कृषि विकास के लिये उपयुक्त टेक्नोलॉजी

Submitted by Hindi on Fri, 05/27/2016 - 11:00
Source
योजना, 15 अगस्त, 1993

कम उपजाऊ तथा बारानी इलाकों में कृषि विकास, गाँवों में रोजगार बढ़ाने और गरीबी दूर करने दोनों दृष्टियों से आवश्यक है। यद्यपि यह एक चुनौती है परन्तु हमारे वैज्ञानिक इसका सफलतापूर्वक मुकाबला कर सकते हैं, क्योंकि कृषि अनुसंधान प्रणाली ने काफी अच्छे परिणाम दिए हैं। लेखक का कहना है कि बेहतर यही होगा कि हमारे कृषि अर्थशास्त्री तथा वैज्ञानिक उपयुक्त कृषि टेक्नोलॉजी विकसित करने के लिये मिलकर काम करें।

भारत में पिछले ढाई दशकों में हरित क्रांति तथा अनाज के मामले में आत्म निर्भरता की प्राप्ति में देश में विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी की सफलता की कहानी छिपी हुई है। वास्तव में कृषि उत्पादन के क्षेत्र में अब तक की उपलब्धियाँ हमारे कृषि अनुसंधान प्रणाली की पूर्ण क्षमताओं को प्रकट नहीं करतीं। पिछले वर्षों, विशेषकर गत डेढ़ दशक के दौरान भिन्न-भिन्न जलवायु तथा सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में भारतीय कृषि की आवश्यकताएँ पूरी करने में इस प्रणाली की क्षमताओं में बहुत वृद्धि हुई है। इतनी ही महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भारत में यहाँ तक कि दूर-दराज के इलाकों में छोटे-बड़े किसानों को विस्तार कार्यों और अनुभव के जरिए नई तथा बेहतर कृषि तकनीकों के इस्तेमाल और विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के लाभों की अच्छी जानकारी हो गई है। कृषि में काम आने वाली आधुनिक वस्तुओं की उनकी मांग तथा नए तरीकों को जानने की इच्छा बढ़ती जा रही है, जिसके फलस्वरूप गाँवों में विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी पर आधारित जो कृषि आज हमें दिखाई दे रही है, वह 25 वर्ष पहले की खेती-बाड़ी से बहुत भिन्न है। हमारी कृषि अनुसंधान प्रणाली तथा उसके प्रति किसानों की रचनात्मक प्रतिक्रिया इन दोनों बातों को देख कर लगता है, कि निकट भविष्य में कृषि क्षेत्र में तेजी से प्रगति होगी।

परन्तु कृषि उत्पादन बढ़ाने और नई टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के लाभों के समान व व्यापक वितरण को सुनिश्चित करने में इसकी भूमिका बढ़ाने के लिये यह आवश्यक है कि भारतीय कृषि में विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के उपयोग की सम्यक समीक्षा की जाए। हरित क्रांति का असर अब तक मुख्यतया गेहूूँ और चावल तक सीमित रहा है जो जलवायु तथा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों दोनों दृष्टियों से समरूप क्षेत्रों में अधिक या कम पैदा होते हैं। जहाँ सिंचाई की निश्चित व्यवस्था है और किसान भी मेहनती व समृद्ध हैं। वहाँ कुछ विशेष फसलों की पैदावार में पर्याप्त वृद्धि हुई है। दूसरी ओर उन क्षेत्रों में अधिक फसलें लेने की दिशा में खास प्रगति नहीं हुई है, जहाँ भूमि जल के बहुत स्रोत हैं तथा श्रमिक भी बहुतायत में उपलब्ध हैं।

हरित क्रांति के सीमित प्रभाव का कारण एक तो उपलब्ध टेक्नोलॉजी का अपना स्वरूप है और दूसरा भौतिक एवं संस्थागत दोनों तरह की बुनियादी सुविधाओं का असमान विकास है, जबकि ये सुविधाएँ नए कृषि उपायों को अपनाने की पहली शर्त हैं।

