कुछ भी नहीं यह संसार

Submitted by Hindi on Fri, 05/13/2011 - 10:28
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

मेरा मुख्य काम बाहर से आने वाले तथा जाने वाले पौधों का निरीक्षण करके यह पता लगाना था कि उन्हें बीमारी-वाहक कीड़े तो नहीं लगे हुए हैं। खुशकिस्मती से मुझे काफी खाली वक्त मिल जाता था, जिसका उपयोग मैं अनुसंधान-प्रयोगशाला में पौधों की बीमारियों के बारे में, जो कि मेरा विषय था, परीक्षण करते हुए करता था।

इधर लोग मुझसे पूछते रहे हैं कि इस ढंग की खेती मैंने इतने बरस पहले ही क्यों शुरू कर दी थी। अब तक इस विषय में मैंने किसी से चर्चा नहीं की थी। शायद इस बारे में बात करने का कोई अवसर ही आया। इस सबकी शुरुआत बस, क्या कहते हैं, एक ऐसे छोटे से तजुर्बे से हुई जो अचानक मेरे दिमाग में कौंध गया।

इस अनुभूति ने मेरी जिंदगी को बिल्कुल ही बदल डाला। वैसे इसमें कहने जैसी कोई खास बात नहीं है। लेकिन उसे कुछ इस ढंग से बयान किया जा सकता हैः ‘मानवता को कुछ भी पता नहीं है। किसी भी चीज का अपना कोई अंतर्निहित मूल्य नहीं होता, और हमारी हर क्रिया एक निष्फल, निरर्थक प्रयास होता है।’ सुनने में यह विचार बड़ा अजीब सा लग सकता है, लेकिन यदि उसे शब्दों में बयां करें तो उसको केवल इसी ढंग से बखाना जा सकता है।

यह ‘विचार’ मेरे दिमाग में अचानक जब विकसित हुआ तब मेरी उम्र काफी कम थी। मुझे तब यह पता नहीं था कि मेरी यह अंतर्दृष्टि कि-मानव की सारी समझदारी और सारे प्रयास बेमानी है, वाजिब है या नहीं, लेकिन यदि मैं इन विचारों की समीक्षा कर उन्हें दिमाग से निकाल भी देना चाहूं तो मेरे अपने भीतर कोई ऐसी चीज मैं नहीं पाता जिसके बल पर मैं उनका खंडन कर सकूं। बस, एक विश्वास मेरे भीतर था, जो मुझसे कह रहा था कि यह ऐसा ही है।

आमतौर से लोग मानते हैं कि मानव की बुद्धि से ज्यादा शानदार कोई चीज नहीं है। कि मानव कुछ विशेष मूल्य रखनेवाला प्राणी है और संस्कृति एवं इतिहास द्वारा प्रतिबिम्बित उसकी रचनाएं और उपलब्धियां देखने में अद्भुत हैं। बहरहाल यह धारणा आम है।

चूंकि मैं जो कुछ भी सोच रहा था, वह इस धारणा को खारिज करता था, इस कारण मैं अपने विचारों को किसी के सामने व्यक्त नहीं कर पाया। आखिर मैंने अपने विचारों को एक ठोस आकार देने तथा उन्हें व्यवहार में लाने का निश्चय किया। ताकि यह तय हो सके कि जो कुछ मैंने सोचा समझा है, वह सही है या गलत। यहीं से मैं यह खेती करने, चावल और जाड़ों की फसल उगाने के रास्ते चल पड़ा। पर आखिर वह अनुभव कौन सा था जिसने मेरी जिंदगी को बदल डाला।

आज से चालीस बरस पहले जब मैं खुद पच्चीस साल का था, मैं योकोहामा कस्टम ब्यूरो (सीमाशुल्क कार्यालय) के पौध निरीक्षण विभाग में काम कर रहा था। मेरा मुख्य काम बाहर से आने वाले तथा जाने वाले पौधों का निरीक्षण करके यह पता लगाना था कि उन्हें बीमारी-वाहक कीड़े तो नहीं लगे हुए हैं। खुशकिस्मती से मुझे काफी खाली वक्त मिल जाता था, जिसका उपयोग मैं अनुसंधान-प्रयोगशाला में पौधों की बीमारियों के बारे में, जो कि मेरा विषय था, परीक्षण करते हुए करता था। यह प्रयोगशाला यामाते उद्यान के पास स्थित थी, और वहां से योकोहामा बंदरगाह दिखाई देता था। इमारत के ठीक सामने कैथोलिक गिरजाघर था तथा पूरब में फेरिस गर्ल्स स्कूल भी। माहौल में खामोशी थी जो कि अनुसंधान कार्य के लिए आदर्श वातावरण बनाती थी।

