नदी जोड़ योजना जरूरी नहीं

Submitted by HindiWater on Tue, 01/06/2015 - 16:53
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परिषद साक्ष्य, नदियों की आग, सितंबर 2004
जलाधिक्य वाली नदी घाटियों से जल का स्थानांतरण जल की कमी वाली नदी घाटियों में किया जाए। इस संबंध में आयोग का आकलन कुछ अलग ही है। पूर्व की ओर बहाव वाली प्रायद्वीपीय नदियों के लिए नौ नदी जोड़ों का प्रस्ताव है। इन सम्पर्कों में 5 बांध एवं 9 सम्पर्क नहरें शामिल हैं। पूर्व बहाव वाली 6 नदियों, महानदी, कृष्णा, गोदावरी, कावेरी, वैगाई एवं पेन्नार के परीक्षण के बाद आयोग का निष्कर्ष है कि यहां इतने व्यापक जल स्थानांतरण की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती। देश भर में भावी जल संकट का राग अलापते हुए मौजूदा सरकार ने देश भर की नदियों को आपस में जोड़ने का लुभावना प्रस्ताव जनता के सामने छोड़ दिया है। इस योजना की व्यावहारिक स्थिति के बारे में आम लोगों को जानकारी दिये बगैर ही इसकी सफलता के बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं। इस योजना के लिए राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (एनडब्ल्यूडीए) द्वारा किए गए पूर्व संभाव्यता अध्ययनों में देश भर में कुल 31 छोटी-बड़ी नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव रखा गया है। इनमें 14 हिमालय से निकलने वाली नदियों के लिए एवं 17 प्रायद्वीपीय नदियों को जोड़ने के बारे में है। एनडब्ल्यूडीए का दावा है कि उसने 6 नदी जोड़ों के बारे में संभाव्यता अध्ययन पूरा कर लिया है।

साथ ही, यह भी दावा किया गया है कि 137 नदी घाटियों व उप घाटियों के जलस्थितिक अध्ययन, 52 दिशांतरण बिन्दुओं, 58 जलाशयों एवं 18 भौगोलिक क्षेत्रों का अध्ययन भी पूरा हो चुका है। जहां एक ओर इस योजना की प्रगति के इतने दावे किये जा रहे हैं, वहीं भारत सरकार द्वारा गठित एक आयोग की इस बारे में बिल्कुल अलग ही धारणा है। भारत सरकार द्वारा एकीकृत जल संसाधन विकास योजना हेतु राष्ट्रीय आयोग (एनसीआईडब्ल्यूआरडीपी) का गठन किया गया था। इसके गठन के एक समय एक केन्द्रीय मंत्री ने इसे ब्लू रिबन वाला (अति उत्कृष्ट) आयोग कहा था।

यहां ध्यान देने योग्य खास बात यह है कि भारत सरकार के राष्ट्रीय आयोग को हिमालयी नदियों को जोड़ने के बारे में मूल जानकारी ही नहीं उपलब्ध करायी गयी। 1956 में तत्कालीन सिंचाई मंत्री केएल राव के नदियों को जोड़ने के प्रस्ताव के बारे में आयोग ने अपने सितम्बर 1999 की रिपोर्ट (पृष्ठ 179) में कहा है कि, ‘काफी विस्तृत जांच के बाद यह स्पष्ट होता है कि प्रस्ताव काफी खर्चीला है, जबकि उससे कम खर्चीले विकल्प मौजूद हैं।’ कैप्टन दस्तूर, जो एक विमान चालक थे एवं जिन्हें जल संसाधन विकास के बारे में कोई पूर्व अनुभव नहीं था, उनके द्वारा 1971 में दिये गये नहरों के विचार के बारे में आयोग का कहना है कि, ‘उनकी योजना पहली नजर में अव्यावहारिक थी।’

जबकि एनडब्ल्यूडीए एवं सरकार द्वारा अध्ययन किये जा रहे वर्तमान प्रस्ताव के बारे में आयोग ने अपनी रिपोर्ट (पृष्ठ 181) में स्पष्ट रूप से कहा है कि इस प्रस्ताव के मूल्यांकन में सामाजिक-आर्थिक अवधारणा का ध्यान ही नही नहीं रखा गया है। पृष्ठ 187 में आयोग ने कहा है कि, ‘यह काफी दुर्भाग्य की बात है कि हिमालयी नदियों के बारे में वर्गीकृत किये जा रहे आंकड़ों को विश्लेषण के लिए उपलब्ध नहीं कराया गया है।’ आयोग का कहना है कि आखिर उनकी आशंका क्या है? क्या वे जांच से कुछ उजागर होने से डरते हैं?

