मेरा पानी तेरा पानी

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पानी, समाज और सरकार (किताब)

आजादी मिलने के बाद भारत का संविधान लिखा गया। सन 1987 में देश की पहली राष्ट्रीय जलनीति लागू हुई। पर संविधान एवं राष्ट्रीय जलनीति में भारत की पुरानी परंपराओं, प्रणालियों और जल-संस्कृति या पानी के बंटवारे की समाज द्वारा संचालित पद्धतियों और प्रणालियों की झलक नहीं दिखती। देश में प्रजातंत्र के लागू होने के बाद भी पानी के प्रबंध में प्रजा या समाज के स्थान पर तंत्र और पानी के पूरे केनवास पर केवल सरकार का ही अस्तित्व; प्रभुत्व एवं अधिकार दिखता है खैर अब इस बीत चुके किस्से को अधिक तूल नहीं दिया जाना चाहिए। भारत में अंग्रेजों के सत्ता संभालने के बाद, पानी से जुड़ी भारत की पुरानी समझ, परंपराओं, प्रणालियों और संस्कृति की अनदेखी हुई। इस अनदेखी के कारण उनका ह्रास हुआ और यूरोप की ठंडी एवं पूरी तरह भिन्न जलवायु में विकसित जल विज्ञान, जल संचय तथा पानी के बंटवारे से जुड़ी समझ ने देश में अपनी जगह बनाना शुरू किया। गुलाम देश में, मैकाले की शिक्षा प्रणाली द्वारा प्रशिक्षित पीढ़ियां तैयार हुईं और उन पीढ़ियों ने अपने विदेशी मालिकों की छत्रछाया में विदेशों में प्रचलित जल संरचनाओं को, पानी के बंटवारे के मॉडल को प्रगति और उपयुक्तता का पर्याय माना। यूरोप तथा अमेरिका में प्रचलित जल बंटवारे की फिलासफी को आधुनिक एवं प्रगतिशील सिद्धांत के रूप में सर्वोपरि माना और अपनाया। इसी दौर में, विदेश की हर चीज अच्छी का सोच विकसित हुआ। उस दौर में इंग्लैंड रिटर्न का ठप्पा किसी को भी अतिविशिष्ट बनाने के लिए पर्याप्त था। इसी माहौल में देश आजाद हुआ और गुलामी के दौर की अंग्रेजी पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने पानी की नीतियों को विदेशी तर्ज पर आगे ले जाने का दायित्व संभाला। इस दौर में भारतीय समाज पीछे छूट गया और जलप्रणालियां भुलाई जाने लगीं।

मेरा पानी तेरा पानी से संबंधित इस अध्याय में हम विभिन्न राज्यों के बीच मौजूद नदी जल विवादों से संबंधित कुछ मोटी-मोटी बातों को जानेंगे। पानी के बंटवारे की कहानी के इस मुकाम पर पाठकों को लेखक के इस अनुरोध को ध्यान में रखना उचित होगा कि विद्वानों के विचार केवल उनकी अपनी सोच, नजरिया और विचारधारा पर आधारित टिप्पणी भर है। वह समाज की आकांक्षा का आईना या सरकार की सोच का प्रतिबिम्ब नहीं है। विषय की हकीकत और हकीकत जन्य जटिलता बिलकुल अलग होती है, इसलिए विद्वानों की सोच और समझ की सीमाएं हैं। इन्हीं सीमाओं के अंदर रहकर उन कारणों की भी बात करेंगे जो जल विवादों की जड़ में मौजूद लगते हैं। इस अध्याय में हम उन कानूनों एवं प्रावधानों की भी बात करेंगे जिनके कारण विभिन्न राज्यों के बीच जल विवादों के लिए जमीन तैयार हुई है। इन विवादों में कुछ विवाद आजादी के पहले के हैं तो कुछ विवाद, आजादी के बाद विभिन्न कारणों के कारण वजूद में आए हैं। इन विवादों में प्रमुख कावेरी जल विवाद है। इस विवाद की कहानी का इतिहास समझेंगे और फिर रावी-व्यास के विवाद का संक्षेप में जायजा लेंगे। इन विवादों के निपटारे में समाज की भागीदारी की तलाश करेंगे। सबसे पहले सुलझे मुख्य अंतरराज्यीय नदी जल विवादों को जान लें फिर आगे बात करेंगे।

1. कृष्णा नदी जल विवाद इस विवाद पर अभिकरण का अंतिम निर्णय हो चुका है। यह विवाद आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच था।
2. नर्मदा नदी जल विवाद इस विवाद पर अभिकरण का अंतिम निर्णय हो चुका है यह विवाद मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के बीच था।

3. गोदावरी नदी जल विवाद इस विवाद पर अभिकरण का अंतिम निर्णय हो चुका है। यह विवाद आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र के बीच था।

अंतरराज्यीय नदियों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर जल विवादों की बात करने के पहले यह जानना आवश्यक है कि आखिर नदियों के पानी को लेकर राज्यों के बीच विवाद क्यों पनपते हैं? जाहिर है, इन विवादों की जड़ में पेयजल, निस्तार, खेती और कल-कारखानों इत्यादि में पानी की अनिवार्य जरूरतें हैं। भारत जैसे विशाल देश में जहां सूखा संभावित एवं बरसात पर निर्भर इलाकों को साल में बमुश्किल चार महीने पानी मिलता हो, उस देश में लगभग आठ माह तक पानी से महरूम राज्यों के बीच अंतरराज्यीय नदियों के पानी के बंटवारे का मामला, अपने आप प्रभावित आबादी की मूलभूत जरूरतों, आजीविका और सेहत से जुड़ा संवेदनशील मामला बन जाता है।

दूसरी ओर यह मामला विभिन्न राज्यों के सरकारी विभागों को सौंपी जिम्मेदारियों से भी जुड़ा मामला है तो इन राज्यों में अपने प्रभाव को आगे ले जाने की जद्दोजहद में जुटी राजनीतिक पार्टियों के लिए भी जनहित और उनके अपने वर्चस्व से जुड़ा अहम मामला है। ऐसा मामला जिसमें मतदाताओं से जुड़ने या टूटने की असीम संभावनाएं हैं, इसीलिए सभी राजनीतिक दल अंतरराज्यीय नदियों के पानी के बंटवारे से संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों की समझ बनाते हैं, अपनी भूमिका तलाशते हैं और पानी की अधिकाधिक मात्रा को अपने राज्य और इलाके में लाने का प्रयास करते हैं।