प्रयोगशाला में रोग अनुसंधानकर्ता थे आईची कुरोसावा। पौध-व्याध-विज्ञान का अध्ययन मैंने गोफू कृषि उच्च माध्यमिक विद्यालय के अध्यापक माकोतो ओकेश के आधीन किया था तथा ओकायामा शासकीय कृषि परीक्षण केंद्र के सुइहिको इगाता से भी मैं मार्गदर्शन प्राप्त कर रहा था।

प्रोफेसर कुरोसावा का छात्रा होना मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात थी। हांलाकि शैक्षिक जगत में उन्हें ज्यादातर लोग नहीं जानते थे, उन्होंने चावल को लगने वाली बीमारी ‘बाकाने’ की फफूंद को अलग कर उसका कल्चर (संवर्ध) विकसित किया। उन्होंने ही पहली बार इस फंगस कल्चर से पौधों को बढ़ाने वाले हारमोन ‘जिबेरेलिन’ को अलग किया। धान के छोटे पौधे, यदि इस हारमोन की थोड़ी सी मात्रा सोख ले तो वह पौधा असाधारण रूप से लम्बा हो जाता है। लेकिन इसी की अधिक मात्रा पौधे को देने से उसका ठीक उल्टा असर होता है, और पौधे की बढ़त रुक जाती है। जापान में तो किसी ने इस खोज पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन विदेशों में यह सक्रिय अनुसंधान का विषय बन गया। इसके बाद ही एक अमेरिकी वैज्ञानिक ने ‘जिबेरेलिन’ का उपयोग अंगूर की बीज-रहित किस्म विकसित करने के लिए किया।

कुरोसावा-सान (हमारे ‘जी’ की तरह सम्मानजनक शब्द) को मैं अपने पिता की तरह मानता था, और उन्हीं के मार्गदर्शन में मैंने अपनी एक विच्छेदन सूक्ष्मदर्शी (डिसेक्शन माइक्रोस्कोप) बनाया और अमेरिकी-जापानी नारंगी फलों के तने, शाखाओं और फलों को लगने वाली बीमारियों पर अनुसंधान शुरू कर दिया।

सूक्ष्मदर्शी में झांकते हुए मैंने फफूंद संबंधी अध्ययन किया। कई प्रकार की फफूंदों का संकरण किया तथा नई रोगजनक किस्में विकसित कीं। अपने काम में मुझे खूब आनंद आता था। चूंकि इस काम के लिए लगातार गहरी एकाग्रता चाहिए होती थी। कई बार मैं प्रयोगशाला में काम करते बेहोश तक हो गया।

यही वक्त जवानी के जोश-खरोश का भी होने के कारण मैं अपना सारा समय प्रयोगशाला के बंद दरवाजों के पीछे ही नहीं बिताता था। यहीं पर योकोहामा का बंदरगाह था, जहां ऐश करने के लिए काफी गुंजाइश थी। इसी दौरान एक घटना घटी। हाथ में कैमरा लिए मैं गोदी के किनारे टहल रहा था कि अचानक मेरी निगाह एक खूबसूरत स्त्री पर पड़ी। यह सोचकर कि वह तस्वीर खींचने के लिए एक अच्छा विषय होगी, मैंने उसे एक पोज देने के लिए कहा। मैं उसे वहां लंगर डाले खड़े एक विदेशी जहाज पर ले गया और उसे तरह-तरह की मुद्राओं में खड़ा होने को कहा और उसकी कई तस्वीरें खींचीं। उसने मुझ से कहा कि तस्वीरें तैयार हो जाने पर उनकी ‘कापियां’ मैं उसे भेज दूं। जब मैंने उससे पूछा कि तस्वीरें किस पते पर भेजूं, तो उसने बगैर अपना नाम बतलाए सिर्फ इतना ही कहा, ‘आकुनाको’ और वहां से चल दी।

