खेती + लाभ + खुशहाली = प्रेमसिंह

Submitted by RuralWater on Sat, 02/06/2016 - 12:22

.जल संकट, अल्प वर्षा, सूखा और तमाम प्राकृतिक तथा मानव जनित समस्याओं से ग्रस्त बुन्देलखण्ड में कुछ चेहरे ऐसे भी हैं जिनको देखकर भविष्य को लेकर आश्वस्ति होती है। ऐसे ही एक शख्स हैं बुन्देलखण्ड के बांदा जिले के बड़ोखर खुर्द गाँव के 51 वर्षीय किसान प्रेम सिंह।

प्रेम सिंह ने किसी कृषि विश्वविद्यालय से शिक्षा-दीक्षा नहीं ली है लेकिन किसानों की समस्याओं के हल तलाश करने में वह सिद्धहस्त हैं। उन्होंने कृषि की एक नई प्रणाली विकसित की है जिसकी मदद से न केवल पर्यावरण का सन्तुलन बरकरार रखा जा सकता है बल्कि किसानों को आर्थिक स्वावलम्बन भी प्रदान किया जा सकता है।

प्रेम सिंह का परिवार पुश्तैनी रूप से खेती के धन्धे में है। उनकी आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा अपने गाँव बड़ोखर खुर्द में ही हुई। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एमए की पढ़ाई पूरी की। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि रखने वाले प्रेम सिंह बहुत जल्दी यह समझ गए कि वर्तमान खेती से न तो कोई लाभ होने वाला है और न ही वह हमारे आसपास के पर्यावास के लिये अच्छी है।

तमाम विकल्पों पर विचार करते हुए उन्होंने खेती की एक नई शैली के रूप में आवर्तनशील खेती का विकास किया।

आवर्तनशील खेती की ओर रुख


प्रेम सिंह ने सन 1986 में खेती शुरू की। खेती का तरीका वही था जो देश के अधिकांश इलाकों में किसानों का होता है। यानी रासायनिक उर्वरक, साल में दो फसल और सिंचाई के लिये मानसून पर निर्भरता या फिर डीजल पम्प से पानी खेतोंं तक लाना।

अपने तथा आसपास के किसानोंं के अनुभवों से वह साल-दो-साल में ही जान गए कि वर्तमान खेती किसानों के लिये न केवल आर्थिक घाटा ला रही है बल्कि वह उनमें अभूतपूर्व निराशा का भी संचार कर रही है। उन्होंने गौर किया कि लगातार प्रयासों के बावजूद उत्पादन या तो सीमित है या फिर उसमें गिरावट आ रही है। हाँ, अगर इससे किसी को फायदा मिल रहा था तो वे थीं बीज और उर्वरक कम्पनियाँ तथा ट्रैक्टर बनाने वाली बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ।

बिजली की कमी तथा डीजल का अन्धाधुन्ध प्रयोग पर्यावरण के लिहाज से भी अत्यधिक नुकसानदेह था। कुल-मिलाकर यह सारा उद्यम किसानों की आत्मनिर्भरता छीनकर उनको दूसरों पर आश्रित बना रहा था। खाद, बीज, पानी, बिजली हर चीज के लिये वे दूसरों पर निर्भर होते जा रहे थे।

सन 1989 के बाद प्रेम सिंह ने कृषि के कई वैकल्पिक मॉडलों पर काम किया। उन्होंने फूलों की खेती की, बाग लगाए और गौशालाएँ तक खोलीं। इसके अलावा भी कई तरीके आजमाए गए। उन्होंने पाया कि इस वैकल्पिक मॉडल के आगमन के बाद न केवल खेती में मुनाफा आने लगा बल्कि एक अन्य लाभ यह हुआ कि किसान परिवारों के चेहरों पर खुशी नजर आने लगी। यह बदलाव सन 1996-97 में दर्ज किया जाने लगा।

