कोपेनहेगन यानी एक नाटक

Submitted by Hindi on Mon, 12/14/2009 - 10:06
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ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए क्या हम अपनी सुविधाओं में कटौती को तैयार हैं

देश की माटी देश का जल/हवा देश की देश के फल
सरस बनें प्रभु सरस बनें/देश के घर और देश के घाट
देश के वन और देश के बाट/सरल बनें प्रभु सरल बनें
देश के तन और देश के मन/देश के घर के भाई-बहन
विमल बनें प्रभु विमल बनें


विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर रचित और विख्यात हिंदी कवि भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा अनूदित यह गीत आज बरबस याद आता है। दुनिया भर के बड़े नेता डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में जुट रहे हैं, यह फैसला करने के लिए कि गरमाती धरती और बदलते वातावरण पर कैसे नकेल कसी जाए? इस सच्चाई को सभी मान रहे हैं कि धरती खतरे में है। मानव सभ्यता धीरे-धीरे पतन के गर्त की ओर धकेली जा रही है। लोग इस आशंका से डरे हुए हैं कि यदि धधकती धरती को रोका नहीं गया, तो किसी दिन प्रलय हो जाएगा।

लोगों को मालूम है कि धरती को बचाने के लिए क्या किया जाना है। 11 दिसंबर, 1997 को जापान के क्योटो शहर में हुए ऐसे ही सम्मेलन में यह रूपरेखा बनी थी कि धरती को कैसे बचाया जाए। हर देश जानता है कि किसे क्या कदम उठाना है, लेकिन उसे सचमुच अंजाम देने को कोई तैयार नहीं है। इसलिए आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या कोपेनहेगन में कोई सहमति बन पाएगी? वाकई ऐसे किसी मसले पर सहमति बन पाना बेहद मुश्किल है। और यदि बन भी गई, तो उससे धरती बच पाएगी, इसमें संदेह है। क्योंकि जब पानी गले तक पहुंचने लगता है, तब उससे बचने के लिए हमारे वैज्ञानिक नए-नए शिगूफे उछालते हैं। बड़े-बड़े सम्मेलन होते हैं। कभी रियो दा जानीरो से पृथ्वी बचाओ की आवाज उठती है, तो कभी क्योटो में जलवायु परिवर्तन को रोकने की संधि होती है, तो कभी बाली से इसे लागू करने के लिए ऐक्शन प्लान जारी होता है। अब पता नहीं, कोपेनहेगन से क्या निकलता है?

लोगों को मालूम है कि धरती को बचाने के लिए क्या किया जाना है। 11 दिसंबर, 1997 को जापान के क्योटो शहर में हुए ऐसे ही सम्मेलन में यह रूपरेखा बनी थी कि धरती को कैसे बचाया जाए। हर देश जानता है कि किसे क्या कदम उठाना है, लेकिन उसे सचमुच अंजाम देने को कोई तैयार नहीं है। इसलिए आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या कोपेनहेगन में कोई सहमति बन पाएगी?दरअसल ये सारी आवाजें अंतत: उस एक बिंदु की ओर इशारा करती हैं, जहां से हमने आधुनिक और तथाकथित विकास की डग भरी थी। वह बिंदु है औद्योगिकीकरण से पहले की दुनिया। औद्योगिकीकरण न हुआ होता, तो ग्लोबल वार्मिंग भी न हुई होती। क्योटो में भी वैज्ञानिकों ने यह रेखांकित किया था कि दुनिया को महाविनाश से बचाने के लिए ग्लोबल वार्मिंग का अधिकतम स्तर पूर्व औद्योगिकीकरण युग से दो डिग्री सेल्सियस अधिक तक ही रखना होगा। इस स्तर पर भी दुनिया 1990 में पहुंच गई थी।

आज वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा 40 प्रतिशत बढ़ चुकी है, जो धरती को रोज-ब-रोज गरमाने के लिए खतरनाक स्थिति की ओर बढ़ रही है। इसलिए वर्ष 2050 तक हमें इसमें 50 प्रतिशत तक की कटौती करनी होगी।

ग्लोबल वार्मिंग यानी ग्रीन हाउस गैसों के अतिशय उत्सर्जन के लिए पश्चिम के उन्नत देश ही मुख्यतया जिम्मेदार रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग से निजात पाने के लिए वैज्ञानिकों ने यह सुझाव दिया था कि कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम किया जाए। लेकिन इन सबका संबंध हमारे आधुनिक विकास से है। हम जितना आगे बढ़ेंगे, जितने ही हम विलास-वस्तुओं के गुलाम होते जाएंगे, कार्बन उत्सर्जन बढ़ना ही बढ़ना है।

लेकिन क्या हम ग्लोबल वार्मिंग रोकने की खातिर अपनी विलासिता और सुविधाओं में कटौती करने को तैयार हैं? शायद ही इसके लिए कोई राजी होगा। आप किसी को कहिए, तुम स्कूटर छोड़कर साइकिल पर आ जाओ, क्या वह मानेगा? हर आदमी स्कूटर से आगे कार के ही सपने देखता है। यही समाज का चलन है। क्या वैज्ञानिक हमारे लिए कोई ऐसी चीज बना सकते हैं, जिससे बिना सुविधाओं में कटौती किए ग्लोबल वार्मिंग भी कम हो जाए और हम तरक्की भी करते जाएं? बहुत मुश्किल है, लेकिन यदि वह जादुई छड़ी मिल भी जाती है, तो क्या गारंटी है कि उसके साथ कोई और नई मुसीबत नहीं आएगी?

