बंद किया गया। राष्ट्रीय नदी संरक्षण प्राधिकरण की कार्यवाही समिति ने गंगा कार्य योजना के प्रथम चरण की समीक्षा की तथा गंगा कार्य योजना के प्रथम चरण से प्राप्त अनुभवों के आधार पर आवश्यक सुझाव दिए। इस कार्य योजना को देश की प्रमुख प्रदूषित नदियों में राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अन्तर्गत लागू किया गया है।

गंगा कार्य योजना के दूसरे चरण को राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के अन्तर्गत शामिल किया गया है। विस्तृत राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना में अब 16 राज्यों की 27 नदियों के किनारे बसे 152 जिले शामिल हैं। इस कार्य योजना के तहत 57 जिलों में प्रदूषण को कम करने के लिये कार्य किया जा रहा है। प्रदूषण को कम करने वाली कुल 215 योजनाओं को स्वीकृति दी गई है। अभी तक 69 योजनाएँ इस कार्य योजना के तहत पूरी हो चुकी है। इसके अन्तर्गत लाखों लीटर प्रदूषित जल को रोककर उसकी दिशा में परिवर्तन करके परिष्करण करने का लक्ष्य रखा गया है।

गंगा नदी सफाई प्राधिकरण (Ganga River Cleaning Authority) को विश्व बैंक ने गंगा नदी की सफाई के लिये अरबों डाॅलर ऋण मुहैया कराया है। इसके अलावा अनेक स्वयं सेवक समूह भी इस कार्य में तन्मयता से लगे हैं।

आर्ट आॅफ लिविंग (Art of Living) के संस्थापक आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर के नेतृत्व में कुछ छात्रों और स्वयं सेवकों ने भी इस कार्य में प्रगति शुरू कर दी है।

नदी जल संरक्षण योजना को मद्देनजर रखते हुए गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी (National River) घोषित किया गया है।

भारत के संविधान (Constitution of India) के भाग चार ‘क’ के अन्तर्गत अनुच्छेद-51 ‘क’ के मौलिक कर्तव्यों (Fundamental Duties) में यह प्रावधान है कि नागरिकों का कर्तव्य है कि प्राकृतिक पर्यावरण की जिसके अन्तर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा प्राणीमात्र के प्रति दया भाव रखें। अतः किसी भी नदी या झील को प्रदूषित करना संविधान का हनन करना है। राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त के कथनानुसार ‘अपने अधिकारों की चाह रखने वालों पहले अपने कर्तव्यों का पालन करो।’ इसका आशय है कि टेनरी या फैक्ट्री मालिक समय-समय पर अपने फायदे के लिये अधिकारों के अनुसार माँग तो करते हैं परन्तु अपने कर्तव्यों का ध्यान नहीं रखते हैं। वे नदियों में औद्योगिक कचरा बिना उपचारित किए हुए प्रवाहित करते हैं।

जल संरक्षण (Water Conservation) के लिये कुछ मौलिक सुझाव निम्नांकित हैं:-
s_h05_210131751. शहरों केे औद्योगिक व घरेलू कचरे को नालों के माध्यम से नदियों में बिना उपचार किए प्रवाहित किया जाता है। इससे नदियाँ प्रदूषित होती हैं और नदी तट पर स्थित बस्तियों में विभिन्न बीमारियाँ जन्म लेती हैं। इसलिये नालों के पानी को अपशिष्ट जल उपचार संयन्त्र (Waste Water Treatment Plant ‘WWTP’) द्वारा उपचारित करके नदियों में प्रवाहित करना चाहिए। इस तरीके से उपचारित करने में दो फायदे होते हैं। पहला तो जल उपचारित होगा और दूसरा उससे प्राप्त अपशिष्ट पदार्थ के उपयोग से बिजली बनाने में सहायता मिलेगी।

2. वर्षाजल सर्वाधिक शुद्ध जल माना जाता है। विभिन्न विधियों से एकत्र करके घरेलू कार्यों हेतु उस जल का उपयोग कर सकते हैं। छतों में बारिश के पानी को एकत्र करके सीधे घरों के नीचे बनी टंकियों में एकत्रित कर सकते हैं। वर्षाजल को एकत्रित करने की इस विधि को वर्षा जल संचयन (Rain Water Harvesting) कहते हैं। इस जल का उपयोग घरेलू कार्यों में कर सकते हैं अन्यथा फिल्टर करके उसका उपयोग पीने के लिये कर सकते हैं।