आयोग ने रिपोर्ट (पृष्ठ 197) में जोर देते हुए कहा है कि अंतरनदी घाटी जल स्थानांतरण के अंतर्गत जल का संग्रहण होगा, नहरें बनेंगी एवं जल निकासी की तमाम व्यवस्थाएं होंगी, जिसके परिणामस्वरूप जल जमाव एवं अन्य पर्यावरणीय प्रभाव पड़ सकते हैं, जो कि सामान्य जल संसाधन परियोजनाओं के मुकाबले ज्यादा घातक सिद्ध हो सकते हैं।

उपलब्ध जानकारियों के आधार पर आयोग ने (पृष्ठ 187-88) कहा है कि, ‘नदियों को जोड़ने एवं जल संग्रहण का का आकार एवं लम्बाई काफी ज्यादा होगी एवं निर्माण-लागत एवं पर्यावरणीय समस्याएं भी व्यापक होंगी। प्रकाशित जानकारियों के आधार पर आयोग का विचार है कि हिमालयी हिस्से के लिए ज्यादा विस्तृत अध्ययन की जरूरत होगी। जबकि आगामी दशक में तो इसका वास्तविक अमलीकरण नहीं हो सकता।’

इस योजना के बारे में जो दावे किए गए हैं, उसका आधार यह है कि जलाधिक्य वाली नदी घाटियों से जल का स्थानांतरण जल की कमी वाली नदी घाटियों में किया जाए। इस संबंध में आयोग का आकलन कुछ अलग ही है। पूर्व की ओर बहाव वाली प्रायद्वीपीय नदियों के लिए नौ नदी जोड़ों का प्रस्ताव है। इन सम्पर्कों में 5 बांध एवं 9 सम्पर्क नहरें शामिल हैं। पूर्व बहाव वाली 6 नदियों, महानदी, कृष्णा, गोदावरी, कावेरी, वैगाई एवं पेन्नार के परीक्षण के बाद आयोग का निष्कर्ष है कि, ‘यहां इतने व्यापक जल स्थानांतरण की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती। कावेरी एवं वैगाई के वर्तमान सिंचित क्षेत्र में क्रमशः 1.4 गुना एवं 1.6 गुना बढ़ोत्तरी के बावजूद दोनों नदी घाटियों में पानी की कमी क्रमशः 5 प्रतिशत एवं 8 प्रतिशत ही रहती है।

एनडब्ल्यूडीए द्वारा गोदावरी एवं महानदी के जलाधिक्य होने के दावे के बारे में आयोग ने स्पष्ट किया है कि, ‘यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि उड़ीसा एवं आंध्र प्रदेश ने दावा किया है कि महादनी एवं गोदावरी नदी घाटी के समस्त जल का उपयोग उनकी अपनी ही नदी घाटी में हो सकता है। इस प्रकार जलाधिक्य की स्थिति नहीं है।’

पार-तापी-नर्मदा नदी जोड़ के बारे में आयोग का कहना है कि, ‘इसके लिए इन नदियों में 7 जलाशय प्रस्तावित हैं, एवं नर्मदा के उत्तरी क्षेत्र को सिंचित करने के लक्ष्य के तहत उकाई जलाशय होते हुए इन जलाशयों को जोड़ने के लिए 400 किलोमीटर लम्बी सम्पर्क नहर प्रस्तावित है। पूरी प्रणाली को देखा जाए तो इसमें पानी की लागत काफी ऊंची होगी एवं किसानों द्वारा प्रभावी कृषि कीमत पर लागत वहन करना संभव नहीं होगा। इससे यह महसूस होता है कि इस जोड़ प्रस्ताव को स्थगित कर दिया जाए।’

दमनगंगा एवं पिंजाल नदी जोड़ परियोजना, जिसका पानी मुम्बई के घरेलू व औद्योगिक उपयोग हेतु प्रस्तावित है, इस नदी जोड़ में गुजरात एवं महाराष्ट्र के अंतरराज्यीय विवाद का मामला भी जुड़ा हुआ है।

