जो बोया सो कट रहा है

Submitted by Hindi on Mon, 05/09/2011 - 15:04
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गांधी-मार्ग मई-जून 2011

पंजाब की खेती किसानी का सबसे बड़ा संकट आज यही है कि वह प्रकृति से अपनी रिश्तेदारी का लिहाज भूल गई है। पवन, पानी और धरती का तालमेल तोड़ने से ढेरों संकट बढ़े हैं। सारा संतुलन अस्त-व्यस्त हुआ है। पंजाब ने पिछले तीन दशकों में पेस्टीसाइड का इतना अधिक इस्तेमाल कर लिया कि पूरी धरती को ही तंदूर बना डाला है।

पंजाब सदियों से कृषि प्रधान राज्य का गौरव पाता रहा है। कभी सप्त सिंधु, कभी पंचनद तथा कभी पंजाब के नाम से इस क्षेत्र को जाना गया है। यह क्षेत्र अपने प्राकृतिक जल स्रोतों, उपजाऊ भूमि और संजीवनी हवाओं के कारण जाना जाता था। प्रकृति का यह खजाना ही यहां हुए हमलों का कारण रहा है। देश के बंटवारे के बाद ढाई दरिया छीने जाने के बावजूद बचे ढाई दरियाओं वाले प्रदेश ने देश के अन्न भंडार को समृद्ध किया है। किसानी का काम किसी भी देश या कौम का मूल काम माना गया है। हमारी परंपराओं में किसान को संसार का संचालन कर्ता माना गया है। यह भी कहा गया कि किसान दूसरे कामों में व्यस्त उन लोगों को भी जीवन देते हैं, जिन्होंने कभी जमीन पर हल नहीं चलाया। यह भी कहा गया है कि जो मात्र अपने ही पेट तक सीमित है, वह पापी है। मात्र स्वयं के पेट का मित्र स्वार्थी और महादोशी है। किसान का काम अपने लिए तो जीविका कमाना है ही, दूसरों के लिए भी रोटी का प्रबंध करना है। वह धरती को अपनी छुअन मात्र से उसके भीतर छिपी सृजन शक्ति को मानव मात्र की जरूरतों के अनुसार जगाता है। बीजाई के संकल्प को गुरुवाणी में बहुत ऊंचा स्थान प्राप्त है। गुरुवाणी में बीजाई को शुभ कारज (कार्य) के साथ-साथ बुनियादी कारज भी कहा गया है। किसानी एक ऐसा काम है जिसकी निर्भरता किसान के आचरण से जुड़ी है। इसलिए गुरुवाणी में यह भी बेहद स्पष्ट किया गया है कि मात्र बीजाई का काम ही यह निश्चित कर देता है कि फल कैसा ऊगेगा- जैसा बीजोगे, वैसा काटोगे।

पंजाब का सारा का सारा आर्थिक और सामाजिक इतिहास खेती-किसानी के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा है। जब-जब यहां की किसानी पर कोई खतरा आया, यहां की अर्थव्यवस्था में भी भारी हलचल, उथल-पुथल पैदा हो जाती है। आर्थिक मंदी के दौर में यहां की किसानी भी बनती-बिगड़ती रही है। ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ ऐसे ही आर्थिक संकट से उपजी लहर थी। घोर संकटों के दौर में भी पंजाब के किसानों ने अपनी खेती को मरजीवड़ों की तरह संभाल कर रखा। ऐसे स्वभाव के पीछे गुरुनानक देवजी की वह चेतना भी थी जिसमें तमाम यात्राओं के बाद करतारपुर में उन्होंने स्वयं खेती की थी। गुरु नानक देवजी ने अध्यात्म की तमाम ऊंचाईयां छूने के बाद तथा अपनी देश-विदेश की तमाम यात्राओं के बाद स्वयं देसी-किसानी को अपनाकर सबसे बड़ा संदेश यही दिया कि ‘किरत (कृषि) करो, नाम जपो और वंड छको (बांटकर खाओ)। उन्होंने कृषि को नाम से भी ऊपर रखा।

ऐसे रुहानी एहसास के इतिहास के कारण ही पंजाब का किसान ब्रह्म बेला में खेतों में जाता रहा और उनके परिवारों की महिलाएं दूध दूहते-दुहते नाम सिमरती रहीं। इसी कारण सदियों तक परमार्थी वातावरण बनता चला गया। रात को थके किसान, बढ़ई, लोहार तथा मजदूर मिलकर ढोलक-चिमटा बजाते और गा-गाकर सारी थकान गुरु चरणों में अर्पित कर देते। खेती के इर्द-गिर्द ही गांव का भाईचारा घूमता। जिस तथाकथित विकास ने गुरुचरणों की रज धूमिल की, उसकी कीमत पंजाब की किसानी को चुकानी पड़ी है।

