मवेशियों पर सूखे की मार से बेखबर समाज

Submitted by RuralWater on Fri, 02/12/2016 - 15:16

मौसम में बदलाव के साथ बुन्देलखण्ड में अभी सूखे की आग और भड़केगी। लोगों को मुआवजा, राहत कार्य या ऐसे ही नाम पर राशि बाँटी जाएगी, लेकिन देश व समाज के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पशु-धन को सहेजने के प्रति शायद ही किसी का ध्यान जाये। अभी तो ओस या अल्प बारिश के चलते जमीन पर थोड़ी हरियाली है और कहीं-कहीं पानी भी, लेकिन अगली बारिश होने में अभी कम-से-कम छह महीने हैं और इतने लम्बे समय तक आधे पेट व प्यासे रह कर मवेशियों का जी पाना सम्भव नहीं होगा। भीषण सूखे से बेहाल बुन्देलखण्ड का एक जिला है छतरपुर। यहाँ सरकारी रिकॉर्ड में 10 लाख 32 हजार चौपाए दर्ज हैं जिनमें से सात लाख से ज्यादा तो गाय-भैंस ही हैं। तीन लाख के लगभग बकरियाँ हैं। चूँकि बारिश ना होने के कारण कहीं घास तो बची नहीं है सो अनुमान है कि इन मवेशियों के लिये हर महीने 67 लाख टन भूसे की जरूरत है। इनके लिये पीने के पानी की व्यवस्था का गणित अलग ही है।

यह केवल एक जिले का हाल नहीं है, दो राज्यों में विस्तारित समूचे बुन्देलखण्ड के 12 जिलों में दूध देने वाले चौपायों के हालात भूख-प्यास व कोताही के हैं। आये रोज गाँव-गाँव में कई-कई दिन से चारा ना मिलने या पानी ना मिलने या फिर इसके कारण भड़क कर हाईवे पर आने से होने वाली दुर्घटनाओं के चलते मवेशी मर रहे हैं। आने वाले गर्मी के दिन और भी बदतर होंगे क्योंकि तापमान भी बढ़ेगा।

सूखे की वजह से लोग काम की तलाश में शहरों की ओर भाग रहे हैं व गाँव-के-गाँव खाली हो गए हैं। गाँवों में रह गए हैं बुजुर्ग या कमजोर। यहाँ भी किसान आत्महत्याओं की खबरें लगातार आ रही हैं। मवेशी चारे और पानी के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। अन्ना प्रथा यानी लोगों ने अपने मवेशियों को खुला छोड़ दिया है क्योंकि चारे व पानी की व्यवस्था वह नहीं कर सकते।

सैकड़ों गायों ने अपना बसेरा सड़कों पर बना लिया। इनमें कई सड़क दुर्घटना में मारी जाती हैं और कई चारे और पानी के अभाव में कमजोर होकर मर रही हैं। किसानों के लिये यह परेशानी का सबब बनी हुई हैं क्योंकि उनकी फसलों को मवेशियों का झुण्ड चट कर जाता है। वैसे तो बुन्देलखण्ड सदियों से तीन साल में एक बार अल्प वर्षा का शिकार रहा है।

यहाँ से रोजगार के लिये पलायन की परम्परा भी एक सदी से ज्यादा पुरानी है, लेकिन दुधारू मवेशियों को मजबूरी में छुट्टा छोड़े देने का रोग अभी कुछ दशक से ही है। ‘अन्ना प्रथा’ यानि दूध ना देने वाले मवेशी को आवारा छोड़ देने के चलते यहाँ खेत व इंसान दोनों पर संकट है। उरई, झाँसी आदि जिलों में कई ऐसे किसान हैं।

जिनके पास अपने जल संसाधन हैं लेकिन वे अन्ना पशुओं के कारण बुवाई नहीं कर पाये। जब फसल कुछ हरी होती है तो अचानक ही हजारों अन्ना गायों का रेवड़ आता है व फसल चट कर जाता है। यदि गाय को मारो तो धर्म-रक्षक खड़े हो जाते हैं और खदेड़ों तो बगल के खेत वाला बन्दूक निकाल लेता है।