आजादी मिलने के बाद भारत का संविधान लिखा गया। सन 1987 में देश की पहली राष्ट्रीय जलनीति लागू हुई। पर संविधान एवं राष्ट्रीय जलनीति में भारत की पुरानी परंपराओं, प्रणालियों और जल-संस्कृति या पानी के बंटवारे की समाज द्वारा संचालित पद्धतियों और प्रणालियों की झलक नहीं दिखती। देश में प्रजातंत्र के लागू होने के बाद भी पानी के प्रबंध में प्रजा या समाज के स्थान पर तंत्र और पानी के पूरे केनवास पर केवल सरकार का ही अस्तित्व; प्रभुत्व एवं अधिकार दिखता है खैर अब इस बीत चुके किस्से को अधिक तूल नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि अब यह अतीत है और कुछ लोगों की नजर में अतीत बीत चुका है।

पाठक सहमत होंगे कि भारत का संविधान और देश में लागू जलनीति के प्रावधान ही पानी के अंतरराज्यीय विवादास्पद मामलों को सुलझाने में वास्तविक भूमिका निभा सकते हैं। न्यायालय भी इन्हीं के प्रावधानों के अनुसार अपने निर्णय दे सके हैं। गौरतलब है कि संविधान के आर्टिकल 262 में अंतरराज्यीय नदियों या नदी घाटी में पानी के उपयोग, उसके वितरण या उसके नियंत्रण के मामलों में संसद द्वारा कानून बनाकर विवादों का निपटारा कराने का उल्लेख है। केन्द्र सरकार ने संविधान के इस आर्टिकल का उपयोग कर सन 1956 में इंटर स्टेट वाटर डिसप्यूट एक्ट पारित कराया है। इस एक्ट के सेक्शन 11 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को पंचाट (ट्रिब्यूनल) को सौंपे जल विवाद मामलों में दखल का अधिकार नहीं है। इसी एक्ट के सेक्शन 4 के प्रावधान के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को अधिकार होगा कि वह केन्द्र सरकार को अंतरराज्यीय जल विवादों को पंचाट को सौंपने के आदेश दे सके। अंतरराज्यीय नदियों के विवादों (वितरण, उपयोग और नियंत्रण) के अतिरिक्त, संविधान में अन्य किसी विषय का उल्लेख नहीं है। इस मुकाम पर कुछ लोगों के मन में प्रश्न उठ सकता है कि यदि उक्त प्रावधानों में अंतरराज्यीय नदियों के विवाद नहीं सुलझते तो नोडल विभाग, संसद, सरकार और समाज का अगला कदम क्या होना चाहिए?

गौरतलब है कि भारत सरकार ने सन 1956 में संसद से अंतरराज्यीय जल विवाद एक्ट पारित कराया था। इस एक्ट का उद्देश्य अंतरराज्यीय नदी जल विवादों का निपटारा करना था। इस एक्ट में नदी जल विवादों के निपटारे के लिए पहले राज्यों के बीच आपसी चर्चा और चर्चा के असफल होने पर ट्रिब्यूनल के गठन का प्रावधान है। सन् 1956 में जब यह एक्ट बना था, निश्चय ही उस समय संसद ने उपरोक्त प्रावधानों को पर्याप्त माना होगा पर बाद का अनुभव बताता है कि कुछ मामलों में राज्यों ने ट्रिब्यूनल के आदेशों को मानने से इंकार किया। रावी-व्यास विवाद में केन्द्र का हस्तक्षेप अमान्य किया तो अन्य मामले में कोर्ट के आदेशों की अनदेखी हुई। अब कुछ बातें थोड़े विस्तार से।

भारत सरकार ने सन 1982 में देश के जल संसाधनों के इष्टतम उपयोग एवं जल उपलब्धता एवं अन्य आवश्यक अध्ययन करने के लिए नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी का नाम की सोसाइटी का गठन किया। इस सोसाइटी का काम केवल तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराना है। इस सोसाइटी को नदी जल विवादों या अन्य मामलों पर वैधानिक अधिकार नहीं हैं। सन 1983 में भारत सरकार ने नेशनल वाटर रिसोर्स काउंसिल का गठन किया। इस काउंसिल ने भी अंतरराज्यीय जल विवादों के निपटारे के लिए कोई भी ठोस सुझाव नहीं दिए। सन 1987 में देश की पहली जलनीति बनी। इस नीति में या बाद के संशोधन (सन 2002 की जलनीति) में देश के जल संसाधनों के समन्वित एवं पर्यावरणी आधार पर विकास की बातें कही गई हैं। पर विकास के उपर्युक्त उल्लेख के बावजूद मौजूद संस्थागत ढांचों ने उक्त जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया। जल विवादों के निपटारे के लिए संवैधानिक और संसद द्वारा पारित व्यवस्था मौजूद है जिसमें आपसी चर्चा और ट्रिब्यूनल के गठन का कानूनी प्रावधान है।

गौरतलब है कि कुछ अंतरराज्यीय नदियों के विवाद आजादी के पहले से तो कुछ नदियों के मामले आजादी के बाद उभरे हैं। इनमें कुछ विवाद सरलता से निपट गए हैं तो कुछ विवाद आज भी गले की हड्डी बने हुए हैं। उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद सरलता से निपटे विवादों में यमुना नदी के पानी का विवाद उल्लेखनीय हैं यह विवाद हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के बीच था जो न्यायालयीन हस्तक्षेप के बाद, इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केन्द्र सरकार की बैठक के बाद सुलझ गया पर अनसुलझे विवादों की सूची कम नहीं है। इस सूची में कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच का कावेरी विवाद सबसे पहली पायदान पर है। इस विवाद का निपटरा अनेक सालों से असहमति की बुनियाद पर टिका हैं पानी के बंटवारे पर अत्यंत गंभीर मतभेद हैं तथा अंतहीन असहमति है। भारत की अंतरराज्यीय नदियों के पानी के बंटवारे का हाल जानने के लिए उपयुक्त होगा कि हम पहले उल्लेखनीय जल विवादों को जान लें और फिर पूरे परिदृश्य की हकीकत समझने के लिए हंडी के एक या दो चावलों की बानगी देखें।