पिछले तीन दशकों से आर्थिक विकास की एक आंधी चली है। बदले फसल चक्र की आपा-धापी में आए पैसे की हरियाली ने उसे दैवी हरियाली से दूर कर दिया। कृषि विश्वविद्यालय में बैठे मनमर्जी करने वाले बुद्धिजीवियों ने यह भुला ही दिया कि प्रकृति उनसे पहले भी थी और बाद में भी रहेगी। पंजाब के किसान ने ‘हरित क्रांति’ के इस मामूली से सट्टे में खेती किसानी के न केवल सनातन मूल्य गंवाए, बल्कि गुरु बचन भी बिसार दिए।

पंजाब की खेती किसानी का सबसे बड़ा संकट आज यही है कि वह प्रकृति से अपनी रिश्तेदारी का लिहाज भूल गई है। पवन, पानी और धरती का तालमेल तोड़ने से ढेरों संकट बढ़े हैं। सारा संतुलन अस्त-व्यस्त हुआ है। पंजाब ने पिछले तीन दशकों में पेस्टीसाइड का इतना अधिक इस्तेमाल कर लिया कि पूरी धरती को ही तंदूर बना डाला है। विशेषज्ञों ने बड़ी विदेशी कंपनियों संग कागजी हरियाली की सांठ-गांठ करके असली हरियाली को दांव पर लगा दिया। पंजाब के किसान ने इस दांव को सट्टा समझा और थोड़ा अर्थ पाकर परमार्थ गंवा बैठा।

किसान ही एक मात्र ऐसा वैद्य है जो मिट्टी, पानी, हवा और कर्म के सुमेल से इंसान को जीने लायक बनाता है। कारखानों या कम्प्यूटर सेंटरों में सहायक साधन पैदा किए जा सकते हैं, जानकारियां बढ़ाई जा सकती हैं, दुनिया को मुट्ठी में किया जा सकता है। संसार को एक गांव में बदलने का नारा दिया जा सकता है। लेकिन जीवन दान नहीं दिया जा सकता।

ये योजनाएं पंजाब के किसान के पैरों की बेडि़यां बनती चली गईं। फिर नए-नए योजनाकार इन बेडि़यों में और नई योजनाओं की नई बेडि़यां जोड़ते गए। लुधियाना कृषि विश्वविद्यालय की जनवरी-2011 में छपी एक ताजी रिपोर्ट अब इन योजनाओं को बेडि़यां मान तो रही है, पर यह वह भूल गई है कि ये तो अपने ही कुकर्मों का सियापा है। ये योजनाकार अब लिखते हैं कि पंजाब के 40 प्रतिशत छोटे किसान या तो समाप्त हो चुके हैं या अपने ही बिक चुके खेतों में मजदूरी कर रहे हैं। पंजाब के 12644 गांवों में प्रतिवर्ष 10 से 15 परिवार उजड़ रहे हैं। खाली हाथ हो चुके किसान के साथ ऊपर से नीचे तक के अधिकारी कौए या गिद्ध जैसा बर्ताव करते हैं। किताबी कृषि पढ़ाने वाले प्रोफेसरों की तनख्वाहें बढ़ती चली गईं और पंजाब के खेतों में फाके का खरपतवार लगातार उगता चला गया। विकास के ये नए योद्धा यह भूल ही जाते हैं कि विकास के तथाकथित सिमेंटी युग में भी पेट तो अन्न से ही भरता है। कृषि योजनाकारों को याद ही नहीं रहा कि किसानी एक वृक्ष है जिसकी छाया के बिना कोई सुखी नहीं रह सकता। किसान ही एक मात्र ऐसा वैद्य है जो मिट्टी, पानी, हवा और कर्म के सुमेल से इंसान को जीने लायक बनाता है। कारखानों या कम्प्यूटर सेंटरों में सहायक साधन पैदा किए जा सकते हैं, जानकारियां बढ़ाई जा सकती हैं, दुनिया को मुट्ठी में लेने का भ्रम पैदा किया जा सकता है। संसार को एक गांव में बदलने का नारा दिया जा सकता है।