फिल्म डेवलप करने के बाद मैंने वो फोटो अपने एक मित्र को दिखलाकर उससे पूछा कि क्या वह उसे पहचानता है। उसका मुंह आश्चर्य से खुला रह गया और उसने कहा, ‘यह तो प्रसिद्ध सिनेतारिका माईको ताकामीने है।’ तत्काल मैंने दस एनलार्ज फिल्मप्रिंट उसे ओकुना सिटी भेज दिए। कुछ ही दिनों के बाद वे हस्ताक्षर सहित डाक द्वारा मेरे पास वापिस आ गए। लेकिन उनमें एक तस्वीर कम थी। जब मैंने बाद में इस पर सोचा तो वह उसका तिरछा नजदीक से लिए चेहरे का फोटो था, जिसमें शायद उसके चेहरे की झुर्रियां नजर आ रही होंगी। मैंने नारी मन की एक झलक पायी, यह सोचकर मुझे खुशी हुई।

कभी-कभी बेढब और असहज होने के बावजूद मैं नानकिंगाई क्षेत्र के नाच घरों में भी चला जाया करता था। वहां एक बार मेरी नजर लोकप्रिय गायिका नोरिको आयाबा पर पड़ी और मैंने उसे अपने साथ नृत्य करने के लिए आमंत्रित किया। उस नृत्य के अनुभव को मैं कभी नहीं भुला पाया। उसके भरे-पुरे जिस्म से मैं इस कदर अभीभूत हो गया कि उसकी कमर में अपना बाजू तक नहीं डाल सका।

इस परिवर्तन के बावजूद मूल रूप से मैं वही औसत, अज्ञानी व्यक्ति बना रहा और इसमें तब से अब तक कोई फर्क नहीं आया है बाहर से देखने पर आपको मुझसे ज्यादा आम व्यक्ति कोई अन्य नजर नहीं आएगा। मेरी रोजमर्रा की जिंदगी में भी असाधारण कुछ भी नहीं है।

कुल मिलाकर मैं बहुत अधिक व्यस्त रहता था और खुद को ऐसा खुशनसीब युवा मानता था जो सूक्ष्मदर्शी आंख से उजागर होती प्रकृति से चमत्कृत हो रहा था। मुझे पहली बार पता चला कि यह सूक्ष्म जगत बाहर के विराट जगत के साथ कितनी समानता रखता है। शामों को मैं चाहें मोहब्बत कर रहा हूं या नहीं, मैं फिर भी घूमते-फिरते जिंगदी का लुत्फ उठाता था। मुझे लगता है कि अति परिश्रम की थकान तथा लक्ष्यहीन जीवन ही प्रयोगशाला में मेरी बेहोशी का कारण बना। इस सबका परिणाम यह हुआ कि मुझे अचानक निमोनिया हो गया, और मुझे पुलिस अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती होना पड़ा।

वे जाड़े के दिन थे। टूटी हुई खिड़की के कारण कमरे में काफी बर्फ आ जाती थी। रजाई के भीतर तो शरीर गर्म रहता था लेकिन मेरा चेहरा बर्फ हो जाता था। मेरा बुखार नाप कर नर्स तुरंत चली जाती थी।

चूंकि मेरा कमरा एक निजी वार्ड था, इसलिए लोग मेरे कमरे में शायद कभी ही झांकते थे। मुझे ऐसा लगा जैसे, मुझे बाहर ठंड में छोड़ दिया गया है, और अचानक मैं अकेलेपन और एकांत की गहराईयों में गुम गया हूं। मुझे पहली बार मौत का भय सताने लगा। अब जब मैं उसके बारे में सोचता हूं तो मुझे यह भय बेमानी लगता है। लेकिन तब मैंने उसे बड़ी गंभीरता से लिया था।

आखिर मुझे अस्पताल से तो छुट्टी दे दी गई लेकिन मैं उसे अवसाद से मुक्त नहीं हो पाया। आखिर उस समय के पहले तक मैं किसी चीज पर भरोसा किए हुए था? मैं बेफिक्र और खुद से संतुष्ट था। लेकिन आखिर उस आत्मसंतुष्टि की प्रकृति क्या थी? जीवन और मृत्यु की प्रकृति के बारे में कई शंकाएं मेरे मन में उठ रही थीं। न मैं सो पाता था और न ही कुछ काम कर पाता था। रात-रात भर बंदरगाह में तथा कगार पर टहलने से भी मुझे कोई राहत नहीं मिलती थी।

