क्या करे बाढ़ से बेहाल दुनिया

Submitted by Hindi on Sat, 08/20/2016 - 15:11
Source
दैनिक भास्कर, 09 अगस्त, 2016

समूची दुनिया आज बाढ़ की विभीषिका से हलकान है। इससे निपटने के लिये इस दिशा में वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं कि आने वाले समय में यह समस्या न रहकर अनेक समस्याओं का समाधान बन जाए। ऐसा संभव होगा बाढ़ के पानी को संरक्षित करके

.बाढ़ से समूचा उत्तर भारत परेशान है। देश का तकरीबन आठवाँ हिस्सा तो बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावित है, लेकिन यह न तो कोई पहली बार का हिस्सा है और न आखिरी बार का। आकलन और विशेषज्ञ तो यह भी कह रहे हैं कि आने वाले सालों में बाढ़ की प्रवृत्ति, प्रकृति और बारम्बारता में न सिर्फ लगातार बदलाव आयेगा, बल्कि बढ़त भी होगी। वजह है धरती के औसत तापमान में 2 से 3 डिग्री तक की बढ़ोतरी। इससे अंटार्कटिक की बर्फ का बुरी तरह से पिघलना, हिमालयी ग्लेशियरों का गलना, समुद्र के तल का तीन फीट से ज्यादा ऊपर उठ आना। जलवायु परिवर्तन की वजह से मैदानों में आये दिन अतिवृष्टि का होना तथा अचानक तेजी से आने वाली फ्लैश फ्लड। कुल मिलाकर ये तमाम परिस्थितियाँ और आशंकाएं जल प्रलय की ओर इशारा करती हैं।

कुल सबब यह कि धरती के बाशिंदों को भविष्य में कभी सूखे तो कभी बाढ़ से लगातार जूझना ही होगा। सवाल है इसका हल क्या है? विशेषज्ञों का मानना है कि इसका हल, इसका इस्तेमाल है यानी जो बाढ़ अभी विभीषिका है, उसे अवसर में तब्दील करना पड़ेगा। बाढ़ की समस्या से दो-चार होना वैज्ञानिकों, तकनीकिज्ञों और नगर नियोजकों तथा आपदा प्रबंधन के विशेषज्ञों ने कई सालों पहले से शुरू कर दिया है। अमेरिका के नारफाक में लाकहीड मार्टिन के संडिया नेशनल लैब के सहयोग से नाभिकीय हथियार और ऊर्जा के क्षेत्र में शोध करने वाले बाढ़ के खतरों से सकारात्मक निजात पर भी काम कर रहे हैं। वर्तमान में इस दिशा की तरफ बढ़ रहे कदमों, शोध और विकास की स्थिति तथा प्रायोगिक कार्यों को देख-समझकर कहा जा सकता है कि दो से तीन दशक के भीतर कई विकसित देशों के लिये बाढ़ कोई बड़ी समस्या नहीं रह जायेगी, वरन चीन की तरह कई देशों के लिये तो यह समस्याओं के समाधान बन जाएगी।

अमेरिका ने एक ऐसा मॉडल निर्मित कर लिया है, जिसके तहत उसका दावा है कि एक दशक के भीतर वे इस स्थिति में होंगे कि भीषण से भीषण बाढ़ को कुछ घंटों के भीतर खत्म कर देंगे। अभी उनका मॉडल चार दिन लगाता है। भविष्य की बाढ़ का संचार सुविधा, परिवहन ईंधन आपूर्ति, बिजली की व्यवस्था रेलवे और सड़क पर जो असर होगा, उसके प्रभाव को कुछ ही घंटे में कैसे दूर किया जाये? बाढ़ के दौरान, भले ही वह दस से बारह घंटों तक ही रहे रक्षा, सुरक्षा और दूसरी सुविधाओं को कैसे बहाल रखा जाये, उसका वैकल्पिक उपाय क्या हो, इस पर चल रहे शोध का परिणाम बस कुछ ही सालों दूर है।

बाढ़ भले ही कुछ घंटे रहे, पर वह अपने निशान, अपने पीछे कई विसंगतियाँ छोड़ जाती है। इसे कैसे इस तरह मिटाया जाये कि सब पूर्ववत हो, इस पर भी काम चल रहा है। ब्रिटेन ने तो विगत 300 सालों के बाढ़ पैटर्न पर काम किया है। इसी के सहारे भविष्य में इससे बचाव के रास्ते निकालने के हल तक पहुँचने का दावा किया है। जबकि ऑस्ट्रेलिया ने ब्रिसबेन फ्लड स्मार्ट फ्यूचर स्ट्रेटजी 2031 शुरू किया है। ब्रिसबेन को एक नमूने के तौर पर लिया गया है। परियोजना 2031 में समाप्त होनी है, पर अगर अगले 15 वर्षों की बजाय इसे स्थापित होने में 20 बरस भी लगे और इसके प्रायोगिक परीक्षण तथा खामियाँ सुधारने का भी इसे कुछ अवसर दे दिया जाये तो भी 2040 तक बाढ़ से पूरी तरह बचाव का एक शानदार कार्यरूप मॉडल ऑस्ट्रेलिया के पास होगा।

वियतनाम, हालैंड, जापान ने बाढ़ और जल जमाव से निपटने तथा इसे निरापद बनाने की दिशा में नयी तकनीक निर्मित करने के क्षेत्र में अद्भुत काम किया है। प्रकाश-लेजर, ध्वनि, ड्रोन, उपग्रह, बायो इंफार्मेटिक्स, रोबोटिक्स, अंतरिक्ष विज्ञान तकनीक तथा विभिन्न तकनीकी के सहयोग से इन देशों ने चलते-फिरते बैरियर, बायो स्वेल्स, भूमिगत वॉटर रिजर्वायर इत्यादि बनाकर वर्तमान हल ढूँढने के अलावा वे भविष्य का हल भी तलाशने में लगे हुये हैं। इनमें चीन की स्पंज सिटी भी है।