पिछले तीन दशकों के दौरान पंजाब की किसानी विश्व व्यापारियों द्वारा बिछाए जाल में पूरी तरह फंस चुकी है। नए बीज, नई फसलें, अजीबो गरीब खाद, कीड़े मार दवाइयां तथा भयंकर किस्म का मशीनीकरण तथा आंखों में धूल झोंकने वाले प्रचार ने किसानों का भविष्य अंधेरे में झोंक दिया है। घिनौने प्रचार ने किसानी को लगभग बेहोश बना डाला है। पंजाब के किसान का जोश लालच में बदल दिया गया है। उसे लालच के लिए जीवन दान नहीं दिया जा सकता। केले के छिलके पर चला दिया गया, जिसके ऊपर से फिसल कर जल्दी से कुछ देर के लिए अमीर हुआ जा सकता था। इसका हश्र यह हुआ कि कृषि आत्म निर्भरता का विधान न रह कर मात्र इन्द्रजाल बनकर रह गई। इसके साथ ही कृषि शहर पर ही केंद्रित होकर रह गई, जिससे गांव का स्वतंत्र अस्तित्व बिखर कर रह गया।

पंजाब की किसानी का संकट चतुर सुजान कृषि विश्वविद्यालय और झूठी सरकारों तथा बैंक के कर्जों में नहीं बल्कि परंपराओं की धूल झाड़ने में है। ‘हरित क्रांति’ का नारा तो क्षणभंगुर जानकारी नुमा था। बुरा क्षण कभी भी भुला कर आगे बढ़ा जा सकता है।

आज पंजाब के अधिकतर गांव मरने के कगार पर हैं। सेहत, शिक्षा, आवाजाही तथा साफ सफाई की सुविधाएं भी मात्र शहर और कस्बा केंद्रित कर दी गई हैं। हां! फर्जी नीतियों पर सरकारें कैसे बदलें बजाती हैं, उसकी एक बानगी शिक्षा विभाग की देखें। वेंटिलेटर पर चल रहे सरकारी स्कूलों को बचाने के लिए इसी नए सत्र में पंजाब सरकार ने एक घोषणा के तहत कहा है कि अगर सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला कोई बच्चा अपने साथ एक बच्चा और लाएगा तो उसे सौ रुपए दिए जाएंगे और अगर कोई बच्चा अपने साथ पांच बच्चे लाएगा तो उसे एक हजार रुपए दिए जाएंगे। जब सरकारें इस ढंग से काम करती हों तो बिना गुणा तक्सीम के अंदाजा लगाया जा सकता है कि भीतर से हमारे देश की हालत क्या होगी। जिस राज्य में हजारों किसान आत्महत्याएं कर रहे हों, उस राज्य में भी सरकार अपने जनसंपर्क विभाग को यही सीधा निर्देश देती है कि सरकारी आरती में मस्त अखबारों की जोत में विज्ञापनों का घी कम नहीं होना चाहिए। पिछले 30 साल में जहरीले कीटनाशकों से लीप दी गई धरती पर सेहत विभाग क्या करता होगा, वाहेगुरु ही जानें।

अपने-अपने लालच पर केंद्रित किसानी के कारण बेहद समृद्ध लोकजीवन भी छिन्न-भिन्न हो चला है। गांव की सारी किसानी शहरों में स्थापित बीजों, खादों, दवाइयों की दुकानों के गिर्द चक्कर लगाती रहती है। नए बीजों संग आई गाजर बूटी धरती का कोढ़ बन चुकी है। धान कभी भी पंजाब की फसल नहीं रही। चावल पंजाबी लोकजीवन की स्वाभाविक खुराक नहीं था। लेकिन पैसे के लालच और दूसरे राज्यों के लिए अधिक से अधिक चावल बेचने के मोह ने किसानी के फसल चक्र को उलटा चला दिया। धान का उत्पादन बढ़ता ही गया। इतना बढ़ा कि सड़ने तक लगा। लेकिन पेट भूखे के भूखे रहे। अधिक उत्पादन के कारण चोरी के नए-नए तरीके ईजाद हुए। बहुत ही कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि सरकारी गोदामों में धान की बोरियां सड़ाने के लिए विशेष तौर सब्मर्सिबल पंप लगाए गए। परिणाम स्वरूप शैलर मालिक और अधिकारियों की तिजौरियां भरने लगीं और किसान का खीसा फटता चला गया।

हरित क्रांति से पूर्व पंजाब के किसान को खेतों का साधु कहा जाता था क्योंकि वह स्वनिर्भर था, स्वतंत्र था, संतुष्ट था, सेवा भावी था, संयमी था और सहज सरल था। परंपराओं से मुख मोड़ते ही ये सभी गुण काफूर हो गए।

