जल स्रोतों को तबाह करती जीवन शैली

Submitted by Hindi on Fri, 05/13/2016 - 09:00
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डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट, 13 मई, 2016

बर्बाद होते भूजलपानी के संकट से लगभग पूरा देश जूझ रहा है। अगर पानी को संरक्षित नहीं किया गया तो इसके लिये युद्ध करना पड़ेगा। पानी को बचाना, हम सबकी जिम्मेदारी है। इसके लिये सभी को आगे आना होगा। एक समय हमारा देश पानी के मामले में सबसे ज्यादा धनी था। जब यहाँ राजसत्ता थी तो कुँआ और पोखर खुदवाकर लोगों की जल समस्या का निदान किया जाता था। जिससे पशु-पक्षी की प्यास तो बुझती ही थी, साथ में कृषि के लिये बहुत उपयोगी होता था। लेकिन विकास की अंधी दौड़ ने तालाबों, नहरों व पोखरों को पाटकर आलीशान इमारातों में तब्दील कर दिया। जिससे पानी के स्रोत लगभग सूखते चले गए। बचे-खुचे पानी भी सूखने की कगार पर है। गाँवों में भी तालाबों पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया। कुएँ सूखते चले जा रहे हैं। लोगों ने हैंडपंप व सब्मर्सिबल पंप का सहारा लेना शुरू कर दिया है। ज्यादा से ज्यादा लोग सुविधाभोगी होते जा रहे हैं।

पाताल के कलेजे से उसके जीवन स्रोतों को भी धीरे-धीरे छीनते जा रहे हैं। किसी वक्त इलाके में तालाब व कुँआ बनवाना स्टेटस सिंबल होता था। हजारों की संख्या में कुएँ होते थे। हर गाँव में चार-पाँच की संख्या में पोखर और तालाब भी भारी मात्रा में होते थे। लेकिन देखरेख के अभाव में कुएँ व तालाब दोनों समाप्त होते चले गए। जितना भी सूखे का प्रभाव बढ़ा है, वह जलदोहन का ही उदाहरण है। पानी के आधुनिक संसाधनों ने कुँओं व तालाबों को निगल लिया है। पहले सिंचाई के लिये हर गाँव में व्यवस्था होती थी और बरसात के मौसम में इकट्ठा जल को करीन व ढौंस के माध्यम से खेतों में ले जाया जाता था। लेकिन पंपसेट व बोरिंग के कारण बाद में तालाब व कुँओं पर निर्भरता कम होती गई और भूगर्भीय जल का दोहन अधिक होने लगा। उपेक्षा के कारण तालाबों का क्षेत्रफल भी सिकुड़ा है।

गाँवों में घूमते वक्त आपको बीच में जर्जर जाठ वाले कई सूखे तालाब आराम से दिख जाएँगे। इनमें पानी नहीं होता तथा ये मवेशियों का चारागाह बन कर रह गए हैं। तालाब निर्माण प्रतिष्ठा का बिंदु माना जाता था और गाँवों में पोखर यज्ञ करवाने की हसरत रखने वाले हजारों लोग आज भी मिल जाएँगे। कुएँ लगभग समाप्त हो गए हैं। यहाँ तक कि शादी विवाह के अवसर पर कूप पूजन के लिये भी गंदे व बंद कुँओं का ही आसरा रहता है। वैज्ञानिकों की मानें तो जब पानी का अत्यधिक दोहन होता है, तब जमीन के अंदर के पानी का उत्प्लावन बल कम होने या खत्म होने पर जमीन धंस जाती है और उसमें दरारें पड़ जाती हैं। इसे उसी स्थिति में रोका जा सकता है, जब भूजल के उत्प्लावन बल को बरकरार रखा जाए।

पानी समुचित मात्रा में रिचार्ज होता रहे। यह तभी सम्भव है, जब ग्रामीण-शहरी दोनों जगह पानी का दोहन नियंत्रित हो। विश्व बैंक की मानें तो भूजल का सर्वाधिक 92 फीसदी उपयोग और सतही जल का 89 फीसदी उपयोग कृषि में होता है। 5 फीसदी भूजल व 2 फीसदी सतही जल उद्योग में, 3 फीसदी भूजल व 9 फीसदी सतही जल घरेलू उपयोग में लाया जाता है। एक जानकारी के अनुसार, 91 जलभंडारों में उनकी कुल क्षमता का केवल 23 प्रतिशत पानी ही जमा है और यह मात्रा भी घटने वाली है, क्योंकि अगले माह गर्मी और भी अधिक पड़ेगी। पिछले 15 सालों से यह समस्या लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारों ने इससे निपटने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है।

