जलवायु परिवर्तन पर हम कितने तैयार

Submitted by HindiWater on Fri, 02/07/2020 - 10:32
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राजस्थान पत्रिका, 07 फरवरी 2020

वरुण गांधी, लोकसभा सांसद

राजस्थान पत्रिका, 07 फरवरी 2020


ऑस्ट्रेलिया में सूखे के लम्बे दौर के बाद हालिया जंगल की आग के फैलाव ने पूरे महाद्वीप को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। यह आग स्थानीय वनस्पतियों और जीवों के लिए तबाही बन गई, जिसमें तकरीबन 50 करोड़ जीव खत्म हो गए हैं। इसी समय, तिमोर सागर के दूसरे किनारे पर इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में बेमौसम बारिश के कारण आई बाढ़ से हजारों लोग विस्थापित हो गए। अपने देस की बात करें तो दिल्ली में वर्ष 1959 और 1968 के बीच, अपेक्षाकृत हल्की गर्मी हुआ करती थी। भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक उस दशक में करीब 1,350 दिन तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहा था। इसी तरह मुम्बई में ऐसी गर्मी सिर्फ 113 दिन पड़ी थी, जबकि इसी दशक में बंगलुरु में ऐसे 249 दिन थे।

वर्ष 2018 में भारत में मौसमी अतिरेक के कारण करीब 2,081 मौतें हुई और 37.8 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान (2017 की तुलना में करीब तीन गुना) उठाना पड़ा। 2018 में उत्तर और पश्चिम भारत में नियमित रूप से चलने वाले लू के थपेड़ों के साथ ही उष्णकटिबंधीय तूफानों गज और तितली के चलते केरल में भारी बारिश हुई। खासकर समुद्रीतटीय शहरों की बाढ़ एक बड़ा जोखिम हैं, जिससे वर्ष 2050 तक तटीय शहरों को सालाना एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक का नुकसान पहुंचने की सम्भावना है। इन सबके बीच क्लाइमेट सेंट्रल की 2019 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में मुम्बई जैसे शहरों (लोअर परेल ,कोलाबा इलाके), कोलकाता (लगभग पूरा) सूरत और काकीनाड़ा जैसे शहरों के वर्ष 2050 तक पानी के नीचे आ जाने का खतरा है। इधर, देश के अदरूनी शहरों के भी बचे रहने की सम्भावना संदिग्ध है।

भारत के नीति निर्माताओं को देश के शहरों की जलवायु और भौगोलिक विविधता को समझने की जरूरत है। यहाँ 10 लाख से ऊपर की आबादी वाले कम से कम 50 शहर हैं। इनमें से कई (जैसे कि चेन्नई, मुम्बई) समुद्र या नदी के पास होने के चलते जलवायु परिवर्तन के प्रति काफी संवेदनशील है। इसके बावजूद, हाल के दिनों तक शहर के प्लानिंग एंजेडा में जलवायु परिवर्तन से मुकाबले के स्थाई उपायों का अभाव ही दिखता है। मुम्बई, सूरत और कोलकाता में अपशिष्ट-प्रबंधन की एक श्रृंखला की शुरुआत की गई है। सरकार का स्मार्ट सिटी प्लान जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने की दिशा में एक स्वागत योग्य शुरुआती कदम है। इसी तरह, इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान का मकसद 2038 तक कूलिंग डिमांड को 25 फीसद और रेफिजरेंट की डिमांड को 25-30 फीसद तक कम करना है। कई शहरों ने अन्तरराष्ट्रीय सहयोग (जैसे पुणे और जर्मन शहर ब्रेमेन की बायोगैसे और अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी परियोजनाओं पर साझेदारी) की पहल की है।

हालांकि इस तरह की पारस्परिक सहयोग की योजनाओं के लिए राज्य और केन्द्र सरकार की मंजूरी और वित्तीय सहायता पर निर्भर रहना पड़ता है। किसी शहरी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए उठाए गए किसी भी कदम के लिए जरूरी है कि इसे स्थानीय स्तर पर तैयार और लागू किया जाए। इसे सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय स्तर पर सशक्तिकरण के साथ-साथ हमारे शहरी विकास के दृष्टिकोण में बदलाव की जरूरत होगी, जो कि उन नीतियों के साथ होगा जो शहर के स्तर पर विशिष्ट जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाली चुनौतियों का सामना कर सकती है।