इस ऊहा-पोह की स्थिति में काम बढ़ने लगे, हरित क्रांति का कनस्तर भी साथ-साथ पिटता रहा। दूसरे राज्यों से मजदूरों से भरी गाडि़यां भी आने लगीं। मेहनती माना जाने वाला किसान अब मेहनत से भी दूर होने लगा। शराब का नशा बेशक पहले से था ही, उसमें और भी छोटे-बड़े नशे जुड़ गए। जैसे हर फसल का भूसा होता है वैसे ही इन नशों के भूसे के एवज एड्स, छीना झपटी आदि की घटनाएं बढ़ने लगीं। ऐसा कोई नशा नहीं बचा जो पंजाब के युवा ने छका न हो। अफसोस तो यह है कि कृषि से जुड़े ढेरों कर्जों के साथ-साथ लोग नशों के लिए भी कर्ज लेने लगे हैं। घर की निकली शराब से स्मैक तथा कोकीन तक नशे का विकास हुआ है। कर्ज की हरियाली के कारण आंख जल भी खारा हो चला है।

‘हरे इंकलाब’ के पिटे कनस्तर के कारण पंजाब की 70 प्रतिशत भूमि धान की फसल के नीचे दबती चली गई। भयंकर उत्पादन और पैसे की पहली खेप से सब्सिडी, सस्ते लोन वगैरा के कारण सब्मर्सिबल और ट्रैक्टरों की कंपनियां सरकारी शरण ले हर शहर में बिछ गईं। देखते ही देखते 12,644 गांवों में कुछ ही बरसों में साढ़े 15 लाख सब्मर्सिबल धंसा दिए गए। कुछ ही बरसों में भूजल 20 से 200 फुट नीचे चला गया। और अभी पंजाब के भावी मुख्यमंत्री माने जाने वाले श्री सुखबीर बादल ने एक घोषणा कर 180 करोड़ रुपए इसलिए जारी किए हैं कि जिस कोने में सब्मर्सिबल नहीं हैं, वहां भी वह पहुंच जाए। इन सब्मर्सिबल पंपों के लिए जहां कुछ बरस पहले पांच हॉर्स पावर की मोटर काम करती थी, वहीं आज 15 से 20 हॉर्स-पावर की मोटर जरूरी हो चली है। भू-जल संकट के कारण बिजली की बत्ती भी गुल हुई है। सीमा क्षेत्र भठिण्डा में लगे थर्मल पॉवर स्टेशन ने बिजली से ज्यादा राख दी है और अब तो इस राख ने पूरे इलाके के लोगों को थका दिया है।

किसानी के संकट को प्रबुद्ध नगरीय चेतना ने कुछ और भी बढ़ाया है। शहरी और कस्बई पानी की सारी निकासी गांवों के प्राकृतिक स्रोतों की ओर मोड़ दी गई है। अन्य कई नुकसानों के साथ-साथ सबसे बड़ा नुकसान चरागाहों का समाप्त होना है। बांझ पशुओं के दूध के कारण महिलाओं में भी बांझपन के अनेक मामले सामने आने लगे हैं। चारे के अभाव में पूरा-का पूरा पशुधन सुई के दर्द पर टिक गया है। सबेरे-शाम के दूध से पहले यहां अब हर पशु को टीका लगाना अनिवार्य हो गया है! बांझ होता पशुधन कब तक सुई का दर्द सहेगा मालूम नहीं।

पंजाब प्रदेश के नाम में जुड़े शब्द ‘आब’ का एक अर्थ ‘पानी’ तो है ही, लेकिन इसका दूसरा गहरा अर्थ हैः चमक, इज्जत और आबरू। पंजाब अपने नाम का यह असली अर्थ न खो बैठे- आज हमें इसकी चिंता करनी है।

हरित क्रांति, सिर्फ और सिर्फ शहरीकरण और अब वैश्वीकरण ने पंजाब को काल का ग्रास बनने के कगार पर ला खड़ा किया है। पंजाब शायद संसार का पहला ऐसा राज्य होगा जहां से ‘कैंसर एक्सप्रेस’ नाम वाली रेलगाड़ी चलती है। जिस राजस्थान के साथ पंजाब पानी का एक घड़ा बांटने तैयार नहीं, उसी पंजाब के सभी कैंसर मरीजों को राजस्थान का बीकानेर मुफ्त इलाज देता है। कैंसर के साथ-साथ गुर्दा, जिगर रोगों की भयावहता भी बढ़ती जा रही है। जगह-जगह होटलनुमा अस्पताल खुल गए हैं। इनमें मरीजों की जान कितनी बचती कहा नहीं जा सकता, पर डाक्टरों का जीवन बनता जा रहा है। भ्रूण हत्याओं का विश्व रिकार्ड पंजाब के इन्हीं होटलनुमा निजी अस्पतालों को जाता है। मार्च 11 को जारी की गई जनगणना रिपोर्ट में यह बात अब सरकारी तौर पर भी सामने आ चुकी है। रुपयों के मोह में पंजाब ने अपने घर में पैदा हो रही लक्ष्मी को मारा है। इसी कारण पंजाब के जिन कुओं में नेकियां झिलमिलानी चाहिए थीं, उनमें हजारों भ्रूणों की आत्माएं तड़पती मिलती हैं।

