कम अक्ल आखिर कौन है?

Submitted by Hindi on Fri, 09/09/2011 - 10:41
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

इन सबका कारण मानव की कुछ-न-कुछ हासिल करने की कोशिश ही रही है। प्रारंभ में प्रगति करने का न कोई कारण था न ऐसी कोई चीज थी जिसे करना जरूरी ही हो। अब हम उस मुकाम पर आ पहुंचे हैं, जहां हमारे लिए इसके अलावा कोई और चारा नहीं बचा है, कि एक ‘आंदोलन’ इस बात के लिए चलाएं कि अब हमें भी कुछ भी करके नहीं दिखाना है।

लोग कहते हैं कि इंसान से ज्यादा बुद्धिमान कोई अन्य प्राणी नहीं होता। अपनी इस अक्ल का इस्तेमाल करते हुए, वही एक मात्र ऐसा प्राणी बन गया है जो परमाणु अस्त्रों का इस्तेमाल करने में समर्थ हो गया है। अभी उस रोज ओसाका स्टेशन के सामने स्थित प्राकृतिक खाद्य बेचने वाले स्टोर के प्रमुख महोदय पहाड़ी चढ़कर यहां तक पहुंचे। उनके साथ सात शुभंकर देवताओं की तरह उनके सात साथी भी थे। दोपहर को भूरे चावल की खिचड़ी की दावत के दौरान उनमें से एक सज्जन ने कुछ यों कहा, ‘बच्चों में हमेशा कोई एक ऐसा होता है, जिसे दुनिया की कोई चिंता नहीं होती। तथा जो सड़क किनारे पेशाब करते हुए हंस पड़ता है। एक कोई अन्य ‘घोड़े पर सवार’ का खेल खेलते वक्त हमेशा घोड़ा बना रहता है और कोई तीसरा हमेशा अपने साथियों को चकमा देते हुए उनका दोपहर का खाना चट कर जाता है। जब भी कक्षा-प्रतिनिधि का चुनाव होता है अध्यापक महोदय बच्चों को बड़ी गंभीरता से अच्छे नेता के गुण बतलाते हुए, निर्णय लेने की क्षमता का महत्व बताते हैं। जब चुनाव होता है तो वह लड़का जो सड़क के किनारे ‘पेशाब’ करते हंस पड़ता है, चुन लिया जाता है।’

किस्सा सुनकर सब लोग खुश हुए, लेकिन मेरी यह समझ में नहीं आया कि वे लोग हंस क्यूं रहे थे। मुझे लगा, उनका वैसा करना स्वाभाविक ही था। यदि फायदे या नुकसान के हिसाब से सोचा जाए तो घाटे में रहनेवाला बालक वही होगा जो हमेशा घोड़ा बनता है, लेकिन महानता और मामूलीपन बच्चों पर लागू नहीं होती। शिक्षक के विचार से चालाक बच्चा सबसे विशेष था, लेकिन अन्य बच्चों की नजर में वह चतुर तो था, लेकिन गलत ढंग से वह उनमें से था जो आगे चलकर दूसरों का दमन कर सकता था। यह सोचना कि जो चलता-पुर्जा है और खुद के हितों की रक्षा कर लेता है, असाधारण है और वैसा होना ही बेहतर है, वयस्कों के मूल्य हैं। मेरे विचार से तो सबसे अच्छे ढंग से वही जीता है जो अपने काम-से-काम रखता है, मनचाहे ढंग से अच्छा खाता-पीता है तथा जिसे किसी किस्म की कोई चिंता नहीं होती। उस व्यक्ति से ज्यादा महान कोई अन्य नहीं हो सकता जो कोई चीज प्राप्त करने की कोशिश नहीं करता।ईसक की एक नीति-कथा में जब मेंढकों ने ईश्वर से एक राजा प्रदान करने को कहा तो उसने उन्हें एक लकड़ी का लट्ठा भेंट कर दिया। मेंढकों ने उस गूंगे लट्ठे का बड़ा मजाक बनाया, और ईश्वर से कहा कि उन्हें, और भी बड़ा राजा चाहिए। इस पर ईश्वर ने वहां एक बगुला भेज दिया। जैसा कि कहानी में होता है, बगुला सारे मेंढकों को एक-एक कर खा गया। यदि पंक्ति में सबसे आगे खड़ा होने वाला ही महान है तो जो पीछे-पीछे चलते हैं उन्हें संघर्ष करना पड़ता है, तकलीफें झेलनी पड़ती हैं। यदि आप किसी सामान्य व्यक्ति को आगे खड़ा कर देते हैं तो पीछे वालों को आसानी रहती है। लोग सोचते हैं कि जो चतुर और ताकतवर है, वह असाधारण है और इसलिए वे ऐसा प्रधानमंत्री चुनते हैं जो सारे देश को डीजल इंजन की तरह खींचता है।

‘प्रधानमंत्री पद के लिए कैसे व्यक्ति को चुना जाना चाहिए?’