मुख्य नदी जल विवाद


1. कावेरी नदी जल विवाद
2. रावी-व्यास नदी जल विवाद

इन विवादों में कावेरी जल विवाद सबसे अधिक विवादास्पद है। अतः सबसे पहले इसी विवाद के संक्षिप्त विवरण को जानने का प्रयास करें-

कावेरी नदी जल विवाद


कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी के बंटवारे का मामला बहुत पुराना है। सौ से भी अधिक सालों से तमिलनाडु द्वारा कावेरी नदी के पानी के बड़े हिस्से का उपयोग किया जा रहा है। यही उपयोग दोनों राज्यों के बीच झगड़े का मूल कारण है। अंग्रेजों के शासन काल में हुए इस असमान बंटवारे को कर्नाटक अपने प्रति ऐतिहासिक अन्याय मानता है। कावेरी नदी के इस असमान जल वितरण की जड़ में सन 1892 और 1924 में मद्रास प्रेसीडेंसी और तत्कालीन मैसूर रियासत के बीच हुए समझौते हैं। कर्नाटक चाहता है कि दोनों राज्यों के बीच समानता के आधार पर पानी का बंटवारा हो जबकि तमिलनाडु का तर्क है कि उपरोक्त ऐतिहासिक समझौतों के कारण उसने लगभग 30 लाख एकड़ सिंचित जमीन विकसित कर ली है। अब इस भूमि के उपयोग को बदलना संभव नहीं हैं यदि कोई भी बदलाव लागू किया जाता है तो लाखों किसानों की आजीविका पर बुरा असर पड़ेगा।

कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर पचासों साल तक दोनों राज्यों के बीच विभिन्न स्तर पर बातचीत चलती रही पर वह बेनतीजा रही। अंत में भारत सरकार ने अंतरराज्यीय जल विवाद एक्ट 1954 के अंतर्गत कावेरी नदी जल विवाद अभिकरण का गठन किया। अभिकरण ने लगभग 16 सालों तक विभिन्न पक्षों के तर्क सुने और दिनांक 5 फरवरी 2007 को अंतिम फैसला सुनाया। इस फैसले के अनुसार तमिलनाडु को 419 बिलियन क्यूबिक फीट और कर्नाटक को 270 बिलियन क्यूबिक फीट पानी मिलना सुनिश्चित हुआ है। इसके अलावा केरल को हर साल 30 बिलियन क्यूबिक फीट और पुडुचेरी को सात बिलियन क्यूबिक फीट पानी दिया जाएगा।

गौरतलब है कि कर्नाटक सहित सभी राज्य इस फैसले से नाखुश है। कर्नाटक ने तो अभिकरण में पुनर्विचार याचिका दायर कर दी है।कुछ पाठकों की रुचि कावेरी नदी के खास-खास आंकड़ों को जानने में होगी। अतः जल विवाद के तकनीकी पक्ष को ठीक से समझने के लिए तालिका में कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी राज्यों से संबंधित आंकड़े दिए जा रहे हैं-

विवरण

कर्नाटक

तमिलनाडु

केरल

पुडुचेरी

योग

नदी घाटी का क्षेत्रफल (वर्ग किलोमीटर)

34,273 (42 प्रतिशत)

44,016 (54 प्रतिशत)

2,866 (3.5 प्रतिशत)

148 (0.5 प्रतिशत) योग में जोड़ा नहीं

81,155

नदी घाटी का सूखा प्रभावित क्षेत्रफल (वर्ग किलोमीटर)

21,870 (63.8 प्रतिशत)

12,790 (29.2 प्रतिशत)

--

--

34,660

कर्नाटक के अनुसार राज्यों का जल योगदान (बिलियन एकड़ फीट)

425 (53.7 प्रतिशत)

252 (31.8 प्रतिशत)

113 (14.3 प्रतिशत)

--

790

तमिलनाडु के अनुसार राज्यों का जल योगदान (बिलियन एकड़ फीट)

392 (52.9 प्रतिशत)

222 (30 प्रतिशत)

126 (17 प्रतिशत)

--

740

राज्यों द्वारा चाही पानी की सकल मात्रा

465 (41 प्रतिशत)

566 (50 प्रतिशत)

100 (9 प्रतिशत)

9.3 (1 प्रतिशत)

1140.3

तमिलनाडु राज्य की इच्छानुसार राज्यों को पानी का आवंटन

177 (24 प्रतिशत)

566 (76 प्रतिशत)

5 (1 प्रतिशत)

--

748

अभिकरण के निर्णय के अनुसार राज्यों को पानी का आवंटन

270 (37 प्रतिशत)

419 (58 प्रतिशत)

30 (4 प्रतिशत)

7 (1 प्रतिशत)

726

 



आजादी के बाद का बदलाव


कावेरी जल विवाद


मैसूर रियासत अपने किसानों को सुनिश्चित सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सिंचाई परियोजनाओं का निर्माण करना चाहती थी। मद्रास प्रेसीडेंसी का इलाका जो कावेरी नदी के डाउनस्ट्रीम में स्थित है, को लगा कि मैसूर के इस कदम से कावेरी के जलप्रवाह में कमी आएगी इसलिए उसने (मद्रास प्रेसीडेंसी ने) विरोध किया। इस विरोध के निपटारे एवं कावेरी पर बांध बनाने की इजाजत के लिए मैसूर रियासत ने अंग्रेज सरकार को प्रतिवेदन दिया। मैसूर रियासत के इस प्रतिवेदन पर, सन 1890 में हुई उच्चस्तरीय बैठक में फैसला हुआ कि मैसूर राज्य को अपने सिंचाई संसाधनों के तर्कसंगत विकास की स्वतंत्रता होगी तो मद्रास प्रेसीडेंसी को अपने हितों की व्यावहारिक सुरक्षा का अधिकार।

