मिट्टी की उपेक्षा कृषि-क्रान्ति में बाधक

Submitted by Hindi on Mon, 04/25/2016 - 16:33
Source
योजना, दिसम्बर, 1995

हमारे देश में प्रति व्यक्ति भूमि का यह क्षेत्र विश्वभर में सबसे कम है। इस प्रकार भूमि की निरन्तर कमी होते रहने से, अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता प्रतीत हो रही है। इसलिये देश के बंजर या परती पड़े हुये भूखण्डों का सुधार तथा उन्हें उपयोग में लाना आज समय की माँग है।

आज भूमि के उपयोग पर नजर डालें तो पता चलता है कि खेती के बाद सबसे अधिक जगह जंगलों के लिये ही रखी गयी हैं परन्तु इस वन-क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा पेड़ कट जाने के कारण बंजर हो चुका है। जंगलों के क्षेत्र से बाहर भी ऐसी बहुत सी जमीनें हैं जो अंधाधुंध चराई; झूम खेती, मिट्टी के कटाव तथा अनेक प्राकृतिक आपदाओं के कारण हरियाली से वंचित हो चुकी हैं। इस समय भारत में खेती वाली भूमि का क्षेत्रफल लगभग 14 करोड़ 50 लाख हेक्टेयर है, जबकि हमारे पास सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्र 32 करोड़ 80 लाख हेक्टेयर है। भारत सरकार द्वारा सन 1952 में स्वीकार की गयी राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार हमारे देश में एक तिहाई भूमि पर जंगल होने चाहिये थे। परन्तु यह दुख की बात है कि इस समय जिन वनों को काफी हद तक सुरक्षित समझा जाता है, उनका प्रतिशत 12 से अधिक नहीं है। पिछले 30 वर्षों में हमारी वन-सम्पदा का बड़े पैमाने पर शोषण हुआ है। फलस्वरूप वानिकी, कृषि और अन्य भूमि-उपयोगों के बीच भारी असंतुलन पैदा हो गया है।

यह सभी जानते हैं कि भूमि हमारा मूलभूत संसाधन है जिसे खींचकर फैलाया नहीं जा सकता। उपजाऊ मिट्टी की मात्र एक सेन्टीमीटर मोटी परत को बनाने में प्रकृति को लगभग 300 वर्ष लगते हैं जबकि हमारे यहाँ हर साल 600 करोड़ टन मिट्टी कटाव के कारण बह जाती है और उसके साथ बहकर चले जाते हैं 84 लाख टन पोषक तत्व। इस समय वर्षा और हवा से होने वाले भूमि कटाव से हमारी लगभग 15 करोड़ हेक्टेयर भूमि दुष्प्रभावित हो रही है। लगभग ढाई करोड़ हेक्टेयर भूमि प्रतिवर्ष जलमग्न रहती है। रेह (45 लाख हेक्टेयर) और कल्लर (25 लाख हेक्टेयर) की वजह से 70 लाख हेक्टेयर भूमि बंजर हो गई है। खादरों ने 40 लाख हेक्टेयर जमीन को अपनी चपेट में ले लिया है। झूम खेती ने कोई 30 लाख हेक्टेयर भूमि को खेती के अयोग्य बना दिया है।

यही नहीं, आज मिटृटी को ‘रद्दी की टोकरी’ की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। औद्योगिक विकास से दैनिक काम-काज में प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं की संख्या में आशातीत वृद्धि हो रही है। जनसंख्या बढ़ने से प्रतिदिन घरों से निकलने वाले झाड़न-बुहारन यानि कूड़ा-करकट में भी काफी बढ़ोत्तरी हुई है। (देखिये सारणी-1) कुछेक बड़े नगरों में कूड़े-करकट की मात्रा इतनी विशाल है कि सही ढंग से उसका निपटान भी एक समस्या बन गया है। इसके दो ही उपाय सूझते हैं- या तो इसे किसी जलस्रोत में फेंक दिया जाए या फिर मृदा में खुला या गड्ढे बनाकर डाल दिया जाए।

सारणी-1

भारत के प्रमुख नगरों में कूड़े-करकट का उत्पादन

नगर

कुल उत्पादन (टन/दिन)

कलकत्ता

4000

बम्बई

3500

दिल्ली

3000

मद्रास

2200

बंगलौर

1000

कानपुर

850

लखनऊ

700

चण्डीगढ़

500

वाराणसी

366

 

