मुखालफत में उठी आवाज

Submitted by Hindi on Sat, 03/14/2015 - 11:46
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साक्ष्य नदियों की आग, अक्टूबर 2004

नदी किनारे के गाँवों में ज्यादातर आबादी मछुआरों की है। इसलिए सबसे बड़ा संकट तो मछुआरों के सामने आ खड़ा हुआ है। सामान्यतया उस क्षेत्र के मछुआरे कम पानी में छोटे जाल के द्वारा मछली पकड़ने का काम करते थे, किन्तु अब नदी में बारहो महीने ज्यादा पानी होने के कारण छोटे जाल से मछली पकड़ना सम्भव नहीं है, जबकि निजी कम्पनी द्वारा बड़ा जाल डालने पर रोक है। मोहलई निवासी रामदुलार निषाद बताते हैं कि अगर जाल डाला भी जाए तो कम्पनी के मोटरबोट से जाल कट जाता है और आज तक किसी को इसके लिए कोई मुआवजा नहीं दिया गया है।

देश में पानी के निजीकरण का पहला उदाहरण प्रस्तुत करने वाले राज्य छत्तीसगढ़ में पानी के निजीकरण के खिलाफ दो दिन की कार्यशाला का आयोजन नदी घाटी संघर्ष मोर्चा बांधों, नदियों एवं लोगों का दक्षिण एशिया नेटवर्क (सैंड्रप) एवं राष्ट्रीय जल बिरादरी द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। विगत 21 एवं 22 दिसम्बर को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित इस कार्यशाला में छत्तीसगढ़ सहित देश भर में पानी के मुद्दे पर सक्रिय दर्जनों संगठनों के करीब 150 से ज्यादा लोगों ने भाग लिया। कार्यशाला से एक दिन पूर्व प्रतिभागियों ने शिवनाथ नदी घाटी के उस क्षेत्र का जायजा लिया, जहाँ पानी की आपूर्ति का निजीकरण किया गया है। इस क्षेत्र में ग्रामीणों से चर्चा एवं दो दिन की कार्यशाला से कई महत्वपूर्ण मुद्दे उभरकर आए।

5 अक्तूबर, 1998 को दुर्ग के बोरई इंडस्ट्रियल ग्रोथ सेन्टर (बीआईजीसी) के लिए पानी की आपूर्ति बीओओटी (बूट-यानी बनाओ, अपनाओ, संचालित करो एवं हस्तान्तरण करो) पर तत्कालीन मध्यप्रदेश औद्योगिक केन्द्र विकास निगम (एमपीएसआईडीसी) तथा निजी कम्पनी रेडियस वाटर्स लिमिटेड के बीच यह अनुबन्ध हुआ था। अनुबन्ध पर अमल छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के बाद हुआ है। अनुबन्ध के अनुसार रेडियस वाटर्स को शिवनाथ नदी का 23.5 किलोमीटर का हिस्सा बीस साल के लिए ठेके पर दे दिया गया है। कम्पनी नदी के इस हिस्से को अपनी जागीर मानती है। एक दिलचस्प घटना मई, 2002 में हुई। कम्पनी के लोग, तत्कालीन एसडीएम एवं निगम के कुछ अधिकारी भारी पुलिस बल के साथ नदी किनारे के गाँव पहुँचकर ग्रमीणों द्वारा सिंचाई के लिए लगाए गए पम्प को निकालकर वाहनों में लादने लगे। लेकिन वे इस बारे में कोई लिखित आदेश प्रस्तुत नहीं कर सके। उग्र विरोध को देखते हुए लोगों के पम्प को उन्हें लौटाना पड़ा। साथ ही ग्रामीणों को मौखिक रूप से चेतावनी दे दी गई है कि वे जनवरी, 2003 तक सभी पम्प हटा लें, नहीं तो उन्हें ज़ब्त कर लिया जाएगा।

