कम पानी में धान की खेती

Submitted by Hindi on Tue, 06/21/2016 - 13:53
Source
कृषि चौपाल, जून 2016

मशहूर किसान कवि घाघ ने कहा था- ‘धान, पान और केला - ये तीनों पानी के चेला।’ इसका मतलब यह है कि धान, पान और केला बिना पानी के नहीं हो सकते। लेकिन अब धरती पानी की किल्लत से जूझ रही है। ऐसे में धान उगाना है तो कुछ नया सोचना होगा।

परंपरागत बीजों की अनदेखीधान की फसल प्रायः ऐसे क्षेत्रों में उगाई जाती है जहाँ प्रचुर सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं। एक किलो धान के उत्पादन के लिये 3000 लीटर पानी खर्च होता है। यही कारण है कि अनेक बार पर्यावरण संरक्षणवादी धान उगाने का विरोध भी करते आये हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा (दिल्ली) के वैज्ञानिकों ने अधिक पानी की खपत से पैदा होने वाली धान की किस्मों की बजाय कुछ ऐसी किस्में सुझाई हैं जोकि कम पानी की खपत से पैदा की जा सकती हैं।

संस्थान के वैज्ञानिकों का कहना है कि समय पर पर्याप्त बरसात न भी हो तो किसानों को तनावग्रस्त होने की आवश्यकता नहीं है। किसान यदि सतर्कता से काम लें तो वह सूखे की स्थिति से निपट सकते हैं। दरअसल धान की कई ऐसी किस्में हैं जो न सिर्फ कम समय में पैदावार देती हैं, अपितु इनको सिंचाई की भी काफी कम आवश्यकता होती है। कृषि वैज्ञानिकों का सुझाव है कि यदि सूखे जैसे हालात पैदा होते हों तो इन किस्मों का उपयोग किया जा सकता है। यदि जुलाई माह में भी पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो भी धान की कई ऐसी किस्में हैं जिनकी पौध जुलाई में तैयार कर अगस्त में रोपाई की जा सकती है। इस प्रकार जुलाई के आखिर में भी यदि बरसात होती है तो उसका लाभ किसानों को मिल सकता है। धान की इन किस्मों में पूसा सुगंध-5, पूसा बासमती-1121, पूसा-1612, पूसा बासमती-1509, पूसा-1610 आदि शामिल हैं। धान की यह प्रजातियाँ लगभग चार माह में पैदावार दे देती हैं।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि किसान विकल्पतः एक और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। इस प्रौद्योगिकी के अनुसार धान की बुवाई गेहूँ की भाँति खेतों में की जा सकती है। पौध तैयार करने की आवश्यकता नहीं है। कम बरसात वाले क्षेत्रों में सरसों की पैदावार लेना भी एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। इसकी फसल को अगस्त और सितम्बर के दौरान लगाकर कम बारिश तथा सिंचाई की सुविधाओं के अभाव के बावजूद अच्छी पैदावार की जा सकती है। वर्तमान में अनुसंधानों के बाद कृषि वैज्ञानिकों ने सरसों की कई ऐसी किस्में ईजाद की हैं जिसमें प्रति हेक्टेयर डेढ़ टन तक की उपज पाई जा सकती है।

भारत में खेती-बाड़ी को आज भी मॉनसून का जुआ माना जाता है। वैज्ञानिकों ने पानी को एकत्रित करने के भी अनेक प्रभावी उपाय सुझाए हैं। उनकी राय है कि जिन किसानों के खेत अभी खाली हैं वे खेत को लेजर तकनीक के प्रयोग से समतल कर सकते हैं। इस तकनीक के इस्तेमाल से परम्परागत सिंचाई की अपेक्षा दो-तिहाई पानी की ही खपत होती है। साथ ही पानी की खपत को कम करने के लिये खरपतवार नियंत्रण पर भी ध्यान देना चाहिये।

जहाँ सिंचाई सुविधाओं का अभाव है और बरसात भी कम होती हो वहाँ ड्रिप सिंचाई, फव्वारा सिंचाई, पॉली हाउस तथा नेट हाउस जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर कम सिंचाई के बावजूद अच्छी फसलें तैयार की जा सकती हैं। इन तकनीकों के इस्तेमाल के लिये सरकारें भी अनुदान देकर प्रोत्साहित करती हैं।

 

पंजाब व हरियाणा के नक्शेकदम पर तराई


चावल का कटोरा कहे जाने वाले तराई में यदि यों ही धन की फसलें लहलहाती रहीं तो वह दिन दूर नहीं जब धरती का गला ही सूख जाएगा। तराई में धान की खेती के लिये भूजल दोहन जिस तेजी से हो रहा है उसे देखते हुए धरती के नीचे पानी का स्तर तेजी से नीचे भाग रहा है। पंजाब और हरियाणा में इस तरह धान की खेती पर सालों पहले प्रतिबंध लगा दिया गया है, लेकिन उत्तराखंड सरकार ने इससे कोई सीख नहीं ली जबकि पूरा उत्तराखंड गर्मियों में पानी को तरस जाता है। केन्द्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक तराई के 40 फीसद पाताल तोड़ कुएँ वाले क्षेत्रों में पानी सूख गया है। कभी इन पाताल तोड़ कुँओं से बिना पम्प किये ही पानी ऊपर बहने लगता था। सालभर में धान की कई-कई फसलों की खेती के वजह से यहाँ मिट्टी और पानी का संतुलन बिगड़ गया है। ऊधमसिंहनगर, जसपुर और काशीपुर में पिछले एक दशक में पानी का स्तर दो से चार मीटर तक नीचे चला गया है।


गोविंद बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मंगला राय के मुताबिक समूचा तराई पंजाब और हरियाणा के नक्शे कदम पर चल रहा है। गर्मी में धान की फसल के लिये पानी का अंधाधुंध दोहन इस पूरे क्षेत्र को एक दिन बेपानी कर देगा। राज्य सरकार को चाहिए कि पानी के इस तरह के दोहन पर प्रतिबंध लगाये।


वहीं पहाड़ में पानी की सुविधा के लिये पिछले वर्षों में सड़क के किनारों पर बड़ी-भारी मशीनों से गहराई तक खुदाई करके हैण्डपम्प लगाए गए, लेकिन उनमें से अनेक गर्मियों में पानी नहीं देते। कई तो सूख ही चुके हैं। इनके लगने से आस-पास के गाँव के नौले-धारों का पानी भी घट गया है या सूख गया है। हैण्डपम्प को जल संरक्षण के उपाय की तरह प्रचारित किया जाता रहा है जबकि मामला इसके ठीक उलट है। जल पुरुष राजेंद्र सिंह का कहना ठीक ही है कि ये पानी के संरक्षण की नहीं, जमा पानी को खर्च करने का उपाय है।


उत्तराखंड के तराई क्षेत्र में भी भूजल निरंतर नीचे जा रहा है और इसका समाधान लोग पहले से ज्यादा गहराई में खुदाई करके पानी खींच कर निकाल रहे हैं। लेकिन कब तक और कितना गहरा? आखिर एक दिन वहाँ से सिर्फ हवा निकलेगी पानी नहीं।

 


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