जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए राष्ट्रीय पहल

Submitted by Hindi on Tue, 08/07/2012 - 11:43
Source
राष्ट्रीय सहारा ईपेपर (हस्तक्षेप), 10 जुलाई 2012

जलवायु परिवर्तन से होने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए सभी किसानों को तैयार करना और अलग-अलग तरीकों से उनमें जागरुकता लाना इस परियोजना का लक्ष्य है। हालांकि, इन तरीकों को उपयोग में लाने से पहले कृषि पर विचार-विमर्श और एक विश्वसनीय मौसम पूर्वानुमान जरूरी है। यह भी एक सच है कि इन रणनीतियों के अभाव में मौसम के बदलाव का प्रभाव गरीबों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा पर बड़ा संकट बनकर मंडरा सकता है।

भारत सरीखा देश, जिसका शुमार उन दक्षिण एशियाई देशों के समूह में है, जिसकी अर्थव्यवस्था मूल रूप से कृषि पर टिकी हुई है, उसमें मौसम की छोटी सी हरकत भी किसानों की खेती पर विपरीत असर डाल सकती है। मूसलाधार बारिश हो या अत्यधिक तापमान या फिर बारिश की घटनाओं में अंतर ही क्यों न हो, इन छोटे-बड़े बदलाव फसलों और किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। हर साल देश का कोई न कोई राज्य सूखा, बाढ़, चक्रवात, मूसलधार बारिश, ठंड और अन्य मौसमी घटनाओं से प्रभावित होता है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की चौथी रिपोर्ट के अनुसार, भारत दक्षिण एशिया के सबसे कमजोर देश के रूप में वर्गीकृत है, वजह- मौसम की बिगड़ती स्थिति। हालांकि, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को दुनिया भर में देखा जा रहा है लेकिन भारत जैसे देशों की कृषि और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता ज्यादा है, जिस वजह से देश की स्थिति खेत-खलिहानों के लिहाज से ज्यादा कमजोर नजर आ रही है।

भारत की वार्मिंग प्रवृत्ति ने तापमान के बढ़ते पारे को देखते हुए खतरे के संकेत दे दिए हैं। इसका सीधा असर फसलों की उपज और खाद्य सुरक्षा पर पड़ रहा है। यूं तो बढ़े हुए तापमान और बरसात के दिनों में आई कमी की वजह से भारत के कुछ हिस्सों में गेहूं और धान की पैदावार पर नकारात्मक प्रभावों के सबूत पहले से ही मौजूद हैं। लेकिन सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि आने वाले समय में मौसम के बदलाव से खेती पर क्या प्रभाव पड़ सकते हैं। 2010 से 2039 के बीच मौसम के बदलाव के कारण कृषि उपज में 9 प्रतिशत तक कमी की संभावना है, जिससे जीडीपी में हर साल लगभग 15 प्रतिशत की कमी संभावित है। अगर यही हाल रहा तो खरीफ के मौसम (जुलाई-अक्टूबर) में और रबी के मौसम में (नवंबर-मार्च) के दौरान तापमान में बढ़त से फसलों को खासा नुकसान पहुंचना लाजमी है। इतना ही नहीं, 2080 से 2100 के बीच फसल उत्पादकता में 10-40 प्रतिशत कमी की संभावना के साथ ही तापमान में बढ़ोतरी से धान और गेहूं की पैदावार में कमी भी संभावित है। इसके विपरीत सर्दी में तापमान की गिरावट से गेहूं की उपज में भी कमी देखी जा सकती है।

निक्रा : भारतीय कृषि में सुधार की उम्मीद


इन स्थितियों पर काबू पाने के लिए एक नई पहल के तौर पर भारतीय कृषि में सुधार लाने के उद्देश्य से अनुसंधान और प्रौद्योगिकी को जोड़कर ‘नेशनल इनीशिएटिव फॉर क्लाइमेट रेजिलियेंट एग्रीकल्चर’ (निक्रा) नाम की एक नेटवर्क परियोजना, फरवरी, 2011 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तहत शुरू की गई। परियोजना की पहल, कृषि वैज्ञानिकों की मदद से किसानों को उनकी खेती में सहायता करने के लिहाज से की गई है। भारतीय कृषि में फसल, पशुधन और मात्स्यिकी क्षेत्रों पर केंद्रित यह परियोजना 350 करोड़ रुपए की लागत से लागू की गई है। इस परियोजना की अगुवाई केंद्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, (सीआरआईडीए) हैदराबाद कर रहा है। इसके साथ ही परिषद के सात मुख्य अनुसंधान संस्थान इस परियोजना में एकजुट होकर काम कर रहे हैं। किसानों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए अत्याधुनिक अंतरराष्ट्रीय मानकों की तर्ज पर चुने गए अनुसंधान संस्थानों में विश्वस्तरीय अनुसंधान सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।

परियोजना चार घटकों में विभाजित है, जिसमें सामरिक अनुसंधान, प्रौद्योगिकी प्रदर्शन, क्षमता निर्माण और प्रायोजित प्रतियोगी अनुदान के माध्यम से किसानों की खेती को सरल बनाने की कोशिश की जारी है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत कोशिश यह भी की जा रही है कि गांवों में बीज बैंक और चारा बैंक बनाए जाएं ताकि प्राकृतिक आपदा के समय किसानों को इनका अभाव न झेलना पड़े। खासतौर पर सूखे के समय फसल बर्बाद होने पर किसानों को बीज की कमी की समस्या झेलनी पड़ती है, जिससे अगली फसल लेना मुश्किल हो जाता है। गांवों में मौसम की जानकारी के लिए केंद्र बनाए जाएंगे, जो किसानों को मौसम की अग्रिम जानकारी देते रहेंगे और सलाह भी देगें कि कब और कौन-सी फसल लेने से जोखिम कम से कम होगा। यह काम भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के देश भर में फैले 630 कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से किया जाएगा।

जलवायु परिवर्तन : चुनौतियों से निपटने की तैयारी


निक्रा की इस परियोजना के तहत देश के 27 राज्यों के 100 ऐसे जिले छांटे गए हैं, जहां बदलती जलवायु का कहर सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है। इन जिलों के एक लाख किसानों के खेतों पर वैज्ञानिक तकनीकी प्रदर्शन आयोजित करके उन्हें जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने का व्यावहारिक सबक सिखाएंगे। ये किसान अपने-अपने गांव के लिए जानकारी का स्रोत बनकर इस मिशन को आगे बढ़ाएंगे। इस तरह पूरे देश में कृषि को जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में सक्षम बनाया जाएगा। किसानों के साथ वैज्ञानिकों को भी मौसम के बदलाव से संबंधित अनुसंधान के लिए तैयार किया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन से होने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए सभी किसानों को तैयार करना और अलग-अलग तरीकों से उनमें जागरुकता लाना इस परियोजना का लक्ष्य है। हालांकि, इन तरीकों को उपयोग में लाने से पहले कृषि पर विचार-विमर्श और एक विश्वसनीय मौसम पूर्वानुमान जरूरी है। यह भी एक सच है कि इन रणनीतियों के अभाव में मौसम के बदलाव का प्रभाव गरीबों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा पर बड़ा संकट बनकर मंडरा सकता है।

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