अनुबन्ध के समय इस परियोजना की प्रस्तावित लागत 9 करोड़ बताई गई थी। अनुबन्ध की शर्तों के मुताबिक इस कम्पनी की परियोजना की विस्तृत डिजाइन, सर्वे रिपोर्ट तथा अन्य तकनीकी विवरण ठेका मिलने के बाद तैयार करने की छूट दी गई थी। शायद अपने आप में यह अनूठा उदाहरण है कि जब सम्भावित रिपोर्ट या डीपीआर से पूर्व ही कोई अनुबन्ध कर लिया गया हो। अनुबन्ध की शर्त के अनुसार कम्पनी इस सम्भावित रिपोर्ट के आधार पर विस्तृत डिजाइन तैयार करेगी एवं मध्यप्रदेश के जल संसाधन विभाग के सम्बन्धित इन्जीनियर से मान्य कराएगी।

अनुबन्ध की शर्तों के मुताबिक प्रस्तावित निर्माण लागत में से रु. 6.5 करोड़ कर्ज से तथा शेष रु. 2.50 करोड़ इक्विटी के रूप में होंगे। इस इक्विटी में भी औद्योगिक केन्द्र विकास निगम (एकेवीएन) को रु. 50 लाख तक का हिस्सा छह महीने तक लगाने की छूट थी। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि रु. 6.5 करोड़ की पूँजी की व्यवस्था भी एकेवीएन द्वारा की गई। आज तक यह पूँजी रेडियस वाटर्स द्वारा लौटाई नहीं गई है।

एकेवीएन से हुए अनुबन्ध के मुताबिक इस कम्पनी को बीस वर्षों तक शिवनाथ नदी का पानी बोरई के उद्योगों को बेचने का अधिकार होगा। अनुबन्ध के मुताबिक कम्पनी को प्रतिदिन न्यूनतम 4 एमएलडी पानी खरीदी की गारण्टी दी गई है। यानी किसी दिन यदि 4 एमएलडी से कम पानी की भी माँग होती है तो भी सरकार 4 एमएलडी की कीमत का भुगतान करेगी। अनुबन्ध के मुताबिक 6 एमएलडी तक की दर सर्वाधिक रु. 12.60 प्रति क्यूबिक मीटर रखी गई है। जबकि 30 एमएलडी तक के लिए न्यूनतम दर रु. 8.00 प्रति क्यूबिक मीटर रखी गई है। इस तरह दर की कुल 9 श्रेणियाँ तय की गई हैं।

यदि एक महीने में निगम न्यूनतम 120 एमएलडी पानी की आपूर्ति नहीं करवा पाता है, तो भी निगम द्वारा कम्पनी को रु. 12600 प्रति एमएलडी की दर से इतने पानी का भुगतान किया जाएगा। इसके ठीक विपरीत यदि कम्पनी निर्धारित माँग के अनुरूप पानी की आपूर्ति नहीं कर पाती है तो मात्र 3000 रु. प्रति एमएलडी की दर से भुगतान करेगी। अनुबन्ध की शर्तों के मुताबिक यदि किसी दिन 4 एमएलडी से कम पानी की आपूर्ति होती है, तो निगम न्यूनतम 4 एमएलडी की कीमत अदा करेगा। ऐसी स्थिति में बिजली में होने वाली कम खपत के बारे में भी कोई जिक्र नहीं है यानी यह लाभ भी अघोषित रूप से कम्पनी को ही मिलेगा।

एकेवीएन ने कम्पनी को यह गारण्टी दी है कि वह जल संसाधन विभाग से सुनिश्चित कर लेगी कि कम्पनी को अधिकतम 30 एमएलडी पानी मिलता रहे। प्रारम्भिक तौर पर देखा जाए तो इस परियोजना की लागत 30 एमएलडी क्षमता मानकर ही आँकी गई थी। अनुबन्ध के अनुसार यदि 9 एमएलडी तक की पानी की आवश्यकता हो तो कम्पनी तीन दिनों के अन्दर आपूर्ति शुरू कर देगी, लेकिन यदि 9 एमएलडी से ज्यादा एवं 30 एमएलडी तक की माँग होती है तो कम्पनी छह माह बाद आपूर्ति कर पाएगी। इसका मतलब यह हुआ कि कम्पनी द्वारा निर्मित व्यवस्था की क्षमता 9 एमएलडी से ज्यादा की नहीं है।