इस आधार पर सन 1892 में दोनों राज्यों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते के बारे में आज की कर्नाटक सरकार का कहना है कि यह समझौता गुलाम देश की दो असमान इकाइयों यथा रजवाड़े और अंग्रेज सरकार के राज्य के बीच हुआ था। इस समझौते ने मद्रास सरकार को असीमित अधिकार प्रदान किए हैं जो कर्नाटक के हितों के पूरी तरह विरुद्ध हैं। इस समझौते के कारण कर्नाटक को किसी भी मुख्य नदी पर नई सिंचाई परियोजना बनाने के पहले मद्रास प्रेसीडेंसी की सहमति लेनी पड़ेगी और परियोजना से संबंधित सभी वांछित जानकारियां प्रदान करनी होंगी।

सन् 1910 में मैसूर राज्य के महाराजा नलवाड़ी कृष्णराजा वाडियार ने अपने राज्य के मुख्य अभियंता सर एम. विश्वेशरैया की तकनीकी मदद से कननम्बडी ग्राम में 41.5 टीएमसी क्षमता के दो बांध (क्षमता 11 टीएमसी और 30.5 टीएमसी) बनाने का प्रस्ताव किया। मद्रास प्रेसीडेंसी ने सहमति नहीं दी क्योंकि वह खुद मेट्टूर में 80 टीएमसी क्षमता का बांध बनाना चाहता था।

मैसूर राज्य ने अंग्रेज सरकार से गुहार की। अंग्रेज सरकार ने मैसूर रियासत के आवेदन पर उसे 11 टीएमसी क्षमता का बांध बनाने की इजाजत दी। असहाय मैसूर ने अनुमति मिलने के बाद मूल प्रस्ताव की भावना के अनुरूप बांध की नींव बनाने का काम प्रारंभ किया। जाहिर है, मैसूर के इस कदम का मद्रास प्रेसीडेंसी ने पुरजोर विरोध किया। उसके ऐतराज पर ब्रिटिश सरकार ने समझौते की धारा 4 के अंतर्गत सर एचडी ग्रिफिथ की अध्यक्षता में कावेरी जल विवाद पर देश के पहले प्राधिकरण या पंचाट का गठन किया। एम. नीथरसोले, इंस्पेक्टर जनरल सिंचाई को इस अभिकरण का एसेसर बनाया गया। सन 1913 की 16 जुलाई को प्राधिकरण (अभिकरण) ने सुनवाई प्रारंभ की और 12 मई 1914 को फैसला सुनाया। इस फैसले के अनुसार मैसूर रियासत को 11 टीएमसी क्षमता का बांध बनाने की अनुमति मिली। मैसूर रियासत ने इस फैसले को अपने प्रति अन्याय और मद्रास प्रेसीडेंसी के हितों का रक्षक माना। इस फैसले के विरुद्ध मद्रास प्रेसीडेंसी ने अपील की। विवाद चलता रहा और सन 1924, 1929 और 1933 में भी फैसले हुए और समझौतों पर हस्ताक्षर भी हुए। कर्नाटक का मानना है कि पानी के वितरण में मैसूर को कावेरी नदी के अपने हिस्से के 80 प्रतिशत पानी से हाथ धोना पड़ा है इस जद्दोजहद के बाद कावेरी पर कन्नम्बडी में टीएमसी और मेट्टूर में मद्रास प्रेसीडेंसी ने 93.5 टीएमसी क्षमता के बांध बनाए।

सन 1947 के बाद कावेरी जल विवाद की दशा और दिशा


देश के आजाद होने के बाद देशी रियासतों का भारत में विलय हुआ और नए-नए प्रांत बने। इस विलय ने मैसूर और मद्रास प्रेसीडेंसी को मैसूर (कर्नाटक) और मद्रास (तमिलनाडु) में बदल दिया। इसके बाद राज्यों का पुनर्गठन हुआ और अनेक इलाकों का राजनीतिक समीकरण बदल गया। कावेरी नदी घाटी के इलाके में भी बदलाव हुए और कुर्ग (कावेरी का उद्गम स्थान) मैसूर राज्य का हिस्सा बना। हैदराबाद रजवाड़े और बंबई प्रेसीडेंसी का बहुत बड़ा हिस्सा मैसूर राज्य में जोड़ा गया। मलावार का कुछ इलाका जो पहले मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था, केरल राज्य में मिलाया गया। पुडुचेरी को केन्द्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला। राज्यों के पुनर्गठन के कारण कावेरी नदी की घाटी का इलाका मैसूर, मद्रास, केरल और पुडुचेरी राज्यों का अंग बना। इस बदलाव ने कावेरी जल विवाद की तस्वीर और समीकरण बदल दिए। हिस्सेदारों की फेहरिश्त में केरल और पुडुचेरी जुड़े और उन्होंने विवाद में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई तथा कावेरी के पानी के बंटवारे में अपना हिस्सा मांगा।

सन 1960 के आते-आते संबंधित राज्यों और केन्द्र सरकार को जल विवाद की गंभीरता का अनुभव होने लगा था क्योंकि सन 1924 में हुए अनुबंध की समाप्ति की समय सीमा पास आ रही थी। अनुबंध समाप्ति की पृष्ठभूमि में चर्चाएं प्रारंभ हुई और लगभग दस साल तक चलती रही। परिणाम वही ढाक के तीन पात। इसी दौरान केन्द्र सरकार ने कावेरी फेक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन किया। इस कमेटी के गठन का उद्देश्य जमीनी हकीकत जानना और हकीकत के संदर्भ में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करना था। सन 1972 में कमेटी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट और सन 1973 में अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट के आधार पर राज्यों के बीच चर्चाओं का दौर चला और सन 1974 में कावेरी घाटी अथॉरिटी का प्रस्ताव सामने आया। इस दौरान तमिलनाडु राज्य का सिंचाई का रकबा 14.40 लाख एकड़ से बढ़कर 25.80 लाख एकड़ हो गया। जबकि इसी अवधि में कर्नाटक में सिंचाई रकबा अपनी पूर्व स्थिति अर्थात 6.80 लाख एकड़ पर स्थिर रहा अर्थात सिंचाई सुविधा नहीं बढ़ाई जा सकी। आंकड़ों की इस हकीकत ने कर्नाटक के लोगों के मन में पुराने समझौते की खामियों को पुख्ता किया।