योजना कार्य-नीति


भारत में कृषि के लिये योजना कार्य नीति का लक्ष्य है गाँवों में निर्धनता तथा विकास की क्षेत्रीय एवं फसल सम्बंधी असमानताओं में कमी लाना, बारानी खेती का विकास, उत्पादकता में स्थिरता लाना तथा वानिकी व फसल की पैदावार के बीच बेहतर संतुलन कायम करना। ये सभी उद्देश्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं और एक दूसरे के पूरक हैं। कम विकसित तथा बारानी इलाकों में कृषि विकास से रोजगार जुटाने व गाँवों में गरीबी दूर करने के लक्ष्य प्राप्त करने में बहुत मदद मिल सकती है। तिलहन तथा दालों जैसी फसलें, जिनकी मांग और पूर्ति में बहुत अधिक अंतर है, मुख्यतः बारानी इलाकों में ही उगाई जाती हैं। सार्वजनिक सिंचाई की व्यवस्था और सूखे तथा कीड़ों का मुकाबला कर सकने वाली किस्मों के उत्तम बीज तैयार करने जैसे स्थायित्व प्रदान करने वाले उपायों से कम संसाधनों वाले क्षेत्रों व किसानों का बहुत भला हो सकता है। वानिकी के विकास से मिट्टी एवं नमी के संरक्षण के साथ-साथ रोजगार के अवसर बढ़ते हैं तथा ईंधन व चारे की आवश्यकताएं पूरी होती हैं।

ये लक्ष्य कृषि-विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी के समक्ष कुछ चुनौतियाँ प्रस्तुत करते हैं। वैज्ञानिकों को कम संसाधनों वाले तथा पर्यावरण की दृष्टि से कठिन क्षेत्रों, जहाँ कम तथा घटती-बढ़ती वर्षा के कारण नमी की कमी रहती है और उन निचले क्षेत्रों, जहाँ आमतौर पर बाढ़ आती है, की ओर अधिक से अधिक ध्यान देना होगा। उन्हें तिलहन जैसी अधिक ऊर्जा की आवश्यकता वाली फसलों की समस्याओं पर भी ध्यान देना होगा, जो कीड़ों व बीमारियों का जल्दी शिकार हो जाती हैं। सामाजिक-आर्थिक संदर्भों में कृषि अनुसंधान में छोटे तथा सीमान्त किसानों और जनजातीय क्षत्रों के किसानों की कम धन लगा सकने और जोखिम न उठा पाने की क्षमता पर ध्यान देना होगा।

इन विषम कृषि जलवायु परिस्थितियों एवं सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्थान विशेष के अनुरूप ही खेती-बाड़ी के संशोधित उपायों अपनाने का सुझाव दिया जाना चाहिए।

इन चुनौतियों का सामना करने के लिये निम्नलिखित कार्यनीतियों को अपनाना आवश्यक होगा। पहली है अनुसंधान के आधार को व्यापक बनाना जिससे भिन्न-भिन्न कृषि जलवायु स्थितियों में उगाई जाने वाली अनेक नई फसलों को उसमें शामिल किया जा सके। इसके लिये बड़े पैमाने पर परिवर्तनीय अनुसंधान करना होगा जिससे ज्ञात क्षमता तथा उसके वास्तविक परिणामों में इस समय जो व्यापक अंतर मौजूद है, उसे दूर किया जा सकेगा। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये वैज्ञानिकों को किसानों के खेतों के और निकट जाना होगा ताकि प्रयोगशाला से खेत तक की संचार व्यवस्था सचमुच कारगर बन सके। पैदावार बढ़ाने के उपायों की बजाय किसी कृषि वर्ष में उगाई जाने वाली सभी फसलों में समूची आय बढ़ाने पर बल दिया जाना चाहिए। इसके लिये पूरे वर्ष के दौरान विविध कृषि जलवायु के अनुकूल फसलों को बदल-बदलकर बुवाई सहित विभिन्न फसल प्रणालियों में अनुसंधान करने की आवश्यकता होगी जिससे भूमि, श्रम आदि जैसे किसानों के अपने संसाधनों का भरपूर लाभ उठाया जाए और भूजल, धूप जैसे प्राकृतिक संसाधनों का भी पूरा उपयोग किया जाए।

