मालवा को आगाह . .

Submitted by admin on Thu, 01/28/2010 - 11:53


यह कथन मात्र भयावह कल्पना नहीं है वरन् वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर निकाले निष्कर्ष इन्हें प्रतिपादित करते हैं। क्या हैं वे आधार? किन कारणों से मरुस्थली तथ्य इनकी पुष्टि करते हैं? मरुस्थल बनती भूमि को रोकने के उपाय कौन से हैं? प्रदेश योजना मंडल के सलाहकार एवं वनस्पति वैज्ञानिक डा. हंसकुमार जैन ने इन्हीं प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए पश्चिमी मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों का विस्तृत अध्ययन किया है। डा. जैन के इस अध्ययन ने जहां एक ओर अनेक चौंका देने वाले तथ्यों को उजागर किया है, वहीं हमारी खुशहाली को कायम रखने के उपाय भी दर्शाएँ है।

मरुस्थल आखिर होता क्या है? विभिन्न ज्ञान कोषों पर आधारित जानकारी के अनुसार कम वर्षा वाले ऐसे क्षेत्र जहां खेती या तो बिलकुल नहीं होती हो अथवा कम मात्रा में होती हो, दूर-दूर तक पेड़ पौधें नजर न आते हों, जमीन या तो रेतीली हो या पथरीली मरुस्थल। वान नोस्ट्रेण्ड के वैज्ञानिक कोश के अनुसार दस इंच से कम वार्षिक औसत वर्षा के क्षेत्र मरुस्थल की श्रेणी में आते हैं। लगातार कम वर्षा के ऐसे क्षेत्रों में पानी का अभाव वनस्पति की भी कमी कर देता है। वातावरण में नमी की कमी के कारण धूप की तेजी से इन क्षेत्रों का भूमिगत जल भी समाप्त होने लगता है। परिणामतः जमीन पथरीली और धीरे-धीरे रेतीली बन जाती है।

विश्व के कुल जमीनी क्षेत्र का पांचवा भाग मरुस्थल के अंतर्गत आता है। इनमें से अधिकांश प्राणी विहीन है अभावग्रस्त होने के अभिशाप के कारण।

हमारे देश में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और कर्नाटक के कुछ क्षेत्र मरुस्थली बाना धारण किए हैं। इस सूची से अनुपस्थित मध्य प्रदेश अब जोर-शोर से इसे अपनाने को जुटा हुआ है। मालवा का इस हेतु बलिदान हमें भी सूची में सम्मिलित करवा देगा।

अब यह भी देख लें कि हम इस दिशा में कदम-दर-कदम किस प्रकार आगे बढ़ रहे हैं।

शरद जोशी की प्रसिद्ध व्यंग्य ‘मध्य प्रदेश गाइड’ में कहा गया है कि ‘मध्य प्रदेश वनों से आच्छादित है।’ लगभग चौथाई दशक पूर्व इस कथन को निरर्थक भी नहीं कहा जा सकता था। जब पश्चिमी मध्य प्रदेश को झाबुआ और राजगढ़ (ब्यावरा) जिलों के जंगलों में शेर-चीते जैसे वन्य प्राणी मुक्त विचरण करते रहते थे। आज भी कट्ठीवाड़ा के बारे में आम धारणा है कि यह आदिवासी क्षेत्र सुरम्य वनों से घिरा है, लेकिन सत्य अत्यन्त कठोर है। उक्त क्षेत्र में जंगल सिमट कर कुछ वृक्षों के झुंडों के रूप में ही नजर आते हैं। हमने अपनी आजादी का उपयोग नैतिक मूल्यों को गिराने में किया है और मूल्यों के पतन के साथ वनों का पतन भी तेजी से हुआ है। देवदूत ‘इन्सेट’ द्वारा आसमान से भेजे गए चित्र प्रमाणित दस्तावेज हैं कि अब मध्य प्रदेश वनों से आच्छादित नहीं रहा है। इस तथ्य से तो सभी परिचित हैं कि वनों का अभाव वर्षा के औसत को घटाता है। पर ऐसा क्यों होता है? वनों के पेड़-पौधे और वनस्पति जल की मात्रा में समृद्ध होते हैं और उनके सब और वातावरण में नमी की मात्रा काफी अधिक होती है।