भारत सरकार ने सन 1997 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कावेरी नदी अथॉरिटी का गठन किया। इस अथॉरिटी के अन्य सदस्यों में राज्यों के मुख्यमंत्री भी है। इसका मुख्यालय दिल्ली में रखा गया। कावेरी नदी अथॉरिटी के गठन के कुछ दिन बाद कावेरी मानीटरिंग कमेटी का गठन किया गया और उसे जमीनी हकीकत की रिपोर्टिंग का काम सौंपा गया। मानीटरिंग कमेटी में तकनीकी व्यक्ति रखे गए।सन 1976 में केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री की अध्यक्षता में कर्नाटक और तमिलनाडु (मद्रास) राज्य के बीच पानी के बंटवारे पर समझौते का प्रारूप बनाया गया। इस प्रारूप की संसद में घोषणा भी की गई। इस घोषणा के कुछ दिन बाद तमिलनाडु में एआईएडीएमके की सरकार सत्ता में आई। इस सरकार ने कावेरी जल विवाद को नया मोड़ दिया और सन 1924 के समझौते के हवाले से तर्क दिया कि पुराने समझौते के अनुसार पानी के बंटवारे की समीक्षा का प्रश्न ही नहीं है अतः चर्चा या फैसला केवल समयावधि पर ही हो सकता है। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने सन 1892 और सन 1924 के समझौते को लागू करने के लिए दबाव बनाना प्रारंभ किया। इस दबाव के बावजूद कर्नाटक सरकार लगातार पुराने समझौतों को पक्षपातपूर्ण और असमान पक्षों के बीच हुआ समझौता बताती रही तथा इसी आधार पर अपना पक्ष पेश करती रही। कर्नाटक ने हरंगी में बांध बनाना प्रारंभ किया तो उसे तमिलनाडु के विरोध का सामना करना पड़ा। तमिलनाडु ने सन 1956 के नदी जल विवाद एक्ट के तहत अधिकरण के गठन और बांध के निर्माण को रोकने के लिए न्यायालय से अनुरोध किया।

सन 1980 के दशक में कहानी में मोड़ आया और तमिलनाडु सरकार ने न्यायालय से अपनी याचिका वापस ले ली और केन्द्र सरकार से अभिकरण के गठन की मांग की। दोनों राज्यों के बीच चर्चाओं का दौर फिर प्रारंभ हुआ पर वह सन 1990 तक बेनतीजा ही रहा। दो जून सन 1990 को उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर न्यायमूर्ति सी. मुखर्जी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय अभिकरण का गठन किया गया। इस अभिकरण का मुख्यालय दिल्ली में रखा गया। कावेरी घाटी के चारों राज्यों ने इस अभिकरण के सामने अपना-अपना पक्ष पेश किया। विभिन्न राज्यों की पानी की मांग निम्नानुसार थी-

1. कर्नाटक की मांग- 465 बिलियन क्यूबिक फीट
2. तमिलनाडु की मांग- सन 1982 एवं 1924 के समझौतों के अनुसार उसे एवं पुडुचेरी राज्य को 566 बिलियन क्यूबिक फीट पानी, कर्नाटक को 177 बिलियन क्यूबिक फीट और केरल राज्य को 5 बिलियन क्यूबिक फीट पानी दिया जाना चाहिए।
3. केरल की मांग- 99.8 बिलियन क्यूबिक फीट
4. पांडुचेरी की मांग- 9.3 बिलियन क्यूबिक फीट

अभिकरण ने 25 जून 1991 को अंतरिम आदेश दिया। इस आदेश के अनुसार कर्नाटक को कहा गया कि वह सुनिश्चित करेगा-

1. हर साल में तमिलनाडु राज्य को 205 बिलियन क्यूबिक फीट पानी पहुंचाया जाएगा। इसके अलावा अभिकरण ने उसे मासिक एवं साप्ताहिक जल प्रवाह की मात्रा भी तय करने को कहा।
2. कर्नाटक राज्य का सिंचित रकबा 11.2 लाख एकड़ की सीमा के आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

अभिकरण के इस अंतरिम निर्णय का कर्नाटक में भारी विरोध हुआ। धरना प्रदर्शन हुए और दोनों राज्यों में हिंसा भड़की। कोई 20 लोग मारे गए और अनेक घायल हुए। अकेले कर्नाटक में ही लगभग 19 करोड़ रुपयों की संपति का नुकसान हुआ।

सन् 1995 में मानसून ने धोखा दिया जिसके कारण कर्नाटक को अभिकरण के अंतरिम आदेश के पालन में कठिनाई आई और तमिलनाडु को पानी की आपूर्ति घटी। आपूर्ति कम होने के कारण तमिलनाडु ने कर्नाटक से तत्काल कम से कम 30 बिलियन क्यूबिक फीट पानी छुड़वाने के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उच्चतम न्यायालय ने दखल देने के स्थान पर तमिलनाडु को अभिकरण के सामने अपनी बात रखने का निर्देश दिया। अभिकरण ने प्रकरण की समीक्षा कर कर्नाटक को 11 बिलियन क्यूबिक फीट पानी छोड़ने के निर्देश दिए। जब कर्नाटक ने 11 बिलियन क्यूबिक फीट पानी छोड़ने में असमर्थता जताई तो तमिलनाडु ने पुनः उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में कर्नाटक को 6 बिलियन क्यूबिक फीट पानी छोड़ने का फैसला हुआ। कर्नाटक ने इस फैसले का पालन किया और तमिलनाडु को छह बिलियन क्यूबिक फीट पानी मिला।

भारत सरकार ने सन 1997 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कावेरी नदी अथॉरिटी का गठन किया। इस अथॉरिटी के अन्य सदस्यों में राज्यों के मुख्यमंत्री भी है। इसका मुख्यालय दिल्ली में रखा गया। कावेरी नदी अथॉरिटी के गठन के कुछ दिन बाद कावेरी मानीटरिंग कमेटी का गठन किया गया और उसे जमीनी हकीकत की रिपोर्टिंग का काम सौंपा गया। मानीटरिंग कमेटी में तकनीकी व्यक्ति रखे गए।

