किसानों के हाथ खाली के खाली

Submitted by editorial on Sat, 10/06/2018 - 12:59
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 06 अक्टूबर 2018

कहना उचित नहीं है कि जिन 23 कृषि जिंसों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किये जाते हैं, उनमें से प्रत्येक की खरीद के लिये सरकार के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। आँकड़े बताते हैं कि हर साल इनकी खरीद के लिये कुल मिलाकर एक लाख करोड़ रुपए की जरूरत होगी। तो सवाल उठता है कि पैसा कहाँ से आएगा? इसके लिये जरूरी है कि 2008-09 में आई आर्थिक मंदी के बाद से उद्योग क्षेत्र को दिये जा रहे 1.86 लाख करोड़ रुपए के स्टीमुलस पैकेज को तत्काल खत्म किया जाये।

किसान आन्दोलनकिसान आन्दोलन (फोटो साभार - फाइनेंशियल एक्सप्रेस)गाँधी जयन्ती के अवसर पर प्रो. एमएस स्वामीनाथन ने ध्यान दिलाया, ‘एक बार महात्मा गाँधी ने नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बंगलुरु ने अपनी आगन्तुक पुस्तिका में अपना अनुभव लिखने का आग्रह किया था। व्यवसाय कॉलम में उन्होंने ‘किसान’ लिखा।’ विडम्बना है कि महात्मा के जन्मदिन पर ही पुलिस ने उन हजारों किसानों पर आँसू गैस के गोले और वॉटरकैनन दागे जो अपने दस दिनी विरोध के तहत शान्तिपूर्ण तरीके से हरिद्वार से कूच करके दिल्ली में प्रवेश करने पहुँचे थे। उसी दिन हरियाणा की भिवानी जेल में पैंसठ वर्षीय किसान रणबीर सिंह का देहान्त हुआ। वह ऋण चुकाने के लिये दिया गया अपना चेक बाउंस होने पर दस दिन पहले जेल में डाल दिये गए थे। उन पर 9.83 लाख रुपए का कर्जा था और उन्हें दो साल की सजा सुनाई गई थी।

खबरों के मुताबिक, उन्हें दो दिन पहले जेल में मिलने आये अपने रिश्तेदारों से यह सुनकर सदमा लगा कि हाल में हुई बारिश से उनकी फसल नष्ट हो गई। बैंक डिफॉल्ट के मामले में जेल भेजे जाने वाले रणबीर अकेले किसान नहीं थे।

सैकड़ों किसान बैंक का कर्ज नहीं लौटा पाने पर पंजाब और हरियाणा की जेलों में सींखचों के पीछे हैं। यह खबर उस समय आई है, जब सरकार ने ऋण-ग्रस्त कम्पनी आईएलएंडएफएस, जिसकी 169 समूह कम्पनियाँ हैं, के गर्वनिंग बोर्ड को हटा दिया है, जो कुल मिलाकर 90,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्ज में डूब गई है। इस कम्पनी के उच्चाधिकारियों में से किसी को भी अभी तक गिरफ्तार नहीं किया है।

महात्मा गाँधी के जन्मदिन पर इन दोनों घटनाओं से पता चलता है कि कृषि के साथ क्या गलत हो रहा है। दिल्ली में प्रवेश करने पहुँचे किसान अपने घरों को लौट चुके हैं, इस वादे के साथ कि उनकी माँगें नहीं मानी गईं तो फिर लौटेंगे। बहरहाल, उनके आक्रोश से ग्रामीण भारत में बढ़ते असन्तोष का पता चला।

बीते छह महीनों में देश ने नासिक से मुम्बई तक निकाली गई शान्तिपूर्ण लम्बी विरोध यात्रा देखी। तदुपरान्त जून माह में शहरों को खाद्य आपूर्ति रोकने के लिये दस-दिनी आन्दोलन भी हुआ। उसके बाद ऑल इण्डिया किसान सभा ने नई दिल्ली में एक और विरोध यात्रा निकाली। इनके अलावा, देश भर में ऐसे तमाम विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जिनकी तरफ लोगों का ध्यान नहीं गया। अभी कुछ और विरोध यात्राएँ जारी हैं। इनमें कुछ दिन पहले ग्वालियर से शुरू हुई आदिवासियों और भूमिहीनों की विरोधयात्रा भी शामिल है। कहना यह कि कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों का गुस्सा दिनोंदिन बढ़ने पर है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक, 2014 में 678 विरोध-प्रदर्शन हुए। 2015 में इनकी संख्या बढ़कर 2,683 तक जा पहुँची। एक साल बाद यह दोगुनी होकर 4,837 पर जा पहुँची। दूसरे शब्दों में तीन सालों में विरोध प्रदर्शनों की संख्या सात गुना बढ़ी है। स्पष्ट है कि किसानों में गुस्सा दिनोंदिन बढ़ रहा है। इसके कारण अनेक हो सकते हैं, लेकिन किसी से यह तथ्य छिपा नहीं है कि खेती-किसानी आज गम्भीर दौर से गुजर रही है।

भारतीय किसान यूनियन की हरिद्वार से शुरू की गई विरोध यात्रा से इसी बात की पुष्टि करने का प्रयास किया गया। भाकियू ने अपनी 15 माँगों का जो माँग पत्र रखा है, उसमें कम-से-कम आधा दर्जन तो खेती-किसानी की जर्जर होती आर्थिक स्थिति से ही जुड़ी हैं।

