क्या भारत और चीन नए खलनायक हैं

Submitted by Hindi on Fri, 02/08/2013 - 15:04
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दैनिक भास्कर, नई दिल्ली, जून 2, 2007, सुनीता नारायण की पुस्तक 'पर्यावरण की राजनीति' से साभार
सवाल है कि लंदन, न्यूयार्क और दूसरे धनी देश क्यों वाहनों की बढ़ती संख्या रोकने का गंभीर प्रयास नहीं कर रहे हैं? वह शायद इसलिए ऐसा नहीं कर रहे हैं क्योंकि जलवायु परिवर्तन के पीड़ित उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। इसे ही याद रखना है और इसे ही हमें बदलना है।मेरी सबसे बुरी आशंका सही साबित हो रही है। इसका संबंध जलवायु परिवर्तन की वास्तविकता के बजाय उसकी राजनीति से है। ऐसे समय में जब ग्लोबल वार्मिंग की चिंता चरम पर पहुंच गई है, सारी दुनिया इसका समाधान खोजने के बजाय तेजी से विवाद और संघर्ष की ओर बढ़ रही है। हमें इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट होना होगा। हमारे पास खराब राजनीति और बुरे राजनेताओं पर बर्बाद करने के लिए समय नहीं है।

हाल में दो चीजें हो रही हैं। पहला, भारत और चीन को नए खलनायकों की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है – ये प्रदूषण फैलाते हैं, ये उत्सर्जन बढ़ाएंगे, ये कानूनी बाध्यताओं वाली प्रतिबद्धता नहीं चाहते और इसलिए वैश्विक वार्ताओं को बाधित कर रहे हैं। दूसरा, जलवायु को बिगाड़ने वाले देशों अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ नरमी बनती जा रही है। हमें बताया जा रहा है कि ये देश वैश्विक हित में काम करना चाहते हैं लेकिन उनके प्रयासों को गंदे चीन और भारत के बढ़ते उत्सर्जन के कारण बाधित किया जाएगा। इस प्रक्रिया में यूरोप और जापान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं और दोनों पक्षों को एक साथ ला रहे हैं। वे चीन को कह रहे हैं कि वह समझौता कर ले ताकि अमेरिका को मनाया जा सके। लेकिन इस मामले में यह नहीं बताया जा रहा है कि कैसे पिछले कुछ सालों में यूरोप का उत्सर्जन बढ़ा है।

अगर चीन सबकी भागीदारी का सवाल उठाता है यानी यह कहता है कि कैसे विकसित देश जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं, तो कहा जा रहा है कि वह प्रक्रिया को बाधित कर रहा है। लेकिन आरोप-प्रत्यारोप के इस खेल का समय बीत गया, अब दुनिया को निर्णायक रूप से कुछ करना होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो हमलोगों ने अब तक जो भी किया है वह अपने विकास के लिए किया है, लेकिन वही काम इस पृथ्वी के हित के लिए नहीं किया है।

यह भुला दिया जाता है कि चीन भी जलवायु परिवर्तन का शिकार होगा। यह भी भुला दिया जाता है कि यह समस्या नहीं है, बल्कि समस्या तैयार की गई है।

अगर हमारे पास खेल के लिए समय होता तो यह पूरी कुश्ती मजेदार होगी। लेकिन हमारे पास बिल्कुल समय नहीं है। आज हमें जरूरत इस बात की है कि राजनेता हमें इस समस्या से बाहर निकलने में नेतृत्व दें। हमें नेतृत्व और समझदारी चाहिए, हिचक और आशंका नहीं।

मेरा मानना है कि हमारा एक बुनियादी ढाँचा है, जिसके तहत हम आगे बढ़ सकते हैं। पहला, हमें इस बात के लिए सहमत होना होगा कि जलवायु परिवर्तन के लिए औद्योगिक दुनिया जिम्मेदार है। वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों का बड़ा भारी ज़ख़ीरा जमा हो गया है, जो सदियों से छोड़े से लोगों को समृद्ध बनाने की प्रक्रिया में पैदा हुआ है। इसने पहले से ही जलवायु को अस्थिर बना दिया है। गरीब देश अपनी ताज़ा आर्थिक विकास की प्रक्रिया के जरिए इसे और बढ़ा रहे हैं। लेकिन यह हमारे लिए (और बाकी धनी दुनिया के लिए भी) कोई कड़े कदम उठने और उत्सर्जन रोकने या उसे घटाने का लक्ष्य हासिल करने की प्रक्रिया शुरू नहीं करने के लिए कोई तर्क नहीं हो सकता है।

इस करार का दूसरा हिस्सा यह है कि चीन और भारत के समझदार होने की जरूरत है। इन दोनों की भागीदारी कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होगी, लेकिन राष्ट्रीय हितों और कार्यक्रमों पर आधारित होगी। हम जानते हैं कि यह हमारे हित में नहीं है कि हम पहले प्रदूषण फैलाएं और उसकी सफाई करे, यानि पहले तो अक्षम बनें और फिर उसकी बचत करें। सवाल कम कार्बन वाले विकास की रणनीति की तलाश की है, खास कर उभरते देशों के लिए ताकि वे विकसित होने के अपने अधिकार के साथ कोई समझौता किए बगैर उत्सर्जन कम कर सकें।