जिन क्षत्रों में न्यून से लेकर मध्यम स्तर की वर्षा होती है, किन्तु सिंचाई की समुचित व्यवस्था भी है वे नई बीज-उर्वरक टेक्नोलॉजी के लाभदायक इस्तेमाल के लिये अभी तक सबसे अधिक उपयुक्त सिद्ध हुए हैं।

तीसरी कार्यनीति यह है कि खेती के काम आने वाली वस्तुओं के संरक्षण व बचत के लिये अनुसंधान पर पर्याप्त बल देना होगा। पानी प्राप्त करने की तकनीकों सहित जल प्रबंध, नाइट्रोजन का जैविक निर्धारण, रासायनिक खादों की बर्बादी कम करने, कीड़ों तथा बीमारियों का मुकाबला कर सकने और प्रतिकूल पर्यावरण में अधिक उपज देने वाले बीजों के विकास जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान इसी वर्ग में आता है।

इस प्रक्रिया के दो बुनियादी हिस्से हैं। ये हैं- ऐसी कृषि अनुसंधान प्रणाली जिसमें वैज्ञानिक सुयोग्य होने के साथ-साथ खेतों में किसानों की समस्याओं को समझते हों और ऐसी विस्तार प्रणाली जिसमें किसानों तक सभी उपयोगी तकनीकों की जानकारी पहुँचाने के साथ-साथ उन्हें विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी के प्रति लगातार जागरूक बनाया जाए।

अनुभव


यह मानना सही नहीं है कि हरित क्रांति की टेक्नोलॉजी बुनियादी तौर पर विकासशील देशों में ही वहाँ की परिस्थितियों की प्रतिक्रिया से विकसित हुई है। इनमें अनेक विधियाँ काफी हद तक विकसित देशों में हस्तांतरित हुई हैं और विकासशील देशों की परिस्थितियों के अनुरूप ढाल लिया गया है, इसलिये इन तकनीकों के उन पहलुओं को समझना आवश्यक है जो विकसित देशों की परिस्थितियों से प्रभावित हैं विकासशील अर्थव्यवस्था की उन परिस्थितियों को भी समझना होगा जिनके कारण ये विधियाँ लाई गई और जो इन विधियों में आवश्यक परिवर्तन के अनुरूप हैं।

अनेक विकसित देशों, विशेष रूप से अमरीका तथा जापान ने दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात के पहले दो दशकों में फसलों की पैदावार बढ़ाने में बहुत प्रगति की। इन देशों में कृषि सम्बंधी बुनियादी ढाँचा, विशेष रूप से जल प्रबंध बहुत विकसित था। अपेक्षाकृत समान जलवायु वाले वातावरण के लिये नई बीज-उर्वरक टेक्नोलॉजी का विकास किया गया। एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि उस अवधि में कृषि उत्पादन में वृद्धि औद्योगिक उत्पादन के बाद हुई। उस समय जहाँ औद्योगिक उत्पाद उपलब्ध होने लगे थे, वहाँ मजदूरी महंगी होने लगी थीं। कृषि में यह प्रगति परस्पर विपरीत स्थितियों में हुई, क्योंकि अमरीका में तो भूमि काफी पैमाने पर उपलब्ध थी परन्तु जापान में खेती-बाड़ी के लिये जमीन की बहुत कमी थी। इसलिये नई जैव-रासायनिक टेक्नोलॉजी से कम जमीन तथा कम मजदूरी से तो काम चल सकता था परन्तु इसमें पूँजी की अधिक आवश्यकता थी। इससे भी बढ़कर समूचा संस्थागत ढाँचा जिसमें किसानों की जागरूकता और प्रशासनिक योग्यताएं भी शामिल हैं नई टेक्नोलॉजी तेजी से अपनाने में सहायक था। यही कारण है कि इन देशों के विकासशील देशों की तुलना में कुल कृषि उत्पादन के मूल्य में विस्तार सेवाओं पर किए गए खर्च का अनुपात बहुत कम रहा।