3. वर्षा जल संग्रहण की एक अनूठी विधि राजस्थान के जैसलमेर और बाड़मेर जैसे इलाकों में राजपूत काल से उपयोग में लाई जा रही है। रेगिस्तानी क्षेत्र होने के कारण क्षेत्र में पानी की अत्यधिक कमी रहती है। परन्तु वहाँ पर वर्षाजल को कृत्रिम तालाबों में इकट्ठा किया जाता है। तालाब के तल पर पत्थरों को डाल दिया जाता है। ताकि पानी गंदा न हो। वहाँ लोग इतना जल एकत्रित कर लेते हैं कि अगर दो वर्षों तक वर्षा नहीं होगी तो भी पानी की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। ऐसा तरीका जल की कमी की समस्या का सामना कर रहे क्षेत्रों के लिये वरदान साबित हो सकता है।

4. ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षाजल अधिकांशतः इधर-उधर बह जाता है। अगर वहाँ पर तालाबों को खोदकर उसकी तलहटी पर ‘चारकोल, लकड़ी का कोयला व चूना’ को डाल देते हैं और वहाँ पर वर्षाजल को एकत्र करते हैं। ऐसे में जो जल रिसेगा वह फिल्टर होकर भूगर्भ पर जाएगा। चूँकि चारकोल, लकड़ी का कोयला व चूना प्राकृतिक फिल्टर का कार्य करते हैं। ऐसे में भूगर्भ जल के गिरते हुए स्तर को ऊपर उठाने में मदद मिल सकती है।

5. वर्तमान समय में ग्रामीण क्षेत्रों में लोग घरेलू उपयोग हेतु जल प्राप्त करने के लिये बोरिंग करवा रहे हैं। इस तरीके से भूगर्भ जल की अनुचित खपत होती है और लोग अनुचित उपयोग भी करते हैं। इससे भविष्य में जल की कमी का सामना करने के आसार प्रबल होते हैं। अगर ग्रामीण क्षेत्रों में भी शहरी क्षेत्रों की भाँति पानी की टंकियों का निर्माण किया जाए और उससे घरों में नियमित रूप से पानी की आपूर्ति की जाए तो ग्रामीणों द्वारा जल के होने वाले अनुचित दोहन को रोका जा सकता है क्योंकि सबमर्सिबल पम्प लगवाने में 40-50 हजार रुपए तक का खर्च आता है। परन्तु टंकी वाले पानी के उपयोग में अपेक्षाकृत बहुत कम खर्च आता है।

6. भारत में अधिकांशतः भागों में विशेष कर उत्तरी भारत में सिंचाई के लिये ट्यूबवेल या सबमर्सिबल पम्पसेटों का उपयोग किया जाता है। इससे सिंचाई में बहुत पानी खर्च होता है। अब किसान सिंचाई के लिये अत्याधुनिक तरीकों जैसे- ड्रिप सिस्टम व स्प्रिंकलर सिस्टम का उपयोग कर सकते हैं। इससे पानी की खपत अपेक्षाकृत बहुत कम होती है।

ड्रिप सिस्टम व स्प्रिंकलर सिस्टम को स्थापित करना काफी खर्चीला होता है। जोकि छोटे व मध्यमवर्गीय किसानों के वश की बात नहीं है। अतः सरकार को इन तौर-तरीकों को अधिक प्रचलन में लाने के लिये किसानों को आर्थिक रूप से सहायता देनी चाहिए।

7. हाइड्रोजन गैस (H2) का ऊष्मीय मान 150 जूल/ग्राम होता है जोकि अन्य ईंधनों जैसे कोयला, पेट्रोल या डीजल की अपेक्षा बहुत अधिक होता है। यदि रेलगाड़ियों या अन्य वाहनों को चलाने के लिये हाइड्रोजन गैस का उपयोग हो तो कम ईंधन की खपत होगी व जब हाइड्रोजन गैस के कण उपयोग होने के बाद बाहर निकलेंगे तो वह आॅक्सीजन गैस (02) के साथ मिलकर जल (H2O) बनाएँगे जिससे सड़कों व रेल की पटरियों के आस-पास नमी आएगी व भूमि में अधिक जल का रिसाव होगा।