मानसूनी बादल के आगमन पर यही नमी दबाव की वृद्धि में अधिक होती है। फलस्वरूप रिमझिम के तराने लेकर आ जाती है बरसात, लेकिन पश्चिम मध्य प्रदेश में वनों की कटाई ही वर्षा की कमी का मात्र कारण नहीं है। इस क्षेत्र में नमी को बरकार रखने वाला दूसरा साधन अर्थात घास-दूब जैसी अन्य वनस्पतियां भी गायब होती जा रही हैं और यही मुख्य कारण है जिसने वर्षा का औसत तो इस क्षेत्र से घटाया ही है, गर्मी की तीव्रता को भी बढ़ाया है। देखते-देखते शब-ए-मालवा किंवदन्ती बनती जा रही है और 35-36 डिग्री की लक्ष्मण रेखा को शिरोधार्य करने वाली पारे की ऊंचाई 48-50 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंच रही है।

आखिर आपने सोचा है घास जैसी वनस्पति मालवा क्षेत्र से समाप्त क्यों होती जा रही है? यह प्रक्रिया उस लुभावने दृश्य की परिणित है जो हम अक्सर देखते रहते हैं। यह दृष्य उन पशु खेड़ो का होता है, जो राजस्थान की सीमा पार कर पश्चिमी मध्य प्रदेश में प्रतिवर्ष प्रविष्ट होते रहते हैं। इन खेड़ों में सम्मिलित ऊंट इस क्षेत्र के ऊंचे पेड़ो की पत्ती साफ कर देते हैं और गाय, भेड़, बकरी आदि हमारी घास को निगल लेते हैं। हमारे इन अतिथियों में भेड़ों की दावत हमारे लिए सबसे अधिक भारी सिद्ध होती है। अपने समक्ष परोसा पड़ा घास भेड़ें जड़ से उखाड़ लेती है, परिणामतः भविष्य में घास की पैदाइश ही नहीं होती। इस प्रकार घास एवं अन्य वनस्पतियों के अभाव में जमीन की मिट्टी बेआसरा हो जाती है और तेज वर्षा होने पर बहकर नदी नालों में समा जाती है। ऐसी मिट्टी बनने में तो दो-तीन सौ वर्ष लगाती है, किन्तु वर्षा के एक ही मौसम में साफ हो जाती है। मिट्टी के नीचे से निकली पथरीली जमीन गर्मी पाकर दरकती जाती है, और परिणाम होता है मरुस्थल।

वनस्पति जड़ो से विहीन जमीन का दूसरा दुष्प्रभाव यह होता है कि ऐसी भूमि जल रोकने की क्षमता का अभाव रहता है। ऐसी भूमि की वृद्धि के फलस्वरुप ही मालवा में भूमिगत जल सूखता जा रहा है। दूसरी और मशीनीकरण के इस दौर में कुओं पर रहट-चरस आदि के स्थान पर सिंचाई करने वाली मोटरें पानी बाहर फेंक रही है। इतनी अधिक गति से निकाला गया पानी धारा को तोड़ देता है और टूटी हुई धार बमुश्किल ही पुनर्स्थापित हो पाती है। इसलिए एक जमाने में मुंह पर से ही उलीच लिए जाने वाले कुएं अब सैकड़ों फीट की खुदाई पर भी जल विहीन रहने लगे हैं।

हम प्रतिवर्ष जोर-शोर से वन महोत्सव मनाते हैं। हजारों-लाखों वृक्ष लगाए जाते हैं। फिर उन्हें भूल जाते हैं, क्योंकि हम तो कर्म करते हैं, फल की चिंता हमें नहीं उसे करना है। बांधने की क्षमता में अक्षम हमारी धरती इन पौधों को बांध नहीं पाती और भूमिगत जल का अभाव उन्हें सूखा देता है। हम अगले वर्षों में उन्हीं स्थलों पर फिर से वन महोत्सव मनाकर अपना कर्तव्य पूरा करते रहते हैं। हमारा महोत्सवी प्रेम इस प्रकार अब तक करोड़ों रुपए की कुरबानी ले चुका है। आंकड़ों का गणित दर्थाता है कि इस प्रकार लगाए गए पौधों में से मात्र 5 से 10 प्रतिशत तक पौधे ही जीवित रह पाते हैं।