सन् 2002 में मानसून ने फिर धोखा दिया। कर्नाटक और तमिलनाडु के जलाशयों के खाली रहने के कारण पानी के लिए मारामारी प्रारंभ हुई और पानी के बंटवारे के सवाल ने फिर उग्र रूप धारण कर लिया। अभिकरण ने 27 अगस्त को बैठक बुलाई। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री ने असहमति जताते हुए बैठक से बहिर्गमन किया। उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक को हर रोज 1.25 बिलियन क्यूबिक फीट पानी छोड़ने का निर्देश दिया। इसी के साथ, कावेरी रिवर अथॉरिटी (सीआरए) को आवश्यक होने की स्थिति में पानी को छोड़ी जा रही मात्रा में हस्तक्षेप करने का अधिकार दिया। न्यायालय के आदेश के परिप्रेक्ष्य में कावेरी रिवर अथॉरिटी ने कर्नाटक को तमिलनाडु राज्य को हर दिन 1.25 बिलियन क्यूबिक फीट पानी के स्थान पर हर दिन 0.85 बिलियन क्यूबिक फीट पानी देने का निर्देश दिया। अंततोगत्वा तमिलनाडु को 6 बिलियन क्यूबिक फीट पानी मिला। इस बार कावेरी जिले में हो रहे उग्र प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में कर्नाटक सरकार ने कावेरी रिवर अथॉरिटी के निर्देश मानने से इंकार किया। इस परिस्थिति में तमिलनाडु ने फिर उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कर्नाटक ने कुछ दिन तो सही मात्रा में पानी छोड़ा पर 18 सितंबर को एक किसान द्वारा आत्महत्या करने के कारण तमिलनाडु को पानी की सप्लाई बंद कर दी।

उच्चतम न्यायालय के निर्देशों कर कावेरी रिवर अथॉरिटी ने दोनों राज्यों के जलाशयों में एकत्रित पानी की मात्रा और छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा के विवरण प्राप्त करना चाहा। कर्नाटक ने जांच दल से सहयोग किया पर तमिलनाडु ने अनुमति नहीं दी। प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के 30 सितंबर के दखल के कारण तमिलनाडु ने वांछित अनुमति प्रदान की। इस दौरान विरोधी पार्टियां, अवसर को राजनीतिक रंग दे रही थीं और दोनों राज्यों के बीच का सौहार्द्र समाप्त हो रहा था। कर्नाटक में पानी छोड़ने के मामले को लेकर तनाव बढ़ रहा था और वह मंडया जिले के गली कूचों से निकलकर पूरे राज्य के लिए समस्या बन रहा था। इसी बीच उच्चतम न्यायालय ने 3 अक्टूबर को कर्नाटक को पानी छोड़ने के लिए निर्देश दिए पर कर्नाटक ने एक बार फिर आदेशों का पालन करने से इंकार कर दिया। इस कदम की तमिलनाडु में गंभीर प्रतिक्रिया हुई और समाज के अनेक धड़े आंदोलन में कूद पड़े। नेवेली से बिजली की आपूर्ति बंद करने के लिए दबाव बनने लगा तो पान तमिल मिलिटेंट समूह ने कर्नाटक और आंध्र प्रदेश को बिजली देने वाले प्रमुख ट्रांसफार्मर को ध्वस्त कर दिया। इसी अवसर पर माहौल को ठीक करने के लिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने बंगलुरु से मंडया तक पद यात्रा की। उच्चतम न्यायालय ने दोनों राज्यों को आदेशों के अनुपालन का दोषी माना और उनकी निंदा की। दोनों राज्यों ने माफी मांगी पर समस्या का निराकरण नहीं हो सका। पानी की कमी के सालों में पानी का वितरण समस्या बना रहा और आज भी वह अनसुलझा है। सन 2003 से 2006 तक के सालों में तमिलनाडु और कर्नाटक में मानसून की बरसात सामान्य हुई जिसके कारण पानी का बंटवारा मुद्दा नहीं बना।

अभिकरण का फैसला और उसका अंजाम


दिनांक 5 फरवरी 2007 को कावेरी जल विवाद अभिकरण ने अपना अंतिम फैसला सुनाया। इस फैसले के अनुसार तमिलनाडु को 419 बिलियन क्यूबिक फीट और कर्नाटक को 270 बिलियन क्यूबिक फीट पानी मिलना सुनिश्चित हुआ है। जहां तक वास्तविक पानी छोड़े जाने का प्रश्न है तो कर्नाटक राज्य द्वारा हर साल तमिलनाडु को वास्तविक रूप से 192 बिलियन क्यूबिक फीट पानी दिया जाएगा। इसके अलावा केरल को हर साल 30 बिलियन क्यूबिक फीट और पुडुचेरी को सात बिलियन क्यूबिक फीट पानी दिया जाएगा। गौरतलब है कि कर्नाटक राज्य इस फैसले से नाखुश है। इसलिए उसने अभिकरण में पुनर्विचार याचिका दायर कर दी है।

रावी-व्यास जल विवाद


कावेरी जल विवाद के बाद रावी-व्यास जल विवाद की संक्षिप्त चर्चा करेंगे। रावी-व्यास विवाद कुछ मामलों में अलग है। इस मामले की विशेषता यह है कि सन 2004 की जुलाई में पंजाब विधानसभा ने मुख्यमंत्री की पहल पर अप्रत्याशित कदम उठाते हुए पिछले सभी अंतरराज्यीय नदी जल समझौतों को निरस्त कर दिया। पंजाब विधानसभा के इस निर्णय के औचित्य एवं संवैधानिक अधिकार पर पूरे देश में एक नई बहस को जन्म दिया। विधानसभा के कदम से व्यथित केन्द्र सरकार ने भारत के संविधान के आर्टिकल 143 के तहत, भारत के राष्ट्रपति की ओर से उच्चतम न्यायालय को मामला सुपुर्द किया। अनेक लोगों ने पंजाब सरकार के इस कदम को केन्द्र और राज्य सरकारों के समीकरण और प्रजातंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा बताया। दूसरी ओर, कुछ लोगों को पंजाब विधानसभा के अप्रत्याशित कदम के बीच नीचे वर्णित कहानी में दिखते हैं। अतः पाठकों की जिज्ञासा को किसी हद तक शांत करने के लिए रावी-व्यास विवाद की कहानी के कुछ अंश दिए जा रहे हैं।