देश के आजाद होने के बाद 1951 में प्रति व्यक्ति 5177 घन मीटर पानी उपलब्ध था, लेकिन 2011 में यह घटकर 1545 घन मीटर ही रह गया, क्योंकि तब से अब तक शहरों और महानगरों का जिस अनियोजित और अव्यवस्थित ढंग से विकास हुआ है, उसमें पानी की जरूरत और उसकी उपलब्धता के अनुपात पर ध्यान नहीं दिया गया। सामाजिक विज्ञानी केके जैन ने कहा कि भारत में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता 1000 घन मीटर है, जो 1951 में 3.4 हजार घन मीटर थी। देश में अभी जल भंडार प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति 200 घन मीटर है, जो खपत के लिहाज से चिंता का विषय है। नार्वे में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता 8036 घन मीटर, अमेरिका में 5000 घनमीटर तथा आस्ट्रेलिया में 3223 घनमीटर है। चीन में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता करीब 2000 घन मीटर है। जैन ने कहा कि स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि 1050 में विश्व में प्रति व्यक्ति जल की औसत खपत 1000 घनमीटर प्रति वर्ष थी, जो 1980 में बढ़कर 3600 घनमीटर हो गई। जल क्षेत्र से जुड़ी संस्था सहस्त्रधारा की रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व की नदियों में प्रतिवर्ष बहने वाले 41,000 घन किलो मीटर पानी में से 14,000 घन किलोमीटर का ही उपयोग किया जा सकता है । इस 14,000 घन किलोमीटर में भी 5,000 घन किलोमीटर पानी ऐसे स्थानों से गुजरता है, जहाँ आबादी नहीं है और यदि है भी तो उपयोग करने के लिये पर्याप्त नहीं है।

इस प्रकार केवल 9,000 घन किलोमीटर पानी का ही उपयोग पूरे विश्व की आबादी करती है। वर्षा जल के भंडारण की हमारे देश में कोई व्यवस्था नहीं है और वर्षा जल का बड़ा हिस्सा समुद्र में चला जाता है। पानी की इतनी ज्यादा कमी है कि एक राज्य दूसरे राज्य से पानी उधार ले रहा है। पंजाब का हरियाणा से, आंध्र का तेलंगाना से, तमिलनाडु का केरल और पुड्डुचेरी से पानी समझौता है। जोकि सूखे की स्थिति आने पर विवाद का कारण भी होता है। वह बंटवारे को लेकर एक दूसरे से लड़ने को तैयार रहते हैं। इनमें कई राज्यों के बीच तो नदियों और बांध की भी लड़ाई होती है। पानी का विवाद बहुत पुराना नहीं है। एक प्रकार से कहा जाए कि कोई भी राज्य बिना एक दूसरे की सहायता किसी की प्यास नहीं बुझा सकते हैं। परिस्थितियाँ बहुत गम्भीर हो रही हैं।

पानी की दिनोंदिन कमी से संघर्ष बढ़ रहा है। ऐसे में इनसे निपटने के लिये सरकार और समाज को मिलकर कोई कारगर योजना बनानी होगी। भूजल का स्तर कैसे ऊपर उठे, इसके लिये भी सरकारों को विज्ञान और तकनीकी का सहारा लेकर जरूरी और ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है। गाँवों में वर्षा के पानी के संचयन के लिये तालाबों को खोदे जाने की आवश्यकता है। यह हर ग्रामसभा में करना होगा। तालाबों को जल से भी समृद्ध करना होगा। जल संचयन के लिये चैकडैम व बाँध निर्माण की योजनाओं को और ज्यादा क्रियान्वित करने की आवश्यकता है। तालाबों के क्षेत्र में अतिक्रमण को रोकना होगा। इसमें ज्यादा से ज्यादा वर्षा का पानी जाने देने की जरूरत है। अभी जो पानी के हालात हैं, इनसे निपटने के लिये यदि दीर्घकालिक प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले समय में प्रलय की स्थिति हो सकती है।

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