मनरेगा, गरीबी और नौकरशाही

Submitted by admin on Mon, 08/23/2010 - 13:00
Source
जनसत्ता, 22 अगस्त 2010
कई अध्ययनों से पता चला है कि ब्लाक स्तर पर कायम नौकरशाही ने मनरेगा में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार किया है। अनुमान है कि ग्रामीण मजदूरों के नाम पर आवंटित राशि में से 30 फीसद राशि नौकरशाही की जेब में पहुंची और करीब 20 फीसद राशि जनप्रतिनिधियों की। इस तरह मजदूरों तक सिर्फ पचास फीसद राशि ही पहुंच पाई। यह योजना नौकरशाहों और नेताओं की संपन्नता का एक बहुत बड़ा जरिया बन गई। इस भ्रष्टाचार का दूसरा सिरा भारत की गरीबी से जुड़ा हुआ है। भारत में गरीबी के आकलन के लिए अब किसी तरह के अध्ययन या रिपोर्ट की जरूरत नहीं रह गई है। गरीबी के आंकड़े जरूर कुछ कम या ज्यादा हो सकते हैं, लेकिन स्थिति बेहद चिंताजनक है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यूएनडीपी की रिपोर्ट में भारत के 42 करोड़ लोगों को गरीब दिखाया गया है। इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए, बल्कि जिस तरह की विकास नीति और नौकरशाही के सहारे योजनाओं को अंजाम दिया जा रहा है, उससे यह आंकड़ा आने वाले समय में और भी बढ़ सकता है।

मुद्दा


देश में गरीबी उन्मूलन की योजनाएं तो खूब हैं, लेकिन भूमि सुधार से हमेशा परहेज किया जाता रहा है। नौकरशाही का रवैया और भ्रष्टाचार भी गरीबी उन्मूलन में बड़ी बाधा है।

भारत में किसे गरीब माना जाता है। सुरेश तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 37.2 फीसद आबादी गरीब है। इस समिति की मानें तो देश में गरीबों की संख्या में कमी हुई है। इसके मुताबिक 20 रुपए रोजना से कम आमदनी वाला व्यक्ति गरीब है। किसी व्यक्ति की आमदनी 25 रुपए रोज है तो वह गरीब नहीं है। इसी तरह भारत में प्रतिव्यक्ति आय के आंकड़े भी गरीबी को कम कर रहे हैं। देश में प्रतिव्यक्ति आय 44,345 रुपए है, जिसके मुताबिक अब देश के हर व्यक्ति को हर महीने 3700 रुपए मिलते हैं। देश में करीब दो फीसद लोग ऐसे है, जिनका सालाना वेतन 25 लाख या इससे अधिक है, जबकि करोड़ों लोग ऐसे भी हैं जिन्हें दो वक्त के भोजन के लिए अथक संघर्ष करना पड़ता है।

दूसरी ओर कई ऐसे तथ्य मौजूद हैं जो यह साबित करते हैं कि देश में तमाम विकास योजनाओं के बावजूद गरीबों की संख्या बढ़ रही है। खाद्य सुरक्षा मामलों के आयुक्त एनसी सक्सेना की रिपोर्ट के मुताबिक आधी आबादी गरीब है। सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट बताती है कि गरीब बढ़ रहे हैं।

कई ऐसे तथ्य हैं जिन्हें देखकर कहा जा सकता है कि गरीबों की संख्या में कमी हो जानी चाहिए थी। एक दशक में देश के बाजारों की रौनक में ‘दिन-दूनी रात-चौगूनी’ बढ़ोतरी हुई है। सूचना प्रौद्योगिकी, संचार और साफ्टवेयर बाजार में चहल-पहल बढ़ी है और शहरों से लेकर कस्बों तक शॉपिंग मॉल का जाल बिछा है। देश की विकास दर 9 फीसद के आंकड़े को छूने को तैयार है। दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को रोजगार की गारंटी दी जा चुकी है और गांव स्तर पर आंगनबाड़ी से लेकर सस्ती दरों की सरकारी राशन दुकानें स्थापित की गई हैं। कई राज्य सरकारें गरीबों को दो से तीन रुपए प्रति किलो की दर से अनाज मुहैया करा रही हैं। इस सबके बावजूद आखिर गरीबों की संख्या में बढ़ोतरी क्यों हो रही है?

