नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा में तब्दील होगा स्पर्श गंगा बोर्ड

Submitted by Hindi on Thu, 09/07/2017 - 10:25

.वैसे तो गंगा के सवाल पहले से ही गंगा के पानी के साथ तैरते रहे, परन्तु गंगा के सवाल वर्ष 1982 से इसलिये खड़े हैं कि गंगा संरक्षण और गंगा की अविरलता पर सरकारों ने अरबों रुपयों का वारा-न्यारा किया है। हालाँकि गंगा की धारा अपने प्राकृतिक स्वरूप से कुछेक जगहों को छोड़कर अविरल बहती रही है, मगर गंगा का पानी, बजट के आने से अत्यधिक प्रदूषित होता जा रहा है। गंगाजल को आचमन करने से पहले कोई भी नागरिक एक बार सोचता है कि गंगा का पानी कहाँ से आचमन करूँ। जबकि पहले गंगा एक्शन प्लान, फिर स्पर्श गंगा और अब निर्मल गंगा के तहत ‘नमामि गंगे’ जैसी लोक लुभावनी योजनाएँ सरकारें चला रही हैं। प्रधानमंत्री का क्लीन गंगा का सपना कब पूरा होगा यह तो समय ही बता पायेगा। यह तय है कि जब तक आम लोग इन सरकारी अभियानों से नहीं जुड़ेंगे तब तक ‘क्लीन गंगा और अविरल गंगा’ की कल्पना करना दिवास्वप्न ही कहा जायेगा।

ज्ञात हो कि वर्ष 2010 में उत्तराखण्ड राज्य की भाजपानीत सरकार ने ‘स्पर्श गंगा बोर्ड’ का गठन किया है। जिसके लिये मशहूर फिल्म अदाकारा हेमा-मालिनी और विवेक ओबराय को गंगा एम्बेसडर बनाया गया। यही नहीं जिस दिन गंगा एम्बेसडर को लॉन्च किया गया उसी दिन ऋषिकेश स्थित एक भव्य आयोजन में करोड़ो रुपयों को ठिकाने लगाया। ऐसा बताया जाता है कि अकेले हेमा मालिनी को इस पदवी के लिये लगभग 14 करोड़ का भुगतान राज्य सरकार ने किया है। दिलचस्प तथ्य यह है कि स्पर्श गंगा बोर्ड का गठन भाजपा राज में हुआ है और अंत भी भाजपा राज में होने जा रहा है। 2010 में हुए कुम्भ से पूर्व यानि दिसम्बर 2009 में तत्कालीन सीएम डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने स्पर्श गंगा बोर्ड के गठन की घोषणा की थी, जो फरवरी 2010 में विधिवत रूप से वजूद में आ पाया। इसी क्रम में स्पर्श गंगा के प्रमोशन के लिये चार अप्रैल 2010 को ऋषिकेश में एक विशाल कार्यक्रम सरकार द्वारा आयोजित किया गया।

जिसमें पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, धार्मिक गुरू दलाईलामा सहित कई नामचीन हस्तियों ने हिस्सा लिया। कौतूहल का विषय यह है कि जितने लोग इस दौरान इस आयोजन में सम्मिलित हुए यदि वे लोग चाहते तो गंगा अब तक निर्मल हो जाती। वे लोग स्पर्श गंगा के ऋषिकेश कार्यक्रम में जरूर आये और खूब अखबारी सुर्खियाँ भी बटोरी फलतः दूसरे ही दिन गंगा के सवाल उन नामचीन हस्तियों के दिलों से गायब ही हो गये। ऐसा इसलिये कहा जा रहा है कि जितने भी लोग इस आयोजन में हिस्सा ले रहे थे वे अपने देश की सत्ता चलाने वाली शक्तियों में शुमार है। हाँ अब ऐसा जरूर हो गया कि हमारे प्रधानमंत्री का ‘क्लीन गंगा’ एक ड्रीम प्रोजेक्ट बन गया है। इसलिये गंगा के इस आबाद क्षेत्र में रह रहे लोग और गंगा पर आस्था रखने वाले करोड़ों लोगों का विश्वास बनता जा रहा है कि कम से कम हमारे देश के प्रधानमंत्री ने गंगा की दुर्दशा पर संवेदनशीलता दिखाई है।