प्रेम सिंह की इस सफल यात्रा में निर्णायक मोड़ वर्ष 2010 में उस समय आया जब वह एक सम्मान समारोह में शामिल होने कर्नाटक के गुलबर्ग गए हुए थे। उस समारोह में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी आये हुए थे। कलाम के भाषण के बाद सवाल-जवाब के दौर में एक बच्ची ने उनसे पूछा कि वह हर किसी को डॉक्टर, इंजीनियर और ब्यूरोक्रेट बनने की सलाह तो देते हैं लेकिन किसान बनने को नहीं कहते ऐसा क्यों? कलाम साहब के पास इसका कोई सन्तुष्ट करने लायक उत्तर नहीं था। उसी समय मेरे मन में यह विचार आया कि इस देश की सरकार, इसके नेताओं और नौकरशाही के पास किसानों के सवालों का कोई उत्तर नहीं है, उनको अपनी राह खुद बनानी होगी। प्रेम सिंह का आवर्तनशील खेती का मॉडल इस बात का उदाहरण है कि कैसे खेती-किसानी के काम में बौद्धिकता का समावेश करके उसे आसानी से लाभ के धन्धे में बदला जा सकता है।

क्या है आवर्तनशील खेती?


प्रेम सिंह ने बागवानी, गोपालन और जैविक खेती का ऐसा अनूठा मॉडल तैयार किया है जिसकी बदौलत बुन्देलखण्ड के इस अपेक्षाकृत सूखे और निराशाग्रस्त इलाके में भी मुनाफे और हँसी की फसल लहलहाने लगी है।

आवर्तनशील खेती के कारण बड़ोखर खुर्द तथा आसपास के इलाकों में व्यापक सामाजिक और पर्यावरण सम्बन्धी बदलाव आये हैं। गाँव का कुल रकबा 2900 बीघा है। इसमें से 2500 बीघा जमीन कृषि कार्यों के लिये उपलब्ध है। आज इस गाँव के कई लोगों ने बाग लगाए हुए हैं। गाँव तथा उसके आसपास की पूरी हरियाली का पूरा श्रेय प्रेम सिंह की प्रेरणा से लगे बागों को जाता है। प्रेम सिंह के कई पड़ोसी काश्तकार अब जैविक खेती को अपना चुके हैं। प्रेम सिंह के पास करीब 14 एकड़ जमीन है जिसके बहुत बड़े हिस्से में उन्होंने आम, अमरूद और आँवले का बाग लगा रखा है। वहीं इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा गायोंं के लिये रखा गया है। शेष एक तिहाई भूभाग में जैविक खेती की जाती है। बागों से जहाँ नकद राशि हासिल होती है वहीं गायों से दूध तो मिलता ही है साथ ही जैविक खेती के लिये खाद भी हासिल होती है।

यानी आवर्तनशील खेती में जमीन के लगभग बराबर-बराबर तीन हिस्से किये जाते हैं। एक हिस्से में बाग, दूसरे में पशुपालन और तीसरे हिस्से में खेती।

किसानों के लाभ के लिये प्रेम सिंह अनाज के प्रसंस्करण को अनिवार्य बताते हैं। उनका कहना है कि गेहूँ को सीधे न बेचकर अगर आटे तथा अन्य उत्पादों में बदला जाये, अरहर को दाल बना दिया जाये और दूध से घी तथा अन्य उत्पाद निर्मित किये जाएँ तो किसान की आय में निश्चित तौर पर सुधार देखने को मिलेगा। अगर इन सभी कामों को गाँव के लोगों द्वारा अंजाम दिया जाये तो न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे बल्कि माल सीधे उपभोक्ता को बेचकर बिचौलियों की बीमारी खत्म की जा सकती है।

आवर्तनशील खेती से बदला जीवन


आवर्तनशील खेती के कारण बड़ोखर खुर्द तथा आसपास के इलाकों में व्यापक सामाजिक और पर्यावरण सम्बन्धी बदलाव आये हैं। गाँव का कुल रकबा 2900 बीघा है। इसमें से 2500 बीघा जमीन कृषि कार्यों के लिये उपलब्ध है।

आज इस गाँव के कई लोगों ने बाग लगाए हुए हैं। गाँव तथा उसके आसपास की पूरी हरियाली का पूरा श्रेय प्रेम सिंह की प्रेरणा से लगे बागों को जाता है। प्रेम सिंह के सभी पड़ोसी काश्तकार अब जैविक खेती को अपना चुके हैं। यहाँ बनने वाले प्रसंस्कृत उत्पादों के नाम का डंका दिल्ली जैसे दूरदराज शहरों तक बज रहा है। एक अकेले प्रेम सिंह के प्रयासों के चलते बड़ोखर खुर्द अपनी बड़ी पहचान कायम कर चुका है।