उम्मीद है आधे दशक के भीतर ही इसका व्यावहारिक और प्रायोगिक उदाहरण सामने होगा। स्पंज सिटी महज भविष्य की बाढ़ से निपटने की एक तकनीकी भर नहीं, बल्कि जल संकट से निपटने और जल प्रबंधन का एक समग्र समाधान है। पूरे जल पारिस्थितिकी को एक करती है यह प्रणाली। जल सुरक्षा, संरक्षण जलप्रबंधन और वितरण। शहर में आयी बाढ़, जल जमाव समस्या नहीं, बल्कि कई समस्यायों का समाधान है, इसे कुदरत की नेमत समझ, इसका एक बूँद भी जाया न जाये, भविष्य में काम आये, ग्रे सिटी ग्रीन में तब्दील हो, यह स्पंज सिटी की अवधारणा और लक्ष्य है। अरबों लीटर पानी जो कंक्रीट के जंगल शहरों में बरसता है, वह या तो तबाही फैलाता है या नालियों, सीवर के जरिये बहकर बर्बाद हो जाता है। अगले दशक तक संसार भर में पाँच अरब लोग जल संकट से किसी न किसी तरह प्रभावित होंगे। ऐसे भविष्य को देखते हुए पानी की बर्बादी कैसे सही जा सकती है?

भविष्य की स्पंज सिटी अपनी सीमा में पानी की हर बूँद सोखकर उसे सहेजेगी। जरूरत पड़ने पर यह पानी, सिंचाई, सफाई, उद्योगों में, घरेलू कामकाज और यहाँ तक कि साफ करके पीने के काम भी आ सकता है। जमीन को पानी का बचत खाता बना देना। इस खाते में साल दर साल प्रदूषण रहित पानी जमा करते रहना और जब सूखा या जरूरत पड़े तो निकालना। रिवर्स टेक्नोलॉजी के इस उपक्रम पर भारी खर्च है, खरबों रुपये, पर यह निवेश भविष्य में लाभ देगा। शहरों का पूरा सीवर और ड्रेनेज सिस्टम बदलने से लेकर तमाम दूसरे तकनीकी उपायों में बेतहाशा खर्चने से यह कम पड़ेगा।

स्पंज सिटी आगे चलकर शहर के कार्बन का उत्सर्जन रोकेंगे और जलवायु परिर्वतन के हमले से निपटने में सहायक होंगे। शहर की जमीन में नमी और पेड़-पौधे, बगीचे, सार्वजनिक स्थल हरे बने रहेंगे। शहर का भूजल प्रदूषण रहित हो जायेगा। ड्रेनेज सिस्टम पर बोझ कम पड़ेगा तो जैव विविधता भी समृद्ध होगी। वेटलैंड, अरबन गार्डेन, ग्रीन रूफ टॉप का विकास इत्यादि स्पंज सिटी के दूसरे फायदे हैं। स्पंज सिटी ऐसी ताकतवर तकनीक है, जो टिकाऊ, भविष्य के खतरे से मुक्त जीरो कार्बन है।

बहुत से देशों में बायोसवाल्स बनाये जा रहे हैं, यह साधारण-सी ढलान जैसी संरचना होती है, जिसमें पेड़-पौधे, घास प्राकृतिक फिल्टर होते हैं, जो इसका गाद और प्रदूषण छान लेते हैं, जिसे बाद में निकालकर खाद बना लेते हैं। इसी तरह बायो रिटेंशन प्रणाली का निर्माण भी कई जगह किया गया है। यह ऐसा तालाब है, जहाँ गाद और प्रदूषण मुक्त जल इकट्ठा करते हैं। इसे वाटर गार्डेन भी कहते हैं। इसी तरह चीन और जापान के बहुत से शहरों में छत पर पानी सोखने के लिये रूफ गार्डेन बनाने का चलन जोरों पर है। यह प्रक्रिया बहुत वैज्ञानिक है। इस प्रक्रिया से जल संरक्षण, बाढ़ से बचाव के अलावा टॉयलेट में इस्तेमाल का दस फीसदी पानी और तापमान में एक डिग्री की गिरावट हासिल होती है।

जमीन में बायो कुएँ जिनमें जलरोधी कंक्रीट के बजाय स्थानीय पौधे, जो पानी छानने का काम करते हैं, इस्तेमाल किया जा रहा है। ये बेहद सरल तकनीकी है, जो भविष्य में बहुतेरे देशों में लोकप्रिय हो सकती है। भविष्य की तकनीक की खोज में लगे वैज्ञानिकों का कहना है कि इस समस्या का समाधान पारम्परिक प्राचीन जल परम्पराओं को पुनर्जीवित करने में है। कुएँ, तालाब, झील, जोहड़ वेटलैंड को नष्ट कर रहे अंधाधुंध शहरीकरण की कवायद को फिर से पलट दिया जाये तो आधी समस्या हल हो जाये। निःसंदेह कुछ दशकों के भीतर भौगोलिक परिदृश्य में इस तरह का बदलाव भी देखने को मिल सकता है। कुल मिलाकर बाढ़ के बारे में दुनिया भर में फैली सचेतता बताती है कि भविष्य में इस समस्या का सटीक समाधान सामने आ जाएगा।

Disqus Comment