अनुबन्ध में सरकारी सम्पत्ति की लूट का एक नमूना देखा जा सकता है। अनुबन्ध के मुताबिक इस कम्पनी को यह परियोजना शुरू करने से पहले, पूर्व से ही मौजूद इनटेक कुआँ, पम्प हाउस,ओवरहेड टैंक, पाइप लाइन, पुरानी मोटर्स सहित वाटर ट्रीटमेन्ट संयन्त्र एवं अन्य पुरानी सम्पत्तियाँ मिल गई हैं। कम्पनी द्वारा परियोजना अपने हाथ में लेते समय वहाँ की समस्त सम्पत्ति की लागत 502.75 लाख रु. आँकी गई थी। इन्हें सिर्फ 1 रु. प्रति वर्ष टोकन राशि पर रेडियस वाटर्स को लीज पर देने का अनुबन्ध हुआ। इसके अलावा कम्पनी को अनुबन्ध अवधि से पूर्व निर्माण के समय से ही इन सम्पत्तियों का उपयोग करने का अधिकार था।

अनुबन्ध की शर्त के मुताबिक यदि कोई जमीन या सम्पत्ति डूब में आती है, तो निगम उन जमीनों की क्षतिपूर्ति राशि की अदायगी करेगा। लेकिन एक गाँव महमरा में ग्रामीणों के पट्टे की जमीन डूब में आ गई है और उनका कोई मुआवजा अब तक नहीं दिया गया है। अनुबन्ध की शर्त के मुताबिक निगम द्वारा कम्पनी को पानी की आपूर्ति में एकाधिकार की गारण्टी दी गई है, यानी उसके क्षेत्र में कोई दूसरी कम्पनी किसी उद्योग को पानी की आपूर्ति नहीं कर सकती।

अनुबन्ध की शर्त के अनुसार उद्योगों से पानी के बिलों की वसूली की जिम्मेदारी भी निगम की ही है। निगम को पानी का बिल 30 दिनों के अन्दर कम्पनी को भुगतान कर देना होगा। इसके लिए निगम को एक राष्ट्रीयकृत बैंक की स्थानीय शाखा में एस्क्रो खाता खोलना होगा, जिसमें निगम की समस्त पूँजी जमा रहेगी। निगम ने ऐसा किया भी है। अनुबन्ध में, बिजली की दर बढ़ने एवं थोक कीमत सूचकांक में बदलाव आने की स्थिति में कम्पनी को पानी की दर बढ़ाने की छूट दी गई है। इसके अलावा, किसी विशेष आपदा की स्थिति में परियोजना को किसी किस्म के नुकसान होने की स्थिति में भी इस नुकसान की भरपाई निगम व कम्पनी की आपसी सहमति द्वारा पानी की कीमत में बढ़ोतरी करके की जाएगी।

यदि किसी कारणवश निगम इस अनुबन्ध को बीच में ही समाप्त करना चाहता है तो कम्पनी की समस्त ऋण एवं देनदारियों के साथ कम्पनी की इक्विटी भी निगम को चुकानी होगी। इसके अलावा बची हुई अवधि में होनेवाले समस्त लाभ की भरपाई भी निगम को ही करनी पड़ेगी। जबकि इसके ठीक विपरीत कम्पनी द्वारा पूरी अवधि के बीच में ही अनुबन्ध छोड़ दिए जाने की स्थिति में कम्पनी की देनदारी के बारे में कोई जिक्र नहीं है।

अनुबन्ध के अनुसार शिवनाथ नदी के अपस्ट्रीम एवं डाउनस्ट्रीम के निवासियों के प्रति सामाजिक जिम्मेदारी निगम की है। साथ ही, निगम की यह जिम्मेदारी भी है कि डाउनस्ट्रीम में पानी कीआपूर्ति नियमित बनी रहे। निकट की ग्राम पंचायतों के अनुसार औद्योगिक केन्द्र बनने से पूर्व ग्राम सभा से कोई प्रस्ताव नहीं लिया गया था। गौरतलब है कि नदी का हिस्सा राज्य के जल संसाधनविभाग के अन्तर्गत आता है, लेकिन नदी में एनीकट बनाने से पूर्व विभाग से कोई अनुमति नहीं ली गई, जबकि अनुबन्ध के बाद इन सबकी जिम्मेदारी उद्योग विभाग को सौंपी गई, उद्योग विभाग नेभी इस औपचारिकता को नहीं निभाया। राज्य में काफी दिनों से जिला जल उपयोगिता समिति एवं राज्य जल उपयोगिता समिति अस्तित्व में है। इसके बावजूद इस मामले को राज्य जल उपयोगिता समिति के सामने नहीं लाया गया।

