नदी जोड़ का मिथक और साइंस

Submitted by Hindi on Thu, 03/15/2012 - 12:20
Source
नवभारत टाइम्स, 12 नवंबर 2003

यही समय है, जब जल संसाधनों के नियोजन में पानी बचाने की बात सबसे ऊपर रहनी चाहिए। लेकिन इसके उलट नदी जोड़ परियोजना के जरिए गैर टिकाऊ जल-उपयोग का मंत्र जपा जा रहा है। असली अमृत क्रांति तो तब होगी, जब जैव विविधता का समर्थन किया जाएगा, पानी बचाने के तरीके लागू किए जाएंगे, जैव (ऑर्गेनिक) कृषि को अपनाया जाएगा और जल स्त्रोतों में नई जान फूंकी जाएगी।

पांच लाख, 60 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित भारत की नदी जोड़ परियोजना को अब 'अमृत क्रांति' का नाम दिया जा रहा है। इस तरह इसे उस पौराणिक आख्यान से जोड़ दिया गया है, जिसके अनुसार देवताओं और दैत्यों ने अमृत पाने के लिए सागर का मंथन किया था। इस काम में लगी टास्क फोर्स और उसके अध्यक्ष सुरेश प्रभु इस पौराणिक प्रतीकवाद का सहारा लेकर नदी जोड़ परियोजना को प्रमोट कर रहे हैं। साथ ही इस परियोजना पर छिड़ी बहस को जज्बात और साइंस की टक्कर के तौर पर पेश किया जा रहा है। जो लोग इकोलॉजी (पारिस्थितिकी) और समाज से जुड़े सवाल उठा रहे हैं, उन्हें जज्बाती करार दिया जा रहा है।

बहरहाल यह परियोजना साइंस नहीं, छद्म साइंस पर टिकी लगती है। इस बात को परियोजना के पहले जोड़ यानी केन-बेतवा लिंक (बुंदेलखंड) में साफ देखा जा सकता है। स्वतंत्रता दिवस पर देश के नाम अपने सम्बोधन में प्रधानमंत्री ने कहा था कि सभी प्रमुख नदियों को जोड़ने की इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर इस साल के अंत में काम शुरू कर दिया जाएगा। योजना यह है कि सबसे पहले केन और बेतवा को जोड़ने के बाद मध्य प्रदेश - राजस्थान की पार्वती, कालीसिंध और चम्बल नदियों को जोड़ा जाए। फाउंडेशन फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इकोलॉजी ने जल विज्ञान, सामाजिक और पारिस्थितिकी आधारों पर केन-बेतवा लिंक की समीक्षा की है। इस अध्ययन से दूसरे नदी जोड़ों को भी परखने की आधारभूमि तैयार होती है।

नदी जोड़ के साइंस का केन्द्रीय आइडिया यह है कि पानी की अधिकता वाली नदियों से उन नदियों में पानी पहुंचाया जाए, जिनमें पानी की कमी रहती है, ताकि सूखा और बाढ़ से राहत मिले और खाद्य सुरक्षा बढ़े। केन-बेतवा लिंक में इनमें से कोई भी बात सही साबित नहीं होती। केन छोटी नदी है और बेतवा बड़ी। लेकिन इस जोड़ के जरिए छोटे बेसिन का पानी बड़े बेसिन में ले जाया जाएगा। तो वे कौन से आधार हैं, जिनके अनुसार छोटी नदी जलबहुल मानी जा रही है और बड़ी नदी जल अभाव वाली? यह पैमाना साफतौर पर साइंस और इकोलॉजी पर आधारित नहीं है। जलबहुल बेसिन इस मामले में वह है, जिसके संसाधनों का उचित और टिकाऊ तरीके से दोहन किया गया है, जबकि जल अभाव वाले बेतवा बेसिन का गलत दोहन हुआ है। मांग को इतना बढ़ने दिया गया है कि उसकी टिकाऊ तरीके से आपूर्ति नहीं हो सकती। इसलिए बेहतर होगा कि हम जलबहुलता और जलाभाव की बजाय नदी बेसिनों में उचित या अनुचित दोहन की बात पर ध्यान दें।

वैसे भी केन में अतिरिक्त (सरप्लस) पानी का आकलन गलत है। केन से 1020 एमसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) पानी बेतवा में ले जाने की योजना है, लेकिन नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी की रिपोर्ट (1995) में मध्य प्रदेश सरकार ने इस जलराशि का दूसरा ही आकलन पेश किया है और जोड़ योजना को रद्द करने की सिफारिश की है। जिस योजना को सरकार फिजूल मान चुकी है, अब उसे ही अमृत क्रांति में पहले नंबर पर रख दिया गया है।

