नदियाँ जोड़िए, जरा सम्भल कर

Submitted by RuralWater on Thu, 05/05/2016 - 13:36
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दैनिक जागरण, 5 मई 2016

खेती को सूखे से बचाने व देश को बाढ़ की आपदा से कुछ हद तक सुरक्षित करने का उपाय अगर नदी जोड़ नहीं है, तो क्या है? पहला सटीक समाधान वाटर हार्वेस्टिंग जैसी तकनीकों में छिपा है, जिसमें बारिश का पानी जमा करने और ग्राउंड वाटर रीचार्ज करना होगा। इसके बावजूद नदियाँ जोड़ी जाती हैं, तो कहना होगा कि यह काम सम्भलकर और पूरी संवेदनशीलता के साथ हो, अन्यथा जीवन देने वाली नदियों का सूख जाना या बाढ़ के रूप में उनके कोप को सम्भाल पाना आसान नहीं होगा। देश में नदी जोड़ो अभियान को लेकर एक बार फिर सुगबुगाहट शुरू हो गई है। जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने हाल ही में कहा है कि नदी जोड़ने के सम्बन्ध में यह आशंका ज्यादा सही नहीं है कि इसका एक खराब असर समुद्र पर पड़ेगा। सुश्री भारती के मुताबिक नदियाँ आपस में जोड़ने के बाद उनका अतिरिक्त (सरप्लस) पानी का रुख बाढ़ के हालात में ही मोड़ा जाएगा। इससे बारिश के दिनों में नदियों के रास्ते में पड़ने वाले इलाकों में बाढ़ का खतरा कम हो जाएगा और सूखाग्रस्त इलाकों में बाढ़ का खतरा कम हो जाएगा और सूखाग्रस्त इलाकों को पानी मिल सकेगा।

हाल में जिस तरह उज्जैन में शुुरू हुए सिंहस्थ महाकुम्भ में सूखी पड़ी क्षिप्रा नदी को करीब 432 करोड़ रुपए के खर्च से बिछाई गई पाइप लाइन के जरिए नर्मदा के जल से भरपूर बनाया गया है, उससे साबित होता है कि देश की जरूरतों के मद्देनजर नदी जोड़ परियोजना वक्त की माँग है। पर इसमें जहाँ एक पर्यावरणीय दुष्प्रभावों की एक अहम भूमिका चिन्ता है, वहीं राजनीति भी इस परियोजना के आड़े आती है।

वैसे तो पिछले साल सितम्बर (2015) में आन्ध्र प्रदेश में गोदावरी और कृष्णा नदी को औपचारिक तौर पर जोड़कर नदी जोड़ अभियान की शुरुआत कर दी गई थी। इन दोनों नदियों को जोड़ने से इन राज्यों के एक बड़े इलाके के किसानों की किस्मत चमकने की उम्मीद की जा रही है। सरकार शुरू से ही कह रही है कि नदियों को जोड़ने पर उसका विशेष ध्यान है।

इस महायोजना के रास्ते में आने वाली हर तरह की बाधा का या तो हल निकाला जाएगा या उस बाधा को ही हटा दिया जाएगा। पिछले साल दिल्ली में आयोजित हुए ‘इण्डिया वाटर वीक’ में शहरी विकास मंंत्री एम वेंकैया नायडू ने भी नदी जोड़ योजना के सम्बन्ध में कहा था कि लोकतंत्र में हर कदम के विरोध में आवाजें तो उठती ही रहती हैं, उठने दीजिए, लेकिन उनका जवाब दिया जाएगा और नदियों को जोड़ने का काम अब और टाला नहीं जा सकता।

पर क्या नदियों पर परस्पर जोड़ने का काम आसान है? और क्या इसे देश में पड़ रहे सूखे, सिंचाई के लिये पानी की कमी और बाढ़ जैसी समस्याओं का पक्का समाधान निकल आएगा? नदी जोड़ो परियोजना के तहत देश की 30 नदियों को जोड़ने की योजना है। सरकार इस योजना के तहत पहली परियोजना का काम दो चरणों में सम्पन्न कराना चाहती है, जिसमें कम-से-कम सात साल लगेंगे।

केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय से दी गई जानकारी के अनुसार, 30 में से 16 परियोजनाएँ पर्वतीय क्षेत्र की हैं, जबकि शेष मैदानी क्षेत्र की हैं। पहली परियोजना के तहत गोदावरी-कृष्णा के बाद मध्य प्रदेश में केन और बेतवा नदियों को जोड़ा जाएगा। केन-बेतवा को जोड़ने से सम्बन्धी सभी औपचारिकताओं को पूरा किया जा चुका है, सिवाय मध्य प्रदेश वन्यजीव बोर्ड की मंजूरी के।

ध्यान रहे कि देश में नदी जोड़ परियोजना के बारे में एक सुचिन्तित प्रयास अटल बिहारी वाजपेयी के शासन वाली एनडीए सरकार के दौरान हुआ था जब सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में इसके लिये एक टास्क फोर्स गठित की गई थी। इसे 12वीं पंचवर्षीय योजना में शामिल करते हुए अनुमान लगाया गया था कि नदियाँ जोड़ने के काम में अनुमानतः पाँच लाख 60 हजार करोड़ का खर्च आएगा।

