खाद्य पदार्थों की संस्कृति

Submitted by Hindi on Wed, 07/06/2011 - 12:06
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मासानोबू फुकूओका पर लिखी गई पुस्तक 'द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन'

आज अधिकांश लोगों ने चावल की खुशबू तक पहचानना बंद कर दिया है। चावल को पॉलिश कर इस तरह रिफाइंड कर दिया जाता है, उसमें सिर्फ स्वाद-रहित चोकर बच रहता है। पॉलिश किए चावल में असली चावल जैसी खुशबू और स्वाद नहीं होता। इसका नतीजा यह होता है कि, उसे अन्य तरकारियों या अतिरिक्त व्यंजनों की मदद के बगैर नहीं खाया नहीं जा सकता।

यदि पूछा जाए कि हम खाना क्यों नहीं खाते हैं, तो बहुत कम लोग इससे आगे सोच पाएंगे कि, खाना जिंदा रहने और मानव शरीर की वृद्धि के लिए आवश्यक है लेकिन इससे परे असली सवाल मानव की आत्मा के साथ खाद्यों के संबंध का है। अन्य प्राणियों को तो सिर्फ खाना, सोना और खेलना ही काफी होता है। इंसानों के लिए भी यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती, यदि वे पौष्टिक भोजन सादी दिनचर्या और चैन से सोकर सुकून प्राप्त कर लेते। बुद्ध ने कहा थाः ‘आकार की रिक्तता है और रिक्तता ही आकार है।’ चूंकि बौद्ध शब्दावली में आकार का मतलब पदार्थ या वस्तु से होता है तथा ‘रिक्तता’ या खालीपन से तात्पर्य मन से है। वे कह रहे हैं कि ‘मन’ और ‘पदार्थ’ एक ही चीज है। वस्तुओं के भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार, रंगरूप तथा खुशबुएं होती हैं और मनुष्य का मन एक तरफ से दूसरी तरफ भटकते हुए उनकी तरफ आकर्षित होता रहता है लेकिन वास्तव में ‘पदार्थ’ तथा मन एक ही चीज हैं।

रंग


दुनिया में सात रंग मूल होते हैं, लेकिन यदि इन्हें आपस में मिला दिया जाए तो वे सफेद हो जाते हैं। प्रिज्म के द्वारा विभाजित होने पर सफेद प्रकाश सात रंगों में बदल जाता है। जब मनुष्य दुनिया का वि-मन (नो-माइंड) होकर देखने लगता है तो रंग में का रंग लुप्त हो जाता है। इसे हम रंगहीनता कहते हैं। सात रंग हमारे समक्ष तभी उतरते हैं जब हम सतरंगे विभेदकारी मन से उन्हें देखते हैं। पानी भी कई रूपांतरों से गुजरने के बाद भी पानी ही रहता है। इसी तरह हमारा सचेतन मन बदलता हुआ नजर आने के बावजूद, हमारा मूल मन ‘अपरिवर्तनशील मन’ कभी नहीं बदलता। जब हमें सात रंगों से लगन लग जाती है तो मन बड़ी आसानी से विचलित हो जाता है। पत्तियों, शाखाओं और फलों के रंग तो हमारी आंखों में उतरते हैं, लेकिन रंग के मूल आधार को हम अनदेखा कर जाते हैं।

यही बात खाद्यान्नों पर भी लागू होती है। इस दुनिया में ऐसे अनेक प्राकृतिक पदार्थ हैं जो मानव खाद्य के रूप में उपयुक्त है। इन खाद्यों में फर्क, मन करता है और उसी के चलते हम उन पर अच्छे या बुरे ‘गुण’ आरोपित करते हैं। इसके बाद लोग सोच समझकर वही चुनते हैं, जिसके बारे में वे सोचते हैं कि, वही उन्हें मिलना चाहिए। चयन की यही प्रक्रिया मानव पोषक तत्वों के उस आधार की पहचान में बाधक बनती है, जो कि प्रकृति स्थान और काल (मौसम) के मुताबिक तजवीज करती है। प्रकृति के रंग हाईड्रेनिया की फूलों की तरह आसानी से बदलते हैं। सतत परिवर्तन ही प्रकृति का रूप है। इसी वजह से उसे अनंतगति भी कहते हैं, और इसीलिए हम उसे गतिहीन गति के रूप में भी ले सकते हैं। जब हम खाद्य के चुनाव के लिए तर्क-बुद्धि का सहारा लेते हैं, तो हमारी प्रकृति के बारे में समझ जड़ हो जाती है और हम प्रकृति के रूपांतरों, जैसे कि मौसमी बदलावों की अनदेखी कर देते हैं।

