खेती को फायदेमन्द बनाने की खातिर

Submitted by UrbanWater on Tue, 04/11/2017 - 11:59
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 8 अप्रैल 2017

सिंचाई किसानों के लिये समस्या बनी हुई है। कुल खेती-बाड़ी के महज 35 से 40 प्रतिशत हिस्से को सिंचाई की सुविधा प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश कि जितने भी तालाब, पोखर, जोहड़ जिस स्थिति में थे उन्हें दोबारा उसी स्थिति में लाया जाये, के बावजूद इस ओर कोई सकारात्मकता नहीं दिखी। लिहाजा, जीडीपी में कृषि क्षेत्र की भागीदारी 13 से 14 फीसदी तक सीमित रह गई है। नेशनल हाईवे के जाल से काफी लाभ मिल रहा है लेकिन इसी तर्ज पर ‘नेशनल इरिगेशन हाईवे’ की जरूरत अब तक के एजेंडे से बाहर है। प्रदेश के लघु एवं सीमान्त किसानों का एक लाख रुपए तक की कर्जमाफी का फैसला स्वागत योग्य है। इस पहल से लगभग 86.68 लाख किसानों को राहत मिलेगी। इसके अलावा सरकार ने लगभग सात लाख गरीब किसानों की करीब 5630 करोड़ रुपए भी माफ किये हैं। हालांकि ऋण माफी का फैसला चुनावी वायदों के सामने छोटा पड़ रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश के किसानों पर लगभग 92,241 करोड़ रुपए का कर्ज है, लेकिन उन हालात में जब कृषि पूरी तरह से उपेक्षित है, कर्ज माफी हौसला अफजाई करने तथा अन्य राज्यों को प्रेरणा देने वाली है।

महत्त्वपूर्ण है कि कृषि ऋण माफी पर शीर्ष बैंकों द्वारा खूब हाय-तौबा देखने को मिला। आरबीआई तथा एसबीआई ने इसे अर्थव्यवस्था के प्रतिकूल भी बताया। आश्चर्य है कि बैंक व वित्तीय संस्थानों के सुर किसान समर्थित नीतियों के खिलाफ रहे हैं परन्तु बैंकों द्वारा महज दो वित्त वर्षों में 1.14 लाख करोड़ रुपए चुपचाप बट्टे खाते में दर्शा दिये जाते हैं और इस पर बहुत ज्यादा एतराज नहीं होता।

संसदीय पब्लिक एकाउंट्स कमेटी की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय बैंकों के 6.8 ट्रिलियन नॉन परफॉर्मिंग एसेट अर्थात गैर-निष्पादित सम्पत्तियों का 70 फीसदी हिस्सा केवल बड़े कॉरपोरेट घरानों के यहाँ बकाया है जबकि इसमें किसानों की भागीदारी महज एक प्रतिशत का है। किसानों तथा छोटे व्यापारियों से ऋण वसूली हेतु तरह-तरह के हथकंडे जैसे नोटिस, इश्तेहार और डिफॉल्टर पोस्टर आदि अपनाए जाते हैं परन्तु बड़े उद्योगपतियों के नाम तक उजागर करने से परहेज बरती जाती रही है।

किसानों की आत्महत्याएँ शर्मनाक


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014-2015 के दौरान आत्महत्याओं में 42 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है। पिछले 21 वर्षों में, 1995 से 2015 के बीच कुल 3,18,528 किसानों ने आत्महत्या की है। कृषि प्रधान देश के लिये इससे शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता कि प्रतिवर्ष औसतन 15168 किसान आत्महत्या को मजबूर होते आ रहे हैं। किसान और कृषि लम्बे समय से उपेक्षा के शिकार रहे हैं। प्रतिवर्ष गन्ना किसानों को अपनी फसल के भुगतान हेतु मिल मालिकों के चक्कर काटने पड़ते हैं।

वर्ष 2016-17 का लगभग 4000 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम अभी भी मिल मालिकों पर बकाया है। धान में अधिक नमी की मात्रा बताकर समर्थन मूल्य से कम दाम दिया जाना भी अखबारों की सुर्खियाँ बनी हैं। गेहूँ आयात से ‘कर’ हटाने से देशी गेहूँ उत्पादकों को काफी निराशा हुई है। ऐसी भी खबरें हैं कि आयातित सस्ती गेहूँ की उपलब्धता में मध्य प्रदेश और गुजरात के किसानों को एमएसपी से कम दाम में गेहूँ बेचने को मजबूर होना पड़ा। दाल आपूर्ति हेतु मोजाम्बिक से करार से दाल उत्पादकों में भी हताशा है। जीएम बीजों के इस्तेमाल को लेकर समय-समय पर किसान संगठनों का विरोध होता रहा है।

ऐसे में तय स्पष्ट है कि वर्तमान कृषि नीतियों से किसानों का भला नहीं हो पा रहा तथा वे असन्तुष्ट भी हैं। महंगाई का बढ़ती बोझ, पहाड़ सा कर्ज और आय की अनिश्चितता भारतीय कृषि के लिये अभिशाप बन चुकी है। एक ओर जहाँ उपभोग की प्रत्येक वस्तु की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है, फसलों की लागत मूल्य बढ़ोत्तरी में कंजूसी बरती गई है। इस दिशा में डॉ. स्वामीनाथन की सिफारिश, जो एमएसपी पर 50 फीसदी का लाभकारी मूल्य प्रदान करने की संस्तुति करती है, कारगर कदम हो सकती है।