इस कूड़ा-करकट को घरेलू अपशिष्ट कहा जाता है। इसमें रद्दी कागज, चीथड़े, चमड़े के पुराने जूते, रबर की वस्तुयें तो रहती ही हैं, जो कि सड़ने-गलने वाली हैं परन्तु साथ में धातु की वस्तुयें, काँच के टुकड़े, गारा, ईंट, राख भी मिली रहती है जो कूड़ा-करकट से सड़ने-गलने के बाद भी मृदा पर बोझ स्वरूप पड़े रहते हैं। इतने पर भी इस प्लास्टिक युग में प्लास्टिक की पन्नियाँ, थैलियाँ, प्लास्टिक की बाल्टियाँ तथा अन्य प्लास्टिक से बनी वस्तुयें कम समस्या मूलक नहीं हैं। अनुमान है कि प्रतिवर्ष हर व्यक्ति लगभग 5 किलोग्राम प्लास्टिक का उपयोग करके रद्दी में फेंकता है। ये भी मृदा में ही मिल जाता है किन्तु मृदा के सूक्ष्म जीवाणुओं में इतनी क्षमता नहीं है कि वे प्लास्टिक को विघटित कर दें। इसके परिणामस्वरूप कालान्तर में मृदा में इतना प्लास्टिक मिल जाएगा कि मिट्टी में वायु तथा जल के आवागमन में कठिनाई होगी। इसी तरह कृषि-जन्य कुछ अपशिष्टों से मृदा में प्रदूषण बढ़ सकता है, विशेषतया फसलों पर यदि कीटनाशकों का छिड़काव हुआ है या मिट्टी में डी.डीटी. जैसे कीटनाशी रसायन डाले गये हैं इनसे जो मृदा प्रदूषण बढ़ेगा वह पशुओं तथा मनुष्यों के लिये ही अहितकर होगा। इसलिये वैज्ञानिकों ने रसायनिक अपशिष्टों का अलग से वर्णन किया है। रासायनिक अपशिष्ट रासायनिक उद्योगों की देन हैं। इनके अन्तर्गत विभिन्न उर्वरक, दवाइयाँ, जीवनाशी (पेस्टीसाइड) तथा धात्विक पदार्थ आते हैं। अनुमान है कि हमारे देश में प्रतिवर्ष 5 लाख टन रासायनिक अपशिष्ट निकलता है। इसमें से कुछ अंश मृदा की गोद में समा जाता है।

यह अपशिष्ट अत्यन्त आपत्तिजनक है। कम से कम सात धातु- मैंगनीज, पारा, निकेल, आर्सेनिक, कापर, लेड तथा कैडमियम ऐसी हैं जो मिट्टी से फसलों तथा तरकारियों में पहुँचकर अनेकानेक रोगों को जन्म देती हैं। यही नहीं, मिट्टी से निकलकर ये धातुयें जलस्रोतों को भी प्रभावित करती हैं। इसीलिये जो मृदा पहले स्वस्थ भोज्य वस्तुयें प्रदान करती थी वहीं अब विषाक्त वस्तुयें प्रदान करती है।

बड़े शहरों की जटिल समस्या मल-मूत्र तथा अवमल को ठिकाने लगाने की है। यदि इस मलमूत्र को लगातार मिट्टी में मिलने दिया जाएगा तो भय है कि मृदा ‘रुग्ण’ हो जाए क्योंकि मिट्टी के सारे रन्ध्र बन्द हो जाएँगे जिससे मिट्टी के भीतर वायु तथा जल का संचरण ठीक से नहीं हो पाएगा। आस्ट्रेलिया में लगातार 70 वर्षों तक गन्दे नाले के पानी तथा कच्चे अवमल का उपयोग करते रहने से मिट्टी में कैडमियम, ताम्बा, निकेल, सीसा जैसी भारी धातुओं की मात्रा बढ़कर दुगुनी हो गयी हैं। नगरों से प्राप्त वाहित मल-जल (सीवेज) में डिटरजेंट, बोरेट, फॉस्फेट तथा अन्य लवणों की भारी मात्रा घुली रहती है जो पौधों की वृद्धि के लिये अत्यन्त हानिकारक हैं और मिट्टी की भौतिक दशा को भी बिगाड़ती है।

साररूप में यह कहा जा सकता है कि विभिन्न कारणों से मृदा के प्रदूषित होने से सन 2000ई. तक लगभग एक अरब जनसंख्या को भोजन उपलब्ध कराना तकरीबन असम्भव हो जायेगा। ऐसी स्थिति में तब तक प्रति व्यक्ति लगभग 0.5 हेक्टेयर भूमि आ सकेगी (इस समय यह 0.9 हेक्टेयर है)। इतना ही नहीं, इस समय कृषि के योग्य कुल 0.48 हेक्टेयर भूमि प्रति व्यक्ति आती है जो कालान्तर में घटकर 0.26 हेक्टेयर ही रह जायेगी। हमारे देश में प्रति व्यक्ति भूमि का यह क्षेत्र विश्वभर में सबसे कम है। इस प्रकार भूमि की निरन्तर कमी होते रहने से, अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता प्रतीत हो रही है। इसलिये देश के बंजर या परती पड़े हुये भूखण्डों का सुधार तथा उन्हें उपयोग में लाना आज समय की माँग है। हमें चाहिये कि हम मिट्टी के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण अपनाते हुए नयी कृषि-क्रान्ति लायें ताकि कोई भी बच्चा या बूढ़ा भूखा न सो सके।

व्याख्याता, रसायन विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय

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