प्राकृतिक भोजन का उद्देश्य ऐसे ज्ञानी लोग तैयार करना नहीं होता जो ठोस व्याख्याएं कर सकें या भिन्न प्रकार के खाद्यों में से कुशलतापूर्वक चुनाव कर सकें, बल्कि ऐसे अज्ञानी लोग तैयार करना, जो जानबूझकर फर्क पैदा किए बिना भोजन ग्रहण कर सकें। यह चीज प्रकृति के तरीकों के खिलाफ नहीं जाती। वि-मन की स्थिति को पाकर बिना आकार की बारीकियों में गए, रंगहीन के रंग को ही रंग के रूप में स्वीकार करने से ही सही आहार की शुरुआत होती है।

सुस्वाद (फ्लेवर)


लोग कहते हैं - ‘जब तक आप चखें नहीं आप नहीं बतला सकते कि खाने का मजा क्या है।’ लेकिन चखने के बाद भी खाने का जायका बदलता है - समय और परिस्थिती तथा चखने वाले व्यक्ति की मनःस्थिति के अनुसार यदि आप किसी वैज्ञानिक से पूछें कि स्वाद का तत्व क्या होता है, तो वह उसके भिन्न घटकों को अलग कर तथा उसमें खट्टे, मीठे, कड़वे, नमकीन, तथा तीखेपन का अनुपात निकालकर उसे परिभाषित करेगा, न जीभ की नोक से। वैसे पांच अलग-अलग स्वादों का प्रभाव जीभ पर पड़ता है, परंतु उसे परिभाषित मन या दिमाग ही करता है। प्राकृतिक व्यक्ति सही आहार प्राप्त करने में सक्षम होता है, क्योंकि उसकी वृत्तियों (इंसटिंक्टस) सही ढंग से काम करती हैं। वह सादे भोजन से संतुष्ट हो जाता है, क्योंकि वही पौष्टिक होता है, उसका स्वाद अच्छा लगता है तथा वह रोजमर्रा की औषध के रूप में भी उपयोगी होता है तथा आहार और मानव की आत्मा एकाकार हो जाती है। आधुनिक मानव ने चूंकि अपनी सहज वृत्तियों (इंसटिंक्टस) को खो दिया है वह वसंत ऋतु की सात जड़ी-बूटियों को एकत्र कर उनका रस लेने में अक्षम हो गया है। वह कई तरह के स्वादों की तलाश में निकल पड़ता है। उनकी खुराक गड़बड़ा गई है तथा उसकी पसंदगी और नपसंदगी का अंतर बढ़ता जाता है और उसकी सहज प्रकृति अधिकाधिक रूप में उलझती जाती है।

इस मुकाम पर आकर हम खाद्य पदार्थों को खूब प्रोसेस और रिफाइन करने और नई-नई पकाने की तकनीकों का आविष्कार करने लगते हैं, और उलझने और बढ़ जाती हैं। परिणाम स्वरूप अब खाद्य तथा मानव मन के बीच अलगाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। आज अधिकांश लोगों ने चावल की खुशबू तक पहचानना बंद कर दिया है। चावल को पॉलिश कर इस तरह रिफाइंड कर दिया जाता है, उसमें सिर्फ स्वाद-रहित चोकर बच रहता है। पॉलिश किए चावल में असली चावल जैसी खुशबू और स्वाद नहीं होता। इसका नतीजा यह होता है कि, उसे अन्य तरकारियों या अतिरिक्त व्यंजनों की मदद के बगैर नहीं खाया नहीं जा सकता। लोगों की यह गलतफहमी हो गई है कि, चावल के पोषक तत्वों के खत्म हो जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उनकी कमी को विटामिनों या मांस-मछली के द्वारा पूरा कर लिया जा सकता है। स्वादिष्ट खाद्य अपने आप में स्वादिष्ट नहीं होते। खाना तब तक स्वादिष्ट नहीं होता जब तक कि खाने वाला यह न मान ले कि वह वैसा है। हालांकि अधिकांश लोग सोचते हैं कि, मांस या मुर्गा बहुत जायकेदार होता है, लेकिन वह उन लोगों के लिए वैसा नहीं होता जो धर्मिक या शारीरिक कारणों से तय करते लेते हैं कि ये घृणित चीजें हैं। बिना कुछ किए सिर्फ खेलते-कूदते हुए ही बच्चे आनंदित रहते हैं मगर भेद-भाव वाली प्रकृति वाले वयस्क यह पहले तय करते हैं कि, उन्हें कौन सी चीज सुखी कर देगी और उनको वह मिल जाने पर ही संतुष्टि होती है। खाने की चीजें, उसे इसलिए रोचक नहीं लगती हैं क्योंकि उनमें प्राकृतिक स्वाद है या उसके शरीर के लिए सेहतमंद हैं, बल्कि इसलिए कि उसकी रुचि पर यह ‘विचार’ आरोपित कर दिया गया है कि, उसका स्वाद अच्छा है।