केन्द्र सरकार किसानों की आमदनी दोगुनी करने को लेकर प्रतिबद्ध है लेकिन इसका धरातल स्पष्ट नहीं है। आर्थिक सर्वे के अनुसार कृषि क्षेत्र का योगदान घट रहा है। बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, बिजली, मजदूरी आदि सभी महंगे हो रहे हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफा न के बराबर हो रहा है। कुछ फसलों पर मिलता आ रहा बोनस भी समाप्त कर दिया गया है। खेती का रकबा दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है। ऐसी तमाम परिस्थितियों में उनकी वर्तमान आय ही निश्चित नहीं है तो दोगुनी आय की कल्पना कैसे की जा सकती है?

कम आमदनी से बढ़ता कृषि संकट


इनकी अत्यन्त कम आमदनी बढ़ते कृषि संकट का बड़ा कारण है। इसलिये उनकी वर्तमान आय सुनिश्चित करने पर ज्यादा जोर होना चाहिए। लगभग प्रत्येक उपकरण में लाभ-हानि का हिसाब देखा जाता है लेकिन कृषि को एमएसपी की मकड़जाल में बाँधकर रखा गया है। फसल बीमा, सिंचाई, सॉयल हेल्थकेयर व अन्य तकनीकी माध्यमों का आम किसानों को कम और एजेंसियों को ज्यादा लाभ प्राप्त होता है।

पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के ससहोली गाँव के एक किसान को राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना के अन्तर्गत 7 रुपए 38 पैसे का मुआवजा दिया गया था। दो एकड़ भूमि पर नष्ट फसल का इतना बड़ा मुआवजा हास्यास्पद है। पंजाब के कपास किसान को 11 रुपए तथा जम्मू में भीषण बाढ़ की तबाही की एवज में 32 रुपए की मुआवजा राशि प्रदान की गई थी। आश्चर्य है कि यह राशि केन्द्रीय सीडीआरएफ नियमों के तहत दी जाती रही है जिसका आकलन कृषि एवं राजस्व विभाग के अधिकारियों द्वारा किया जाता है।

सिंचाई किसानों के लिये समस्या बनी हुई है। कुल खेती-बाड़ी के महज 35 से 40 प्रतिशत हिस्से को सिंचाई की सुविधा प्राप्त है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश कि जितने भी तालाब, पोखर, जोहड़ जिस स्थिति में थे उन्हें दोबारा उसी स्थिति में लाया जाये, के बावजूद इस ओर कोई सकारात्मकता नहीं दिखी। लिहाजा, जीडीपी में कृषि क्षेत्र की भागीदारी 13 से 14 फीसदी तक सीमित रह गई है। अभी उत्तर प्रदेश में किसानों की कर्जमाफी के बाद ऐसे भी विश्लेषण सामने आये कि इतनी बड़ी राशि में दो एक्सप्रेसवे का निर्माण सम्भव था। सरकार प्रतिबद्ध है कि विकास के लिये औद्योगिकरण महत्त्वपूर्ण है।

नेशनल हाईवे के जाल से काफी लाभ मिल रहा है लेकिन इसी तर्ज पर ‘नेशनल इरिगेशन हाईवे’ की जरूरत अब तक के एजेंडे से बाहर है। केन्द्र सरकार को प्रचंड बहुमत मिलने के पीछे किसानों को एमएसपी से इतर 50 प्रतिशत लाभकारी मूल्य का वादा कारगर रहा है। दो वर्ष बाद लोकसभा के चुनाव आहूत हैं लेकिन इस दिशा में अब तक कोई सुगबुगाहट नहीं है।

सरकार महिला सुरक्षा, पेंशन योजना और अन्य सामाजिक-आर्थिक प्रतिबद्धताओं की गारंटी देती है, यकीनन यह सराहनीय है लेकिन किसान हितों के मुद्दे जुमले बनकर क्यों रह जाते हैं? अब और किसान आत्महत्या को मजबूर न हों, खेती फायदे का सौदा बने, गाँवों से पलायन पर लगाम लगे, इसके लिये अब उचित समय आ गया है कि सरकार सभी फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने की गारंटी प्रदान करे। खरीद प्रणाली भारतीय कृषि व्यवस्था की कमजोरियों में से एक है। वर्तमान में देश भर में लगभग 7000 एपीएमसी मंडियाँ हैं, जो भारत जैसे वृहद राष्ट्र के लिये नाकाफी से भी कम हैं। पिछड़े राज्यों में इनकी स्थिति और भी दयनीय है। चूँकि खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे अहम स्रोत है, इसके उत्साहवर्धन से लगभग 60 फीसदी जनसंख्या को सीधे तौर पर लाभान्वित होने की सम्भावना है।

लेखक, (जदयू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।

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