पंचायती राज : सब कुछ बुरा नहीं है

Submitted by Hindi on Thu, 04/25/2013 - 12:47
देखें तो, न्याय पंचायत तीसरे स्तर की न्यायपालिका है, पंचायत तीसरे स्तर की कार्यपालिका और ग्राम सभा का दर्जा ‘तीसरी सरकार’ का है। आज 29 विभागों की विकास योजनाओं का क्रियान्वयन पंचायतों के माध्यम से होता है। पंचायतों से ठीक से काम लेने का काम ‘तीसरी सरकार’ है। पंचायती राज अधिनियम ने भी इस ‘तीसरी सरकार’ को तवज्जो दी है। 18 वर्षीय प्रत्येक ग्रामीण को इस ‘तीसरी सरकार’ की सासंदी दी है। असंतुष्ट होने पर पंच-सरपंच को वापस बुलाने का अधिकार आज भी पंचायती क़ानूनों में है। अब पंच परमेश्वर नहीं रहा। दलगत पैठ ने पंचों को मुशी प्रेमचंद का अलगू चौधरी और जुम्मन शेख बनने के गौरव से महरूम कर दिया है। जितना ज्यादा पैसा पंचायतों को मिला, पंच-सरपंच उतने ज्यादा भ्रष्ट हुए। पंचायतें सिर्फ सरकारी योजनाओं की क्रियान्वयन एजेंसी बनकर रह गई हैं और पंच-प्रधान उसके एजेंट। आर्थिक बंधन ने उनके स्वतंत्र अस्तित्व को खत्म किया है। राजीव गांधी जी ने सत्ता के पूर्ण विकेन्द्रीकरण का सपना सामने रखा था। यह आधा-अधूरा विकेन्द्रीकरण है... आदि आदि। इनमें से प्रत्येक कमी पर एक-एक लेख लिखा जा सकता है; जरूरत हो तो किताब भी; लेकिन मैं उस सरपंच उरमाबाई को कैसे भूल जाऊं, जिसे मैने अंगूठा छाप होने के बावजूद शाम के धुंधलके में ‘पढ़वा चलो रे’ का हरकारा लगाते सुना है...शराबियों से भिड़ते देखा है? उसका आदिवासी गांव कभी दिल्ली-मुंबई रुट की ट्रेनों को रोककर कपड़ा-खाना लूट लेने के लिए बदनाम था। उरमाबाई के सरपंच बनने के बाद मैने कलेक्टर को उस गांव की पीठ थपथपाते देखा है। मैं खुद लंबे अरसे तक उरमाबाई पर फिल्म बनाने का सपना संजोये रहा। मैं कैसे भूल जाऊं?

आदिवासी संजो कोल कभी बंधुवा मजदूर थी। चित्रकूट की गिर दुहा पंचायत की प्रधान बनी। अपने काम के कारण प्रधानमंत्री की पत्नी श्रीमती गुरुशरण कौर के हाथों नवाजी गई। मैं फर्श से अर्श पर पहुंचने की उसकी इस गौरव गाथा को मानने से कैसे इंकार कर दूं? मैने महासमंद जिले की विधवा प्रभा साहू के हाथों को ताकत से भरते देखा है। राधा देवी उत्तराखंड की मीठीबेरी पंचायत से लगातार तीन बार जीती और छीन ली सड़क वापस ले आई। अमेठी के मेरे खुद के मजरा सरैंया दुबान के चुनाव में मैने एक गरीब-पिछड़े नौजवान को मैने अगड़ों से आगे जाते देखा है। पंचायती राज अधिनियम के कारण हुए इस सामाजिक सकारात्मक उलटफेर को भला मैं कैसे नज़रअंदाज़ कर दूं? क्या आप कर सकते हैं? उदाहरण सिर्फ इतने नहीं है, पूरा देश ही ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। अरूणा रॉय सफल पंच-सरपंचों की कितनी ही कहानियां आपको सुना सकती हैं। नजीर चाहे हिवरे बाजार की हो या सरपंच इलिंगो की, सबक एक ही है कि सब कुछ बुरा नहीं है।

मेरा नज़रिया भी कभी इतना ही नकारात्मक था। मैं भी सोचता था कि व्यवस्था बहुत खराब है। इस व्यवस्था में कुछ नहीं हो सकता। इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल देना चाहिए। लेकिन सफल उदाहरणों ने मुझे गलत साबित किया। आज मैं कहता हूं कि व्यवस्था में बहुत कुछ बदलने की जरूरत है, लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है, जिसे बदलने की जरूरत कतई नहीं है। आज मैं मानता हूं कि इस व्यवस्था में जो कुछ अच्छा भी है; आइये! तलाशें..उसे बढ़ाएं!!.... उसकी चर्चा करें!! अच्छा अपने आप फैल जायेगा, तो बुरे पर खुद-ब-खुद लगाम लगने लगेगी। एक दिन व्यवस्था के बुरे पहलुओं को सुधारने की भी ताकत बन ही जाएगी।

देखें तो, न्याय पंचायत तीसरे स्तर की न्यायपालिका है, पंचायत तीसरे स्तर की कार्यपालिका और ग्राम सभा का दर्जा ‘तीसरी सरकार’ का है। आज 29 विभागों की विकास योजनाओं का क्रियान्वयन पंचायतों के माध्यम से होता है। पंचायतों से ठीक से काम लेने का काम ‘तीसरी सरकार’ है। पंचायती राज अधिनियम ने भी इस ‘तीसरी सरकार’ को तवज्जो दी है। 18 वर्षीय प्रत्येक ग्रामीण को इस ‘तीसरी सरकार’ की सासंदी दी है। असंतुष्ट होने पर पंच-सरपंच को वापस बुलाने का अधिकार आज भी पंचायती क़ानूनों में है। ग्रामीण अपने छोटे-छोटे कामों को लिए प्रधानों के चक्कर काटते हैं; एवज् में वह उन से दलाली खाता है। जो वह तय करता है, वह तय करने का अधिकार तो ग्रामसभा का है। फिर भी हम ऐसा होने देते हैं। क्यों?

कितनी ही योजनाओं में लाभार्थियों का निधार्रण ग्रामसभा की खुली बैठक में ग्रामसभा की सहमति से किए जाने के प्रावधान हैं। “मनरेगा के तहत् कौन सा काम होगा? कहां होगा? यह तय करने का अधिकार किसका है? ...ग्रामसभा का। काम का सोशल ऑडिट कौन करेगा... ग्राम सभा।’’ रेडियो-टेलीविजन पर प्रसारित होता यह विज्ञापन आज भी दिन में कई बार हमें याद दिलाता है कि जिस लोकपाल की मांग अन्ना साथी संसद से कर रहे हैं, वह तो मनरेगा एक्ट के द्वारा हर ग्रामसभा को पहले से ही मिला हुआ है। अब हम उसका उपयोग न करें, तो इसमें व्यवस्था का क्या दोष? मनरेगा एक्ट प्रत्येक ग्रामसभा को उसके गांव के विकास की योजना बनाने का हक देता है। खुद की योजना! खुद का क्रियान्वयन!! इसे व्यापक पैमाने पर लागू करने की जरूरत है। लेकिन इससे पहले जरूरत है, प्रत्येक ग्रामसभा को उसके दायित्व और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करने तथा योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु सक्षम बनाने की। अच्छा हो कि दिल्ली का जंतर-मंतर घेरने से पहले हम अपने गांव की मुट्ठी बांधें और अपनी ग्राम पंचायत को घेर लें। क्या हम ऐसा करेंगे?

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