पम्बा-अचनकोविल-वैप्पार नदियों की सम्पर्क योजना में तमिलनाडु के 91,000 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई एवं 500 मेगावाट के पंप स्टोरेज बिजली परियोजना के लिए 15 करोड़ घनमीटर जल की नियमित आपूर्ति के लिए केरल में पम्बा व अचनकोविल नदी घाटी से तमिलनाडु के वैप्पार घाटी में 63.4 करोड़ घनमीटर जल का स्थानांतरण प्रस्तावित है। केरल सरकार एनडब्ल्यूडीए के इन प्रस्ताव को नकार चुकी है।

16 फरवरी, 1999 को राज्य विधान सभा में प्रश्नों के उत्तर देते हुए केरल के मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में एनडब्ल्यूडीए के अध्ययन समूह की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया है। जल संसाधन एवं प्रबंंधन केंद्र ने इस मामले की जांच की और पाया कि पम्बा एवं अचनकोविल नदियों में जलाधिक्य नहीं है। नेत्रवती-हेमवती के अंतर्गत हेमवती बांध नहर द्वारा सिंचाई के लिए पश्चिमी बहाव वाली नेत्रवती नदी से पूर्वी बहाव वाली हेमवती (कावेरी घाटी) में पानी के स्थानांतरण का प्रस्ताव है। इस बारे में आयोग का कहना है कि, ‘पानी को ऊपर उठाने की आवश्यकता के कारण इसकी लागत काफी ज्यादा होगी।’

बेडती-वरदा नदी जोड़ के अंतर्गत पश्चिमी बहाव वाली बेडती नदी से पूर्वी बहाव वाली कृष्णा नदी की सहायक तुंगभद्रा नदी में पानी स्थांतरण प्रस्तावित है, जो कि दोनों ही कर्नाटक में हैं। यमुना की दक्षिणी सहायक नदियों के अंतर्गत केन नदी घाटी से बेतवा नदी घाटी में जल स्थानांतरण का प्रस्ताव है। इसके लिए केन नदी पर डौढ़न में 277.5 करोड़ घनमीटर जलग्रहण क्षमता वाले 73.3 मीटर ऊंचे बांध का निर्माण प्रस्तावित है।

इस सम्पर्क नहर की कुल लम्बाई 231.45 किलोमीटर होगी। इसमें 60 मेगावाट एवं 12 मेगावाट क्षमता वाली दो बिजली परियोजनाएं भी प्रस्तावित हैं। काली सिंध-चंबल नदी जोड़ परियोजना के अंतर्गत मौजूदा गांधी सागर/राणा प्रताप सागर जलाशय के अपस्ट्रीम में सिंचाई के लिए नेवज नदी (कालीसिंध नदी की उपनदी) व कालीसिंध नदी (चंबल नदी की सहायक नदी) से चंबल नदी में पानी स्थानांतरण का प्रस्ताव है। यह अंतरनदी घाटी स्थानांतरण नहीं है।

आयोग का मानना है कि इतने व्यापक स्तर पर नहरों एवं जलाशयों के निर्माण से प्रारंभिक आकलन के अनुसार करीब 250,000 हेक्टेयर भूमि डूब में आयेगी। इसके लिए करीब प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होने वाले 5 लाख से ज्यादा लोगों के पुनर्वास की आवश्यकता होगी। इन जोड़ों से राज्यों के बीच नये विवादों का जन्म होना स्वाभाविक है। योजना के बारे में तमाम दावों के बीच इन सब स्थितियों के बारे में लोगों को क्यों नहीं जानकारी दी जाती कि वास्तव में किन क्षेत्रों के लाभ के लिए कौन-से क्षेत्र पर विपरीत प्रभाव होगा।

अंततः ये हमारी बदनसीबी नहीं तो क्या है कि हमारे प्रधानमंत्री, उप प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायाधीश, जल संसाधन मंत्री एवं खुद श्री सुरेश प्रभु एक ऐसी योजना 10 साल में पूरी करने की बात कह रहे हैं, जिसकी प्राथमिक जांच अभी बाकी है और जिसको एक सरकारी राष्ट्रीय आयोग ने मोटे तौर पर अव्यावहारिक एवं अनावश्यक करार दिया है।

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