8. टेनरियों व कारखानों से निकलने वाले औद्योगिक कचरे को नदियों में बहाया जाता है। चाहे जितने भी कानून बना लिये जाए परन्तु फैक्ट्रियाँ कचरे को उपचारित करके नहीं प्रवाहित करती हैं। अतः सरकार को फैक्ट्रियों को उत्पादन प्रमाण-पत्र देने से पूर्व इस बात को अच्छी तरीके से देख लेना चाहिए कि फैक्ट्री में ‘अपशिष्ट जल उपचार संयन्त्र’ को स्थापित किया गया है व वार्षिक रूप से उपचार संयन्त्र का निरीक्षण भी करना चाहिए।

9. वर्तमान समय में देश भर में ‘महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी योजना (मनरेगा)’ के तहत तालाबों की खुदाई करवाई जा रही है। इन तालाबों को पक्का करवाकर वर्षाजल को संग्रहित करना चाहिए। जिसका उपयोग कृषक लोग पशु-पालन व अन्य कई प्रयोजनों में कर सकें या फिर उन तालाबों में ‘चारकोल, लकड़ी का कोयला व चूना’ को डलवा देना चाहिये जिससे पानी आसानी से रिसकर भूगर्भ में चला जाए।

10. ‘पर्यावरण का विष’ कहलाने वाले यूकेलिप्टिस वृक्ष का उपयोग हम अपना पर्यावरण बचाने व जल संरक्षण के लिये अमृत के रूप में कर सकते हैं। चूँकि यूकेलिप्टिस वृक्ष अपशिष्ट जल को बहुत तेजी से अवशोषित करता है अतः इन वृक्षों को गंदे नालों व उपचार संयन्त्र के आस-पास रोपित करना चाहिए।

ग्लोबल वार्मिंग थर्मामीटर11. मनुष्य जीवन में रोजाना उपयोग में प्रयुक्त पाॅलीथीन में कुछ ऐसे रसायन होते हैं जिनसे नदियों में रहने वाले जीव जैसे- डाॅल्फिन, घड़ियाल आदि का जीवन प्रभावित होता है। अतः सरकार को जल संरक्षण के साथ ही जैवविविधता (Biodiversity) को बचाए रखने के लिये पाॅलीथीन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना चाहिए।

12. अगर हर व्यक्ति नहाने के लिये शाॅवर (Shower) का उपयोग करें तो पूरा बदन भिगोने के लिये ज्यादा से ज्यादा दो-तीन लीटर पानी की जरूरत पड़ेगी। जोकि बाल्टी-मग या टैप (Tap) के नीचे बैठकर नहाने की तुलना में बहुत कम पानी की खपत है।

13. सभी व्यक्तियों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह जल संरक्षण में अपना योगदान दे। अतः व्यक्ति एक सप्ताह में कम-से-कम एक दिन बिना साबुन का उपयोग किए नहाने की आदत डाले जिससे पानी का उपयोग भी कम होगा व पानी गंदा भी नहीं होगा।

14. लोग अपने घर के आस-पास के मैदान या खाली पड़ी जमीन में किचन गार्डेन लगाते हैं। इसके लिये लोग सिंचाई में शुद्ध जल का उपयोग करते हैं। यदि किचन में जो सब्जी व खाद्यान्न धुलने में पानी उपयोग होता है उसका पुनः प्रयोग करके पानी का संरक्षित ढंग से उपयोग कर सकते हैं। चूँकि बगीचे के प्रत्येक गमले में यदि एक मग पानी डाला जाता है तो एक या दो बाल्टी शुद्ध पानी खर्च हो जाता है। लगभग इतना ही पानी किचन उपयोग या घरेलू सफाई के बाद बचता है। इसे डालकर हम जल संरक्षण में अपना योगदान दे सकते हैं।

आज यदि हम नदियों, झीलों सहित जल संसाधनों के संकटों से आहट नहीं है तो साफ है कि कहीं-न-कहीं हम अपनी मानवीय संवेदनाएँ खो चुके हैं व अपने पाँव पर अपने आप कुल्हाड़ी भी मार रहे हैं।

जल संरक्षण
‘‘जल है हमारी भू सम्पदा
जल ही बचाता जीवन सर्वदा।
आपो वै सर्वदेवता।”


सम्पर्क : शिवम उत्तम
जवाहर नवोदय विद्यालय सरसौल, कानपुर नगर (उ.प्र.), पिन- 209402, ईमेल -sruttam175996@gmail.com

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