एक रात भटकते-भटकते मैं बंदरगाह की ओर वाली पहाड़ी पर थकान से चूर हो गिर पड़ा, और एक विशाल वृक्ष के तने से टिक कर ऊघंने लगा। भोर तक मैं वहीं अर्धचेतन अवस्था में पड़ा रहा। मुझे आज तक याद है कि वह 15 मई की सुबह थी। चौंधियाई आंखों से मैंने बंदरगाह पर रोशनी फैलती देखी; सूर्योदय भी मैं देख रहा था और नहीं भी। जैसे ही कगार से बयार बहनी शुरू हुई, अचानक सुबह का कोहरा छंट गया। ठीक उसी क्षण रात का बगुला वहां दिखलाई पड़ा और जोर से चीख मारकर दूर आसमान में उड़ गया। मुझे उसके पंखों के फड़फड़ाने की आवाज तक सुनाई दे रही थी। पल भर में मेरे सारे संदेह दूर हो गए, और शंका-कुशंकाओं की धुंध छंट सी गई। हवा के एक झोंके के साथ मेरे अब तक के सारे विश्वास और संबल उड़ गए। मुझे लगा कि मैं केवल एक चीज समझ रहा हूं। उनके बारे में सोचे बगैर मेरे मुंह से ये शब्द निकल पड़े - ‘इस दुनिया में कुछ भी नहीं है...’ मुझे लगा कि मैं कुछ भी नहीं समझता।

मुझे समझ में आ गया कि, अभी तक मैं जिन अवधारणाओं के साथ चिपका हुआ था - जो मेरे अस्तित्व का अहसास थीं वे भी सब मनगढ़ंत, खोखली कल्पनाएं थीं। मेरा मन बिल्कुल हल्का और स्वच्छ हो गया। खुशी के मारे मैं झूम उठा। अब मैं पेड़ों पर बैठे परिंदों की चहचहाहट सुन पा रहा था, और उगते सूरज की रोशनी में दूर चमकती समुद्र की लहरें भी मुझे दिखलाई पड़ रही थीं। चमकती हरी पत्तियां नृत्य कर रही थीं। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे, यहीं धरती पर स्वर्ग है। अब तक जो भी चीजें मुझ पर हावी थीं वे, तथा मेरी सारी पीड़ाएं भी स्वप्न और भ्रमों की तरह रफूचक्कर हो गयीं और जिसे हम ‘सच्ची प्रकृति’ कह सकते हैं, मेरी आंखों के समक्ष साक्षात उजागर हो गई।

मेरे खयाल से यह कहने में कोई हर्ज नहीं होगा कि उस सुबह के अनुभव ने मेरे जीवन को पूरी तरह बदल डाला।

इस परिवर्तन के बावजूद मूल रूप से मैं वही औसत, अज्ञानी व्यक्ति बना रहा और इसमें तब से अब तक कोई फर्क नहीं आया है बाहर से देखने पर आपको मुझसे ज्यादा आम व्यक्ति कोई अन्य नजर नहीं आएगा। मेरी रोजमर्रा की जिंदगी में भी असाधारण कुछ भी नहीं है। लेकिन इस विश्वास में कि मैं यह एक चीज जानता हूं, तब से आज तक कोई फर्क नहीं आया है। मैंने तीस वर्ष, चालीस वर्ष यह जांचते हुए बिता दिए कि मेरी वह धारणा गलत तो नहीं थी। लेकिन अब तक एक बार भी मुझे अपने विश्वास के विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं मिला।

यह अहसास बहुत ही मूल्यवान है। इसका मतलब यह कतई नहीं कि मेरे साथ कोई विशेष मूल्य जुड़ गए हैं। मैं अब भी एक सीधा-सादा आदमी हूं। बल्कि एक सठियाया हुआ बूढ़ा हूं। अकस्मात देखने वालों को मैं या तो बहुत विनयशील नजर आता हूं या बहुत उद्दंड। मैं अपने बगीचे में आए युवाओं से बार-बार कहता हूं कि वे मेरी नकल न करें, और यदि कोई मेरी इस सलाह की अवहेलना करता है तो मुझे वाकई गुस्सा आ जाता है। मैं उनसे सहज प्रकृति के साथ रहते हुए अपना दैनंदिन काम करने को कहता हूं। नहीं, मुझमें खास ऐसा कुछ भी नहीं है, लेकिन जिस चीज की झलक मैंने पाई है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है।

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