हमारे अन्य शासकीय विभाग भी अपने स्तर पर अलग-अलग कार्यों में जुटे हैं। जैसे भूमि-संरक्षण वाले मेंड़ बनाकर मिट्टी के बहाव को प्रतिबंधित करना चाहते हैं, किन्तु बगैर वनस्पति की ये मेड़े अगली वर्षा में बह जाती है। सिंचाई, विभाग तालाबों का निर्माण कर देता है, जो गर्मी की तीव्रता का शिकार बन सूख जाते हैं। इसी प्रकार के कई कार्य बगैर समन्वय के होने से उपयोगी सिद्ध नहीं हो पाते। यह तथ्य रेखांकित करता है कि किसी भी योजना का कार्यन्वयन बगैर अंत विभागीय सहयोग के संभव नहीं है। पश्चिमी मध्य प्रदेश के मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए सबसे पहली आवश्यकता विभिन्न विभागों का आपसी तालमेल बनाने की हैं।

पश्चिमी मध्य प्रदेश की हरियाली को लौटाने के रचनात्मक कार्यों को आरम्भ करने के पहले आवश्यकता इस बात की है कि इस क्षेत्र में हो रहे विध्वंस को सबसे पहले प्रतिबंधित किया जाए। वृक्षों की कटाई के विरुद्ध तो ढेर से कानून है, लेकिन जब तक उनका पालन सख्ती से नहीं होगा, तब तक धरती का यह दोहन जारी रहेगा।

अब प्रश्न है पशुओं द्वारा समाप्त की जाने वाली वनस्पति का। इस बारे में जब भी कुछ करने का प्रयास किया गया कानून या राजनीति मे उसका बचाव किया। वे पशु स्वामी जिनके खेड़ मध्य प्रदेश में घूमते हैं, अपने धन के बल पर सब कुछ खरीद लेते हैं कानून और राजनीति भी। इनके पशुओं की मालवा-यात्रा इन्हें दूहरा लाभ प्रदान कराती है। प्रथम तो इनके हजारों पशुओं को खाद्य मिलता है, और द्वितीय अपनी वापसी यात्रा में ये अफीम, गांजा आदि की तस्करी भी करते हैं। यह मामला चूंकि अन्तराज्यीय है, इसलिए इस प्रश्न पर राष्ट्रीय विचार आवश्यक है। निश्चित ही इस पशु आगमन पर प्रतिबंध लगाए बगैर बात बनेगी नहीं। अभी तो मामला यह है कि मुसीबत का पहाड़ पश्चिमी मध्य प्रदेश पर ही टूट रहा है, पर भविष्य में पूरा मध्य प्रदेश इसकी चपेट में आ सकता है, क्योंकि अब ये बस्तर तक जाने लगे हैं। इस प्रक्रिया को, जिसके कारण हमारी सदाबहार शिप्रा, पार्वती, बेतवा और चम्बल मौसमी नालों में बदल गई हैं। प्रतिबन्धित किया जाना नितान्त आवश्यक है।

सकारात्मक उपायों के रूप में जल संरक्षण (वाटरशेड) के आधार पर भूमि का विकास किया जाना चाहिए। भूमि, कृषि, वन, सतही तथा भूमिगत जल स्रोतों, पशुपालन इत्यादि के संपूर्ण विकास के लिए सम्मिलित रूप से योजना बनाकर क्रियान्वयत करना होगा। यह कार्य वन, कृषि, सिंचाई, पशुपालन आदि अनेक विभागों के आपसी सहयोग द्वारा ही किया जा सकता है। प्रदेश के योजना मंडल में इस दिशा में विचार-विमर्श किया जा रहा है। शासन के अतिरिक्त जन सहयोग के बगैर किसी भी योजना की सफलता संदिग्ध ही होती है। अभी समय है कि हम चेत जाएं और मालवा भूमि की चिथड़े-चिथड़े हो रही हरी चूनर को नया स्वरूप देने के लिए कृत संकल्प हो, अपना दायित्व निभाएं। निश्चित ही तभी यह दिन सार्थक होगा जब हम गर्व से ऊंचे स्वर में अपनी समृद्धि के गीत गा सकेंगे। मालवाधरती गहन गंभीर.....!
 

 

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