वैश्वीकरण का दैत्य बेशक सारे देश को डकारने को तैयार है, लेकिन पंजाब स्वयं ही सज-धज कर उसके जबड़ों में जाने को बेताब है। खुली अर्थव्यवस्था के माध्यम से बड़े सरकारी अधिकारी और कृषि विशेषज्ञ अब बचे-खुचे पंजाब को भी उजाड़ने की तैयारियों में जुटे हैं। कृषि उत्पादों को विश्व बाजार में ले जाने का एक नया सपना और बोया जा रहा है। बिना यह सोचे जाने कि मात्र दिखावे के लिए यह पतंग बेशक रंगा-रंग दिख रही हो लेकिन इसका जहरीला मंझा किसका है, डोर किसकी है और चरखी किसके हाथ में है- कुछ पता नहीं। पंजाब की बची-खुची उपजाऊ जमीन पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हल्ला जारी है।

दाएं-बाएं विचारों की खुशकी से बेशक समाज का कोई दौर सूख जाए, लेकिन पुरखों के चिंतन और परंपराओं की नमी कभी नहीं सूखती। दौड़ कोई भी हो, उसका अंत नहीं लेकिन मत्था एक बार टिक जाए तो दौड़ से हंफे समाज के फेफड़े भी टिक जाते हैं। पंजाब की खेती-किसानी आज ऐसी दौड़ में है, जिसमें वह अपनी अगली पीढ़ी लगभग गंवा चुकी है। अनेक गांव पंजाब में आज ऐसे हैं जहां मात्र बुजुर्ग ही बचे हैं। बच्चे सब विदेश जा चुके हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार विदेशी जेलों में भी पंजाब के युवक सबसे ज्यादा हैं। विदेशी गुरुद्वारों में हुई बैठकों में यही चिंता सामने आयी है कि किसी तरह भी इन युवतियों और युवकों को विदेश आने से रोका जाए क्योंकि वहां शरण लेने की जगहें संभव न होने पर लड़के लड़कियां इकट्ठे रह रहे हैं, जिसके कारण कई तरह के सभ्यतागत प्रश्न भी सामने आ खड़े हैं।

हरित क्रांति से पूर्व पंजाब के किसान को खेतों का साधु कहा जाता था क्योंकि वह स्वनिर्भर था, स्वतंत्र था, संतुष्ट था, सेवा भावी था, संयमी था और सहज सरल था। परंपराओं से मुख मोड़ते ही ये सभी गुण काफूर हो गए। पुरखों ने कहा है कि कर्म भीतर के पाप को पिघला डालता है, मन को सुंदर करता है, आत्मिक शक्ति को जगाता है। गुरु साहिबान कहते हैं कि सच्चा कर्म करते-करते अध्यात्म की पगडंडियां भी साफ होने लगती हैं।

परंपराओं में सच्चे विकास की नाभि विश्वास और सहयोग है जिसके इर्द-गिर्द सेवा, समर्पण, सादगी, संयम, सब्र, संतोष, सहृदयता, प्रेम, क्षमा, दया जैसे गुण सरलता से पनपते हैं। पंजाब की किसानी का संकट चतुर सुजान कृषि विश्वविद्यालय और झूठी सरकारों तथा बैंक के कर्जों में नहीं, बल्कि परंपराओं पर जम गई धूल झाड़ने में है। ‘हरित क्रांति’ का नारा तो क्षणभंगुर जानकारी नुमा था। बुरा क्षण कभी भी भुला कर आगे बढ़ा जा सकता है। पंजाब प्रदेश के नाम में जुड़े शब्द आब का एक अर्थ पानी तो है ही, लेकिन इसका दूसरा गहरा अर्थ हैः चमक, इज्जत और आबरू।

पंजाब अपने नाम का यह असली अर्थ न खो बैठे- आज हमें इसकी चिंता करनी है।

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