हालांकि दस साल पुराने ट्रैक्टरों पर से प्रतिबन्ध हटाने, कृषि उपकरणों पर जीएसटी (पाँच प्रतिशत) हटाने आदि पर सरकार ने सकारात्मक आस्वस्ति दी है, लेकिन कृषि से जुड़े आर्थिक मुद्दे हैं, जिनका समाधान नहीं हो पा रहा। तथ्य तो यह है कि पहले किये गए सभी विरोध-प्रदर्शनों में किसानों के हाथ खाली के खाली रह गए। सरकार किसानों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाने के लिये अपर्याप्त संसाधनों की समस्या बताने लगती है।

दो माँगें प्रत्येक विरोध प्रदर्शन का केन्द्रीय मुद्दा रही हैं। पहली, कृषि ऋणों की माफी; तथा दूसरी, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के मुताबिक, न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ पचास प्रतिशत का लाभ जोड़कर कृषि उपज का भुगतान करने सम्बन्धी सरकार के अपने आश्वासन का क्रियान्वयन।

सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण के अपेक्षित तरीके के विपरीत उत्पादन लागत आँकने के फार्मूला को अपना रही है। और इसके आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य सम्बन्धी किसानों की माँग के पूरा हो जाने की ताल ठोक रही है। काम्प्रिहेंसिव कॉस्ट अनुमान (सीटू), जिसमें पूँजी निवेश पर ब्याज और भूमि की रेंटल वैल्यू शामिल है, के बजाय सरकार ने किसान द्वारा भुगतान की गई लागत (एटू), जिसमें परिवार की श्रम लागत (एटू+एफएल) को जोड़ा गया है, पर ध्यान देते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य सम्बन्धी आकलन को कम कर दिया है।

उदाहरण के लिये धान के लिये घोषित खरीद मूल्य 1,750 रुपए प्रति क्विंटल है, लेकिन स्वामीनाथन के फॉर्मूले के आधार पर हिसाब लगाया जाये तो धान का प्रति क्विंटल मूल्य 2,340 रुपए होना चाहिए। इसका मतलब हुआ कि किसान को प्रति क्विंटल 590 रुपए का नुकसान। इसी प्रकार बाजरा की बिक्री पर किसान को प्रति क्विंटल 540 रुपए का नुकसान है।

कम संसाधन होने का रोना

कहना उचित नहीं है कि जिन 23 कृषि जिंसों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किये जाते हैं, उनमें से प्रत्येक की खरीद के लिये सरकार के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। आँकड़े बताते हैं कि हर साल इनकी खरीद के लिये कुल मिलाकर एक लाख करोड़ रुपए की जरूरत होगी। तो सवाल उठता है कि पैसा कहाँ से आएगा? इसके लिये 1.86 लाख करोड़ रुपए के स्टीमुलस पैकेज को तत्काल खत्म किया जाये।

दस सालों से यह पैकेज मुहैया कराया जा रहा है और किसी ने भी इसके औचित्य पर सवाल नहीं किया है। चूँकि किसानों की आमदनी बीते चार दशकों में मुद्रास्फीति को समायोजित करने के उपरान्त करीब-करीब स्थिर ही रही है, इसलिये स्पष्ट है कि बीते चार दशकों के दौरान किसान को उसकी न्यायसंगत आमदनी से वंचित किया गया।

अध्ययनों से पता चला है कि कृषि में अग्रणी पंजाब जैसे राज्य तक में 98 प्रतिशत ग्रामीण परिवार कर्ज से ग्रस्त हैं। इनमें भी 94 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं, जिनकी आमदनी से ज्यादा उनका खर्च है। संसद में रखी गई जानकारी के मुताबिक, देश में कुल कृषि ऋण 12.60 लाख करोड़ रुपए के हैं। इसकी तुलना देश में 10.3 लाख करोड़ रुपए के बैंक डिफॉल्ट्स से करें। अप्रैल, 2014 और अप्रैल, 2018 के बीच 3.16 लाख करोड़ रुपए के कारपोरेट एनपीए बट्टे खाते में डाले जा चुके हैं।

लेकिन जैसे ही कृषि ऋणों की माफी की माँग उठती है, नीति-निर्माता, अर्थशास्त्री और कारोबार पर लिखने वाले लेखक चिल्ला उठते हैं कि इससे तो वित्तीय घाटा बढ़ जाएगा। अचरज होता है देखकर कि कारपोरेट के एनपीए को माफ करते समय वित्तीय घाटा बढ़ने की चिन्ता नहीं जताई जाती। इससे पता चलता है कि आर्थिक रूपरेखा को कितनी चतुराई से तैयार किया गया है।

बुनियादी समस्या यह है कि नवउदारवादी अर्थशास्त्र कृषि को एक आर्थिक गतिविधि नहीं मानता। यही कारण है कि किसान बेकल हैं और उन्हें देश पर बोझ के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इस बात को नहीं समझा जा रहा कि केवल कृषि क्षेत्र ही है, जो देश का सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है। इसी क्षेत्र में अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की क्षमता है। यही कारण था कि महात्मा गाँधी कृषि क्षेत्र के जबरदस्त पैरवीकार थे। और इसी सच को हम नजरन्दाज किये हुए हैं।

लेखक, खाद्य एवं कृषि विशेषज्ञ हैं


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