बन्दूकों की जगह कृषि औजार


खेती के लाभ के धन्धे में तब्दील होने से जो सामाजिक बदलाव आये हैं उनकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती है। प्रेम सिंह याद करते हैं कि जिस समय उन्होंने गाँव में खेती का काम शुरू किया था उस समय यहाँ करीब 100 बन्दूकें हुआ करती थीं।

गाँव का लगभग हर जवान बाहर निकलते वक्त कन्धे पर बन्दूक अवश्य टाँगे रहता था। लेकिन आवर्तनशील खेती की सफलता से गाँव के मनोविज्ञान पर चमत्कारिक प्रभाव पड़ा। अब गाँव में एक भी बन्दूक नहीं नजर आती। नए बच्चों का लगाव बन्दूक से कम और नए विचारों और खेती किसानी की उन्नत तकनीकों से अधिक है।

भविष्य की योजना


भविष्य की योजना यह है कि आवर्तनशील खेती को राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाई जाये। अगर सरकार इसे नीतिगत स्तर पर स्वीकार करती है तो न केवल किसान समृद्ध होगा, सबको भोजन मिलेगा बल्कि इससे खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करने का लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकेगा। उत्तर प्रदेश, सरकार की ओर से बाग लगाने पर सीधी सब्सिडी का पूरा समर्थन दिया जा रहा है।

प्रेमसिंह अपने गाँव तथा आसपास के किसानों को जैविक खेती और खाद्य प्रसंस्करण के बारे में समुचित प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराते हैं। प्रेम सिंह के फार्म हाउस जो दरअसल एक किसान आश्रम ही है, में देश के अलग-अलग हिस्सों से आये किसानो का ताँता लगा रहता है। वे यहाँ कृषि में सफलता के गुर सीखने आते हैं। प्रेम सिंह के आश्रम पर इन किसानों के रहने और खाने की निशुल्क व्यवस्था रहती है।

किसान विद्यापीठ की स्थापना


लम्बे समय से प्रेम सिंह का यह इरादा रहा है कि वह चार एकड़ भूखण्ड में एक किसान विद्यापीठ का निर्माण करें। अब यह सपना हकीकत में तब्दील हो गया है। आगामी 12 फरवरी को किसान विद्यापीठ का उद्घाटन होने जा रहा है।

इस विद्यापीठ में पाँच अलग-अलग विभागों की मदद से नवयुवकों को खेती किसानी के काम में प्रशिक्षित किया जाएगा। फिलहाल यहाँ पर उन्होंने एक एग्रेरियन सेंटर स्थापित कर रखा है। जहाँ किसान अक्सर मिल बैठते हैं और अपनी समस्याओं पर चर्चा करते हैं। इस जमीन के आधे हिस्से पर आम के बाग पहले से ही लगे हुए हैं।

अपने बाग मेें टहलते प्रेम सिंहआगामी 12 फरवरी को इस विद्यापीठ का उद्घाटन होना है। इसमें उन काश्तकारोंं की जमीन ली जाएगी जो खेती करने में सक्षम नहीं हैं या जो अपनी खेती किराए पर देते हैं। इन खेतों को उन छात्रों को सौंपा जाएगा जो इस विद्यापीठ में तालीम लेने आएँगे। ये छात्र उन खेतों में आवर्तनशील खेती करेंगे। विद्यापीठ में शिक्षण का कार्य इलाके के वे काश्तकार करेंगे जो पहले से आवर्तनशील खेती कर रहे हैं और उससे लाभान्वित हो रहे हैं। इसके लिये किसी कृषि विश्वविद्यालय से सम्पर्क नहीं किया जाएगा बल्कि किसानों के व्यावहारिक अनुभवों का फायदा उठाया जाएगा। इस तरह प्रेम सिंह साबित करना चाहते हैं कि खेती लाभ का और आनन्द का धन्धा है।

Disqus Comment