‘मिट्टी या माधो हो!’ मैंने जवाब दिया। ‘मेरे ख्याल से ‘दारूमासान’ (दारूमासान जापान के बच्चों का प्रिय खिलौना है। वास्तव में यह एक बड़ा गुब्बारा है जिसके पेंदे को भारी बना दिया जाता है तथा उसका चेहरा-मोहरा एक ध्यानस्थ साधु जैसा होता है।) सिर्फ से अच्छा कोई नहीं होगा।’ मैंने कहा ‘इस इतना बेफिक्र आदमी है कि बिना एक शब्द कहें, बरसों तक ध्यान-मग्न रह सकता है। यदि आप उसे धक्का दे दें तो वह एक तरफ लुढ़क जाता है, लेकिन अपनी अ-प्रतिरोध की जिद के कारण वह फिर उठ बैठता है।’ दारूमासान सिर्फ आलथी-पालथी मारे निठल्ले नहीं बैठे रहता। यह सोचकर, कि आपको अपने हाथ बंटाने चाहिए, वह उन लोगों को देखकर चुपचाप भौंहे सिकोड़ते रहते हैं जो अपने हाथ बाहर निकालते रहते हैं।’

‘यदि आप बिल्कुल कुछ भी नहीं करोगे, तो यह दुनिया कैसे चलेगी? विकास कैसे होगा?’ ‘विकास की आपको क्या जरूरत है? यदि आर्थिक तरक्की 5 से लेकर 10 प्रतिशत हो जाती है तो क्या सुख भी दुगना हो जाता है? यदि वृद्धि दर शून्य प्रतिशत रहती है तो इसमें क्या गलत है? क्या सादगी से रहने और इत्मीनान से जीने से भी बेहतर और कोई चीज हो सकती है?’ लोग किसी चीज को खोजते हैं, वह कैसे काम करती है यह पता लगाते हैं और उसके लिए प्रकृति का उपयोग करते हैं और सोचते हैं कि इससे मानवजाति का भला होगा। आज की तारीख में इसका नतीजा यह हुआ कि, हमारी धरती प्रदूषित हो गई है। लोग भ्रमित हो गए हैं और हमने आधुनिक युग की आपा-धापी को आमंत्रित कर लिया है। अपने इस फार्म पर हम ‘कुछ-मत-करो विधि’ से खेती करते हैं। पौष्टिक और स्वादिष्ट अनाज सब्जियों तथा नारंगियां खाते हैं। चीजों के मूल स्रोत के नजदीक रहने की एक विशेष सार्थकता और संतोष होता है। जीवन की एक गति होती है जो एक कविता की तरह होती है।

किसान उसी समय से अति व्यस्त हुआ है जब से लोगों ने दुनिया की पड़ताल शुरू की और यह तय कर लिया कि ऐसा करना ‘अच्छा’ है तथा हमें ‘वैसा’ नहीं करना चाहिए। पिछले तीस बरसों के दौरान मेरे अनुसंधान का लक्ष्य रहा है ‘यह’ या ‘वह’ नहीं करना। इन तीस बरसों में मैंने यह सीखा है कि, यदि किसान लगभग बिना कुछ किए रहते तो उनकी स्थिति आज से बेहतर होती।

लोग जितना ज्यादा ‘करते’ हैं उतना ही समाज विकसित होता है तथा उतनी ही ज्यादा समस्याएं खड़ी होती हैं। प्रकृति का लगातार बढ़ता विध्वंस, संसाधनों की बर्बादी, मानव की आत्मा की बेचैनी और बिखराव, इन सबका कारण मानव की कुछ-न-कुछ हासिल करने की कोशिश ही रही है। प्रारंभ में प्रगति करने का न कोई कारण था न ऐसी कोई चीज थी जिसे करना जरूरी ही हो। अब हम उस मुकाम पर आ पहुंचे हैं, जहां हमारे लिए इसके अलावा कोई और चारा नहीं बचा है, कि एक ‘आंदोलन’ इस बात के लिए चलाएं कि अब हमें भी कुछ भी करके नहीं दिखाना है।

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