दोनों ही हालात में खून बहता है और कुछ पैसे के लिये खेत बोने वाले किसान को पुलिस-कोतवाली के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यह बानगी है कि बुन्देलखण्ड में एक करोड़ से ज्यादा चौपाये किस तरह मुसीबत बन रहे हैं और साथ ही उनका पेट भरना भी मुसीबत बन गया है।

पिछली सरकार के दौरान जारी किये गए विशेष बुन्देलखण्ड पैकेज में दो करोड़ रुपए का प्रावधान महज ‘अन्ना प्रथा’ रोकने के लिये आम लोगों में जागरुकता फैलाने के लिये था। अल्प वर्षा के कारण खेती ना होने से हताश किसानों को दुधारू मवेशी पालने के लिये प्रोत्साहित करने के लिये भी सौ करोड़ का प्रावधान था। दो करोड़ में कभी कुछ पर्चे जरूर बँटे थे, लेकिन सौ करोड़ में जिन लोगों ने मवेशी पालने का विकल्प चुना वे भयंकर सूखे में जानवर के लिये चारा-पानी ना होने से परेशान हैं।

यहाँ जानना जरूरी है कि अभी चार दशक पहले तक बुन्देलखण्ड के हर गाँव में चारागाह की जमीन होती थी। शायद ही कोई ऐसा गाँव या मजरा होगा जहाँ कम-से-कम एक तालाब और कई कुएँ नहीं हों। जंगल का फैलाव पचास फीसदी तक था। आधुनिकता की आँधी में बहकर लोगों ने चारागाह को अपना ‘चारागाह’ बना लिया व हड़प गए।

तालाबों की जमीन समतल कर या फिर घर की नाली व गन्दगी उसमें गिरा कर उनका अस्तित्व खत्म कर दिया। हैण्डपम्प या ट्यूबवेल की मृगमरिचिका में कुओं को बिसरा दिया। जंगलों की ऐसी कटाई हुई कि अब बुन्देलखण्ड में अन्तिम संस्कार के लिये लकड़ी नहीं बची है व वन विभाग के डिपो तीन सौ किलोमीटर दूर से लकड़ी मंगवा रहे हैं। जो कुछ जंगल बचे हैं वहाँ मवेशी के चरने पर रोक है।

कुल मिलाकर देखें तो बुन्देलखण्ड के बाशिन्दों ने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी और अब इसका खामियाजा इंसान ही नहीं, मवेशी भी भुगत रहे हैं।

कुछ स्थानों पर समाज ने गौशालाएँ भी खोली हैं लेकिन एक जिले में दो हजार से ज्यादा गाय पालने की क्षमता इन गौशालाओं में नहीं है। तभी इन दिनों बुन्देलखण्ड के किसी भी हाईवे पर चले जाएँ हजारों गाएँ सड़क पर बैठी मिलेंगी। यदि किसी वाहन की इन गायों से टक्कर हो जाये तो हर गाँव में कुछ धर्म के ठेकेदार भी मिलेंगे जो तोड़-फोड़ व वसूली करते हैं, लेकिन इन गाय के मालिकों को इन्हें अपने ही घर में रखने के लिये प्रेरित करने वाले एक भी नहीं मिलेंगे।

मौसम में बदलाव के साथ बुन्देलखण्ड में अभी सूखे की आग और भड़केगी। लोगों को मुआवजा, राहत कार्य या ऐसे ही नाम पर राशि बाँटी जाएगी, लेकिन देश व समाज के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पशु-धन को सहेजने के प्रति शायद ही किसी का ध्यान जाये।

अभी तो ओस या अल्प बारिश के चलते जमीन पर थोड़ी हरियाली है और कहीं-कहीं पानी भी, लेकिन अगली बारिश होने में अभी कम-से-कम छह महीने हैं और इतने लम्बे समय तक आधे पेट व प्यासे रह कर मवेशियों का जी पाना सम्भव नहीं होगा। यह जान लें कि एक करोड़ से ज्यादा का पशु धन तैयार करने में कई साल व कई अरब की रकम लगेगी, लेकिन उनके चारा-पानी की व्यवस्था के लिये कुछ करोड़ ही काफी होंगे।

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