भारत सरकार ने सन् 1955 में रावी-व्यास नदियों में बंटवारे योग्य पानी की मात्रा का आकलन किया। इस आकलन के अनुसार यह मात्रा 15.85 मिलियन एकड़ फीट मानी गई। सन 1955 में केन्द्र सरकार के प्रयासों के फलस्वरूप पंजाब और हरियाणा राज्यों के बीच इस पानी के बंटवारे पर समझौता हुआ। इस समझौते के अनुसार पंजाब को 7.2 मिलियन एकड़ फीट और राजस्थान को 8.0 मिलियन एकड़ फीट पानी मिला। बाद में भाषा के आधार पर पंजाब राज्य का पुनर्गठन हुआ जिसके फलस्वरूप भारत सरकार ने पंजाब के हिस्से का पानी पंजाब और हरियाणा राज्यों के बीच बांटा। इस बंटवारे में दोनों राज्यों (पंजाब और हरियाणा) को बराबर-बराबर अर्थात प्रत्येक को 3.5 मिलियन एकड़ फीट पानी दिया गया। दिल्ली को 0.2 मिलियन एकड़ फीट पानी मिला।

असहमत पंजाब ने उच्चतम न्यायालय में गुहार लगाई। बाद में हरियाणा ने समझौते को लागू कराने के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। पानी की मात्रा का पुनः आकलन हुआ और सन 1981 में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दोनों राज्यों के बीच दुबारा समझौता कराया। नए समझौते के अंतर्गत पंजाब को 4.22 मिलियन एकड़ फीट पानी और हरियाणा को 3.5 मिलियन एकड़ फीट पानी मिला। यद्यपि मामले उच्चतम न्यायालय से वापस ले लिए गए पर इस समझौते के बाद भी असहमति बनी रही और असंतोष पनपता रहा। सन 1985 में रावी-व्यास ट्रिब्यूनल का गठन हुआ और उसने सन 1987 के फैसले में पंजाब को 5.00 मिलियन एकड़ फीट पानी और हरियाणा को 3.83 मिलियन एकड़ फीट पानी दिया। यह बंटवारा पंजाब के गले नहीं उतरा। पंजाब की असहमति के कारण इस फैसले का राजपत्र में प्रकाशन नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त पंजाब का विरोध सतलज-यमुना लिंक केनाल को लेकर भी था। सन 2004 का पंजाब विधानसभा में पारित एक्ट जिसने सभी पुराने जल समझौतों को नकार दिया था, उस असहमति एवं असंतोष का नतीजा था जो पिछले अनेक सालों से पंजाब को गले नहीं उतर रहा था।

अंतरराज्यीय जल विवादों में राजनीतिक हस्तक्षेप सबसे अधिक जटिल मुद्दा है। किसी भी प्रजातांत्रिक देश में, प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा इस हस्तक्षेप को नकारना संभव नहीं होता पर भारत में ऐसी सामाजिक व्यवस्थाएं मौजूद हैं जिनके फैसलों को राजनीतिक दलों द्वारा पूरा सम्मान दिया जाता है और पूरी संजीदगी से माना जाता है। इसलिए पूरी जिम्मेदारी से कहा जा सकता है कि उसी तर्ज पर मानवीय चेहरे वाली सामाजिक व्यवस्था कायम करने की आवश्यकता है। लेखक को लगता है कि आजादी के बाद पनपे अंतरराज्यीय जल विवादों की जड़ में भारत के संविधान के प्रावधान (प्रविष्टि 17, प्रविष्टि 56 और आर्टिकल 262) हैं। संविधान की प्रविष्टि 17 के अनुसार पानी राज्यों का विषय हैं प्रविष्टि 56 के अनुसार अंतरराज्यीय नदियों और नदी घाटियों का ऐसा रेगुलेशन एवं विकास को जनहित में हो, संसद द्वारा केन्द्र के नियंत्रण में पारित किया जा सकता है। आर्टिकल 262 संसद को प्रविष्टि 56 के अधीन नियम कायदे बनाने का अधिकार देता है संसद द्वारा पारित इस अधिकार को उच्चतम न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। रामास्वामी अय्यर (1994) के अनुसार संसद ने इस प्रावधान का वांछित उपयोग कानून पारित करने या प्रबंध करने वाली संस्थाओं के रूप में नहीं किया। सरकार ने केवल सलाहकार नदी बोर्डों का गठन किया। केन्द्र सरकार के इस कदम के कारण पानी के बंटवारे के मुद्दे पर राज्य सरकारें अधिक ताकतवर बनीं और उन्होंने जल आवंटन को अपने राज्य के पक्ष में मोड़ने के लिए पूरी ताकत लगा दी। यद्यपि सन 1956 में विवादों के निपटारे के लिए अंरराज्यीय जल विवाद एक्ट बना। इस एक्ट में अंतरराज्यीय नदी जल विवादों के निपटारे के लिए ट्रिब्यूनल बनाने का प्रावधान था पर यह प्रावधान कुछ मामलों में बहुत कारगर सिद्ध नहीं हुआ।

लेखक का मानना है कि प्रविष्टि 56 के अधीन अधिकारों के उपयोग में केवल संसद का उल्लेख पूरी तरह सही नहीं है। इस कोताही के लिए, किसी हद तक, केन्द्र सरकार का जल संसाधन विभाग भी जिम्मेदार है जिसने सरकार और संसद से प्रविष्टि 56 के अधीन उचित कार्यवाही नहीं कराई। अंतरराज्यीय जल विवाद एक्ट 1956 के अधीन कमजोर ट्रिब्यूनल गठित कराए लेकिन राज्यों ने इन कमजोर ट्रिब्यूनल की कमजोरी का लाभ लिया और विवाद बने रहे। यद्यपि केन्द्र सरकार ने अपनी भूमिका का यथासंभव निर्वाह किया पर रावी-व्यास नदी जल विवाद में पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और राजस्थान ने केन्द्र के दखल को नकार दिया। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि देश में चल रहे अंतरराज्यीय जल विवादों के निपटारे के लिए देश का संविधान, कानून और संस्थागत व्यवस्थाएं सकारात्मक असर नहीं दिखा पा रही हैं।