फिर भी सवाल यहाँ खड़ा हो जाता है कि स्पर्श गंगा बोर्ड अब भंग करके इसको ‘नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा’ में मर्ज किया जायेगा। जिसकी कानूनी प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है। इस पर संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज का कहना है कि वे इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते, परन्तु वे इतना कहना चाहते हैं कि गंगा स्वच्छता के लिये चलने वाले सभी अभियानों की एक दिशा रखनी सरकार की प्राथमिकता में है। ताज्जुब हो कि 1982 से लेकर अब तक गंगा के सवाल सरकारों के गलियारों में तैरते ही जा रहे हैं और सरकारें हैं जो अलग-अलग नामों से सिर्फ अभियान व कार्यक्रम की रूप-रेखा ही बनाती जा रही है। गंगा और उसकी सहायक नदियों में हो रहे प्रदूषण को रोकने के लिये गंगा एक्शन प्लान, स्पर्श गंगा और नमामि गंगे कार्यक्रमों के तहत विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों, स्कूली बच्चों, कॉलेजों के साथ अनेकों जागरूकता के कार्यक्रम चलाये गये। फिर भी गंगा की धारा दिन-प्रतिदिन गंदली ही होती जा रही है।

gangaउत्तराखण्ड में गंगा की हालात बहुत ही नाजुक बनती जा रही है। एक तरफ गंगोत्री से लेकर हरिद्वार तक गंगा का पानी आचमन करने के लायक नहीं रह गया है और दूसरी तरफ गंगा पर बन रही जलविद्युत परियोजनाएँ भी गंगा की अविरलता पर अप्राकृतिक दोहन कर रही है जिससे गंगा की धारा गंदली और जहरीली बनती जा रही है। कभी गौमुख से लेकर हरिद्वार तक कहीं पर भी लोग गंगाजल को अपने घरों तक भरकर ले जाते थे पर अब ऐसा नहीं रह गया है, सिवाय गंगोत्री के। गंगोत्री से लगभग सात किमी पहले भैरवघाटी से ही गंगा पर जलविद्युत परियोजनाएँ निर्माणाधीन है। इस निर्माण से गंगा में गिर रहे केमिकल के कारण गंगाजल की औषधीय शक्ति क्षीण होती जा रही है। इसी तरह अलकनंदा और मंदाकिनी के पानी की स्थिति है। यही नहीं गंगा की सभी धारायें इसलिये प्रदूषित हो रही है कि इन पर बड़ी-बड़ी परियोजनाएँ निर्माणाधीन है। इस निर्माण के दौरान जो सामग्री प्रयोग हो रही है उससे पानी की शुद्धता प्रभावित ही नहीं हो रही है बल्कि कई जगहों पर प्राकृतिक जलस्रोतों की सूखने की खबरें भी आ रही हैं।

मजेदार बात यह है कि निर्मल गंगा को लेकर लगभग 40 वर्ष होने जा रहे हैं। 40 वर्षों में गंगा के किनारे जितने भी शहर, बाजार, गाँव विकसित हुए उन्हीं का पर्यावरण इन 40 वर्षों में सर्वाधिक प्रदूषित हुआ है। क्या कारण है कि इतनी महत्त्वपूर्ण योजना अब तक जमीनी रूप नहीं ले पाई? और तो और पिछले 40 वर्षों में गंगा की धारा को ना तो प्रदूषण से बचाया गया और ना ही गंगा के किनारे मौजूद पारम्परिक घाटों का सौन्दर्यीकरण हुआ। इतना जरूर हुआ कि गंगा के किनारे सरकारी और गैर सरकारी अतिक्रमण सर्वाधिक बढ़ा है। इस अतिक्रमण की पोल तब खुली जब साल 2013 की आपदा ने अपना विद्रुप रूप दिखाया और अतिक्रमण को अपने बहाव क्षेत्र से सफाया कर दिया। जिसमें जन-धन की बराबर हानि हुई है।

जानकारों का कहना है कि यदि गंगा के किनारे अतिक्रमण नहीं होता तो इतनी जनहानी नहीं होती। यही नहीं पर्यावरणविदों का आरोप है कि एक तरफ गंगा पर निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं ने ही आपदा को न्योता दिया है और दूसरी तरफ गंगा किनारे बढ़ रहे अतिक्रमण ने आपदा को आग देने का काम किया है। कहा कि गंगा प्रदूषण का सवाल तो ऐसी परिस्थिति में गौण ही हो जाता है। कौन भला जो गंगा को प्रदूषित करने वालों की पहचान करवाये। क्योंकि गंगा प्रदूषण, गंगा पर अतिक्रमण, गंगा के बहाव क्षेत्र में बढ़ रही आपदा की घटना के सवालों के जवाब आज भी हमारे जननायक नहीं दे पा रहे हैं। जो अब यक्ष प्रश्न बन चुका है।

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