केन-बेतवा लिंक का मुख्य लक्ष्य सूखे तथा बाढ़ को थामना और सिंचाई बढ़ाना बताया गया है, लेकिन विंध्याचल की इन दोनों नदियों में एक ही समय बाढ़ आती है। यही बात सूखे पर भी लागू होती है। इस जोड़ से तो उस बेतवा में पानी की मात्रा और भी बढ़ जाएगी, जो हमीरपुर जिले में कहर ढाती है। बेतवा ही है, जो बुंदेलखंड में सबसे ज्यादा बाढ़ लाती है। इस जोड़ से केन बेसिन में सूखे का असर भी बढ़ेगा। बांदा जिला इस नदी पर निर्भर है और हर साल गर्मियों में सूखे का शिकार होता है। इस जोड़ का असर यह भी होगा कि सरोरी, गोरा, गजधर, सुखसागर, कोटड़ा आदि स्थानीय तालों का पानी भी घट जाएगा। इन तालों का निर्माण बुंदेलों ने किया था और इस इलाके को सूखे से बचाने में इनकी बड़ी भूमिका है।

केन-बेतवा लिंक का अकेला फायदा यही होगा कि बेतवा बेसिन की चार बांध परियोजनाओं को पानी मिलने लगेगा, जो पानी की कमी से बेकार हो गई थी। ये चार नाकाम परियोजनाएं हैं- बरारी, नीमखेड़ा, रिछवां और केसुरी। ऐसी बांध परियोजनाओं को, जिनके लिए पानी था ही नहीं, रद्द करने के बजाय कृत्रिम तरीके से पुनर्जीवित किया जा रहा है। सिर्फ इसके लिए केन बेसिन को आर्थिक और पर्यावरणीय तौर पर अनुपयोगी बनाया जा रहा है। इस जोड़ के लिए केन पर दौधां (छतरपुर जिला, मध्य प्रदेश) में 73.40 मीटर ऊंचा और 1468 मीटर लंबा बांध बनाया जाएगा। दो बिजलीघर और बेतवा तक 231.45 किलोमीटर लंबी नहर बनाई जाएगी। बांध से 17419.75 हेक्टेयर जमीन डूबेगी और 1056 परिवारों को उजड़ना पड़ेगा। परियोजना की फीजिबिलिटी (उपयोगिता) रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि पुनर्वास की लागत क्या होगी। चूंकि यह बांध पन्ना नेशनल पार्क में पड़ता है, इसलिए वन्य जीवन और जैव विविधता पर भी इसका बुरा असर पड़ेगा। केन नदी इस टाइगर रिजर्व से होकर गुजरती है, लिहाजा बहुत से जीव इस पर पलते हैं। इस पार्क की कई जीव प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। लेकिन फीजिबिलिटी रिपोर्ट में दर्ज मध्य प्रदेश सरकार की यह टिप्पणी लापरवाही की एक शानदार मिसाल ही है: ' वन्य जीवन पर परियोजना का असर नहीं पड़ेगा , क्योंकि वन्य प्राणी परियोजना के निकट के इलाकों में ठिकाना बनाने की कुदरती क्षमता रखते हैं।'

इस परियोजना से एक खतरा कृषि की जैव विविधता के लिए भी है। केन-बेतवा बेसिन और सम्पर्क नहर वाले इलाके में ज्वार, अरहर, उड़द और तिलहन की खेती होती है। बेतवा बेसिन के 48.52 फीसदी भूभाग में अच्छी किस्म का बरसाती गेहूं होता है, जबकि 26.9 फीसदी जमीन पर दलहन उगाई जाती है। बुंदेलखंड के लोगों को अपने स्थानीय गेहूं की जो कीमत मिलती है, वह हरित क्रांति वाली नस्लों के मुकाबले दोगुनी है। बुंदेलखंड ही वह इलाका है, जहां दलहन की अच्छी उपज आज भी हो रही है। जोड़ परियोजना का मकसद पानी की खपत में मितव्ययिता वाली इन फायदेमंद फसलों की जगह पर धान, गन्ना और सोयाबीन जैसी फसलों को लाना है, जो बेहद पानी मांगती है, लेकिन जिनकी कीमत कम होती है। इस तरह यह परियोजना जैव विविधता को खत्म करेगी और गैर टिकाऊ जल-उपयोग को बढ़ावा देगी। पानी के गैर टिकाऊ इस्तेमाल में ऐसी खेती सबसे बड़ा तत्व है, जो पानी की बर्बादी करती है। कृषि विविधता वाले चंद इलाकों में से एक बुंदेलखंड में अब यह परियोजना जैव विविधता के अंत और पानी के अनाप-शनाप इस्तेमाल का रास्ता खोलने जा रही है।

यही समय है, जब जल संसाधनों के नियोजन में पानी बचाने की बात सबसे ऊपर रहनी चाहिए। लेकिन इसके उलट नदी जोड़ परियोजना के जरिए गैर टिकाऊ जल-उपयोग का मंत्र जपा जा रहा है। असली अमृत क्रांति तो तब होगी, जब जैव विविधता का समर्थन किया जाएगा, पानी बचाने के तरीके लागू किए जाएंगे, जैव (ऑर्गेनिक) कृषि को अपनाया जाएगा और जल स्त्रोतों में नई जान फूंकी जाएगी। नदी जोड़ के छद्म साइंस की जगह अपनी जल प्रणालियों के साथ सामंजस्य के साथ जीने का साइंस लागू होना चाहिए। दूर-दूर की नदियों को जोड़ देने भर से पानी का गलत इस्तेमाल टिकाऊ इस्तेमाल में नहीं बदल जाएगा, बल्कि इससे पानी के दुरुपयोग की गुंजाइश और भी बढ़ जाएगी।

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