पानी में गलते विस्थापितों की जीत

Submitted by Hindi on Fri, 09/14/2012 - 16:26
Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, सितंबर 2012
सुनो/वर्षों बाद
अनहद नाद/दिशाओं में हो रहा है
शिराओं से बज रही है/एक भूली याद वर्षों बाद ......।


ओंकारेश्वर और इंदिरा सागर बांध के संबंध में वर्ष 1989 में नर्मदा पंचाट के फैसले में यह स्पष्ट कर गया था कि हर भू-धारक विस्थापित परिवार को जमीन के बदले जमीन एवं न्यूनतम 5 एकड़ कृषि योग्य सिंचित भूमि का अधिकार दिया जायेगा। इसके बावजूद पिछले 25 सालों में मध्यप्रदेश सरकार ने एक भी विस्थापित को आज तक जमीन नहीं दी है। लेकिन 17 दिन के जल सत्याग्रह से सत्याग्रहियों ने सरकार को नाकों चने तो चबवा दिए हैं।

दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां 10 सितम्बर 2012 को तब चरितार्थ हो गई जबकि मध्य प्रदेश सरकार ने खंडवा जिले के घोघलगांव में पिछले 17 दिनों से जारी जल सत्याग्रह के परिणामस्वरूप सत्याग्रहियों की मांगे मान लीं तथा विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन देने का भी एलान किया। सरकार ने ओंकारेश्वर बांध का जलस्तर घंटों में कम भी कर दिया। यह एक ऐतिहासिक जीत थी। सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरियां गांव वालों के सामने रहीं कि वे उसी मोटली माई (नर्मदा), जिसे वे पूजते हैं, में स्वयं को गला देने के लिए मजबूर हो गए। दरअसल विस्थापन एक मानव निर्मित त्रासदी है। कभी कभार सरकारी अधिकारी भी इसके पक्ष में सुर अलापने लगते हैं। सोचना होगा यह कैसा विकास है और किसकी कीमत पर किसका विकास? पूरे देश और दुनिया में विकास बनाम विनाश की इस अवधारणा को सामने लाने का और इस पर बहस छेड़ने का काम नर्मदा बचाओ आंदोलन ने किया है और इस बहस की परिणति ही है यह जल सत्याग्रह।

मुनव्वर राणा कहते हैं
धूप वायदों की बुरी लगने लगी है अब हमें,
अब हमारे मसअलों का कोई हल भी चाहिए।


ओंकारेश्वर और इंदिरा सागर बांध के संबंध में वर्ष 1989 में नर्मदा पंचाट के फैसले में यह स्पष्ट कर गया था कि हर भू-धारक विस्थापित परिवार को जमीन के बदले जमीन एवं न्यूनतम 5 एकड़ कृषि योग्य सिंचित भूमि का अधिकार दिया जायेगा। इसके बावजूद पिछले 25 सालों में मध्यप्रदेश सरकार ने एक भी विस्थापित को आज तक जमीन नहीं दी है। इस मसले पर पीड़ितों ने 2008 में उच्च न्यायालय में याचिका दायर की और उस पर उच्च न्यायालय ने प्रभावितों के पक्ष में दिये अपने निर्णय में कहा था कि सरकार को पुनर्वास नीति का कड़ाई से पालन करना होगा। इस फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। पिछले साल 11 मई 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए यह कहा है कि इस हेतु जो भी किसान इच्छुक हैं वे शिकायत निवारण प्राधिकरण के समक्ष अपना आवेदन कर सकते हैं।

इस आदेश के बाद ओंकारेश्वर बांध के 2500 विस्थापितों ने जमीन के आवेदन भरे, जिसमें से 1000 से ज्यादा आवेदनों की सुनवाई शिकायत निवारण प्राधिकरण पूरी कर चुका है व आवेदनों पर सुनवाई जारी है। 225 से ज्यादा आदेश आ चुके हैं। प्राधिकरण ने सरकार तथा परियोजनाकर्ता कम्पनी को यह आदेश दिया है कि वे प्रभावितों द्वारा आधा मुआवजा लौटाने पर उनको 5.5 एकड़ जमीन प्रदान करें या 5 एकड़ जमीन खरीदने पर आर्थिक मदद करें। सर्वोच्च न्यायालय यह भी कहा है कि दी जाने वाली जमीन किसान की मूल जमीन से खराब नहीं हो सकती है तथा वह अतिक्रमित भी नहीं हो। न्यायालय ने यह भी कहा है कि जमीन आवंटन का काम बांध निर्माण के पूर्व पूरा करना पड़ेगा।

गौरतलब है कि 24 जुलाई 2012 को ओंकारेश्वर का यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय ने इंदिरा सागर के विस्थापितों पर भी लागू कर दिया कि जिससे इंदिरा सागर बांध के 20,000 से अधिक किसान 5.5 एकड़ सिंचित जमीन के पात्र बन गये। जमीन देने के आदेशों से बौखलाई सरकार तथा एन.एच.डी.सी. कम्पनी अब इंदिरा सागर तथा ओंकारेश्वर परियोजना का जलस्तर बढ़ाने में तुली हुई थी ताकि सभी विस्थापित इधर-उधर भटक जाये व पुनर्वास नीति विफल हो जाये। अपनी इसी मांग को लेकर 16 जुलाई से अनशन कर रहे लोग 25 जुलाई को अचानक जलस्तर बढ़ाए जाने के विरोध में खंडवा के घोघलगांव में जल सत्याग्रह पर बैठ गए और उन्होंने 17 दिन अपने शरीर को गलाना जारी रखा।