जब रेडियस वाटर्स की यह वर्तमान व्यवस्था नहीं थी तो नदी किनारे पड़ने वाले समस्त गाँवों में रेत से औसतन रु. 75000 प्रति वर्ष रेत की रॉयल्टी मिलती थी जो अब बन्द हो चुकी है। इसकेअलावा बरसात के मौसम के बाद गाँव के लोग नदी किनारे की खेती करते थे जिसमें मुख्य रूप से तरबूज, खरबूज, खीरा, ककड़ी आदि काफी मात्रा में होता था, लेकिन अब गाँववासियों को इन नुकसानों का कोई मुआवजा भी नहीं मिला है।

इस क्षेत्र में नदी किनारे के गाँवों में ज्यादातर आबादी मछुआरों की है। इसलिए सबसे बड़ा संकट तो मछुआरों के सामने आ खड़ा हुआ है। सामान्यतया उस क्षेत्र के मछुआरे कम पानी में छोटे जाल के द्वारा मछली पकड़ने का काम करते थे, किन्तु अब नदी में बारहो महीने ज्यादा पानी होने के कारण छोटे जाल से मछली पकड़ना सम्भव नहीं है, जबकि निजी कम्पनी द्वारा बड़ा जाल डालने पर रोक है। मोहलई निवासी रामदुलार निषाद बताते हैं कि अगर जाल डाला भी जाए तो कम्पनी के मोटरबोट से जाल कट जाता है और आज तक किसी को इसके लिए कोई मुआवजा नहीं दिया गया है। एनीकट से अपस्ट्रीम में पड़ने वाले पहले गाँव मोहलई में करीब अस्सी फीसदी मछुआरों की आबादी है। जबकि एक अन्य गाँव महमरा में करीब साठ फीसदी मछुआरों की आबादी है। इस तरह नदी के अपस्ट्रीम में पड़ने वाले छह गाँव गम्भीर रूप से प्रभावित हुए हैं। ये गाँव हैं मोहलई, सरमरा, सिलोदा, पिपरी, महमरा एवं खपरी। नदी के 23.5 किलोमीटर की लम्बाई में दोनों तरफ पड़ने वाले तमाम गाँव भी कुछ कम या ज्यादा प्रभावित हुए हैं जबकि डाउनस्ट्रीम के गाँवों के मछुआरे तो मछली पकड़ने के रोजगार से पूरी तरह वंचित हो चुके हैं।

उन्हें अब सिर्फ बरसात के मौसम में थोड़ी उम्मीद रहती है। बाकी दिनों में मछुआरे अपने परम्परागत काम को छोड़कर गाँवो से बाहर जाकर मजदूरी करने को बाध्य हुए हैं। इसके अलावा डाउनस्ट्रीम में रेल विभाग का एक इनटेक कुआँ है जिसमें पानी की गम्भीर कमी हो गई है। स्थानीय स्तर पर जैसे-जैसे लोगों को हकीकत मालूम हो रही है, लोग सरकार के इस गैर- लोकतान्त्रिक समझौते के खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं। एक ओर स्थानीय गाँवों के लोग सामूहिक रूप से ग्राम पंचायतों से प्रस्ताव पारित करवाकर शासन के पास भेजने की प्रक्रिया में है। दूसरी ओर प्रदेश का औद्योगिक विभाग भी इस अनुबन्ध की तमाम कमियों को देखते हुए इसे रद्द करने की बात कह रहा है। लेकिन अभी तक आधिकारिक तौर पर कुछ भी नहीं किया गया है। इस सब के बीच नदी किनारे के गाँवों के लोग, जो प्रकृतिक संसाधनों पर अपनी आजीविका चलाते थे, मजदूरी के लिए पलायन करने को विवश हो गए हैं।

उपर्युक्त कार्यशाला में पानी के निजीकरण से होने वाले दुष्प्रभावों पर व्यापक चर्चा हुई। कार्यशाला में छतीसगढ़ की अन्य नदियों महानदी, खारून, शंखिनी, डाकिनी, केलो, इन्द्रावती, जोंक आदिकी समस्याओं पर भी खुलकर चर्चा हुई।

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