युद्धोत्तर काल में विकासशील देशों को अपनी बढ़ती हुई आबादी तथा सीमित भूमि के कारण विकसित देशों से अधिक उपज देने वाली किस्में लेनी पड़ी। अतः यह स्वाभाविक ही है कि भारत में हरित क्रांति के प्रथम चरण में भूमि की बचत वाली टेक्नोलॉजी उन क्षेत्रों में व्यापक रूप से अपनाई गई, जहाँ भूमि की प्रति श्रमिक उपलब्धता राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक थी। दूसरी ओर, जिन क्षेत्रों में जमीन कम किन्तु मजदूर बहुतायत में थे, वे भूमि बचाने वाली टेक्नोलॉजी अपनाने में कुछ वर्षों तक पिछड़े रहे।

लगता है कि नई टेक्नोलॉजी की कृषि जलवायु सम्बंधी अनुकूलता ही नई टेक्नोलॉजी के प्रभाव में क्षेत्रीय विषमता का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है। यह भी सही है कि अच्छे जलवायु व वातावरण वाले क्षेत्रों में पूँजी लगने की क्षमता तथा संस्थागत तैयारी भी बेहतर होती है। जिन क्षत्रों में न्यून से लेकर मध्यम स्तर की वर्षा होती है, किन्तु सिंचाई की समुचित व्यवस्था भी है वे नई बीज-उर्वरक टेक्नोलॉजी के लाभदायक इस्तेमाल के लिये अभी तक सबसे अधिक उपयुक्त सिद्ध हुए हैं। इन क्षेत्रों में खुली धूप पड़ती है और कीड़ों तथा बीमारियों का असर अपेक्षाकृत कम है। यह भी मात्र संयोग नहीं है कि प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से देश में चोटी के चार राज्य नई टेक्नोलॉजी अपनाने में भी अग्रणी रहे हैं। ये हैं पंजाब और हरियाणा, जहाँ सिंचाई की समुचित व्यवस्था है और महाराष्ट्र व गुजरात जो मुख्यतया वर्षा पर निर्भर हैं। किसानों की संपन्नता के साथ-साथ इन राज्यों की सरकारों के पास भी पर्याप्त संसाधन हैं और वहाँ की शासन व्यवस्था भी अपेक्षाकृत चुस्त दुरुस्त है।

नई प्राथमिकताएँ


भारत में कृषि अनुसंधान में नई प्राथमिकताएँ हैं- 1. वर्षा सिंचित क्षेत्रों में अधिक उपज देने वाली किस्मों की बुवाई की बजाय अधिक स्थिरता वाली किस्में विकसित करना, जिससे पैदावार के घटने-बढ़ने की स्थिति दूर हो सकेगी। इसके लिये ऐसी किस्में तैयार करने की जरूरत है जो सूखे में भी उग सकें, कीड़ों का मुकाबला कर सकें और जिनसे मिट्टी में नमी का संरक्षण होता हो, 2. नाइट्रोजन के जैविक निर्धारण सहित खेती के उपकरणों की बचत करने वाले विभिन्न उपायों के माध्यम से किसानों पर लागत का बोझ कम करना और 3. किसानों की आय बढ़ाने के लिये फसलों तथा खेती-बाड़ी की ऐसी प्रणालियाँ विकसित करना, जिनसे वे पूरा साल अपने संसाधनों का अधिक-से-अधिक इस्तेमाल कर सकें।