अपने घरों में, खेतों में घुस रहे पानी को लेकर लोगों ने सत्याग्रह शुरू किया। बरसात के गंदे पानी में, कीड़े मकौड़ों के बीच उन्होंने अपने कीचड़ से सने पैरों से सत्ता के अहंकार को रौंद दिया। 17 दिनों के लंबे जल सत्याग्रह और उस पर देश और दुनिया में मचे बवाल पर सरकार को उनकी मांगें मानने पर मजबूर होना पड़ा। लेकिन सरकार के झुकने की क्या यही वजहें थीं? वैसे सरकार अक्टूबर माह के अंतिम सप्ताह में इंदौर में सरकार विश्व के कुछ चुनिन्दा उद्योगपतियों के साथ एक निवेशक बैठक (सरकार भाषा में इन्वेस्टर्स मीट) करने जा रही है। इस जल सत्याग्रह से यह संदेश जाता कि सरकार के पास जमीन नहीं है और मध्यप्रदेश में जमीन अधिग्रहण में सरकार मदद नहीं करती है। सरकार इस तरह की निवेशक बैठक के पहले निवेशकों को लुभाने के लिए वैश्विक स्तर पर विज्ञापन जारी करती है तो उसमें लिखा होता है सस्ती दरों पर बड़ी परियोजनाओं के लिए एक मुश्त जमीन की उपलब्धता। सरकार यह भी कहती है कि तीव्र औद्योगिक विकास में सहायक होना, मध्यप्रदेश सरकार की नीति है। इस मीट की व्यवस्थाएं सर्वोच्च प्रशासनिक एवं राजनीतिक तंत्र देखता है।

इस बीच जब एशियाई मानवाधिकार आयोग ने दुनियाभर में मध्यप्रदेश सरकार की इस अमानवीय हरकत को साझा किया तो दुनियाभर में सरकार की किरकिरी हुई। रही-सही कसर केंद्रीय प्रतिनिधि मंडल के खंडवा पहुंचने की खबर ने पूरी कर दी। अतएव प्रतिनिधिमंडल आने के पहले कुछ निर्णय लेना जरुरी था। सरकार की मंशा पर सवाल यहां भी खड़ा होता है कि जब सत्याग्रही अपने सत्याग्रह के 15वें दिन में प्रवेश कर रहे थे, तब मुख्यमंत्री भोपाल में ही कलेक्टर-कमिश्नर कांफ्रेंस में बोल रहे थे कि वे उद्योगपतियों को जमीन आवंटित करने के लिए दफ्तरों के चक्कर न लगवाएं बल्कि सर्व सुलभ तरीके से उन्हें जमीन अधिग्रहण में भी मदद करें। सरकार ने सत्याग्रहियों के साथ बातचीत करने के लिए एक (अ)शिष्ट मंडल बनाया। यह शिष्ट मंडल इतना अशिष्ट था कि बगैर सत्याग्रहियों की पूरी बात सुने उनसे लड़ कर आ गया। इस शिष्ट मंडल के सदस्य और अब बनी समिति के अध्यक्ष ने सोमवार को एक टी.वी. चैनल पर कहा कि हम सरकार हैं और हम पैसा लुटा नहीं सकते हैं। हरदा के खरदना में चल रहे जलसत्याग्रह पर तल्ख टिप्पणी करते उन्हें कहा कि सत्याग्रही वहां से उठें, नहीं तो हम सरकार हैं और शासन करना हमें भी आता है।

सरकार की असवंदेनशीलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार के राहत एवं पुनर्वास विभाग को अभी तक यही नहीं पता है कि मध्यप्रदेश में अलग-अलग विकास परियोजनाओं से कितने लोग विस्थापित हुए हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन जिसने सक्रियता दिखाते हुए कुछ बांधों से विस्थापितों की सूचियां तैयार करने का काम किया था तो यह आंकड़ा मिल पा रहा है। अफसोस यह कि सरकार इन्हें अब मध्यस्थ कहती है और बरगलाने का आरोप लगा रही है। सरकारें हमेशा से हाशिए के लोगों को कमतर आंकती रही हैं और देशहित के नाम पर उनकी बलि चढ़ाती रही हैं। इस बार सत्याग्रहियों ने सरकार को नाकों चने तो चबवा दिए हैं। अब सत्याग्रहियों की मुश्किलें और बढ़ गयी हैं क्योंकि अब उन्हें इस निष्ठुर सरकार से उसकी विपरीत मानसिकता के बावजूद उपजाऊ जमीन निकलवानी है और सही मायने में लोकतंत्र को स्थापित होने में मदद करनी है।

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