नौकरशाही गरीबी उन्मूलन की जड़ों में नहीं, बल्कि पत्तों पर सिंचाई कर रही है। आखिर गरीबी रेखा से ऊपर उठने के मायने क्या हैं? सिर्फ पेट भरने से ही कोई व्यक्ति गरीबी से मुक्त नहीं हो जाता। चिकित्सा, बच्चों की शिक्षा, आवास, और स्वच्छ पेयजल की क्षमता हासिल किए बिना कोई भी व्यक्ति गरीबी रेखा से ऊपर नहीं हो सकता। इस मानक के आधार पर देश की पचास फीसद आबादी गरीब है।

भारत की तरह चीन में गरीबों की संख्या बहुत थी। पच्चीस सालों में चीन के 60 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया जा चुका है। आधी से ज्यादा गरीबी 80 के दशक के पहले की खत्म कर दी गई थी। जबकि विदेश व्यापार और निवेश 90 के दशक से शुरू हुआ।

जाहिर है कि विदेशी व्यापार और निवेश का गरीबी दूर करने में कोई योगदान नहीं है। चीन में गरीबी दूर करने का सबसे कारगार उपाय भूमि सुधार रहा है, जिसकी वजह से ग्रामीण परिवारों को जमीन हासिल हो पाई। चीन में कृषि खरीद मूल्यों को बढ़ाने के बजाय घरेलू आय को समान किया गया। चीन का गरीबी उन्मूलन वहां की आंतरिक व्यवस्था पर आधारित था। उसमें वैश्वीकरण का कोई योगदान नहीं था। जबकि भारत के राजनेताओं ने उदारीकरण और वैश्वीकरण को गरीबी उन्मूलन का चाभी समझी, जिसका हश्र सामने है।

देश में गरीबी उन्मूलन की योजनाएं तो खूब हैं, लेकिन भूमि सुधार से हमेशा परहेज किया जाता रहा है। नौकरशाही का रवैया और भ्रष्टाचार भी गरीबी उन्मूलन में बड़ी बाधा है। रोजगार गारंटी योजना के बावजूद लोग रोजगार के लिए पलायन को विवश हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 को लागू हुए पांच साल हो चुके हैं। 2008-09 में इसके तहत केंद्र सरकार ने सोलह हजार करोड़ रुपयों आवंटन किया, जिसे संशोधित कर तीस हजार करोड़ रुपए कर दिया गया था।

देश में गरीबी उन्मूलन के लिए सस्ती दरों पर गरीबों को अनाज देने और रोजगार उपलब्ध कराने जैसी योजनाएं तो हैं, लेकिन स्वशासन को मजबूत बनाने, उनमें लोगों की भागीदारी कायम करने और लोगों को सवाल उठाने व उनकी निगरानी क्षमता बढ़ाने के लिए कोई योजना नहीं है। आश्चर्य है कि विकास योजनाओं को भ्रष्टाचार से बचाने के लिए कोई विशेष कानून पारित नहीं किया गया, जिसके चलते भ्रष्टाचार करने वाले व्यक्ति को कोई बड़ी सजा नहीं मिल पाती।

देश में गरीबी खत्म करने के लिए गरीबों की ताकत को बढ़ाना होगा। यह ताकत सिर्फ दो रुपए किलो अनाज देने से नहीं आएगी, बल्कि उन्हें कानूनी संरक्षण देने और योजनाओं के क्रियान्वयन में उनकी वास्तविक भागीदारी कायम करने से ही बढ़ेगी।

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