इन प्राथमिकताओं पर काम करने के लिये अलग-अलग स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अनुसंधान करके खेतों की वास्तविक स्थितियाँ जानने के अधिक प्रयास करने होंगे क्योंकि प्रतिकूल व वातावरण में असमान स्थितियों की अधिकता रहती है। इसके अलावा अनुसंधान का परीक्षण करने के लिये अधिक से अधिक किसानों को आगे आना चाहिए। मौजूदा प्रणालियों के बीच सामाजिक-आर्थिक सम्बंधों को समझने के लिये कृषि वैज्ञानिकों तथा सामाजिक वैज्ञानिकों, विशेषकर कृषि अर्थशास्त्रियों के बीच अधिक सहयोग होना चाहिए, इससे टेक्नोलॉजी को किसानों के पास उपलब्ध संसाधनों व उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने में मदद मिलेगी।

जैव टेक्नोलॉजी लागू हो जाने से हरित क्रांति टेक्नोलॉजी से जुड़े ‘रासायनिकरण’ का स्थान ‘अनुवांशिकी इंजीनियरी’ ले लेगी। जैव टेक्नोलॉजी में बीज का केन्द्रीय स्थान है।

चावल-तिलहन दालों जैसी पिछड़ी हुई फसलों की उत्पादकता में पिछले दशक में जो वृद्धि हुई है, उसमें नई टेक्नोलॉजी विकसित करने से अधिक हाथ मौजूदा टेक्नोलॉजी को विशेष कार्यक्रमों के जरिए और अधिक क्षेत्रों तक पहुँचाने का रहा है। इस अनुभव से उन क्षेत्रों में विशेष कार्यक्रम चलाने तथा कृषि में काम आने वाली वस्तुओं के लिये सब्सिडी का महत्त्व सिद्ध होता है, जहाँ प्रारम्भिक समय की हरित क्रांति से कृषि उत्पादों के तुलनात्मक मूल्यों में कमी आई है। जहाँ पैदावार में काफी पैमाने पर घट-बढ़ होती है और जहाँ किसान गरीब हैं तथा जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं है, किसानों को विशेषकर तिलहनों के उत्पादकों को उनके उत्पादों के लाभकारी मूल्य दिलाना भी बहुत उपयोगी रहा है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा टेक्नोलॉजी हस्तांतरण परियोजना के तहत ‘खेतों’ में किए गए राष्ट्रीय प्रदर्शनों के परिणामों से पता चलता है कि प्रदर्शनों के दौरान प्राप्त की गई उत्पादकता और राष्ट्रीय औसत उत्पादकता में काफी अंतर है तथा सभी प्रमुख फसलों में उत्पादकता दो से तीन गुना बढ़ सकती है। किन्तु कृषि तथा जलवायु सम्बंधी एक जैसी परिस्थितियों में वास्तविक पैदावार तथा पैदावार की क्षमताओं में अंतर आमतौर पर 50-60 प्रतिशत से अधिक नहीं है। यह अंतर वर्षा सिंचित क्षेत्रों तथा खरीफ मौसम में अधिक रहता है जिससे यह बात प्रकट होती है कि किसानों को वर्षा की अनिश्चित स्थितियों में कृषि आदानों का कम इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि ये प्रदर्शन किसी एक फसल के लिये होते हैं अतः यह कहना कठिन है कि ये नई किस्में किसानों की नई फसल प्रणालियों के कितनी अनुकूल होंगी। फसल लेने तथा बुवाई प्रणालियों के बारे में अनुसंधान में त्रुटियाँ एकदम स्पष्ट हैं जोकि संभवतः अनुसंधान का सबसे कठिन और जटिल क्षेत्र है, क्योंकि यह क्षेत्र आधारित है और इसमें एक से अधिक विषयों के विशेषज्ञों का सहयोग आवश्यक है। लगता है सिंचाई वाले क्षेत्रों या वर्षा सिंचित खरीफ फसलों में जबकि मृदा में पर्याप्त नमी होती है कृषि में निवेश पर प्रति व्यक्ति लाभ सर्वाधिक होता है। उत्पादकता बढ़ाने तथा उसके घटने बढ़ने की प्रवृत्ति में कमी होने की सम्भावना के फलस्वरूप बारानी खेती की कार्यनीति में बीजों में आनुवांशिक सुधार लाने के काम को मृदा तथा नमी संरक्षण के साथ जोड़ने की प्रेरणा मिली है। जल प्राप्त करने के एक मुख्य उद्देश्य के साथ वर्षा सिंचित क्षेत्रों के लिये चलाए गए राष्ट्रीय जल विभाजक विकास कार्यक्रम वर्षों के परीक्षणों के बाद अब व्यवस्थित रूप ले पाया है और आशा है कि आने वाले वर्षों में वह अच्छे परिणाम दे पाएगा।

