किसान आफत में, कर रहे हैं गन्ना उगाने से तौबा

Submitted by RuralWater on Thu, 11/17/2016 - 16:47

साल-दर-साल गन्ने का रकबा मालवा-निमाड़ में घटता जा रहा है। अब यहाँ गन्ना उगाना घाटे का सौदा होता जा रहा है। एक तो इसकी बड़ी वजह इलाके में तेजी से घटते पानी को माना जाता है। यहाँ बीते 25 सालों में पानी के स्रोत लगातार कम हुए हैं, वहीं भूजल भण्डार भी गहराई में नीचे चले गए हैं। गन्ने की फसल में पानी की जरूरत ज्यादा पड़ती है। गन्ने की फसल में हाड़तोड़ मेहनत और अच्छी खासी लागत के बाद इसकी जो कीमत आती है, वह बहुत कम होती है। पानी की कमी, सरकारी उपेक्षा और कृषि नीतियों की विसंगतियों के चलते किसान गन्ना उगाने से तौबा कर रहे हैं। हालात यह हैं कि जो क्षेत्र कभी गन्ना उत्पादक इलाके के नाम से पहचाने जाते थे, अब वहाँ भी गन्ना अन्य क्षेत्रों से लाना पड़ता है। अब किसान अपने खेतों में गिनी-चुनी फसलें ही बोने लगे हैं। इससे जैव विविधता के संकट साथ स्थानीय बाजार और अर्थतंत्र को भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

अलग-अलग इलाकों में गन्ने की खेती का बड़ा फायदा यह होता था कि किसान स्थानीय स्तर पर अपने खेत में ही इससे गुड़ बना लिया करते थे। इसका उपयोग वे शक्कर की जगह अपने घरों में करते थे। वहीं दूसरी ओर इलाके में खांडसारी मिलें हुआ करती थीं, जो गन्ना खरीद कर शक्कर बनाया करती थीं।

मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल में दिसम्बर से मार्च तक आप जिधर भी खेतों में निकल जाएँ, गुड़ पकने की मीठी सौंधी खुशबू से आप बाग-बाग हो जाये बिना नहीं रह सकेंगे। खेत-खेत बनी कोल्हू की चर्खियों से निकलते गन्ने के रस और बड़ी-बड़ी कड़ावों में उबलते-खदबदाते गुड़ को चखे बिना कोई नहीं रह सकता। कभी यह इलाका देश के बड़े गन्ना उत्पादक इलाकों में जाना जाता था। इलाके में मेहमान नवाजी का खास अन्दाज हुआ करता था ताजा गन्ने का रस और गरम-गरम गुड़। लेकिन अब यह धीरे-धीरे बीते दिनों की कहानी बनता जा रहा है। इस बार गन्ने का रकबा इलाके में तेजी से घटा है।

साल-दर-साल गन्ने का रकबा मालवा-निमाड़ में घटता जा रहा है। अब यहाँ गन्ना उगाना घाटे का सौदा होता जा रहा है। एक तो इसकी बड़ी वजह इलाके में तेजी से घटते पानी को माना जाता है। यहाँ बीते 25 सालों में पानी के स्रोत लगातार कम हुए हैं, वहीं भूजल भण्डार भी गहराई में नीचे चले गए हैं। गन्ने की फसल में पानी की जरूरत ज्यादा पड़ती है। गन्ने की फसल में हाड़तोड़ मेहनत और अच्छी खासी लागत के बाद इसकी जो कीमत आती है, वह बहुत कम होती है। लिहाजा किसान यहाँ की उर्वरा जमीन में गन्ना उत्पादन की खासी सम्भावना के बावजूद इसकी खेती से दूर होते जा रहे हैं।

25 साल पहले तक गन्ने की फसल इस इलाके की मुख्य फसल मानी जाती थी, जो अब करीब-करीब विलुप्त हो चुकी है। इलाके के बरलाई सहित दो बड़े चीनी कारखाने भी बन्द हो चुके हैं। हरदा की निखिल शुगर मिल भी बाहरी आवक के बल पर ही आखिरी साँस ले रही है। बागली तहसील में दर्जन भर खांडसारी (छोटी शक्कर मिल) हुआ करती थी। 1967 में देवास के करनावद में पहली खांडसारी मिल डली थी। एक खांडसारी में मौसम के दिनों में हर दिन करीब सौ क्विंटल तक शक्कर निकलती थी। चीनी मीलों की तर्ज पर ही खेत-खेत पर बनने वाले गुड़ की चर्खियाँ भी अब नहीं चलतीं। अब बहुत कम किसान ही अपने खेतों में गन्ना लगाते हैं।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में गन्ना उत्पादन बीते कुछ सालों में तेजी से घटकर औसत उपज क्रमशः 444 टन तथा 27.42 टन प्रति हेक्टेयर ही रह गई है। जो भारत के अन्य गन्ना उत्पादक राज्यों व राष्ट्रीय औसत उपज की तुलना में काफी पीछे हैं। भारत में 4999 हेक्टेयर क्षेत्र में हर साल 3 लाख 41 हजार टन गन्ने का उत्पादन होता है। दुनिया में ब्राजील के बाद हमारा देश दूसरा सबसे बड़ा शक्कर उत्पादक (205 मिलियन टन प्रति साल) है। करीब 50 लाख से ज्यादा किसान और खेतिहर मजदूर इसकी खेती से जुड़े हैं।