लेखक को लगता है कि जल विवाद के मुद्दे को सरल बनाने की आवश्यकता है। इन पूरे अंतरराज्यीय नदी घाटी जल विवादों से हितग्राही समाज और उसकी मंशा गायब है। हितग्राही समाज को मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता है। विवादों को निपटाने में हितग्राही समाज की राय, उनकी इच्छा और उनके अपने कानून कायदों को उचित जगह दिलाने की आवश्यकता है। लेखक इन विवादों को पानी और सरकार के रिश्तों का आईना मानता है। ऐसा आईना जिसमें विभाग, सरकारी कायदे, राजनीतिक दल, अभिकरण और कानून मौजूद हैं पर जिससे समाज गायब है। इस आईने में समाज को फोकस किया जाना चाहिए और उसे ही विवादों के निपटारे की जिम्मेदारी सौंपना चाहिए। हो सकता है कुछ लोग लेखक की उपरोक्त राय से सहमत हों। लेखक का मानना है कि समाज के चंद निष्पक्ष लोग ही अविवादित मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें आगे लाने के लिए माहौल बनाने और भूमिका सौंपने की आवश्यकता है। सब जानते हैं कि समाज के फैसलों को नकारना किसी भी व्यक्ति या राजनीतिक दल के लिए संभव नहीं है।

अंतरराज्यीय जल विवादों में राजनीतिक हस्तक्षेप सबसे अधिक जटिल मुद्दा है। किसी भी प्रजातांत्रिक देश में, प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा इस हस्तक्षेप को नकारना संभव नहीं होता पर भारत में ऐसी सामाजिक व्यवस्थाएं मौजूद हैं जिनके फैसलों को राजनीतिक दलों द्वारा पूरा सम्मान दिया जाता है और पूरी संजीदगी से माना जाता है। इसलिए पूरी जिम्मेदारी से कहा जा सकता है कि उसी तर्ज पर मानवीय चेहरे वाली सामाजिक व्यवस्था कायम करने की आवश्यकता है। इस तर्ज पर काम करने के पहले पानी के अधिकारों को नए तरीके से परिभाषित करना होगा, उनके आवंटन की सीमाएं तय करनी होंगी और उनमें समानता तथा सामाजिक न्याय के तत्वों को पूरा-पूरा स्थान देना होगा। वही जल बंटवारे का सर्वमान्य आधार बन सकता है। इसके अलावा, समाज का प्रबंधकीय सहभाग और सहमति अन्य आवश्यकताएं होंगी। नोडल विभाग के बाहर ऐसी व्यवस्था को कायम करने की जरूरत है जो पारदर्शी तरीके से उपर्युक्त दायित्व को निभा सके। हितग्राही समाज को सभी प्रबंधकीय अधिकार सौंपना ही एकमात्र विकल्प लगता है।

जल विवादों के अनिर्णय के पीछे अनेक कारण हो सकते हैं पर इतने सालों के अनुभव के आधार पर यह तो कहा ही जा सकता है कि मौजूदा व्यवस्था और जल बंटवारे के सिद्धांतों की फिलासफी स्वीकारने योग्य नहीं है। इस हकीकत का अर्थ है कि देश को प्रभावी व्यवस्था, पारदर्शी कदमों एवं सबके द्वारा स्वीकार्य जल बंटवारे के सिद्धांत की आवश्यकता है। इसके लिए सन 1956 के एक्ट में भी वांछित प्रावधान जोड़े जा सकते हैं। प्रावधान के उल्लंघन को बेअसर करने के लिए संविधान में उपयुक्त व्यवस्था भी जोड़ी जा सकती है। सरकारिया आयोग ने भी इस विषय पर सुझाव दिया है जिसके अनुसार 1956 के एक्ट के सेक्शन 6 में वांछित सुधार कर निर्णयों को उच्चतम न्यायालय के निर्णय का दर्जा देकर अनिवार्य रूप से लागू कराने के लिए स्वतंत्र व्यवस्था कायम की जा सकती है। गौरतलब है कि प्राचीन भारत में पानी के बंटवारे की अनेक समयसिद्ध एवं समाज द्वारा मंजूर व्यवस्थाएं मौजूद थीं। लेखक का मानना है कि जल बंटवारे में पश्चिम के अनुपयुक्त मॉडल के स्थान पर भारतीय मॉडल अधिक कारगर और स्वीकार्य हो सकता है। लेखक का मानना है कि जलनीति में प्राथमिकता के साथ-साथ जल आवंटन की मात्रा का उल्लेख जोड़ा जाना चाहिए। जल बंटवारे की इकाई व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकता होगी। आबादी के आधार पर पेयजल, निस्तार और आजीविका के लिए पानी का इष्टतम आवंटन तय करने के बाद ही पानी के अन्य उपयोगों की मात्रा तय की जानी चाहिए। तय किए आवंटन को लागू कराने की जिम्मेदारी संवैधानिक संस्थागत व्यवस्था की होगी और उसका प्रबंध समाज के हाथ में देना सार्थक कदम हो सकता है।

लेखक की इस राय से कुछ लोग सहमत हो सकते हैं कि पानी और सरकार के समीकरण ने समस्या को जटिल बनाया है। पूरी नदी घाटी के स्थान पर बहुत छोटी-छोटी इकाइयों यथा ग्रामों के पानी के न्यायोचित बंटवारे की व्यवस्था की बागडोर समाज के हाथ में सौंपकर स्वीकार्य व्यवस्था लागू की जा सकती है। मौजूदा परिवेश में यही सरकार की जिम्मेदारी प्रतीत होती है।

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