नीतियों में नई दिशाः- जैव टेक्नोलॉजी उत्पादकता बढ़ाने तथा उत्पादन में घट बढ़ का सिलसिला कम करने के मामले में भारतीय कृषि अनुसंधान प्रणाली की उपलब्धियाँ प्रतिकूल जलवायु वाले क्षेत्रों में उतनी उत्साहजनक नहीं रही हैं, जितनी हरित क्रांति के प्रारम्भिक वर्षों में अनुकूल जलवायु वाले क्षेत्रों में रहीं। अनुवांशिकी इंजीनियरी, टिशु कल्चर आदि जैसी जैव टेक्नोलॉजी से इन बाधाओं को दूर किए जाने की आशा बंधी है।

पौधों में अनुवांशिक परिवर्तन किए जाने से कीटों तथा रोगों का मुकाबला करने में सक्षम प्रणालियाँ विकसित होने के कारण वास्तविक उत्पादकता तथा सम्भावित उत्पादकता के बीच अंतर कम किया जा सकेगा। इसके अलावा पौधों में अनुवांशिक परिवर्तनों से उन्हें मृदा तथा जलवायु की प्रतिकूल परिस्थितियों से जैव दबावों का मुकाबला करने योग्य बनाया जा सकता है। इस प्रकार फसल को दुगुना करने के लिये पर्यावरण सम्बंधी दबावों के प्रति पौधों की भौतिक प्रतिक्रिया तथा उनकी बनावट में संशोधन करने की उत्पादन प्रणालियों में पूरक सहभागी के रूप में सहयोगी बना सकते हैं।

जैव टेक्नोलॉजी की सम्भवततः सबसे महत्त्वूपर्ण विशेषता, जो उसे हरित क्रान्ति अथवा बीज-उर्वरक टेक्नोलॉजी से बेहतर बनाती है, वह है नाईट्रोजन के जैविक निर्धारण, जैव उर्वरक तथा कीड़ों का मुकाबला करने की क्षमता के कारण कीटनाशक दवाओं कौर उर्वरकों जैसी वस्तुओं की बचत। जैव टेक्नोलॉजी लागू हो जाने से हरित क्रांति टेक्नोलॉजी से जुड़े ‘रासायनिकरण’ का स्थान ‘अनुवांशिकी इंजीनियरी’ ले लेगी। जैव टेक्नोलॉजी में बीज का केन्द्रीय स्थान है।

जैव टेक्नोलॉजी नए पौधों को जैव तथा गैर-जैव दबावों का मुकाबला करने में अधिक सक्षम बनाने के अलावा फसलों की पैदावार में स्थिरता लाती है। फसलों के नुकसान को कम करके वास्तविक तथा संभावित पैदावार में अंतर कम करती हैं और हरित क्रांति की तुलना में अधिक व्यापक क्षेत्र में उपयोगी हो सकती है, क्योंकि हरित क्रांति टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल केवल अनुकूल जलवायु वाले क्षेत्र में किया गया। बीज तैयार करने की परम्परागत विधियों की तुलना में इसमें नए बीज विकसित करने में अधिक कार्यकुशलता तथा समय की बचत के कारण टेक्नोलॉजी में प्रगति की दर अधिक रहने की सम्भावना है। जैव टेक्नोलॉजी से यद्यपि कृषि में काम आने वाले रासायनिक पदार्थों की बचत होगी, परन्तु उनके इस्तेमाल के लिये अधिक जानकारी और कौशल की आवश्यकता पड़ेगी। जिसके लिये अनुसंधान तथा किसानों की क्षमता बढ़ाने के प्रयासों में अधिक निवेश करना आवश्यक होगा।