वैज्ञानिक कह रहे हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए औद्योगिकीकरण जिम्मेदार है, तो क्या हम उसे त्यागने के लिए तैयार हैं? पश्चिमी देश जिस एक चीज पर इतराते हैं, और जिसकी वजह से उन्होंने बाकी दुनिया से बढ़त बनाई, वह औद्योगिकीकरण है। औद्योगिकीकरण ने जो समाज बनाया, वह इन सुविधाओं के बगैर रह ही नहीं सकता। इसलिए संकट जीवन शैली का है। इस लेख के आरंभ में हमने जो कविता उद्धृत की है, उसका सार क्या निकलता है? जिंदगी को खानों में बांटकर देखने की पश्चिमी औद्योगिक जीवन शैली के साथ इन पंक्तियों को नहीं समझा जा सकता। जिस समस्या को रवींद्रनाथ ठाकुर ने नौ पंक्तियों में समझा दिया, उस समस्या को समझने के लिए दुनिया भर के नीति-नियोजक जूझ रहे हैं, फिर भी किसी नतीजे तक नहीं पहुंच पा रहे।

हेनरी डेविड थोरो ने गांधी जी से 60 साल पहले नागरिक अवज्ञा और ओढ़ी हुई सादगी जैसे सिद्धांत दिए। उन्होंने कहा कि ज्यादातर विलासिता और तथाकथित सुख-भोग के साधन जिंदगी के लिए अपरिहार्य नहीं हैं, बल्कि वे तो मानव जाति के उत्थान के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं। औद्योगिक सभ्यता का मखौल उड़ाते हुए उन्होंने कहा, यदि कोई व्यक्ति अपने प्रकृति प्रेम के वशीभूत होकर वनों में घूमता है, तो लोग उसे लोफर कहेंगे, और यही व्यक्ति अगर जंगलों को उजाड़कर, धरती को नंगा करने की ठान ले, तो लोग उसे उद्यमी कहते हैं। क्या विडंबना है!भारतीय सभ्यता हजारों वर्षों से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के साथ बढ़ती रही, कभी ऐसा संकट नहीं आया, क्योंकि हम प्रकृति के विभिन्न उपादानों की उसी तरह पूजा करते रहे हैं, जैसे ईश्वर की। एक बार आपने प्रकृति को अपने से बड़ा समझ लिया, तो आप उसका शोषण कर ही नहीं सकते। जबकि उसे अपने भोग-विलास की दासी मानते ही आप उसका दोहन शुरू कर देते हैं। इसीलिए अपनी विलासिता के लिए प्रकृति के दोहन पर आधारित औद्योगिक सभ्यता ने 300 साल में ही धरती को विनाश के कगार पर ला पटका।

पश्चिम में ही इस संकट की आहट को भांपने वाले लोग भी हुए। हेनरी डेविड थोरो ने गांधी जी से 60 साल पहले नागरिक अवज्ञा और ओढ़ी हुई सादगी जैसे सिद्धांत दिए। उन्होंने कहा कि ज्यादातर विलासिता और तथाकथित सुख-भोग के साधन जिंदगी के लिए अपरिहार्य नहीं हैं, बल्कि वे तो मानव जाति के उत्थान के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं। औद्योगिक सभ्यता का मखौल उड़ाते हुए उन्होंने कहा, यदि कोई व्यक्ति अपने प्रकृति प्रेम के वशीभूत होकर वनों में घूमता है, तो लोग उसे लोफर कहेंगे, और यही व्यक्ति अगर जंगलों को उजाड़कर, धरती को नंगा करने की ठान ले, तो लोग उसे उद्यमी कहते हैं। क्या विडंबना है! पश्चिम ने थोरो की कीमत नहीं समझी। गांधी ने समझी और उनके विचारों को भारतीय विचारों के साथ मिलाकर आजादी की अलख जगाई। वह बात अलग है कि आजादी के तत्काल बाद उनके विचारों को अप्रासंगिक करार दिया गया और हम पश्चिम के जाल में फंसते चले गए। आज हम चाहें भी, तो उस जाल से नहीं निकल सकते।

(लेखक अमर उजाला से जुड़े हैं)
 

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