हमारे देश में 529 चीनी मिलें हैं और करीब 60 प्रतिशत गन्ने का उपयोग भी शक्कर बनाने में ही किया जाता है जबकि 15 से 20 प्रतिशत का गुड़ और खांडसारी में किया जाता है। अब गन्ने का उपयोग ऊर्जा क्षेत्र में भी किया जाएगा। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत को 5200 लाख टन गन्ना उत्पादन करना पड़ेगा। इसलिये अभी से इसके उत्पादन पर ध्यान देना जरूरी है।

फिलहाल गन्ने का भाव किसानों को 260 से 300 रुपए क्विंटल ही मिल पा रहा है जबकि खर्च और मेहनत जोड़कर ही लागत करीब 250 रुपए तक हो जाती है। कई बार इलाके में किसानों को भाव नहीं मिलने से अपने गन्ने के बाड़ जला देने पड़ते हैं।

हालांकि शहरों में मधुशालाओं में गन्ने की खेरची बिक्री भी 5 से 10 रुपए प्रति नग होने लगी है लेकिन यह बहुत सीमित और शहरों के आसपास खेतों से ही सम्भव है। शक्कर के अत्यधिक उपयोग और स्टेटस सिम्बोल हो जाने से गुड़ का भाव भी अब उतना नहीं रहा, न ही इसके खरीददार आसानी से मिलते हैं। थोक व्यापारियों को ही औने-पौने दामों में इसे बेचना पड़ता है।

उज्जैन जिले के पिपलौदा के गन्ना उत्पादक किसान कल्याण सिंह कहते हैं, ‘क्षेत्र में गन्ना उत्पादन की अच्छी सम्भावनाएँ हैं लेकिन भाव नहीं मिलने से किसान इसकी जगह दूसरी फसलों को महत्त्व देते हैं। कुछ सालों पहले तो इतने कम भाव थे कि किसानों ने रातों रात अपने गन्ने के बाड़ जला डाले।’

देवास जिले के सन्दलपुर निवासी राजेश विश्नोई कहते हैं, ‘किसान एक बार इसकी बोवनी करने के बाद तीन बार इसकी फसल लेता था। पर साल-दर-साल कम होती बारिश और पानी के संकट ने इसे यहाँ से खत्म कर दिया है। गन्ना उत्पादन बढ़ाने के लिये राज्य सरकार की कुछ योजनाएँ भी हैं, पर अन्य योजनाओं की तरह ही इनका भी जमीनी स्तर पर बुरा हाल है।’

इन्दौर जिले के पाडल्या निवासी कैलाश चन्द्र की आँखों में बीते दिनों का मंजर तैरने लगा। यादों में खोते हुए उन्होंने बताया कि तब गाँव में ही गुड़ बनाते थे और हाट में उसे अच्छी कीमत पर बेच दिया करते थे पर अब शक्कर के जमाने में गुड़ का वजूद ही नहीं बचा। यहाँ के बच्चे और किशोर अब गन्ने की चर्खियों से अनजान हैं। उन्होंने गन्ने से गुड़ बनाने के किस्से तो सुने हैं पर देखा नहीं है। अब इस इलाके से करीब-करीब गन्ने के खेत ही लुप्त हो चले हैं।

उन दिनों किसान 5 से 30 बीघा तक खेतों में गन्ना उगाते थे। अब तो हालत यह है कि दीवाली के दिन लक्ष्मी पूजन के समय रखा जाने के लिये भी गन्ना नहीं मिलता है या मिलता है तो 25 से 35 रुपए नग में।

किसान संघ के प्रेमसिंह बताते हैं कि गन्ना उत्पादक किसानों को अब मोदी सरकार से स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने की आस है। फिलहाल खरीफ फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य की पुरानी दरें ही लागू है। लेकिन जल्द इसे बदलने की तैयारियाँ शुरू हो गई हैं, केन्द्र ने कृषि लागत व मूल्य आयोग (सीएसीपी) की पहली बैठक में राज्यों के साथ विचार-विमर्श किया है, अभी कुछ राज्य गन्ना खेती की लागत के आधार पर एफआरपी तय करते हैं वहीं कुछ राज्य एफआरपी के साथ राज्य समर्थित मूल्य (एसएपी) घोषित करते हैं, यह हमेशा अधिक होने से किसानों के हित में होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनावों से पहले यह बात प्रमुखता से कही थी कि केन्द्र में उनकी सरकार बनती है तो वे इसे लागू करेंगे। इसे भाजपा ने चुनाव घोषणा पत्र में भी रखा था।

इसके लागू होने से गन्ने का एफआरपी किसी भी हाल में 400 रुपए प्रति क्विंटल से कम नहीं होगा। देश भर में किसान अत्याचारों और आर्थिक हालातों के चलते उनकी आत्महत्याओं को रोकने के लिये स्वामीनाथन आयोग बनाया गया था, जिसने कृषि क्षेत्र को लेकर अपनी अनुशंसाएँ वर्ष 2006 में अपनी रिपोर्ट के रूप में केन्द्र सरकार को सौंपी थी।

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