जैव टेक्नोलॉजी गरीब किसानों के हित में है। इसके कई कारण हैं। एक तो बीज-उर्वरक टेक्नोलॉजी की भांति खेत के छोटा या बड़ा होने से इसकी उपयोगिता पर कोई असर नहीं पड़ता। इससे रासायनिक आदानों की बचत होती है, पैदावार में स्थिरता आती है और प्रतिकूल परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलों में इसके इस्तेमाल की बेहतर सम्भावनाएं हैं। परन्तु निर्धनों के हित की इसकी क्षमताओं का उपयोग अनुसंधान के लिये प्राथमिकताओं के निर्धारण पर निर्भर करता है। इसका कारण यह है जैव टेक्नोलॉजी से अनेक प्रकार के वैकल्पिक अवसर प्राप्त होते हैं जिन्हें गरीबों के हितों के विरुद्ध भी बनाया जा सकता है। इसका ज्वलंत उदाहरण है कीड़ों का मुकाबला कर सकने और कीटनाशक दवाओं का मुकाबला कर सकने वाली किस्मों में से चुनाव करना। पहले प्रकार के बीज निर्धन लोगों के लिये हितकर तथा पर्यावरण संरक्षण में सहायक हैं। अतः इससे कीटनाशक दवाओं की बचत होती है जबकि दूसरी तरह के बीजों से कीटनाशक दवाओं का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को फायदा हो सकता है। विकसित देशों की उन्नत टेक्नोलॉजी की मदद से उन वस्तुओं के स्थान पर भारतीय वस्तुएँ तैयार की जा सकती हैं, जिन्हें अल्प-विकसित देशों से आयात करके गरीबी की समस्या और गम्भीर बनाई जाती है।

जैव टेक्नोलॉजी में लचीलेपन की पर्याप्त सम्भावना के कारण इसमें अनुसंधान की कार्यनीति तथा नीति की भूमिका और बढ़ जाती है। जैव टेक्नोलॉजी में अनुसंधान तथा अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में आत्म निर्भरता प्राप्त करने के लिये सही प्राथमिकताएँ निर्धारित करने में विकासशील देशों की सरकारों की भूमिका हरित क्रांति टेक्नोलॉजी में अनुसंधान में निभाई गई भूमिका से कहीं अधिक आवश्यक और महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि कृषि क्षेत्र में अधिक हिस्सा प्रतिकूल परिस्थितियों वाले इलाकों का है। अतः प्रगति तथा न्याय दोनों दृष्टियों से इन परिस्थितियों के अनुरूप टेक्नोलॉजी विकसित करने में निवेश करना वांछनीय होगा। आधुनिक जैव टेक्नोलॉजी से सम्भावनाओं के जो नए द्वार खुले हैं, उन्हें देखते हुए कृषि अनुसंधान में इस निवेश की लाभप्रदता बढ़ गई है क्योंकि पूर्वी भारत जैसे प्रतिकूल परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में वास्तविक तथा सम्भावित पैदावार में बहुत अधिक अंतर है।

जैव टेक्नोलॉजी से अनेक तरह के विकल्प उपलब्ध होने के फलस्वरूप अर्थशास्त्रियों और सामाजिक वैज्ञानिकों के लिये भी नई टेक्नोलॉजी के विकास में योगदान करने की गुंजाइश बढ़ गई है। अर्थशास्त्री अभी तक नई बीज-उर्वरक टेक्नोलॉजी अपनाए जाने के बाद के परिणामों का ही विश्लेषण करते रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से उचित टेक्नोलॉजी के विकास में तथा नीति निर्धारण स्तर पर उनका योगदान बहुत कम रहा है। अतः उचित टेक्नोलॉजी विकसित करने तथा कृषि टेक्नोलॉजी की नीति तय करने के लिये कृषि अर्थशास्त्रियों और कृषि वैज्ञानिकों के सामूहिक योगदान की दिशा में प्रयास करना अब आवश्यक है।

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