हालांकि यह खर्च और भी ज्यादा हो सकता है कि क्योंकि इसी तरह की एक योजना तीन साल पहले चीन में शुरू की गई है, जहाँ सिर्फ दो नदियों को जोड़ने पर करीब चार हजार अरब रुपए का अनुमानित खर्च आया है। चीन ने अपनी सबसे बड़ी नदी यांगत्जे और देश की नम्बर दो पीली नदी की जलधारा को जोड़ने की पाँच दशक पुरानी परियोजना के जरिए यांगत्जे नदी से तकरीबन डेढ़ अरब घनमीटर पानी हर साल सूखाग्रस्त शांदोंग प्रान्त में भेजने का लक्ष्य रखा है ताकि इस प्रान्त में पानी की कमी के गम्भीर संकट से निपटा जा सके।

पड़ोसी चीन के लिये भी यह काम आसान नहीं रहा क्योंकि दक्षिण-उत्तर जलमार्ग परिवर्तन परियोजना की परिकल्पना सबसे पहले चीनी नेता माओ जेदांग ने 1952 में की थी। करीब आधी सदी तक चली बहस के बाद चीनी कैबिनेट ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को दिसम्बर, 2002 में मंजूरी दे दी थी, जिसके बाद लाखों लोगों को विस्थापित किया गया था। चीन के उदाहरण को सामने रखकर देखें तो कहा जा सकता है कि हमारे देश में नदियों को परस्पर जोड़ना कितनी चुनौती हो सकता है। इसमें सबसे पहली बाधा राजनीतिक है, दूसरी व्यावहारिकता की और तीसरी पर्यावरणीय दुष्प्रभावों व खर्च की।

पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच सतलुज-यमुना लिंक नहर की हैसियत इसके सामने कुछ भी नहीं है, पर इसके बावजूद पंजाब अपने हिस्से का एक लीटर पानी भी कहीं और जाने देने को राजी नहीं है। ऐसे में 30 नदियों को जोड़ने की परियोजना कितने राज्यों के बीच किस-किस तरह के विवादों का विषय बनेगी और इसका नतीजा देश के लिये कैसा होगा, यह कोई भी सोच सकता है।

इसका एक पक्ष परियोजना के लिये जमीनों के अधिग्रहण का है। देश का कोई कोना ऐसा नहीं है जहाँ सड़क, रेल, बिजली घर, खान, उद्योग या आवासीय कॉलोनियाँ बनाने के लिये किये गए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ उग्र आन्दोलन न चल रहे हों। चूँकि नदी जोड़ो परियोजना के लिये ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट की तुलना में कहीं ज्यादा जमीन की जरूरत होगी, इसलिये सवाल है कि क्या ऐसे में अदालतें किसानों की अपीलों को अनसुना कर पाएँगी?

देश में सबसे पहले मद्रास प्रेसीडेंसी में काम करने वाले सर आर्थर काटन ने 19वीं सदी में दक्षिण भारत में नदियों को आपस में जोड़ने की योजना बनाई थी ताकि यहाँ के अन्दरूनी इलाकों को पानी मुहैया कराया जा सके। लेकिन आगे चलकर इस योजना को रद्द करना पड़ा। इसके बाद 1963 में तत्कालीन केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री के एल राव ने गंगा-कावेरी लिंक का प्रस्ताव रखा जिसे कैबिनेट ने व्यावहारिक नहीं माना। बीसवीं सदी के 79 के दशक में कैप्टन दिनशा दस्तूसर ने माला नहर (गारलैंड कैनाल) का प्रस्ताव दिया।

इसी तरह 80 के दशक में जल संशाधन मंत्रालय ने अन्तरबेसिन स्थानान्तरण की परिकल्पना की। ऐसे प्रस्तावों की व्यावहारिकता का अध्ययन करने के लिये 1982 में राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (एनडब्ल्यूडीए) की स्थापना की गई जिसने ‘इंटरलिंकिंग ऑफ रिवर्स प्लान’ तैयार किया। वर्ष 1999 में इस योजना की समीक्षा के लिये एक राष्ट्रीय आयोग का गठन हुआ, जिसका निष्कर्ष यह था कि इतने बड़े पैैमाने पर पानी के स्थानान्तरण की कोई आवश्यकता नहीं है।

सवाल यह है कि आखिर खेती को सूखे से बचाने व देश को बाढ़ की आपदा से कुछ हद तक सुरक्षित करने का उपाय अगर नदी जोड़ नहीं है, तो क्या है? पहला सटीक समाधान वाटर हार्वेस्टिंग जैसी तकनीकों में छिपा है, जिसमें बारिश का पानी जमा करने और ग्राउंड वाटर रीचार्ज करना होगा। इसके बावजूद नदियाँ जोड़ी जाती हैं, तो कहना होगा कि यह काम सम्भलकर और पूरी संवेदनशीलता के साथ हो, अन्यथा जीवन देने वाली नदियों का सूख जाना या बाढ़ के रूप में उनके कोप को सम्भाल पाना आसान नहीं होगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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