यह हो सकता है। लेकिन इसके लिए इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) द्वारा राहत के मामले पर जारी की गई कायराना और राजनीतिक रिपोर्ट से कहीं ज्यादा करने की जरूरत है। इस रिपोर्ट में परमाणु ऊर्जा, जैव-ईंधन, कार्बन स्टोरेज आदि के विकल्प दिए गए हैं, दुनिया को बचाने के लिए। इसके अलावा उपभोग के मौजूदा पैटर्न में बदलाव की जरूरत के बारे में बहुत कुछ दोहराया गया है। हकीक़त यह है कि हमें आज कुछ शीर्ष अर्थशास्त्रियों और वैज्ञानिकों के समूह की जरूरत है, उन चीजों के बारे में बताने के लिए, जिनके बारे में स्कूली बच्चे भी जानते हैं।

हकीक़त यह है कि दुनिया जानती है कि जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने के लिए क्या जरूरी है। प्रश्न यह है कि ऐसा हो क्यों नहीं रहा है? असल में हमें इस कारण को ही खोजने और हासिल करने की जरूरत है। यहां कई समस्याएं हैं। पहली, तकनीक उपलब्ध है, लेकिन वे बहुत महंगी है। ऐसा नहीं है कि चीन और भारत पहले गंदी और ऊर्जा के प्रतिकूल तकनीक का इस्तेमाल करने पर तुले हैं, वे इसलिए ऐसा कर रहे हैं क्योंकि वे उच्च गुणवत्ता वाली महंगी तकनीक का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं। फिर वे भी वही करेंगे, जो धनी दुनिया के देशों ने किया है यानी पहले उत्सर्जन बढ़ाएंगे, पैसा कमाएंगे और फिर गुणवत्ता सुधारने में निवेश करेंगे।

यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है। इसलिए यह सवाल उठाता है कि क्यों दुनिया उभरते हुए देशों के लिए इस तरह की तकनीक हासिल करने में मदद करने की राह नहीं तलाश पा रहा है? क्यों बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं और हासिल कुछ नहीं हो रहा है? स्वच्छ विकास की यांत्रिकी स्थापित की गई थी। लेकिन इसके नियम धनी और औद्योगिक देशों द्वारा बनाए गए थे और इनमें यह सुनिश्चित किया गया था कि ये यांत्रिकी सस्ती हो, खराब हो और दक्षिण में किसी तरह का बदलाव लाने के लिहाज से अप्रभावी हो। इस यांत्रिकी को इस तरह से डिज़ाइन किया गया था कि ये धनी देशों के लिए उत्सर्जन में कमी लाने का सबसे सस्ता विकल्प हों और साथ ही धनी व उभरते हुए कुछ देशों के कुछ उद्योगों के लिए मुनाफ़ा कमाने वाली भी हो। यह यांत्रिकी प्रदूषण फैलाने वालों के साझा हितों को प्रोत्साहित करने वाली है, यह निश्चित रूप से बदली जानी चाहिए।

दूसरी समस्या ज्यादा मुश्किल है। धनी देशों ने वातावरण में उपलब्ध जगह को प्रदूषण से पहले ही भर दिया है, अब बाकी दुनिया के लिए बहुत कम जगह बची है। इसे समझने के लिए इन तथ्यों को देखना जरूरी है। वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की सघनता औद्योगिकरण के पहले 280 पार्टस पर मिलियम (पीपीएम) की मात्रा के मुकाबले 2005 में बढ़ कर 379 पीपीएम हो गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जोखिम को कम रखते हुए यह अधिकतम 450 पीपीएम तक हो सकता है और 550 पीपीएम बहुत अधिक जोखिम वाला हो जाएगा। गरीब देश इतने भर में अपना हिस्सा तभी हासिल कर सकते हैं, जब धनी देशों में कार्बन उत्सर्जन पर पूरी तरह से रोक लग जाए।

अब सवाल है कि हम इस स्पेस में कैसे हिस्सेदारी करेंगे? इसके लिए जरूरी है कि हम अपने कामकाज में बदलाव करके उत्सर्जन घटाने का रास्ता खोजे। सिर्फ तकनीक और प्रभावशीलता के बारे में बात करना ही काफी नहीं है। इसके लिए अर्थव्यवस्था की पुनर्संरचना जरूरी है ताकि उपभोग कम हो सके। मैं फिर कहती हूं कि यह किया जा सकता है। उदाहरण के लिए हम जानते हैं कि हमें सार्वजनिक परिवहन में निवेश करना चाहिए और निजी वाहनों को रोकना चाहिए। सिंगापुर ने ऐसा किया है। वह न तो गरीब है और न बेवकूफ़। सवाल है कि लंदन, न्यूयार्क और दूसरे धनी देश क्यों वाहनों की बढ़ती संख्या रोकने का गंभीर प्रयास नहीं कर रहे हैं? वह शायद इसलिए ऐसा नहीं कर रहे हैं क्योंकि जलवायु परिवर्तन के पीड़ित उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। इसे ही याद रखना है और इसे ही हमें बदलना है।

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