गेहूं के नूडल्स अच्छे लगते हैं परंतु ऑटोमैटिक मशीनों में सिक्का डालकर जो आप नूडल्स खाते हैं वे बहुत ही बेस्वाद होते हैं। लेकिन विज्ञापनों के द्वारा यह विचार ही हमारे दिमागों से निकाल दिया जाता है कि, उनका स्वाद बुरा है और बहुत से लोगों को ये बद-जायका नूडल्स भी भाने लगते हैं। ऐसे किस्से प्रचलित हैं कि लोमड़ी द्वारा धोखे से कुछ लोग घोड़े की लीद खा गए। इसमें हंसने जैसी कोई बात नहीं है। आजकल लोग खाने के लिए ‘शरीर’ का उपयोग करते हैं, मन का नहीं। कई लोगों को इस बात की परवाह नहीं होती कि, उनके खाने में मोनो-सोडियम-ग्लूटामेट रसायन मिला है। चूंकि वे सिर्फ अपनी जीभ का इस्तेमाल करते हैं इसलिए वे आसानी से बेवकूफ बनते हैं। शुरू में लोग सिर्फ इसलिए खाते थे कि वे जिंदा थे, और खाना स्वादिष्ट होता था। आधुनिक जमाने में लोग यह सोचने लगे हैं कि, भोजन को बहुत से मेहनत-मशक्कत करके रिफाइंड करने पर ही वह स्वादिष्ट बनता है। यदि आप खाद्य को स्वादिष्ट बनाने की ‘कोशिश’ न करें तो आप पाएंगे कि प्रकृति ने ही उसे स्वादिष्ट बनाया है। पहला विचार तो यही होना चाहिए कि, हम एक ऐसे ढंग से रहें कि खुद खाद्य पदार्थ ही स्वादिष्ट लगें। लेकिन आजकल, इसके बदले, सारी कवायद खाद्यों में स्वाद बाहर से जोड़ने के लिए की जाती है। इसका नतीजा यह हुआ है कि, स्वादिष्ट खाद्य ही लुप्त हो गए हैं।

लोगों ने स्वादिष्ट पाव-रोटी बनाने की कोशिश की और स्वादिष्ट पाव-रोटी गायब हो गई। अच्छे शाही और पौष्टिक खाद्य बनाने की कोशिश में हम बेकार के खाद्य बनाने में लग गए, और अब हमारी भूख ही तृप्त नहीं होती। भोजन तैयार करने का सबसे अच्छा तरीका वही है, जिसमें पदार्थों के कुदरती स्वाद बने रहें। बहुत पहले रोजमर्रा की अपनी अक्ल के सहारे ही लोग सब्जियों से तरह-तरह के ऐसे अचार धूप में सुखाकर या नमक डालकर बनाते थे, जिनमें उनका खुद का कुदरती जायका बना रहता था। खाना पकाने की कला की शुरुआत समुद्र से निकले नमक तथा सुलगती आग से होती है। खाद्य पदार्थ में उनका नैसर्गिक स्वाद तभी बना रहता है जब उन्हें कोई ऐसा व्यक्ति बनाता है जो पाक-कला के बुनियादी तत्वों के प्रति संवेदनशील हो। यदि पकाते हुए, खाना कोई बेगाना स्वाद ग्रहण कर ले, और यदि इस परिवर्तन का उद्देश्य सिर्फ जीभ को रिझाना हो तो उसे असली पाककला नहीं कहा जा सकता है।

आमतौर से लोग संस्कृति को एक ऐसी चीज मानते हैं जो मात्रा मानवीय प्रयासों से ही रची, संरक्षित तथा विकसित की जाती है। लेकिन संस्कृति हमेशा मानव और प्रकृति की भागीदारी से उत्पन्न होती है। जब मानव समाज और प्रकृति के बीच सही सामंजस्य स्थापित हो जाता है तो संस्कृति अपना आकार खुद ग्रहण करती है। संस्कृति हमेशा से ही हमारे दैनंदिन क्रिया-कलापों से जुड़ी रहती है और वह भावी पीढ़ियों को विरासत में मिलती चली आई और आज तक बनी हुई है। किसी भी ऐसी चीज को संस्कृति नहीं कहा जा सकता है जो मानवीय घमंड तथा इंद्रियों के सुख की तलाश से उपजी हुई हो। सच्ची संस्कृति का जन्म प्रकृति में होता है तथा यह शुद्ध, सात्विक तथा विनम्र होती है। यह सच्ची संस्कृति खोकर मानवता नष्ट हो जाएगी। जब लोगों ने प्राकृतिक भोजन को ठुकरा कर रिफाइंड खानों को अपनाया तो समाज उस रास्ते पर चल पड़ा जो आत्मविनाश की ओर ले जाता है। यह इसलिए कि ऐसा भोजन सच्ची संस्कृति के नहीं जन्मा है। भोजन ही जीवन है और जीवन प्रकृति से दूर नहीं हटना चाहिए।

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