हमारे शहरी विकास के नजरिए को बदलने की जरूरत है, असंतुलन दुरुस्त करते हुए विकास सर्वोपरि के दृष्टिकोण के साथ। हमें परस्पर लाभ के दृष्टिकोण को अपनाने की जरूरत है, जो दोनों पक्षों को लाभ की बात करता हो, जो विभिन्न पॉलिसी एजेंडे के बीच टकराव को करने में मदद कर सकता है। इस तरह के नजरिए से बेहद ऊर्जा प्राप्ति, अपशिष्ट प्रबंधन, स्वच्छ हवा और रोजगार सूजन हो सकता है। एक अध्ययन में पाया गया कि कोलकाता करीब 4 साल की पे-बैक अवधि का निवेश करके 2025 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को आसानी से 21 फसदी (परिवहन घरेलू आदि क्षेत्रों में) तक कम कर सकता है। इस निवेश से हुई आय को पुनर्निवेश करने से शहर के लिए कार्बन उत्सर्जन में और कमी आएगी।

जलवायु परिवर्तन को लेकर भारत की राष्ट्रीय कार्ययोजना (2008) इस दृष्टिकोण को एकीकृत रूप में पेश करती है। हालांकि, इसको जमीनी स्तर पर हकीकत में उतारने के लिए खास उपायों की जरूरत होगी। खासतौर पर, ऐसी परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए एक अधिकार सम्पन्न उपक्रम (जैसे दिल्ली मेट्रो के मामले में किया गया) बनाने से सरकार में सभी स्तरों और हितधारकों के बीच समन्वय सुगम  बनाने में मदद मिल सकती है। हमारे शहरों को स्थानीय स्तर पर पेश आने वाली किसी चुनौती का सामना करने में, जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार नहीं दिया गया है। 73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992 में पारित)  नगर निकास के स्तर पर अधिक स्थानीय शासन शक्तियों को जन्म दिया, इसने आर्थिक विकास को दिशा देते हुए शहरों को राजस्व जुटाने में सक्षम बनाया। हालांकि, एक विषय के रूप में शहरी विकास अभी भी राज्य का विषय है, जबकि क्रियान्वयन स्थानीय निकाय में निहित है, जिस कारण एक औसत भारतीय शहर के स्थानीय निकाय की राजकोषीय दशा आमतौर पर कमजोर ही रहती है।

हमारे शहरों को प्राथमिकता के आधार पर जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए योजना बनाने और पहल करने की जरूरत है। पानी सोखने वाली मिट्टी पर शहर बसाने प्राकृतिक बाढ़ के मैदानों (जैसे कि चेन्नई में हुआ) में निर्माण को रोकना होगा। खासकर मुम्बई को तटीय मैंग्रोव को बहाल करते हुए, अपनी सीवेज और ड्रेनेज क्षमता में सुधार करने की जरूरत है। शहरी तैयारियों में हीट-वेव्स जैसी घटनाओं को लेकर योजना बनाने की जरूरत है। यह अब सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गई है। स्थानीय निकायों को श्रम, पेयजल और बिजली विभाग के साथ समन्वय करने की जरूरत है।

जलवायु परिवर्तन के असर से भारत के सभी क्षेत्रों में शहरी परिदृश्य प्रभावित होंगे। वर्ष 2065 तक भारत की आबादी 1.7 अरब हो जाएगी और इसका अधिकांश हिस्सा शहरी होगा, उस समय रहने योग्य शहरों के लिए ‘विकास सर्वोपरि’ के एजेंडे को पूरा करना मुश्किल होगा। जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए किया गया सही निवेश हमारे शहरों की सहनशक्ति बढ़ाने में मदद करेगा, जिससे उन्हें मौसम की मार से पानी की आपूर्ति में कमी होने या हीटवेव चलने पर हालात से निपटने में मदद मिलेगी। हमारे शहरों के लिए व्यवस्थागत सहारे के साथ स्थानीय निकाय स्तर पर नीचे की ओर से सशक्तिकरण, भारत को जलवायु परिवर्तन से पेश शहरी जोखिमों का सामना करने में मददगार हो सकता है। समय रहते तैयारी और उपाय कर लेने से हम भविष्य में सामने आने वाले पर्यावरणीय महासंकट से बच सकते हैं।

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